पहाड़ियों को गले लगाती लहरों की भूमि विशाखापत्तनम

आंध्रप्रदेश व तेलंगाना | भारत | विशाखापट्टनम

आनंदा  हाइट्स

हर्षा पेशे एक मैकेनिकल इंजीनियर है। जानी मानी कंपनी में कार्यरत हैं।

एक एक कर उनके सभी मित्र कार्यालय के लिए निकल रहे हैं। टू बीएचके फ्लैट में रह रहे हर्षा के साथ उनके तीन मित्र और हैं जो यहाँ निवास करते हैं।

रात्रि में दो अलग अलग कमरों में मैं और साथी घुमक्कड़ को सोने को मिला जिनके साथ हर्षा के एक मित्र सोए।

मेरे कमरे में सोए जनाब से घंटेभर चली वार्ता में विस्तार से अब तक के सफर के बारे में पूछा।

घूमने के तरीके और भिन्न भिन्न जगहों के बारे में भी। एक सवाल जो जनता से बहुत आम पूछा जाता है वो ये की सबसे पसंदीद जगह कौन सी है अभी तक की घूमी हुई जगहों में!

जगह सभी खास होती हैं। जगह लोगों से बनती है जिसे बनता है इतिहास। कुदरती जगहें भी स्थानीय लोगों के बरताव पर निर्भर हैं।

अगर कुदरत के साथ छेड़छाड़ नहीं तो वो उन्हें नुकसान नहीं पहुंचाती। यही ऐतिहासिक जगहों का है।

निर्भर करता है की शहर का निवासी कितना सजग है अपनी धरोहर को ले कर।

 ये सब सुन कर दूसरे बिस्तर पर विराजमान साहब के कान फटे के फटे रह गए और आंखे खुली।

अपनी घुमक्कड़ी के बारे में बताते हुए बोले की ये सारे लोग तो दफ्तर से छुट्टी ले कर ही जाते हैं।

मेरी तरह एक बार में इनके लिए संभव नहीं। कब सो गया याद नहीं। पर जब आंख खुली तो साथी साहब नदारद थे।

नई सुबह

थकान के कारण भरपूर नींद ली। जिस वजह से देर सुबह साढ़े आठ बजे आंख खुली।

घर में कोई है तो उनके एकमात्र मित्र जिनको छोड़ बाकी सब निकल चुके हैं दफ्तर।

अब मैं भी निकलने कि तैयारी करने में जुट गया हूँ। बिस्तर समेटने के बाद स्नान ध्यान कर ले तैयार होने लगा।

हर्षा फोन से अपने मित्र को निर्देश दे रहे हैं की क्या क्या करना है।

साथी घुमक्कड़ मेरे उठने के बाद ही उठा। वो भी दूसरे कमरे से निकल कर तैयारी करने लगा निकलने की।

बैग ऐसे के ऐसे ही तहे रखे हैं बस उठा कर निकल जाना है।

साथी घुमक्कड़ ने अवगत कराया कि उनके मामा के मित्र गजुवाका में ही रहते हैं।

तो क्यों ना उनके घर उनसे मिला जाए। इसकी चर्चा सफर के दौरान हुई थी की मित्र के मामा के मित्र विशाखापत्तनम में भारतीय नौसेना में तैनाती है।

हर्षा का मित्र मेरे तैयार होते ही हमे ले गया ऊपर माले पर नाश्ते के लिए। मैं साथी घुमक्कड़ के साथ यहाँ आ पहुंचे नाश्ता करने।

डोसा, इडली, थेपला जैसी सब व्यंजन हैं। जो मुझे याद दिलाते हैं बैंगलोर के हॉस्टल की जब स्नातक करने के बाद नौकरी ढूंढें घर से निकला था तो आए दिन यही नाश्ता मिला करता था।

हर्षा ने फोन पर बताया की नाश्ता करने के बाद फ्लैट में ताला डाल कर यहीं के रसोड़े वाले भैया को चाभी पकड़ा दें।

हम दो प्राणियों के सिवा अन्य कोई नहीं है फ्लैट में। नाश्ता करने के बाद नीचे कमरे में आ गया।

हॉल में रखा बैग उठाया और निकल पड़ा बाहर। ताला लगा कर चाभी कहे हुए व्यक्ति को पकड़ा देता हूँ।

ऊपर माले में जाता की सफाई कर्मचारी ही आ गया इनके फ्लैट में। निकलने से पहले मैंने चाभी इन्ही महाशय को थमा दी।

हर्षा से फोन पर बात कर निकल पड़ा गाजूवाका। ये मेरी हर्षा से आखिरी वार्ता थी।

हमउम्र मामा के मित्र से मिलने का विचार अच्छा है। इसी विचार के साथ मैं हर्षा के घर से प्रस्थान कर गया।

गाजुवाका

इमारत से बाहर निकलते हुए सड़क पार कर वाहन का इंतजार करने लगा।

तेज धूप में आगनमपुडी से बस में बैठकर गाजुवाका निकल चुका हूँ। उधर साथी घुमक्कड़ के मामा ने बताया की गाजूवाका में सारा इंतजाम हो चुका है।

इधर बस में भीषण गर्मी के कारण शरीर से पसीना ऐसे टपक रहा है जैसे किसी ने नल खुला छोड़ दिया हो।

ऊपर से ये चौराहे चौराहे जाम और विलंब करवा रहा है। अब तक मामा के मित्र से संपर्क साधा जा चुका है।

उनके द्वारा भेजी गई दिशा पर बढ़ना है।

गाजुवाका चौराहे पर उतर कर चल पड़ा निर्देशित दिशा में।

यहाँ बाज़ार और गलियों से गुजरते हुए साथी घुमक्कड़ में मामा मित्र(अनुराग) के घर को ढूंढने लगा।

घर की पहचान के लिए अनुराग जी ने पानी की टंकी तक आने का इशारा किया है।

टंकी के निकट ही उनका घर है। आसमान की तरह आंखे गड़ाए टंकी ढूंढने लगा। दो गली छोड़ कर टंकी मिल गई।

उसी के ठीक सामने के घर के दरवाज़े पर एक नौजवान महिला चश्मा लगाए हुए, हांथ में मोबाइल यंत्र और चेहरे पर मुस्कुराहट के साथ खड़ी हुई है।

अपने गांववासी

उन्होंने मेरी तरफ देख कर हांथ हिलाने लगीं तो मैं कुछ समझा शायद यही मामी हैं।

बैग ले कर आ गया। मुलाकात हुई और मैं अंदर कमरे में विराजमान हो गया।

पुष्टि करने पर उन्होंने हामी भरी और बताया कि अनुराग जी अभी नौसेना कार्यालय में हैं।

साथी घुमक्कड़ के मामा का नाम भी अनुराग है। मामी के पति का भी नाम है।

दोनों ही भारतीय नौसेना ने कार्यत हैं जिसके दौरान इन दोनों की मित्रता हुई।

अब साथी घुमक्कड़ के मामा का तबादला कोचिन हो गया है। 

शुरुआत में तो मामी ने मुझे ही अनुराग(कोच्चि) मामा का भांजा मान लिया।

जबतक उनको टोका नहीं तब तक। स्वागत में मामी कोई कमी नहीं होने दे रही हैं। चाय नाश्ता मैगी सब बनाकर स्वागत में ला रही हैं।

हो भी क्यों ना उन्ही के गांव से कोई आया जो है। उनका दूर का भांजा।

कुछ ही क्षणों में अनुराग जी ने हमें नौसेना कैंप बुला लिया।

नाश्ता करने के बाद मामी से बाते खूब होती रहीं। तमाम तरह की बातें बताई।

बड़े बैग यहीं घर पर छोड़कर छोटे बैग में जरूरी सामान रखा और निकल पड़ा नौसेना कैंप।

घर अपना हो या किसी जान परिचित का घर तो घर होता है। घर आ कर सुकून भी मिलता है और प्रदान होती है एक नई ऊर्जा।

घर बनता है परिवार से। इन्हीं परिवारजनों से संवाद होने पर बातों का आदान प्रदान होता है।

जिससे कई नई चीजें और बाते जानने को मिलती हैं। जैसे किसी भी शहर का वातावरण।

कुछ लोगों के घर तो होते है पर बात करने वाला कोई नहीं। वो गरीब से भी ज्यादा गरीब कहलाए जायेंगे।

मामी ने बताया की यहाँ मौसम हर समय भीगा भीगा रहता है। उमस तो ना के बराबर रहती है।

कोई तो लिफ्ट करा दे

गली कूचों से होते हुए पैदल ही मुख्य सड़क फिर गाजूवाका चौराहे तक आ पहुंचा।

बस के इंतजार में मिनटों खड़ा रहना पड़ रहा है।

बस आई तो निकल पड़ा नौसेना कैंप। धूल धक्कड़ भरे रास्ते से होते हुए बीच रास्ते तक ही साथ रहा।

आगे का सफर अब कैसे तय होगा। हाईवे पर खड़े हो कर सवारी का इंतजार करने लगा।

सुनसान सड़क पर आते हुए ट्रक को हांथ दे कर रोका। पता चला कैंप तो नहीं पर उसके करीब तक तो जा ही रहा है।

किस्मत से इसी ट्रक में लड़ कर कुछ दूर और निकल पड़ा।

टुकड़ों में ही सही कैंप तो जरूर पहुंच जाऊंगा। नक्शे और सड़क पर चलते वाहनों के सहारे कैंप की शुरुआती रोड तक आ गया।

शुक्र है यहाँ सवारी गाड़ी चल रही है। बस भी आराम से बिना किसी असुविधा के मिल गई। 

जिसकी बदौलत सिंधिया रोड पहुंचा जहाँ भारतीय नौसेना का कैंप है। 

मैं बस से उतरकर मुख्य द्वार के ठीक विपरीत सड़क पर अनुराग जी का इंतजार करने लगा।

अनुराग जी के द्वारा बताई हुई जगह पर उनका इंतजार करने लगा। गेट पर सुरक्षाकर्मी मुस्तैद हैं। कैंप के दाहिने ओर कैंटीन है।

यहाँ अच्छी खासी भीड़ जुटी हुई है सामान लेने के लिए। मैं सड़क के दूसरी पार छांव में आ कर इंतजार करने लगा।

अचानक फोन की घंटी बजी। देखा तो अनुराज की का है। सामने गेट के पास खड़े होकर द्वार से इशारा करते हुए मुख्य द्वार पर बुलाने लगे।

पहले तो साथी घुमक्कड़ को ही भेज दिया। मुझे लगा शायद वाहन उसी को थमा कर निकल जायेंगे।

पर ऐसा होता की मुझे भी इशारे से बुला लिया गया। सड़क पार कर अनुराग जी से मुलाकात हुई।

उन्होंने अपने किसी मित्र का दुपहिया वाहन हमें घूमने के लिए थमा दिया। खुद घर निकल रहे हैं।

मुझे लगा अपना ही वाहन हमे दिए दे रहे हैं खुद को कष्ट में डालकर। पर ऐसा नहीं है। जो की अच्छा है।

कोई मेरे लिए इतनी तकलीफ या जरा सी भी किसी को मेरी वजह से तकलीफ हो वो अच्छी बात नहीं।

पर्यटन के लिहाज से उपयुक्त जगह पूछने पर अनुराग जी ने ऋषिकोंडा तट जाने की सलाह दी।

क्यों की विशाखापट्टनम के अन्य तट जैसे यरवडा तट, आरके तट पर चूक होने पर जान गवाने का खतरा ज्यादा है। सुरक्षा के लिहाज से बेहतर रहेगा।

ऋषिकोंडा पर खतरा ना के बराबर होगा। अनुराग जी से अलविदा लेते हुए वाहन घुमा दिया ऋषिकोंडा तट की तरफ।

दुपहिया वाहन का साथ

वाहन ले कर सबसे पहले उसे उसकी खुराक पिलाने पेट्रोल पंप खोजने निकल पड़ा।

कुछ दूर ही पेट्रोल पंप मिला। यहाँ चार लीटर की खुराक काफी रहेगी।

ऑनलाइन भुगतान किया और गाड़ी स्टार्ट करके अपने चालक साथी घुमक्कड़ के साथ आगे के सफर के लिए सुझाव अनुसार ऋषिकोंडा के लिए निकल पड़ा।

दुपहिया वाहन से किसी भी शहर को घूमने में आसानी हो जाती है। समय की भी बचत और ज्यादा से ज्यादा स्थलों पर घूमना भी हो जाता है।

जैसा कि ओरिसा में प्रशांत जी की गाड़ी के कर कटक, कोणार्क, जगन्नाथ पुरी तक हो आया था।

जैसे जैसे दिन बीत रहा है वैसे वैसे सूर्य देवता अपना प्रकोप भी बढ़ाते जा रहे हैं। 

ऋषिकोंडा के रास्ते मार्ग में कैलाशगिरी भी देखने में आ रहा है। यहाँ सैकड़ों की संख्या में लोग जमा हैं।

कैलाशगिरी में भगवान शिव और देवी पार्वती की अत्यंत विशाल मूर्ति स्थापित है जिसे देखना तो जरूर चाहिए।

तेज धूप से वाहन पर सवार हो कर भी हाल बेहाल हो रहा है। नौसेना कैंप से ही तेरह किमी का सफर है जो तय कर रहा हूँ।

नारियल पानी हर मोड़ पर बिक रहा है। बेहतर रहेगा की ऊर्जा के लिए नारियल पानी का सेवन कर लिया जाए।

मध्य मार्ग में रोक कर नारियल पानी को गले के नीचे उतारा। तब और होश आया।

ऋषिकोंडा पहुंचने से पहले मुख्य मार्ग पर समुद्र से तकरीबन दो किमी दूर ऐसा नज़ारा देखने को मिला जिसे भुलाया नहीं जा सकता।

ठीक सामने समुद्र और उसकी उफान मारती हुई लहरें मानो इसी सड़क पर तनिक देर में आ जाएंगी।

लंबी सड़क जो झूले जैसी ऊपर से नीचे जा रही है उससे समुद्र की ऊपर उठती लहरें ऐसी दिख रही हैं मानो सुनामी ने दस्तक दे दी हो।

तट की तरफ जाते हुए शहर से समुद्र का विशाल रूप देखने को आ रहा है।

एक पल के लिए तो मैं भी भ्रम में पड़ गया। पर ये वो विनाशकारी लहरें नहीं है जैसा सोच रहा था।

ये छाप दिमाग में ऐसी छपी की तस्वीर लेने जरूरी नहीं समझा। जो शायद आजीवन चिन्हित रहेगा।

कुछ ही क्षणों में तट पर पहुंच गया। पर प्रवेश मार्ग कहाँ से है ये जानना जरूरी है। ताकि दुपहिया वाहन भी अंदर ले जा सकूं।

ऋषिकोंडा तट पर सैर सपाटा करते ऐश्वर्य तिवारी

ऋषिकोंडा समुद्री तट

सड़क के इस पार मुझे भटका हुआ देख यहाँ के एक ऑटोवाले ने इशारे से पथ प्रदर्शित कर बताने लगा की किधर जाना है।

गाड़ी वापस मोड़ कर निकल पड़ा। गालिब्से होते हुए मैदानी इलाके में आ पहुंचा। यहाँ गजब की भीड़ और दुकानें हैं।

वाहन पार्किंग में लगा कर निकल पड़ा ऋषिकोंडा तट के समुद्री लहरों के समीप।

तट पर भारी संख्या में लोग यहाँ आनंद उठा रहे हैं। कुछ एकदम ही बौराए नजर आ रहे है।

उछलते कूदते लहरों के साथ खेल रहे हैं। कहीं लहरों ने इनके साथ खेल लिया तो समस्या हो सकती है।

ऋषिकोंडा तट बंगाल की खाड़ी में स्तिथ है जो कि आंध्र प्रदेश पर्यटन के अधिनियम है।

बहुत ही साफ और स्वच्छ, और पूरी तरह सुरक्षित दिखाई देता हुआ। 

समुद्री लहरें बार बार तट तक आ रही हैं जिसके कारण अपने आप को भीगने से बचा रहा हूँ।

जूते एक किनारे एकांत में ऐसी जगह रख दिए हैं जहाँ सुरक्षित रहें।

एकांत में निकल कर जहाँ एक भी व्यक्ति मौजूद नहीं है वहाँ आ कर वीडियो बनाने लगा।

अच्छी तस्वीरें ली। कड़ी धूप में लोगो का उत्साह देखने लायक है। जब जी भर कर तस्वीरें और चलचित्र बना लिए तब निकल आया लोगों के बीच।

एक किनारे बैठ कर लहरों कि गूंज सुनना एक संगीत की तरह होती हैं। मन में एक अलग उत्साह भरती हैं।

फोटो खींचते खींचते कैमरा अचानक से बंद हो गया। आखिरी संदेश कैमरा बंद होते होते बोल गया की सेल डिस्चार्ज हो चुके हैं।

यानी अब कोई तस्वीर नहीं ले पाऊंगा। बमुश्किल तीन तस्वीर ही ले सका।

चित्रकूट जलप्रपात में बहुत तस्वीरें ली जिसके बाद चार्ज ही नहीं किया।

जब भी कोई व्यक्ति नहाते हुए सीमा से आगे निकल रहा है तो इस छोर पर बैठे सुरक्षाकर्मी सिटी बजते हुए उसको वापस बुला रहे हैं।

ऐसे कई सुरक्षाकर्मी लोगो का ध्यान रख रहे हैं। मुखिया प्रदान की हुई गाड़ी से इधर उधर गश्त लगा रहा है।

मैदान में लगी भुट्टे की ठेले से लोग अच्छी बिक्री करवा रहे हैं।

भुट्टे चबाना भी अच्छा है इस तट पर। सूर्य को ढलता देख तट के दूसरी ओर चलने लगा।

यहाँ भीड़ कम और आकर्षण ज्यादा है। चट्टानों से टकराती लहरे इसकी शोभा बढ़ा रही हैं।

ठीक सामने चंद्रमा नजर आ रहा है। समुद्र के ऊपर दिखता चंद्रमा खुशनुमा दाग जैसा लगता है।

यही आकार अगर बड़ा हो तो और भी प्यारा। चट्टानों पर पड़ती लहरे और सामने चंद्रमा के साथ कुछ तस्वीरें अच्छा मेल रहेगा।

सायंकाल से पहले चट्टानों और लहरों के बीच ऐश्वर्य तिवारी

आईएनएस कुर्सुरा

साढ़े पांच बज चुका है और सूरज भी डाल चुका है। जिसके कारण अंधेरा छाने लगा है।

बेहतर रहेगा अब घर निकल लिया जाए। समय की कमी के चलते आरके तट छोड़ना पड़ रहा है और साथ ही कैलाशगिरी पर्वत भी।

वाहन चालू कर पार्किंग का भुगतान अदा किया और गाजूवाका किबोर चल पड़ा।

छह बज रहे हैं। घर की ओर जाते समय मार्ग में आईएनएस कुर्सुरा जहाज युद्ध स्मारक के रूप में पंदुरांगापुराम में रखा गया है।

वाहन काफी आगे निकल आया है। साथी घुमक्कड़ से चर्चा कर वापस लौट आया सिर्फ इस पनडुब्बी को देखने।

सड़क किनारे तो वाहन लगे दिख नहीं रहे। बीचों बीच सैकड़ों वाहन हैं। यही लगा कर फुटपाथ पर लोगो के बीच आ गया।

जहाज दिख तो बहुत ही सुंदर रहा है। इसका रख रखाव भी अच्छा है। अंदर जाने की प्रबल इच्छा है पर टिकट के लिए खड़ी भीड़ को देख विचार त्यागना पड़ रहा है।

इस जहाज को देखने सैकड़ों का तांता लगता है जिसके लिए थोड़ी धनराशि भी चुकानी पड़ती है।

आज इस पनडुब्बी को संग्रहालय का रूप मिला हुआ है जिसे वर्ष 1969 में रूस से खरीदा गया था

ये भारत की पांचवी पनडुब्बी है।   भारतीय नौसेना ने 1970 में ही इस पनडुब्बी को अपने बेड़े में शामिल कर लिया था

इस पनडुब्बी ने न केवल 1971 की हुई पाकिस्तान से लड़ाई में बांग्लादेश को आज़ाद कराने में अहम भूमिका निभाई थी बल्कि और भी युद्ध में सेवाएं दी।

अपने 31 वर्षों की सेवा के बाद इसे  सन् 2001 में ही नौसेना से हटा दिया गया था।

अंदर से वर्तमान पंडुब्बाई का ये वास्तविक रूप नहीं है जो कभी क्रियाशील के दौरान हुआ करता था।

पर्यटकों की सहूलियत को देखते हुए इसमें कई बदलाव किए गए हैं ताकि बिना किसी असुविधा के घूमा जा सके।

रोचक बात तो ये है की जल सेना का कोई न कोई अधिकारी यहाँ उपस्थित रहता है लोगो को समझने और उनके प्रश्नों का उत्तर देने के लिए।

नौसेना के बेड़े से बाहर आईएनएस कुरसुरा

रामकृष्ण समुद्री तट

यहाँ से डॉल्फिन मछली आकार की पहाड़ी देख पा रहा हूँ। जो काफी मशहूर है विशाखपत्तनम में।

बकायदा लोग वहाँ उस पहाड़ी पर सैर सपाटे के लिए जाते हैं।

यरवडा और गंगावरम तट के बीच स्तिथ यह पहाड़ हूबहू डॉल्फिन मछली जैसी दिखती है। 

कुछ ऐसे ही ऊपर खड़ा पनडुब्बी निहारता रहा। आगे नजर आया तट। जहाँ अच्छी खासी भीड़ नजर आ रही है।

साथ ही व्यवस्था भी दुरुस्त है। हेलमेट पकड़े इधर निकल पड़ा। जब गाड़ी रोकी ही है तो थोड़ा नजर भी मार लेना बेहतर है।

डॉलफिन के आकार की पहाड़ी

तट किनारे भीड़ कम दुकानें और ठेले ज्यादा नजर आ रहे हैं। जहाँ अधिकतर लोग लुत्फ उठा रहे हैं खाने का।

मैं अपने बैग के साथ एक शांत जगह पर आ कर बैठ गया जहाँ ना कुत्ते हैं ना दुकानें।

तट पर मांसाहारी दुकानें हैं जिसके कारण यहाँ आसपास कई कुत्ते घूमते हैं।

जो मांस खा खा कर ना सिर्फ मोटे हो गए है बल्कि बहुत आक्रामक और खूंखार भी।

ऐसे पालतू जंगली होते जानवरों से जितना दूर उतना भला। ना जाने कब इंसानों पर ही लपक पड़ें।

तट हो लहरें शांत हो ऐसा ना कभी हुआ है ना हो सकता है। पर लहरें ये क्या छोड़ गई किनारे।

यही चर्चा पास में बैठी आंटी जी भी कर रही हैं। जिसको लहरें बार बार ले जाती और वापस छोड़ जाती।

एक अजीब सा गोल आकार का रबर जैसी गेंद। मोबाइल की बत्ती जला कर देखा तो पाया की ये तो एक जीव है।

जिसको छेड़ने पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं मिल रही। शायद मर चुकी है।

जब मृत्यु आती है तो लहरे ऐसे इनको किनारे छोड़ जाती है जहाँ ना जल होता है ना ऑक्सीजन।

छह से कब सात बज गए मालूम ही नहीं पड़ा। तट पर लोग लहरों के साथ भी खेलते दिख रहे हैं।

नहाता हुआ कोई भी नहीं दिख रहा। पर दूर बहुत दूर एक सीध में छोटी छोटी बत्ती जलती हुई नजर आ रही।

शायद ये समुद्री पुलिस है जो बाहरी तत्वों को भारत में प्रवेश करने से रोकती है।

इन्ही के कारण हम तट पर मौज मस्ती कर पाते हैं। घरों में सुकून से से भी पाते हैं।

साढ़े सात हो रहे हैं बेहतर होगा अब निकल लिया जाए।

क्योंकि अनुराज जी के वादे के मुताबिक कल रविवार के दिन  नौसेना कैंप में बड़े बड़े जंगी जहाज, युद्ध पनडुब्बी देखने जाना होगा।

अनंदा हाइट्स से गजुवाका से इंडियन नेवी से ऋषिकोंडा से वापस कुल यात्रा 125km

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