नृत्य प्रतियोगिता के कारण बना नटराज मंदिर

चिदंबरम | तमिलनाडु | भारत दर्शन

कांचीपुरम  में हाय पैसा

कांचीपुरम में बैठे बैठे यही सोच रहा था की दीपावली कहा माननी है। इस पर कल तक संशय था महाबलीपुरम, पुडुचेरी या चिदंबरम।

पर दिवाली के ही कारण ना तो महाबलीपुरम से कोई प्रतिक्रिया मिला और ना ही पुडुचेरी से। कल दिन में चिदंबरम से निमंत्रण आया प्रेम कुमार के घर आने का।

बात महाबलीपुरम और पुडुचेरी के सामुदायिक मित्रों से भी चल रही थी। लेकिन दीवाली के पावन पर्व पर सब अपने घर की ओर रवाना हो रहे हैं।

ग्यारह बजे की ट्रेन के अनुसार मैं जल्दी ही उठ गया। स्नान ध्यान कर बैग तैयार कर रहा था की दरवाजे पर सतीश आ खड़ा हुआ। मेरी जिभिया देख कर उसने चेताया की कोमल जीभ के लिए कितनी हानिकारक हैं ये स्टील की जीभिया।

बातों में ज्यादा समय ना देते हुए सतीश से अलविदा लेक कर निकल पड़ा चेंगलपट्टू स्टेशन की ओर जो कांचीपुरम से 40 किलोमीटर की दूरी पर है।

सतीश के घर से निकलने के बाद सीधा बस अड्डा आ पहुंचा। सुबह ना नाश्ता किया है न चाय नसीब हुई है। कुछ कदम पीछे खींचते हुए नुक्कड़ पर आ गया।

चाय पी कर भुगतान कर वापस चेंगलपट्टू के लिए बस पकड़ने के लिए आ गया बस अड्डे। जेब में पैसे भी खत्म हो रहे हैं। पास की नुक्कड़ से सुबह की चाय के बाद केवल पांच रुपए रह गए हैं।

साथी घुमक्कड़ के पास भी पिटारा खतम हो रहा है। बेहतर है जेब में कुछ पैसे हो जाएं नहीं तो बस में भुगतान क्या करूंगा। समय से पहुंचने के भी लाले पड़ जायेंगे।

स्थानीय लोगों से पूछते हुए मुख्य सड़क पर ही थोड़ा आगे एटीएम में आ गया। जबतक मैं पैसे निकलता तब तक के लिए साथी को चौकन्ना रहने के लिए बोला ताकि कोई बस ना निकल जाए।

पैसे भी निकल आए और इतनी देर में एक बस भी निकल गई। लापरवाही से चेंगलपट्टू को जाने वाली बस भी निकल गई। भागते हुए कुछ दूर पीछा भी किया पर बस अब कहाँ रुकने वाली थी।

निराशा लेते हुए वापस बस स्टैंड पर इंतजार करने लगा चेंगलपट्टू स्टेशन के लिए बस का। बल्कि किसी सज्जन के कहने पर बस स्टैंड पर ना जा कर इसी मोड़ पर इंतजार करने लगा।

कुछ ही क्षण बीते होंगे की एक बस का आना हुआ। बस रुकी और मैं उसमे चढ़ गया। सुकून मिल रहा है की आखिरकार बस तो आई।

बस के आगे वाले दरवाजे से चढ़ते हुए सापेक्षिक गति को चुनौती देते हुए पीछे कंडक्टर के पास आ पहुंचा। स्वयं ही टिकट का दाम बताने लगे।

सुन के बहुत महंगा लगा एक आदमी का अस्सी रुपए। पूछने पर मालूम पड़ा की ये महाशय तो दो इंसानों के साथ साथ दो बड़े बैग का भी टिकट कटने पर अमादा है।

यह वाक्या तो अजीब लग रहा है सुनने में भी और बताने में भी, बैग का टिकट?? मैंने उनकी इस बात का विरोध किया तो साथ बैठे यात्री ने कंडक्टर का ही साथ देने लगा।

शायद उसने कंडक्टर का इसलिए भी पक्ष लिया क्योंकि वो तमिल भाषी है और मैं हिंदी। मैं तमिनाडु में हूँ और यह बात मुझे इनकी इस हरकत से एहसाह कराई गई।

इस कृत्य का विरोध किया और अधिक मनमाने पैसे ना देने की आवाज उठाई। कुछ दूर आगे चल कर मैं खुद ही उतर पड़ा।

यह अच्छी कोशिश थी सुबह सुबह वसूली करने की। कुछ और वक्त ही सही इंतजार करना पड़ेगा। पर अब स्टेशन के लिए विलंब हो सकता है।

चेंगालपट्टु रेल परिसर

कांचीपुरम  से चेंगालपट्टु

दस मिनट के भीतर दूसरी बस आ गई। शुकर है समय पर आ गई नहीं तो इसके बाद देरी तय थी। कंडक्टर ने टिकट काटा सिर्फ दो इंसानों का बैग का नहीं। इसमे ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।

बैठ गया सीट पर गाने सुनने लगा। पर यह बस जिस रफ्तार से चल रही है उससे मेरा ध्यान गाने सुनने में कम ही लग रहा है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि ट्रेन छूट जाएगी।

शहर से बाहर निकलते हुए गांव में दाखिल हुआ। ग्यारह बजने से कुछ ही वक्त पहले मैं आ पहुंचा। देरी नहीं हुई। स्टेशन पर उतरते वक्त कुछ हल्की बूंदा बांदी होने लगी।

कुछ देर में ये बारिश भी बंद हो गई। अच्छी बात ये है की ट्रेन भी देरी से आएगी। समय से आती तो शायद थोड़ा मुश्किल हो जाता पकड़ने में।

परिसर में प्रवेश करने के बाद सीढ़ी के माध्यम से प्लेटफार्म संख्या पांच पर आ पहुंचा। सन्नाटा है पर कुछ जनता भी है।

ट्रेन कुछ समय की देरी से आ पहुंची। अच्छी बात ये भी है की बैठने को सीट भी मिल गई है। ट्रेन में भीड़ भी उस कदर नहीं है। महज तीन घंटे का सफर होगा।

कांचीपुरम और चेंगालपट्टू से अलविदा लेते हुए निकल पड़ा चिदंबरम। कुछ दिन पहले तक मैं यही सोचता था की चिदंबरम तो इंसान का नाम होता है। पर ऐसा नहीं है। इस चिदंबरम में तो विश्व प्रसिद्ध नटराज मंदिर है।

खेत खलिहान से गुजरते हुए आगे बढ़ रही है। सफर के दौरान बारिश भी होने लगी। जिस कारण ट्रेन की खिड़कियां बंद करने की नौबत आन पड़ी है।

रेत का एक मैदान दिख रहा है चलती ट्रेन से। ट्रेन भी पुल के ऊपर से गुजर रही है। जो दर्शाती है यहाँ कभी नदी हुआ करती थी जो अब पूर्णतः सूख चुकी है।

चेंगालपट्टु से चिदंबरम जाते हुए पड़ी विशालकाय सूखी नदी

रेल परिसर में छूटा चश्मा

दिन के तीन बजे तक मैं चिदंबरम आ पहुंचा। यात्रा बहुत ही सुगम रही। पर यहाँ तो जबरदस्त सन्नाटा है। प्लेटफार्म के एक छोर से दुसरे छोर पर आ पहुंचा।

भूख जोरों पर है इसी कारण जहाँ दुकान दिखी वहीं पर आ गया। दुकान पर ही चाय और नाश्ता करने के बाद निकल पड़ा प्रेम भाई के द्वारा सांझा किए हुए स्थान पर।

स्टेशन परिसर से निकलते वक़्त साथी घुमक्कड़ का चश्मा स्टेशन की सीट पर ही छूट गया। चश्मा देने के लिए आवाज़ भी लगाई पर उसने सुना नहीं।

सो चश्मा उठा कर मैंने अपने बैग में डाल लिया। यह कोई पहला वाक्या नहीं है जब साथी घुमक्कड़ अपना समान भूल गया हो। उसके लिए यह आम बात है।

हाल फिलहाल में चेन्नई में १२८ जीबी की पेन ड्राइव खो कर आया। बारह बोतले उसके द्वारा खो गई हैं। विचार आया क्यों ना आज इसे सबक सिखाया जाए जो लंबे समय तक याद रहेगा। शायद फिर कभी समान नहीं भूलेगा।

पटरियां पार करके स्टेशन परिसर से पूर्णतः बाहर निकाल आया। सोच रहा हूँ अब उसे याद दिलाया जाए उसके चश्मे के लिए। चश्मे का जिक्र किया तो आदमी हक्का बक्का रह गया। उसे लगा मैं उठा कर ले आया हूँ!

बताने भी लगा की चश्मा कहाँ छूटा है और कहाँ रखा मिलेगा। यहीं के यहीं फौरन बैग छोड़कर भागा चश्मा लेने। इधर मैं सोच रहा हूँ आज सबक मिलेगा।

कुछ देर बाद फोन आया जिस पर फिर यही बात हुई। तब मैने उसे बुला लिया ये बोल कर की चश्मा मेरे पास ही है।

साथी घुमक्कड़ वापस आया और मैंने उसे उसका चश्मा थमा दिया। बताने लगा की स्टेशन पर अलग कहानी घटित हुई है। वहाँ चश्मा मिला भी नहीं। मिलता भी कैसे?

वहाँ बैठे दद्दू बार बार बोल रहे थे की तुम्हारा साथी ले गया है चश्मा। बात पुलिस तक पहुंच गई थी। हद तो तब हो गई थी जब परिसर में कुछ लोगों के बैग टटोले गए।

हालांकि ये सबक भी मिला की आगे से कोई भी वस्तु तुम्हारी वजह से खोएगी तो उसकी जिम्मेदारी तुमको ही लेनी पड़ेगी। वापस चल पड़ा प्रेम के घर की ओर जो रेल कॉलोनी के पास ही है।

प्रेम भाई

देर होने के कारण प्रेम का कॉल आया। क्योंकि स्टेशन से उनके घर तक इतना समय नहीं लगता है आने में। इसलिए वो खुद ही आ गए लेने हमें आधे रास्ते से अपनी दुपहिया वाहन से।

कुछ ही क्षणों में मैं प्रेम कुमार के घर आ पहुंच गया। प्रेम भाई ने जोरदार स्वागत किया। नीचे उनके परिजन और ऊपर स्वयं वो रहते हैं।

उन्होंने हमें कमरा दिखाया जहाँ हम अपना सामान रख कर रह सकते हैं। समान उतार कर अंदर कमरे में रख दिया और बाहर के बरामदे में आ गया।

यहाँ चौकड़ी जम चुकी है। जान परिचय में समय गुजरने लगा। काफी देर तक बहुत से विषयों पर बातें होती रहीं। अपने जीवनकाल के बारे में बताने लगे जो काफी प्रेरणास्त्रोत है और बहुत हिम्मती भी।

बैग से मैले कुचैले कपड़े धुलने की अब बारी है और तैयारी भी। मौके का फायदा उठाते हुए खाली दुसलखाने में पहुंच गया कपड़े के कर।

कपड़े यहीं सारे बरामदे फैला भी दिए। उम्मीद है जो शाम तक सूख भी जायेंगे। इस मोहल्ले में कुछ अफ्रीकी भी रहते हैं। दिवाली भले ही कल हो पर पटाखे अभी से ही फूटने लगे हैं। डर है कहीं कोई पटाखा मेरे कपड़ों में आ कर ना गिर जाए।

काम निपटाने और कुछ देर विश्राम के बाद शाम होते होते हम तीनो चाय पर चर्चा के लिए निकल लिए। एक वाहन पर तीन सवार।

सड़कों गली में सन्नाटे के बीच यहाँ अधिकतर दुकानें दीवाली के कारण बंद हैं। इसलिए पुल पार करते हुए प्रेम भाई ढूंढ़ते हुए एक दुकान पर ले कर आए।

दुकान के भीतर तीन चाय मंगा कर बैठ गया। पर अंदर दुकान में मजा नहीं आ रहा। बाहर पड़ी मेज कुर्सी पर विराजमान हो गए हम सभी।

प्रेम भाई हुबाहुं मेरे एक मित्र से मेल खा रहे हैं। प्रेम को अपने मित्र की तस्वीर दिखाई जिस पर उन्होंने भी हामी भरी। प्रेम की तस्वीर ले कर अपने मित्र को भेजी। वो भी चौंक गया प्रेम की तस्वीर देख कर।

यहाँ से थोड़ी दूर पर ही नटराज मंदिर है। चाय के बाद प्रेम हमें नटराज मंदिर के द्वार पर छोड़ कर घर को निकल गए।

मंदिर की छत पर चित्रकारी

नटराज मंदिर

चालीस एकड़ में फैले इस मंदिर में प्रवेश करने के लिए नौ द्वार है जिसमें से चार में पगोड़ा या गोपुरम है। अंधेरे में किस द्वार से भीतर जा रहा हूँ कुछ नहीं पता। चप्पल बाहर ही किनारे उतार कर अंदर आ गया।

मंदिर के निर्माण के कोई ठोस साक्ष्य तो मौजूद नहीं हैं। पर 7वीं शताब्दी से ले कर 16वीं शताब्दी तक प्राचीन राजवंशों ने इसके निर्माण में योगदान दिया।

चोला, पंड्या, विजयनगर, चेरावंश के राजाओं और स्थानीय लोगों ने निर्माण कार्य में योगदान दिया। मंदिर की दीवारों और स्तंभों पर नटराज की नृत्य मूर्ति को नाट्य शास्त्रीय आधार पर उत्कीर्ण कराया गया था।

मजेदार बात ये है की मंदिर के शिखर पर कलश सोने का है। गोपुरम में भरतनाट्यम के 108 मुद्राएं चिन्हित हैं।

यहाँ मौजूद नटराज की मूर्ति आभूषणों से लदी हुई है। यह मंदिर “पंचभूत स्थलम” के पांच पवित्र शिव मंदिरों में से एक का दर्जा प्राप्त है।

चिदंबरम का नटराज मंदिर आकाश का, कांचीपुरम का एकांबरेश्व धरती का, थिरुवनैकावल का जंबूकेश्वर पानी का, थिरुवन्नामलाई का अरुणाचलेश्वर आग का, कलहस्ती का श्री कलहस्तीश्वरा वायु का प्रतिनिधत्व करता है।

यह इकलौता ऐसा मंदिर है जहाँ भगवान शिव की नटराज रूप में पूजा होती है।

मैं मंदिर के आस पास घूम रहा हैं। सामने जो दिख रहा है वो है पार्वती माता का मंदिर। आ पहुंचा यहाँ दर्शन करने। छत की दीवारों पर अदभुत चित्रकारी है। ये जाने कितनी ही पुरानी होगी।

भीतर प्रांगण में पहुंच कर माता पार्वती के दर्शन करने को मिले। वापस अद्भुत चित्रकारी देखते देखते वापस बाहर निकल आया।

दर्शन कर बाहर आ कर बैठ गया। ये सोच कर मुख्य मंदिर के तो दर्शन कर ही लिए हैं। आसपास की तस्वीर लेने लगा। पीछे बने शिवगंगा के साथ, गोपुरम के साथ।

अपनी तस्वीर यहाँ दो नौजवान टहेल रहे हैं उनसे भी निकलवाने लगा। इन्ही महाशय से जिज्ञावसा पूर्वक मैंने मंदिर का इतिहास जाना।

नटराज मंदरी में शिवगंगा के बहार

मुख्या प्रांगण में प्रवेश

इन्होंने मेरा भ्रम दूर करते हुए बतलाया की यही मुख्य मंदिर है। दर्शन कर संशय में था कि शायद यही मुख्य मंदिर है। वाद विवाद में जब उन्हें मेरी घूमने की मंशा पता चली तो वह मंदिर के बारे में हर एक जानकारी देने लगे।

घूमते हुए मुझे मुख्य मंदिर ले आए। यह दोनों तमिल युवक यांत्रिकी अभियंता(मैकेनिकल इंजीनियर) हैं जो दीपावली के अवसर पर अपने घर पर आए हुए हैं।

जो छोटा मंदिर जिसे मैं नजरंदाज कर रहा था मालूम पड़ा नटराज यहीं पर हैं। इस भवन के समीप भगवान विष्णु की निद्रासन में एक विशालकाय मूर्ति स्थापित है।

फिलहाल अभी नटराज मंदिर के कपाट बंद हैं। जो कुछ देर में खुलेंगे। यांत्रिकी अभियंता ने बताया की नटराज मंदिर धरती का चुंबकीय केंद्र माना जाता है।

भक्त पहले से ही मंदिर के कपाट के पास इकट्ठा हो रहे हैं। घड़ी में ठीक आठ बजते ही नटराज भवन के कपाट खुले और बाहर से दर्शन किए। जयघोष और आरती के साथ बहुत ही भव्य नजारा। मंदिर का फोटो लेना मना है नहीं तो एक तस्वीर तो जरूर निकाल लेता।

बाहर सैकड़ों की संख्या में भीड़ है। इन दो नव युवकों में से एक मंदिर के पुजारी को जनता है। योजनानुसार वो हमें मंदिर के भीतर तक के दर्शन कराने के इच्छुक हैं। वो भी बहुत ही समीप से।

आरती के बाद नटराज मंदिर के बाएं हिस्से पर आ कर खड़ा हो गया। जहाँ ये भाईसाहब अपने परिचित पुजारी से हमें अंदर ले जाने की अनुमति मांग रहे हैं।

नुमाती प्राप्त हो गई है भवन के भी अंदर जाने की जहाँ से नटराज भगवान के समीप से दर्शन हो सकेेंगे। यहाँ जाने के लिए अलग से मूल्य चुकाना पड़ता है।

चूंकि इस नौजवान के परिचित के पंडित जी हैं तो ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। बशर्ते भीतर जाने के लिए कमर के ऊपर वस्त्र नहीं होने चाहिए।

ऐसा माना जाता है कि मंदिर के अंदर की जितनी सकारात्मक ऊर्जा अपने अन्दर ग्रहण कर सकते हैं तो करें। ऊपर के वस्त्र निकाल दिए जो की सिर्फ पुरुषों के लिए मान्य है।

मैने कल ही नई टी शर्ट खरीदी है। बाहर रखूं तो कहीं ऐसा ना हो जाए की उघारे ही घर जाना पड़े बिना कमीज के। कमीज उतार कर भवन के भीतर ही अंधेरे में कोने में ही बुशर्ट रख दी।

भवन में ज्यादा भीड़ नहीं है। इस कारण भी चलने में कोई समस्या नहीं है। आते आते भीतर नटराज मूर्ति के ठीक सामने आ गया। जो बाहर से बिलकुल भी दिखाई नहीं पड़ रहे थे।

पर यहाँ भी रस्सी बंधी है। मुख्य प्रांगण तक जाने की अनुमति किसी को नही है। सिर्फ पुजारी और पंडित जी को। बहुत ही अच्छा अनुभव हो रहा है यहाँ।

दर्शन करने के बाद मैं बाहर की ओर निकल आया। दक्षिणा या पैसा देने का भी कोई झंझट नहीं है। जैसे बाकियों से लिया जा रहा है।

दोनो अभ्यंताओं से अलविदा लेते हुए मंदिर के बाहर निकलने लगा। मंदिर बहुत ही आकर्षक और सुंदर है। बचपन से जिस नटराज की मूर्ति को देखता आया हूँ आज स्वयं उस मंदिर की चौखट पर खड़ा था।

केले के पत्ते पर खाने का स्वाद लेते लेखक

नटराज बनने की कहानी

इस मंदिर को लेकर एक किवदंती यह है इस स्‍थान पर पहले भगवान श्री गोविंद राजास्वामी का राज था। एक बार शिव सिर्फ इसलिए उनसे मिलने आए थे कि वह उनके और पार्वती के बीच नृत्य प्रतिस्पर्धा के निर्णायक बन जाएं।

गोविंद राजास्वामी तैयार हो गए। शिव पार्वती के बीच नृत्य प्रतिस्पर्धा चलती रही। ऐस में शिव विजयी होने की युक्ति जानने के लिए श्री गोविंद राजास्वामी के पास गए।

उन्‍होंने एक पैर से उठाई हुई मुद्रा में नृत्य कर करने का संकेत दिया। यह मुद्रा महिलाओं के लिए वर्जित थी। ऐसे में जैसे ही भगवान शिव इस मुद्रा में आए तो पार्वती जी ने हार मान ली।

इसके बाद शिव जी का नटराज स्‍वरूप यहाँ पर स्‍थापित हो गया। कहते हैं यहाँ चुम्बकीय तरंगों का भी आभास किया गया है। रात काफी बीत चुकी थी अब वक़्त हो चला था प्रेम भाई के पास वापस आने का।

पर उससे पहले पेट पूजा। पास के ही एक रेस्तरां में आ पहुंचा। शुद्ध शाकाहारी इस भोजनालय में हमने एक एक डोसा मंगाया। जो प्रस्तुत हुआ केले के पत्ते में।

कहते हैं केले के पत्ते में खाने के बहुत फायदे हैं। उत्तर भारतीय लोग सिर्फ फैशन में ही जिए जा रहे हैं। असली मजा तो दक्षिण में है।

कांचीपुरम से चेंगलपट्टू से चिदंबरम से नटराज मंदिर तक कुल यात्रा 217किमी

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