नंदबाबा का बसेरा

उत्तर प्रदेश | नंदगांव | भारत

बरसाना से नंदगांव

बरसाना में ऑटो स्टैंड के पास चाय की दुकान पर तय हो गया है की नंदगांव के लिए निकल रहा हूँ। इधर चाय की दुकान के मालिक अपना अलग ही राग अलाप रहे हैं। मूलनिवासी होने के बावजूद कभी ये भाईसाहब नंदगांव नहीं गए।

इनके जाने या ना जाने से मेरा नंदगांव जाने का विचार नहीं बदलने वाला। ऑटो स्टैंड पर आ कर नंदगांव के लिए जा रही ऑटो में बैठ गया।

कुछ ही समय में सवारियों के आते ही ऑटो भरकर निकल पड़ा। जैसे जैसे ऑटो बढ़ रही है नींद आ रही है। थकान के कारण ऑटो में कब नींद आ गई मालूम ही नहीं पड़ा।

इक्का दुक्का जगह टेंपो रुकी और सवारियां भी उतरी। सात किमी दूर नंदगांव मेरे लिए बन गया दस किमी।

आंख खुली तो सूझा गूगल नक्शे पर देख लूं कितनी दूर है नंदगांव। पाया की मैं तो कुछ किमी आगे निकल आया हूँ, बल्कि और दूर होता जा रहा हूँ। तुरंत ऑटो चालक से वाहन रुकवाया।

इधर ऑटो चालक दलील देते हुए बता रहा है की उसने नंदगांव आने पर सूचित किया था। सूचित किया था या नहीं, पता नही पर मुझे आभास हुआ था नंदगांव का पड़ाव।

उतरा भुगतान किया और सड़क पार कर पीछे रास्ते पर निकल पड़ा। नंदगांव जाने के लिए कोई साधन इस समय उपलब्ध ही नहीं है। ट्रक खूब निकल रहे हैं पर रुक नहीं रहे। ऑटो का तो पता ही नहीं। पास आते बुलेट वाहन को रूकवाया और लदकर निकल पड़ा।

नंदगांव

नंदगांव चौराहे पर उतरकर मंदिर तलाशने लगा। स्थानीय लोगों से पूछने पर मालूम पड़ा मंदिर दाईं ओर ना हो कर बाईं तरफ है। यहाँ से दूसरी गली में।

सन्नाटे में सीढियाँ

नंदगांव पूरा गांव है। शायद आने वाले समय में यह अच्छा पर्यटक स्थल या आस्था का केंद्र हो जाए। कच्चे पक्के मकानों के बीच गलियों में गुजरते हुए यहाँ लोग ऐसे निहार रहे हैं जैसे सालों से कोई आया ना हो।

सुनने में आया की नंदबाबा का मंदिर ज्यादा दूर नहीं। मंदिर के लिए जाने के लिए बलुआ पत्थर की सीढ़ियां बनी हुई हैं। सीढ़ियों के किनारे बनी दुकानों में फूल विक्रेता भी हैं।

आधी सीढ़ी के बाद दाहिनी ओर चार पहिया वाहनों का खड़ा करने का स्थान है। जहाँ वाहन पीछे की ओर से आते हैं।

लंबी और बड़ी सीढ़ियों पर से होते हुए मंदिर के चौखट तक आ गया। चप्पल पहनने के कारण पैर कट चुके हैं। इतने बुरे तरीके से की ठीक से चला भी नहीं जा रहा। खाल उखड़ चुकी है और अब इस चप्पल से नफरत हो रही।

सीढियां खत्म तो हो गईं पर मुख्य मंदिर अभी और ऊपर है। जान पड़ता है ऊंची पहाड़ी है। मंदिर का नवीनीकरण हुआ है। दुकान के सामने चप्पल उतारकर मंदिर पर चढ़ता की सन्नाटे में पड़ी सीढ़ियों की तस्वीर लेने के लिए रुक गया।

नंदबाबा मंदिर

मंदिर का द्वार बहुत भव्य है। ऊपर पहुँचकर मंदिर के पिछले हिस्से की ओर आ गया। यहाँ खूब सारे पुजारी बैठे हुए हैं जो आज आए दक्षिणा की चर्चा कर रहे हैं।

मंदिर के ऊपर एक और मंजिला है जो किनारे किनारे है जिसपर टेहला जा सकता है। हर कोने पर छतरी भी बनाई गई है। मंदिर के बाएं हिस्से में एक हॉल बना है।

होली और अन्य त्योहारों में यहाँ अच्छी खासी भीड़ एकत्रित होती होगी। हॉल में समय बिताते हुए मंदिर की ओर निकल पड़ा। ध्यान गया एक जत्थे पर जिसमें महिलाओं की संख्या ज्यादा है।

मुख्य द्वार से भीतर आ गया। यहाँ खड़े पुजारी ने भक्तो को यहीं रोक लिया। भीतर एक और कक्ष है जिसमे कुछ भक्त बैठे हुए हैं। जिनको यहाँ के इतिहास के बारे में बता रहे शायद।

इधर ये पुजारी भक्तों को रोक कर रखने के लिए कथा सुनाने लगे। ध्यान बटकाने का अच्छा तरीका है। अंदर बैठे पुजारी से इशारा मिलते ही भीतर के फाटक खोल दिए गए।

नंदगाव में ढलता सूरज

फाटक से भीतर भक्तों के साथ मेरा भी आना हुआ। जमीन पर सबको बैठने को कहा गया। राधे के नाम पर भक्तजनों को आगे बुलाया जाने लगा।

अब शुरू हो रहा है असली खेल जो ये सब देख कर ही पता चल गया। सामने खड़े दो पुजारी में से बाहर खड़ा पुजारी चीख चीख कर मासूम भक्तों से दान के नाम पर पैसा मांग रहा है।

मुख्य प्रांगण में नंदबाबा, राधारानी और श्रीकृष्ण की मूर्ति है। मूर्तियों के कुछ आगे रखी है एक परात जिसमे पैसे ही पैसे रखे हुए हैं। नए खरे नोट और सिक्के।

बाहर का प्रसाद झूठे एवं गंदे मैले कुचैले हाथों से बनाया जाता है। यहाँ मंदिर में बकायदा नया और स्वच्छ प्रसाद बनाया जाएगा जो भक्तों ने वितरित होगा।

इसी के नाम पर भक्तो से दान लिया जा रहा है। भाषणबाजी बंद करने के बाद और भोली भाली जनता के दिमाग को अपने वश में करने के बाद अब दान का इंतजार हो रहा है।

कोई इक्यावन, कोई सौ, कोई ढाई सौ। हर दान को अलग काम में उपयोग करने का वादा किया जा रहा। बड़े दान से राधा जी का श्रृंगार।

भक्तिभाव में चूर जनता में से कोई ना कोई यहाँ दान दे रहा है। भले ही इनके पास ज्यादा पैसे ना हों पर भगवान के नाम पर इन्हे दान देने में कोई गुरेज नहीं है। दान लेने वालों को भी रहम नहीं आ रहा। जो बड़ा नकद दान में दे रहे हैं उनका नाम पुकारा जा रहा है।

भर मूठी दान के बाद भक्तों को अगले पुजारी के पास अगले कक्ष में भेजा जा रहा है। यहाँ खड़े महाशय अपने अनुसार नंदबाबा की कथा सुना कर कुछ पैसे लेने के चक्कर में हैं।

यहाँ भी कुछ बचे कूचे भक्त जेब से निकल कर, महिलाएं अपनी पर्स टटोते हुए पैसा दे रही हैं। प्रसाद के तौर पर मुझे भोजन की आस थी पर यहाँ दिए जा रहे हैं सूखे मखाने। कक्ष के फाटक के पास खड़े युवक से प्रसाद ले कर बाहर आ गया।

श्रीकृष्ण की लीला का बखान

भक्तों को ऊपर रेलिंग पर ले जाया जा रहा है। मैं भी निकल पड़ा इन्हीं के पीछे। पहली छतरी को पार कर भक्तजनों को वो स्थान दिखाई जा रहे हैं जहाँ पर श्रीकृष्ण ने अपने बाल्यकांड में राक्षसों का संघार किया था।

कंस और उसके भेजे गए राक्षसों से प्राण बचाने के लिए नंदबाबा इस जगह आ कर बस गए। क्योंकि यहाँ पहाड़ी पर कंस को श्राप था की अगर वो यहाँ आया तो उसकी मृत्यु निश्चित है।

दूसरी मंज़िल पर श्रीकृष्ण की लीलाओं का स्थान दीखते महाशय

जब ब्रम्हा और महादेव को दर्शन करने थे तब वो साधु रूप रख कर बालक कृष्ण के दर्शन करने आए थे। सभी देवी देवता बाल गोपाल के दर्शन कर चुके थे सिवाय शनि देव के।

कहा जाता है शनि की दृष्टि बुरी होती है। इस वजह से बाल गोपाल ने शनि देव को गांव के बाहर ही रोक दिया था। खुद चलकर शनि देव को दर्शन दिए थे। ताकि गांव पर बुरी दृष्टि ना पड़े।

महाशय सभा को इशारे में दूर स्तिथ वो स्थान भी दिखाने लगे। बताने लगे की नंदबाबा के पास नौ लाख गाय थी। नंदगांव में बसने से पहले दो लाख गाय दान में दे दीं। इन्हीं गाय को दान में देने के लिए अब नया दान इक्कठा किया जा रहा है।

इधर सूरज ढल रहा है। मैं शायद आज वो तस्वीर ना ले पाऊं जो सोच रहा हूँ। पीछे मुड़कर छतरी के नीचे कुछ तस्वीरें निकाली। कुछ ढलते सूरज की।

घूमकर दूसरी छतरी की ओर जाने लगा। हर छतरी से अलग तस्वीर लेने की कोशिश कर रहा हूँ। पर अब सूरज बहुत छोटा प्रतीत हो रहा है।

यहाँ ऊपर काफी जगह है जो नीचे से अंदाजा नहीं लग पा रहा था। मंदिर की भी और सूरज की तो हर कोण से तस्वीर ले ही रहा हूँ। यहाँ एक ढीठ गूंगी बच्ची चंदन टिका लगाने के लिए घूम रही है।

पर मैने ना लगवाया और आगे बढ़ निकला। उसके बाकी साथी बोल पा रहे हैं। छह बजने से पहले पहले निकल पड़ा मंदिर से बाहर।

मुख्य सड़क पर आते आते अंधेरा हो चला है। क्या पता ऑटो मिले ना मिले। इसी प्रश्न का जवाब देते हुए एक बूढ़ी माता जी मेरे साथ चल पड़ी चौराहे तक ताकि मुझे ऑटो में बैठाल सकें।

माताजी की विनम्रता और चिंता देख भाव विभोर हो गया। हालांकि कुछ ही पल में चौराहे पर से एक दुपहिया वाहन में आधे रास्ते के लिए बैठ गया।

इनके जाने के बाद लोडर वाले की गाड़ी में बैठ कर बरसाना के लिए निकल पड़ा। जहाँ से मुझे सीधी गाड़ी वृंदावन के लिए मिलेगी।

बातों बातों में मालूम पड़ा की चालक साहब तो गोवर्धन तक जा रहे हैं। पर यहाँ बरसाना पहुँचते ही कीर्ति मंदिर पर हो रहे भव्य प्रकाश को देखने के लिए उतर गया।

वृन्दावन से बरसाने से नंदगांव तक कुल यात्रा 152किमी

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