विश्व धरोहर नालंदा विश्वविद्यालय

नालंदा | बिहार | भारत

पटना से नालंदा

नालंदा विश्वविद्यालय केवल एक विश्वविद्यालय नहीं बल्कि एक सदियों पुरानी संस्कृति थी जिसे दुष्टता के चलते मिटा दिया गया। आज पटना से उसी विश्व विख्यात विश्वविद्यलय रवाना होने के लिए सुबह से तैयारी में जुटा हूँ।

स्नान पाठ करके सुमित के साथ नाश्ता करने के लिए आगे कमरे में आ गया। कल की तरह आज भी थोड़ा देर से सो कर उठा हूँ। सुमित ने आज बताया की उसका अपना घर कहीं और ही मोहल्ले में है। यहाँ तो वो अपनी नाना नानी के साथ रहता है।

 मीठापुर बस अड्डे पर पहुंचते पहुंचते ग्यारह बज गए। परसों जैसे वैशाली जाने के हालात थे वैसे आज नालंदा जाने के लिए भी बस पकड़ने के लिए मशकक्त करनी पड़ रही है।

इस बस अड्डे का नाम मीठापुर से बदल कर कीचड़पुर बस अड्डा रख देना चाहिए। क्योंकि मीठा यहाँ कुछ भी नहीं ना लोगो की बोली ना भाषा।

सुमित हमें मीठापुर बस स्टैंड पर दुखी मन से अलविदा कहने आया हुआ है। चलते चलते मेरे ही फ़ोन से तस्वीर लेने लगा। शायद इतना भावुक हो गया की अपना फोन घर पर ही भूल आया।

सुमित के विचार और अनुसार से उसके साथ एक दिन और बिताना चाहिए। बिल्कुल बिताना चाहिए लेकिन समय सीमा से मैं भी बाधित हूँ।

अगर भ्रमण के शुरुआत में रुकता जाऊंगा तो यही आदत पड़ जाएगी। हालांकि एक दिन और रुक कर हरमिंदर साहिब पटना और बुद्धा स्मृति पार्क जैसे जगहों पर भी जा सकता था।

भर पेट खाना पचा के तड़के सुबह ग्यारह बजे की बस से नालंदा की ओर सफर के लिए निकल पड़ा। नालंदा के लिए सीधी बस तो नहीं मिली। चंदासी गांव से दूसरी बस पकड़ कर नालंदा जाना पड़ेगा।

आज गर्मी बहुत है और बस में भीड़ भी। गर्मी से निपटने के लिए आइस क्रीम का सहारा लेना पड़ रहा है। आइस क्रीम भी गर्मी की मार से महरूम नहीं है। पिघल कर हांथेली पर अपना रुतबा दिखा रही है। बस में बैठे बैठे गप्प कर गया। 

भीषण गर्मी से बुरा हाल है। बस यही लग रहा है कितनी जल्दी हो सके पहुंच जाऊं। चंदासी ज्यादा दूर नहीं है और घंटे भर के भीतर ही मैं यहाँ आ पहुंचा। नालंदा के लिए दूसरी बस पकड़ता पर रास्ता ही समझ से परे है।

काफी देर सड़क किनारे खड़े रहने के बाद और किसी बस के ना रुकने के बाद बैग उठा कर चल पड़ा। सन्नाटा इतना है की अगर यही देर रात होती तो शायद कोई कर्म काण्ड हो चुका होता। सड़क के उस पार है तो बस एक ढाबा। बैग ले कर यहीं आ गया।

अभी तक भूख तो कुछ खास लगी नहीं थी पर ढाबे पर खाना देख कर लगने लगी है। ढाबे पर रास्ता पूछ रहा था, और यहाँ समझा भी ठीक से रहे हैं। इन जनाब ने तो बस संख्या तक बता दी है। उधर मैंने खाने के लिए साथी घुमक्कड को भी बुला लिया।

बैग बाहर ही तख्त पर रख कर रसोइए के समीप पड़ी में कुर्सी पर बैठना हुआ। थाली पर पत्तल पर खाना परसा गया। दाल चावल सब्जी, बैगन की सब्जी और चटपटा आचार से पेट भर गया। 

ढाबा पूरा गांव में होने का एहसास करा रहा है। भुगतान के बाद निकल लिया नालंदा के रास्ते।

दूसरी बस पकड़ने के इंतजार में सड़क के इस तरफ खड़ा हुआ। कुछ ही देर में एक प्राइवेट बस आ धमकी। गनीमत है इस बस की छत पर कोई सवारी नहीं मौजूद है।

बैग ले कर चढ़ा और पीछे की तरफ निकल गया। बस में कंडक्टर ने दुगना किराया वसूलने की कोशिश की जिसमे वो कामयाब भी रहा। मेरा समर्थन कुछ लोगो ने किया पर अड़ियल कंडक्टर टस से मस ना हुआ। मैं जानता हूँ ऐसा सिर्फ मुसाफिरों के साथ ही होता है। परदेश में क्या बहस करना।

नालंदा विश्वविद्यालय

ठीक तीन घंटे में नालंदा पहुंच गया जिसके लिए मैंने दो बार बस बदली। मुख्य सड़क से यूनिवर्सिटी की दूरी डेढ़ किमी है। भरी धूप में पीठ पर बैग के साथ वहाँ तक जाना संभव तो है पर व्यर्थ की थका देने वाली पैदल यात्रा से मैं बचना चाह रहा हूँ।

मुख्य सड़क पर ही कई ऑटो और रिक्शा वाले मंडरा रहे हैं। विश्वविद्यालय तक के लिए ऑटो कर लिया। ऑटो वाला भी खूब बातूनी निकला। यहाँ के किस्से कहानी सुनाने में मगन हो गया। कुछ पल में पहुंंच गया नालंदा विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर।

पर यहाँ कोई भी खिड़की काउंटर नहीं है। मालूम पड़ा इसका टिकट घर सड़क के इस तरफ है। टिकट घर पहुंचा तो ज्यादा भीड़ ना मिली।

भारतीयों का टिकट सस्ता और विदेशी का टिकट आसमान छू रहा है। शायद विदेशियों ने जो अब तक हमसे लूटा अब हम उनसे टिकट के माध्यम से ले रहे हैं। ये भारत की अर्थव्यवस्था के लिहाज से भी सही है।

आज आप टिकट मूल्य देकर दाखिल हो सकते है जो की काफी आसान जान पड़ता है। हजारों सालों पहले यह इतना आसान नहीं हुआ करता था। जब देश विदेश से लंबा सफर करके विद्यार्थी आते थे। जिनका साक्षात्कार मुख्य द्वारपाल लिया करते थे। अगर वह इस साक्षात्कार में उत्तीर्ण हुए तो ही दाखिला मिलता था वरना उल्टे पांव उन्हें घर का रास्ता दिखा दिया जाता था। 

घर नहीं तो विक्रमशिला या तकशीला जैसे अन्य विश्वविद्यालय में दाखिला लेने पहुंच जाया करते थे। जैसे आज के युग में अगर हमें अपना पसंदीदा कॉलेज ना मिला तो उससे थोड़ा कमतर ही सही।

अंदर जाता पर ऐसा लग रहा है की कुछ छूट रहा है या रह गया है। ठीक से देखा तो एक छोटा बैग नदारद है। जो  टिकट काउंटर पर ही रह गया है जिसमें एक GoPro, एक SLR कैमरा और कुछ पैसे रखे हुए हैं। 

याद आते ही मेरे पैर से मानो ज़मीन खिसक गई। अपना बड़ा बैग उतार कर साथी घुमक्कड वह बैग लेने गया। इधर मेरे मन में उल्टे सीधे विचार आने प्रारंभ हो गए है।

मिलने के अवसर कम ही लग रहे हैं लेकिन साथी घुमक्कड सफलतापूर्वक छोटा बैग ले आया। बैग देखते ही मैंने राहत की सांस ली। काउंटर पर जहाँ छूट गया था उसी जगह पर रखा मिला। जो की बहुत ही अच्छी बात है की बैग के साथ ना तो छेड़ छाड़ हुई ना चोरी हुआ। शायद थोड़ी देर और हो जाती तो आज ही भ्रमण पूरा हो जाता।

विश्ववद्यालय परिसर काफी बड़ा है। जिसके बारे में किताबो में पढ़ा आज उसी जगह पर उसी विश्ववद्यालय का इतिहास पढ़ रहा हूँ। तमाम गाइड आगे पीछे घूम रहे हैं ताकि मैं उनको उनके मुताबिक रकम देकर उनसे इस जगह के बारे में जानकारी हासिल करुं।

बड़े बगीचे के बाद अंदर परिसर में दाखिल हुआ। टूटा फूटा जैसे भी हालत में है इसे अच्छे से संजोया गया है। हर छोटे बड़े कमरे के आगे सिलेट पर उस कमरे का वर्णन किया गया है।

गली से होते हुए मुख्य परिसर में आया जो काफी खुला हुआ है और जहाँ से अनेकों जगह के लिए द्वार हैं। उस काल में ये एक तरह का बड़ा गलियारा होता होगा जो कभी सुना नहीं रहता होगा।

नालंदा विश्वविद्यालय के बाहर दाखिले के इंतजार में

नालंदा का इतिहास और विध्वंस्ता

ऊंचे टीले के पास आ कर खड़ा हो गया। जिससे नालंदा को हम पहचानते हैं। यहाँ पर एक माली मिला जिसने मुझे खुद ही यहाँ का इतिहास बताने का आग्रह किया सबसे कम मूल्य पर। जब मैंने इसका कारण पूछा तो वो खुद ही तोते की तरह फला फला परीक्षा का हवाले बता कर पढ़ाई करने की बात करने लगा।

मुझे लगा गाइड को मोटी रकम देने से बेहतर और ऑनलाइन किसी चैनल पर देखने या किसी वेबसाइट पर पढ़ने से बेहतर है इनके मुख से सुनना। क्योंकि यहाँ दर्जनों गाइड हैं जो मारे मारे घूम रहे हैं।

जब माली बताने लगा तो मैं ध्यान लगाकर सुनने लगा। उसने बताया कि प्राचीन काल में इस विश्वविद्यालय में 10000 छात्र हुआ करते थे जिन्हें 2000 शिक्षक पढ़ाते थे।

बताते बताते वो अन्दर ले आया जहाँ पढ़ने के साथ साथ खाने पीने और रहने कि व्यवस्था परिसर में पूर्ण खयाल रखा जाता था और इन सुविधाओं के लिए किसी भी विद्यार्थी से किसी भी तरह की कोई  शुल्क नहीं लिया जाता था। ये उस समय काफी बड़ी बात थी की इतने बड़े विश्वविद्यालय को चलाने के लिए किसी से पैसे ना लेना।

उसी हॉल में हुआन सांग का छोटा सा कमरा दिखाया जिसमे वो रहते थे। विश्ववद्यालय की खोज हुआन सांग की लिखी हुई उनकी आत्मकथा से हुई अन्यथा दुनिया को कभी मालूम ही ना पड़ता इस सभ्यता के बारे में। जिसमे उन्होंने नालंदा आने और वहाँ एक वर्ष तक रहने का जिक्र है। 

जब यह किताब अंग्रेजो के हांथ लगी तो नालंदा में खुदाई का कार्य चालू हुआ जो 25 साल तक चला। इतने साल तक चली खुदाई में एक किमी का परिसर ही प्राप्त हो सका, बल्कि किताब में नौ किमी का उल्लेख है।

माली जो इस समय मेरा गाइड है ने बताया कि कुमारगुप्त ने 450-470 ईसा में इसकी स्थापना की थी। किताब में वर्णन के अनुसार इसका पूरा परिसर दीवार से घिरा हुआ था जिसमें आने-जाने के लिए एक मुख्य दरवाजा था।

उत्तर से दक्षिण की ओर मठों की कतार थी और उनके सामने अनेक भव्य स्तूप और मंदिर थे। मंदिरों में भगवान बुद्ध की मूर्तियां थीं।

यूनिवर्सिटी की मध्य इमारत में सात बड़े और 300 छोटे कमरे थे, जिनमें लेक्चर हुआ करते थे। मठ एक से अधिक मंजिल के थे। हर मठ के आंगन में एक कुआं बना था। आठ बड़ी इमारतें, दस मंदिर, कई प्राथना और अध्यन कक्ष के अलावा इस परिसर में सुंदर बगीचे और झीलें भी थीं।

नालंदा को हिंदुस्तानी राजाओं के साथ ही विदेशों से भी आर्थिक मदद मिलती थी। विश्ववद्यालय का पूरा प्रबंध कुलपति या प्रमुख आचार्य करते थे जिन्हें बौद्ध भिक्षु चुनते थे। ऐसा लग रहा है किताब अंग्रेज़ो के नहीं माली के हांथ लग गई है।

नालंदा वो जगह है जो छठी शताब्दी में पूरी दुनिया में ज्ञान का केंद्र हुआ करता था। कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत और तुर्की से यहाँ विद्यार्थी और शिक्षक पढ़ने-पढ़ाने आते थे, लेकिन बख्तियार खिलजी की सनक ने इसको तहस-नहस कर दिया।

जब भारत सोने की चिड़िया हुआ करता था तब इसे लूटने मुस्लिम शासक अक्सर यहाँ आया करते थे। इन्हीं में से एक था- तुर्की का शासक इख्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी।

जब खिलजी बुरी तरह बीमार पड़ गया उसके किसी भी हकीम का इलाज असर ना हुआ। तब किसी ने नालंदा के वैद्य से इलाज कराने का सुझाव दिया लेकिन वो किसी हिन्दू सभ्यता के वैद्य से इलाज कराने का इच्छुक नहीं था। 

नालंदा विश्वविद्यालय के हॉल और कक्ष

अपने हकीमों से काफी विचार विमर्श कर वो इलाज  करने को त्यार तो हुआ मगर कुछ शर्तों के साथ। जिसमे से एक शर्त यह भी थी कि उसके इलाज में कोई भी हिन्दुस्तानी दवा का इस्तेमाल नहीं करेगा। वैद्य मान गए और खिलजी को कुरान पढ़ने को दे गए।

कुरान में लगी दवा से थूक लगा लगा के पन्ने पलटने से वह धीरे धीरे ठीक हो गया। लेकिन वो इस एहसान को भूल गया और उसकी जलन ने इस विश्वविद्यालय को आग के हवाले कर दिया। जब उसका इससे भी मन नहीं भरा तो उसने कई शिक्षकों पर छात्रों की हत्या भी करवा दी। बताया जाता है की इस विश्वविद्यालय में इतनी किताबे थी कि वह 6 महीने तक धू धू कर जलती रहीं।

नालंदा विश्वविद्यालय को आग में झोंक देने का जिक्र नासत्रेदेमस ने भी किया था। उनके द्वारा लिखी गई किताब में इसका वर्णन है की कुछ असभ्य अज्ञानी ऐसे ज्ञान को नष्ट कर देंगे जिसके अधिकांश हिस्से को कभी दोबारा कभी वापस नहीं पाया जा सकेगा।

इतनी जानकारी मुझे यहाँ घास छिलने वाले एक कर्मचारी ने दी। विश्वविद्यालय का रुतबा विदेशी तक फैला है। यहाँ देश विदेशों से जत्थे का जत्था आ रहा है।

तस्वीर लेने जा रहा था की तभी लाल वस्त्र धारण किए कई भिक्षु आते दिखें जिन्हे एक जगह एकत्रित कर के बैठाला गया है। इनको इन्ही की भाषा में नालंदा का इतनिहास सुनाया जा रहा है। बाकियों की तरह इनके भी मुख पर रोमांच देखा जा सकता है।

परिसर में जहाँ तक जाने दिया जा रहा वहाँ तक मैं सब देखने जा रहा हूँ। एक मंदिर जो अब जर्जर हो चुका है। इस पर चढ़ने की भी अनुमति नहीं है। चप्पे चप्पे पर सुरक्षाकर्मी तैनात हैं।

वापस मुड़ कर बाएं हांथ पर कई हॉल और छोटे बड़े कमरे, प्रार्थना सभा दिखाई पड़ रहे हैं। इनमे से एक हॉल में एक जोड़ा घूम रहा है। नाग नागिन की तरह लिपटे पाए गए।

जिन्हे सुरक्षा कर्मी ढूंढते ढूंढते वहाँ पहुंचे और उन्हें वहाँ से खदेड़ा। भरी अफरातफरी मच गई कुछ देर के लिए। आज कल इन कमरों का कुछ अलग अंदाज़ में उपयोग हो रहा है, सुरक्षाकर्मी यह बड़बड़ाते हुए निकल गया और भी जोड़ों को देखने। मैं तनिक देर में बाहर आ गया।

उस काल में इतने बड़े हॉल में प्राथना सभाएं हुआ करती थी। या किसी शिक्षक को कोई आदेश जारी करना होता था तो उस दल के बच्चों को एकत्रित किया जाता था।

परिसर से बाहर निकल कर बगीचे में आया जहाँ बहुत ही शांति है। सैलानियों का आना बरकरार है। गाइड का उनके पीछे लगना भी। बाहर सड़क पर सैलानी बसों से भी यहाँ पर आए हैं।

नालंदा विश्वविद्यालय का काफी हिस्सा अब कमजोर हो चुका है जिसकी वजह से लकड़ी की रेलिंग बिछा दी गई हैं। माली का ज्ञान लेनें के बाद दाईं ओर निकल पड़ा। यहां पहले से ही दो सुरक्षाकर्मी मौजूद हैं। इनसे अनुमति ले कर ही मैं आगे बढ़ कर बड़े स्तूप को नजदीक से देखने लगा। जितने भी छोटे स्तूप हैं ये इस जमाने के होनहार शिष्यों के हैं जिनकी अस्थियां इन्ही के अंदर रख दी गई हैं।

नालंदा संग्रहालय

विश्वविद्यालय के ठीक सामने नालंदा संग्रहालय है। माली ने बताया था की यहाँ पर हुई खुदाई में को जो मिला है वो सब देखने को मिलेगा यहाँ। बस कहीं अगर ये बारी भरकम बैग रखने का प्रबंध हो जाता तो बड़ी सहूलियत होती घूमने में। सड़क पार करके आ गया संग्रहालय।

नालंदा संग्रहालय का बंद होने का समय शाम के पांच बजे

संग्रहालय में टिकट दर ज्यादा नहीं है। खिड़की पर टिकट कटवा कर अंदर प्रवेश करने लगा। यहाँ टिकट को आधा फाड़ कर अंदर भेज दिया। टिकट फाड़ने की परंपरा काफी पुरानी है।

टिकट फाड़ने वाले भाईसाहब से दरख्वास्त करके बैग इन्ही के पास रखवा कर बाईं आर मुड़ा। यहाँ भगवान बुद्ध, विष्णु और शिवलिंग की प्रतिमाएं के साथ साथ खुदाई में निकले बर्तन, भगवान विष्णु की मूर्ति और भी काफी चीजों का संग्रह है।

आश्चर्य भी होता है और रोमांच भी पैदा होता है इतनी पुरानी सामग्री देख। खुदाई के समय की तस्वीरें भी दीवारों पर टांगी गई हैं। जो जगह आज इतनी लुभावनी दिख रही है उसे जमीन के अंदर से खोद कर निकला गया है।

लोगों के खेतों और घरों के नीचे ये विश्वविद्यालय दबा हुआ था। पुरानी तस्वीरें देख कर अंदाजा लगाया जा सकता है की अंग्रेजो ने कितनी मेहनत करी होगी। अंग्रेजो की एक बात तो काबिले तारीफ़ है की वो पुरातत्व सर्वेक्षण से जुड़ी हुई चीजों को संजो कर रखते थे फिर चाहें भारत का कोई भी कोना हो। पूर्वोत्तर भारत में भी अंग्रेजो की अय्याशी का नमूना देखने को मिला।

ये संग्रहालय, पटना संग्रहालय जितना बड़ा नही है पर जितना भी है बहुत ही बेशकीमती है। बैग ले कर बाहर साथी घुमक्कड के आने का इंतजार करने लगा।

इतने में मेरी नजर पड़ी एक गाड़ी पर जो आई जिससे एक व्यक्ति विशेष निकले और कार्यालय में चले गए। दो चार दस मिनट मुआयना किया और वपास निकल गए अपनी गाड़ी में बैठ कर।

इतनी देर में जो इनकी ठाठ बाठ है वो मैं देख कर यहीं सोच रहा हूँ कि जरूर यह कोई बड़ा अधिकारी ही होगा जिसके लिए बाकी लोग इतना कष्ट ले रहे है।

ये चीज़ मुझे अन्दर तक प्रभावित कर गई। पांच बजे तक मैं नालंदा के संग्रहालय से निकल के मुख्य सड़क तक पहुंच गया। दोबारा रिक्शा में बैठ कर मुख्य सड़क तक आने लगा।

मैने सुना था की यहाँ संचालित यूनिवर्सिटी भी कुछ ही साल पहले शुरू की गई है। जहाँ पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह की बेटी प्रोफेसर की उपाधि पर पढ़ाती हैं।

नयी मंज़िल राजगीर

मुख्य सड़क पर बस के इंतजार में ऑटो से उतर कर खड़ा हो गया। बस भी झट पट आई और मैं लद कर राजगीर के लिए रवाना हो गया। बस बहुत ही खाली है। मुश्किल से कुछ सवारियां है।

राजगीर ज्यादा दूर नहीं है। गाने सुनते हुए आधे घंटे के भीतर शाम के साढ़े छह बजे तक राजगीर पहुंच गया। बस अड्डे पर अंधेरा छाया हुआ है। चुनौती ये है की जल्द से जल्द टिकने का ठिकाना ढूंढना पड़ेगा।

यहाँ रहने का कोई इंतजाम नहीं है। ना पहले से कोई होटल या हॉस्टल बुक कराया है ना कोई मित्र। रात गुजारने के लिए चौराहा पार करके होटल ढूंढने गया पर सब बंद मिला।

इसी हांथ पर साथी घुमक्कड को होटल तलाशने के लिए भेजा। कुछ ही देर बाद साथी घुमक्कड वापस आया और बताया की एक होटल मिला है जहाँ आज रात रुकने के लिए खाली कमरा उपलब्ध है। यहाँ उसे सफलता हांथ लगी। 

मालिक से साथी घुमक्कड ने जिससे अच्छा खासा मोलभाव किया है। पंजीकरण के बाद बूढ़े मालिक ने पहले खंड के कमरे की चाभी दी और पैसे भी तत्काल जमा करा लिए। 

सुबह से निकलने के बाद अब जा कर कहीं आराम करने का मौका मिल रहा है। बैग से सारा बिजली का उपकरण निकाल कर सॉकेट में खोसा और मोबाइल, कमरे सब चार्जिंग पर लगा दिए।

होटल की खिड़की से राजगीर का नजारा दिख रहा है। कुछ देर आराम करने के बाद राजगीर की छोटी गलियों में चहलकदमी करने के लिए निकल पड़ा कमरे में ताला लगा कर। 

राजगीर एक गांव जैसा ही है जो शायद आने वाले सालों में काफी विकसित होगा। टहलते टहलते रेलवे स्टेशन के मुहाने तक आ गया। पर यहाँ मेरा कोई काम ना था। अंधेरा भी जम कर हो रहा है इसलिए वापस निकलना ही उचित लगा।

फिलहाल सड़क पर थोड़ी देर और टहलने का मन हो रहा है। इसलिए सड़क पार करके दूसरी तरफ आ गया। यहाँ पहले से पसरा सन्नाटा और बंद दुकानें बता रही हैं की कितनी जल्दी कार्यक्रम हो चुका है। 

सिर्फ दिख रही है तो एक जर्जर दुकान। चाय के नाम पर भी यहाँ कुछ नहीं है। शाम को बस चाय मिल जाए तो बहुत होगा।

होटल के पास चौराहे पर आ कर ढाबे पर चाय ऑर्डर की। खाने की बिलकुल भी इच्छा नहीं है। क्योंकि दिन में भर पेट खाना खाया था। चाय की कड़क चुस्की लेते हुए कल की योजना पर विचार करने लगा।

कल राजगीर घूमने के बाद बोधगया निकल जाऊंगा जहाँ भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त किया था।

पटना से नालंदा से राजगीर तक की कुल यात्रा 105km

Similar Posts

4 Comments

  1. Meri bhi kaafi icha hai nalanda jaane ki. Aapne interest jga diya , aur padhuga vaha ke baare mai ab😁

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *