सफर नक्सली प्रभावित क्षेत्र में

छत्तीसगढ़ | जगदलपुर | भारत

कल की खबर

दुपहिया वाहन होने के कारण पुरी ओर कोणार्क एक ही दिन सम्पूर्ण हो गया।

पिछली रात प्रशांत जी के आमंत्रण पर साथ में रात्रि भोज किया।

पुरी से भुवनेश्वर वापस लौटते वक़्त इतनी मूसलाधार वर्षा हो रही थी कि वाहन किनारे लगा कर एक बंद दुकान की टीन की छत्र में काफी वक्त इंतज़ार करना पड़ा।

तेज वर्षा में गाड़ी फिसलने का भी ज्यादा खतरा मंडराता है।

प्रशांत जी को उम्मीद नहीं थी कि इस बाइक की मदद से कटक, कोणार्क और पुरी तक की दूरी तय कर ली है।

भोज के बाद प्रशांत जी हमें खुद प्रीतेश के घर तक छोड़ने आए।

प्रीतेश अपने मित्रो के साथ रात्रि में घूमने निकल गया। जिसके कारण उसने मुझसे कल की रात होटल में ठहर जाने का आग्रह किया था। 

होटल में कमरे का आरक्षण भी उसने खुद ही कर दिया था। देरी थी तो बस पहुंचने की।

किंतु जब वाहन से वो होटल खोजने हम निकले तो काफी देर तक गलियों में इधर उधर घूमते रहना पड़ा।

बड़ा गोपनीय होटल था। पर आज सुबह जब होटल खाली करके बाहर निकला तो देखने में आया पटिया रोड से सटा हुआ ही है।

आज शाम को जगदलपुर के लिए प्रस्थान करना है। इसलिए होटल से प्रातः दस बजे तक वापस प्रीतेश के घर पहुंच कर निकलने की तैयारियां भी करनी है।

होटल से निकालने के बाद लगा प्रीतेश के घर थोड़ा देर से पहुंचना ठीक रहेगा। क्या पता आया होगा की नहीं?

पाटिया रोड

बाहर निकल कर जो सबसे पहला काम किया वो है चाय की चुस्की। ताकि कुछ दिमाग की बत्ती जले।

आज दशहरा है शायद इसलिए भी पास की एक दुकान फूलों से सजी हुई है।

घूमते टहलते दुकान पर पहुंचा तो ज्ञात हुआ की आज ही इस दुकान का शुभारंभ हुआ है।

हांथ में सुभारंभ का प्रसाद अलग थमा दिया। चाय के बाद अब नाश्ता भी हो रहा है।

यूं ही पटिया रोड पर टहलते हुए एक साइकिल स्टैंड के पास आया। वैसी ही साइकिल जैसी रांची में देखने को मिली थीं।

मोबाइल की ऐप से स्कैन करके साइकिल का तला खोलो और जहाँ मर्जी हो ले जाओ।

पर एक सीमित अवधि के लिए।

प्रीतेश के अनुसार इस रोड पर कभी सन्नाटा भी होता। वो तो दशहरा है जिसके कारण सभी छात्र अपने अपने घर को निकल गए हैं।

पैदल ही घर की ओर निकल पड़ा। समय असमय पहुंचा तो इसका खामियाजा रात वाली ट्रेन को छोड़कर भुगतना पड़ सकता है।

मुझे सुब्रत ने बताया था कि ओड़ीसा सरकार द्वारा यहाँ विश्वविद्यालय चलाया जाता है।

जिसमें नक्सली प्रभावित या जो पहले नक्सली गतिविधियों में सम्मिलित थे अब उनके बच्चो को यहाँ मुफ़्त शिक्षा दीक्षा दी जाती है।

इतना ही नहीं बड़े बड़े उद्योपति के बच्चों से पूरी रकम वसूली जाती है। ओड़ीसा अपने खेलो के लिए तो और भी ज्यादा प्रसिद्ध है।

खासतौर से हॉकी। मिजोरम, त्रिपुरा, महाराष्ट्र और भी अन्य राज्यों से पुरुष एवं महिला खिलाड़ी जगह जगह दिखाई पड़ रहे हैं।

सबकी तैयारी

पैदल चलते चलते मैं घर की चौखट पर आ गया हूँ। 

आज दशहरा के अवसर पर ओड़ीसा या दक्षिण के किसी भी प्रांत में रावण जलाने की प्रथा शायद नहीं है।

सुब्रत ने बताया कि दशहरे के इस मौके पर यहाँ वाहन की पूर्जा अर्चना होती है।

दिन के बारह बजे तक प्रीतेश कटक स्तिथ अपने घर को निकलने है वाला है।

प्रीतेश के संग ऐश्वर्य तिवारी(नीली शर्ट में)

जीवन में और भी मुलाकाते हों ऐसी आशा के साथ प्रीतेश ने हमसे अलविदा लिया। अब बारी है मेरी अलविदा कहने की इन सभी से, भुभनेश्वर से अलविदा लेने की।

स्नान ध्यान करने के बाद मैं अपना बैग संभालने लगा। इधर उधर बिखरा समान समेटने लगा।

अपने वाहन की पूजा कराने को ले कर सुब्रत बाहर निकल गया। यहाँ हमे अंदर बंद कर के।

अब मेरा भी समय हो रहा है निकलने का और सुब्रत का भी।

उसके वापस आते ही मैंने कमर कस ली है स्टेशन पहुंचने की। शाम तक हम सभी ने निकलने की तैयारियां पूरी कर ली।

तीन सवारी

सुब्रत को भी अपने घर के लिए रवाना होना है।

घर की तरफ निकल रहे सुब्रत ने मुझे और मेरे साथी घुमक्कड़ को मुख्य सड़क तक छोड़ने का दबाव बनाया।

एक ही वाहन पर तीन प्राणी के साथ दो बड़े बैग सवार हो गए।

एक बैग तेल कि टंकी पर, दूजा पीठ पर टांगे पीछे बैठ गया। गाड़ी चलाने में कोई असुविधा तो नहीं हो रही।

ना ही किसी को बैठने में। ऐसा ताल मेल बिठाया है जो बिगड़ना नहीं चाहिए जब तक पहुंच ना जाऊं।

सुब्रत ने बड़ी ही बारीकी से वाहन चलाते हुए पटिया रोड के छोर पर ले आए।

यहाँ मैने उनसे अलविदा लिया और स्टेशन की ओर निकलने की तैयारी करने लगा। जो काफी सुविधाजनक सिद्ध हुआ।

ट्रेन को अभी काफी समय है निकलने में। सुबह से शायद ही कुछ पेट में गया है। 

पास में चाट वाले का ठेला दिख रहा है। वहां पर एक एक चाट लपेटी। 

कार या ऑटो

इधर उबर ऐप से स्टेशन तक के लिए कार बुक कर ली।

पर संवाद कुछ इस तरह हुआ की मैं उनके द्वारा बताए हुए मार्ग तक नहीं पहुंच पा रहा हूँ।

मुझे वह खुद ही सड़क के दूसरी तरफ बुलाने लगे। इंकार करने पर उन्होंने ही आने का फैसला किया।

सड़क पार देखने पर भी जब वह नहीं दिखा तो मैंने उसे नक्शे के अनुसार मेरे स्थान पर आने को कहा।

कुछ देर के इंतजार के बाद मेरे पास एक कार आकर रूकी। यहाँ मैं थोड़ा आश्चर्य में पड़ गया।

कार वाले ने स्टेशन चलने को बोला तो मैंने मना कर दिया। 

उबर की ऐप से तो मैने ऑटो आरक्षित किया था और सामने पाता हूँ कार।

मैं यह सब सोच ही रहा था कि वो ड्राइवर बोल पड़ा की ये गाड़ी आप ही ने बुक करी है।

ऐप दोबारा चेक करने पर देखा तो पाया उसमें ऑटो के बदले कार बुक हो गई है। तुरंत उसे रद्द करके ऑटो बुक किया।

जिसका खामियाजा कुछ मूल्य से कर चुकाना पड़ा।

दूसरे राज्यों में भिन्न भाषा से कुछ दिक्कतें आती हैं।

खासतौर पर जब गाड़ी आरक्षित करा लो। चालक ना आप की बात समझ पाता है और ना आप उसकी।

इस स्थिति में आस पास के दुकानदारों या राहगीर से सहायता लेना उचित लगता है। कुछ इस प्रकार इन ऑटो वाले भाईसाहब के साथ हुआ।

फोन पर जगह पूछे जाने पर जब मुझे इनकी भाषा समझ नहीं आई तो मैंने चाट वाले भैय्या को फोन पकड़ा कर बात करने को कहा।

जिन्हे हिंदी उड़िया दोनो का ज्ञान है। चाट वाले भैय्या ने बखूबी रास्ता समझाया जिसके बाद तो ऑटो वाला ठीक बताए हुए स्थान पर ही आया। 

सामान लाद कर लाठ साहब की तरह निकल पड़ा स्टेशन। अब लग रहा है समय से पहले पहुंच भी जाऊंगा और इतमीनान से ट्रेन में अपनी आरक्षित सीट तक भी पहुंच जाऊंगा।

जगदलपुर जाने के लिए भुभनेश्वर से हीराकुंड एक्सप्रेस एकमात्र ट्रेन है जो चिलिका और विशाखाट्टनम होते हुए जाती है।

सुब्रत के संग ऐश्वर्या तिवारी(लाल टीशर्ट में)

स्टेशन पर समय

स्टेशन पहुंचने पर खुशी खुशी किराया पकड़ाया और समान ले कर प्लेटफार्म की तरफ बढ़ने लगा।

पिछले हिस्से से आने के कारण यहाँ नजारा भी पिछड़नेपन का ही नजर आ रहा है।

जांच केंद्र से गुजरते हुए प्लेटफार्म संख्या एक पर आया। ऐप पर प्लेटफार्म संख्या चार पर दिखा रहा है। पर स्टेशन पर लगे बोर्ड पर कोई संख्या निर्धारित नहीं है।

ट्रेन अभी आई नहीं है। तब तक प्लेटफार्म संख्या एक पर ही इंतजार कर लेता हूँ। जब तक आएगी तब तक तरोताजा हो लेता हूँ।

जिस दिन भुभनेश्वर में कदम रखा था उस दिन बादाम दूध पी कर ऊर्जावान किया था। उसी दिन की तर्ज पर ऊर्जा के लिए लस्सी सही रहेगी।

सवारियों का आना जारी है। जो सभी चार संख्या पर लिफ्ट के माध्यम से जा रही हैं।

चुकी मैं लिफ्ट के पास ही बैठा इंतजार कर रहा हूँ ताकि फटाक से मैं भी निकल सकूं प्लेटफार्म संख्या निर्धारित होते ही।

दुकान पर नोट पकड़ाया और अपने लिए एक लस्सी ली। एक साथी घुमक्कड़ के लिए भी। वो भी मानव ही है।

लस्सी इतनी स्वादिष्ट निकली की एक से जी ही नहीं भरा। दोबारा आ पहुंचा लेने।

लस्सी से तरोताजा होने के बाद बैग ले कर निकल पड़ा। ना जाने क्यों व्यक्तिगत तौर पर हवाई यात्रा या सड़क यात्रा से ज्यादा ट्रेन यात्रा पसंद है।

शायद ट्रेन में लोगों का अलग अलग प्रांतों से चढ़ने उतरने का सिलसिला जारी रहता है इसलिए भी।

ट्रेन में किया गया सफर यादगार भी रहता है। मित्र भी बनते हैं। कुछ लोगो को अपना जीवन साथी भी ट्रेन में मिल जाता है।

लिफ्ट से चढ़कर पुल पर पहुंच गया। चार संख्या पर ट्रेन आ गई है।

मैं ही देर से आया हूँ। काफी लंबी ट्रेन है। छुटपन में चार डिब्बों वाली ट्रेन में भी सफर किया है।

जनरल डिब्बे से ज्यादा स्लीपर डब्बों में भीड़ नजर आ रही है। जो अमूमन होता नहीं है। ये आश्चर्य की बात है।

एक बात तो समझ आने लगी है उत्तर भारत के मुकाबले यहाँ ऐसे ही डब्बे खाली मिला करेंगे।

अगर खाली नहीं मिले तो कम से कम बैठने की तो जगह मिल ही जाएगी जो कि पर्याप्त है।

बोधगया से रांची, कोलकात्ता से भुभनेश्वर से आते समय भी यही स्थिति देखने को मिली थी।

खाली डब्बे! वापसी में जगदलपुर से विशाखापट्टनम जाते वक़्त जनरल डब्बा से जाया जा सकता है। 

पैसे फूकने का मुझे तो कोई अर्थ समझ नहीं आता। यात्रा में यही उचित है जहाँ जहाँ पैसा बचा सकते हैं तो बचा ले।

भुवनेश्वर की यादों को संजोय कहा अलविदा

ट्रेन चल पड़ी। रात के अंधेरे में सफर करने में और भी मजा आता है।

ठंडी हवा चलती है। ट्रेन में इस तरह से कई लोगों के बीच सफर करना अच्छा लगता है।

पहले तो सुरक्षा कारण हुआ करते थे जैसे लूटपाट, डकैती वैसा अब ना देखने को मिलता है ना सुनने को।

ट्रेन में पुलिस मुस्तैद रहती है। जो हमारी रात भर जाग कर रक्षा करने को तत्पर रहती है।

छत्तीसगढ़ में दाखिल होने पर जगह जगह पुलिस तैनात है। ट्रेन के हर डिब्बे में भी कम से कम एक से दो पुलिस वाले पहरा दे रहे हैं।

ट्रेन में मैं हमेशा ऊपर वाली सीट आरक्षित करता हूँ। नींद बेहतर आती है। अवरोध भी कम ही रहते हैं।

मेरी सीट के ठीक नीचे एक विचित्र ही प्राणी देखने को मिल रहा है।

सिकुड़ी भौं, गुस्से से लाल चेहरे पर नजर का चश्मा और हांथ में अखबार जिसकी सुर्खियां पढ़ने में जुटा है।

साथ ही सफ़र में खुद के मुताबिक नियम भी निर्धारित कर रखे हैं। जैसे दो लोग से ज्यादा व्यक्ति उसकी सीट पर नहीं बैठ सकते।

बत्ती बुझ गई तो कोई जला नहीं सकता। सब यात्री मंद मंद एक दूसरे को देख कर मुस्का रहे हैं। पर इस दुखी आत्मा से कोई बोलने के विचार में नहीं।

ट्रेन अपनी सही रफ्तार में चल रही है। ज्यादा कहीं रुक नहीं रही। साढ़े नौ तक चिलिका स्टेशन तक आ गई।

देर रात्रि स्टेशन पर खड़ी ट्रेन पर सवार ऐश्वर्य तिवारी

खड़ी हुई तो ऐसे खड़ी हुई की चलने का नाम ही नहीं ले रही। उतरकर प्लेटफार्म पर आ गया।

यहाँ प्लेटफार्म को ढके स्टेशन की टीन पर कबूतर ही कबूतर नजर आ रहे।

कबूतरों ने पूरा प्लेटफार्म सफेद कर डाला है अपना मल गिरा गिरा कर।

ट्रेन का सायरन बजता की मैं पहले ही अंदर आ गया। यहाँ डिब्बे में अब लोग सोने की तैयारी कर रहे हैं।

खडूस भाईसाहब भी अपना बिस्तर लगा कर सो चुके हैं।

मैं चप्पल उतार कर ऊपर अपनी सीट पर आ गया। चप्पल धरातल पर छोड़ने में भी संशय रहता है।

रात बिरात लोग सौंच घर जाते समय नींद में किसी की भी चप्पल डाल कर निकल जाते हैं।

ऐसा मैं खुद कर चुका हूँ जब खुद मेरी चप्पल ना मिलने पर तंग आ कर दूसरे की ही चप्पल पहन कर निकल गया था।

मोबाइल में कुछ देर गाने सुनते सुनते समय बिताया। अब जब तगड़ी नींद आ रही है तो बैग में अंदर रख कर चद्दर तान कर सो गया।

देखता हूँ कल कितने बज तक जगदलपुर पहुंचना होगा।

हरियाली से लैस छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ बहुत खूबसरत है। यहां प्रकृति फल फूल रही है क्योंकि मानव दखल कम है।

पर नक्सल दखल ज्यादा। क़ुदरत क्या कहती है कैसे कहती है क्यों कहती हैं ये तो ऊपर वाले की आवाज़ हैं। जो हमेशा कायम रहती है।

छत्तीसगढ़ कुछ इसी गूंज के साथ प्रकृति के साथ कंधे से कंधा मिला कर सीना ताने खड़ा है।

स्टेशन दर स्टेशन सवारियां उतरती जा रही हैं। भीड़ कम होती जा रही है।

कोटापोर रोड स्टेशन पर तो ऐसी खाली हुई की हर डिब्बे में यात्रियों से ज्यादा पुलिसकर्मी मौजूद हैं।

विशाखाट्टनम होते हुए समयानुसार दिन में दो बजे जगदलपुर आ पहुंचा।

सीट पर बिखरा समान बैग में डाला। चप्पल वापस बैग में और जूते पांव में।

ट्रेन खाली होने के बाद हर डिब्बे को ठीक से बंद कर दिया गया। गतिविधियां ज्यादा होती हैं शायद इसी कारण।

योजना तो यही है की बैग रखवा कर चित्रकोट झरना देखने निकल जाऊं। कल दिन की ट्रेन से विशाखापत्तनम निकल जाऊं।

अमानती घर की खोज

स्टेशन पर अमानती घर की खोज करने लगा। स्टेशन अधीक्षक से ले कर थाने तक में हर जगह खोजा पर जानकारी मिली कि यहां अमानती घर है ही नहीं।

आश्चर्यजनक है। इतने बड़े और मुख्य स्टेशन पर अमानती घर का ना होना।

सुरक्षाकर्मी यात्रियों से भी ज्यादा मौजूद हैं। सब के सब हथियारों से लैस। जांच सबकी हो रही और हर जगह हो रही।

याद आ रहा ही की पिछले दफ्तर में एक सहकर्मी छत्तीसगढ़ का निवासी है।

बातचीत हुई तो मालूम पड़ा वो छत्तीसगढ़ में ना हो कर हैदराबाद में है। जहां उसने किसी कोर्स में दाखिला ले लिया है।

पर भरोसा दिलाने लगा की जगदलपुर में व्यवस्था कर सकता है। उसके भरोसे पर मैं भरोसा कर बैठा।

अगर इंतजाम हो जाएगा तो भी बैग ही रखवाना है। नहीं भी होता है तो बैग के साथ बस्तर निकल जाना है।

इंतजाम का वक्त मांगते हुए उसने कुछ देर में जानकारी से अवगत कराने को बात रखी।

तब तक स्टेशन का ही मुआयना करने निकल पड़ा। जांच के घेराव से स्टेशन के बाहर निकलकर देखने पर जंगल जैसा वातावरण देखने में आ है। 

घोर जंगल। ना आदमी ना दुकान, इक्का दुक्का टेंपो जो शहर की ओर ले जा रहे हैं।

सहकर्मी के माध्यम से पता चला की उनके मित्र दशहरा की छुट्टी मनाने निकल गए हैं। जिसके कारण कोई व्यवस्था नहीं हो पाएगी।

इसका शायद ही कोई फर्क पड़ेगा मेरी योजना पर। 

हरित छत्तीसगढ़

खाना खज़ाना

बैठने वाली सीट पर सामान बटोर कर स्टेशन पर थोड़ा आगे चल कर देखने को मिली चालू अवस्था में भोजन की दुकान।

दिन का खाना यहीं खाना ठीक समझा क्यों कि स्टेशन के बाहर निकलते ही जंगली इलाका शुरू होने लगता है।

भरोसा नहीं कितनी दूर तक ऐसा देखने को मिलेगा। शहर के अंदर क्या माहौल होगा।

ज़ाहिर है कोई भी दुकान वाला जंगल में जानवरों के लिए अपना ठेला नहीं लगाएगा। 

एक पैकेट वाली थाली ले कर भोजन करने लगा। आसपास भरी तादाद में सुरक्षाकर्मी तैनात हैं।

दुकानदार ने बताया की कुछ ही देर तक ये दुकानें खुलती हैं। अंधेरा होने से काफी पहले ही ये दुकानें बंद हो जाती हैं नक्सलवाद के चलते।

खाना स्वादिष्ट है। इसलिए एक थाली और मंगवा ली। इस गांव जैसे वीरान स्टेशन पर यात्रियों से अधिक पुलिस कर्मियों की भीड़।

इनकी इतनी तादाद देख कर यही लग रहा है मानो नक्सलियों का हमला कभी भी हो सकता है।

मैं थोड़ा असुरक्षित महसूस कर रहा हूं। कम से कम स्टेशन परिसर पर ही पच्चीस से तीस जवान गश्त लगा रहे हैं।

तो परिसर के आसपास ना जाने कितने होंगे। इनको देख के यह अनुमान तो मैं लगा सकता हूं कि यहां गतिविधियां कितनी तेज रही होंगी। चलती ट्रेन में हत्या लूटपाट आम होगा।

पास में खड़ी ट्रेन के चलते ही ये सारे के सारे ट्रेन में चढ़ गए। अब जा कर मालूम पड़ा की ये सभी ट्रेन के चलने का इंतजार कर रहे थे।

इनके निकलते ही मैं भी निकल पड़ा बस्तर। भारत के सबसे चौड़े झरने को देखने।झरने को देखने।

भुवनेश्वर से जगदलपुर 810km

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *