अम्बा विलास महाराजा महल, मैसुरु महल

कर्नाटक | भारत | मैसूर

औषधि का महत्व

कल रात आठ बजे घर आने के बाद मैसुरु निकल पाना संभव नहीं था। इसलिए एक रात और सही कोयंबटूर में। सुबह मीरा आंटी से अलविदा लेने से पहले उनके बगीचे में निकल आया।

यहाँ उन्होंने अपने बगीचे में लगे हर पौधे के बारे में जानकारी देने लगीं। कई औषधिक पौधे जिनके अनेकों फायदे हैं।

इधर अंकल जी की अपनी बुलेट तैयार खड़ी है हमें पूलुवापट्टी तक छोड़ने के लिए। जहाँ से गांधीपुरा के लिए निकल जाऊंगा। जितना हो सका बल्कि सभी पेड़ों के बारे में जानकारी देते हुए कुदरत के महत्व को समझाया।

दंपति से अलविदा लेने के बाद दस बजे तक निकल पड़ा गांधीपुरा बस अड्डा। जहाँ से मैसुरु के लिए बस मिलेगी। अंकल जी ने पूलुवापट्टी बस अड्डे तक छोड़ दिया। यहाँ से कुछ ही देर में गांधीपुर के लिए बस का मिलना हो गया।

बस में जगह ना होने के कारण कुछ दूरी का सफर खड़े खड़े ही तय करना पड़ रहा है। हालंकि कुछ ही देर में बैठने की जगह मिल गई।

कोयम्बटूर से मैसुरु

ग्यारह बजे गांधीपुरा आ पहुंचा। यहीं बस अड्डे से मैसुरु के लिए सीधी बस मिल गई। बैग ले कर बस में चढ़ गया। पिछली सीट पर विराजमान हो चला।

मैं निरंतर ट्रेन के चक्कर में था की शायद कोई ट्रेन कोयंबटूर से मैसुरु के लिए मिल जाती तो बेहतर होता।

पहाड़ी इलाका होने के कारण कोई भी सीधी ट्रेन यहाँ से मैसुरु के लिए नहीं है। जो ट्रेन है भी वो दो भागों में मैसुरु तक पहुंचाएगी और समय बारह घंटे से भी ज्यादा का लग जाएगा। उससे बेहतर है कुछ घंटों में बस या अपने वाहन के जरिए सड़क मार्ग से जाना बेहतर रहेगा।

धीरे धीरे ही सही रेलवे स्टेशन के सामने से निकलते हुए शहर से बाहर निकलने का रास्ता तलाश रही है। पहाड़ी इलाके में प्रवेश कर चली है। कोयंबटूर पहाड़ों से घिरा हुआ है।

यह इलाका पूरा जंगल नजर आ रहा है। बिलकुल सुनसान। सड़क पर बस के सिवाय कोई अन्य वाहन नजर नहीं आ रहा। लग रहा है मानो अभी कोई जंगली जानवर निकल आयेगा।

एक पहाड़ी से दूसरी पहाड़ी पर जाने के लिए मोड बेहद खतरनाक साबित होते है। इधर बस में चालक ने कन्नड़ तमिल भाषी गाने शुरू कर दिए हैं। जो सुनने में बेहद कमाल लग रहे हैं। साथ ही मुझे याद भी दिला रहे हैं की मैं अभी भी दक्षिण भारत में ही हूँ।

बस भी पूरी तरह से भरी नहीं है। जितनी सवारियां आ गईं उतनी ही। कई सीटें यहाँ खाली पड़ी हैं। आसमान में बादल है पर धूप भी अच्छी खासी है। ना बारिश के आसार दिख रहे हैं ना तपिश से हाल बुरा है। कुल मिलाकर सफर का आनंद उठा रहा हूँ।

आधा सफर तय हो जाने और थोड़ी नींद लेने के बाद सड़क पर अलग ही दृश्य देखने में आ रहा है। सड़क किनारे पहाड़ में ट्रक औंधे मूंह घुसा हुआ है जिसे निकालने में काफी मशक्कत करनी होगी।

भीड़ का जमावड़ा है। ट्रक में लदे समान के साथ ट्रक को भी बाहर निकालने की कवायद जारी है। अपने अपने प्रयास में हर कोई लगा है। साथ ही भारी भरकम क्रेन भी मैदान में दिख रही है जिसकी मदद से ही ट्रक का निकल पाना संभव है।

सड़क किनारे पड़ा ट्रक

साढ़े पांच तक मैसुरु आ पहुंचा। बस अड्डे से निकलते हुए सोच रहा हूँ पहले जाऊं तो जाऊं किधर सामुदायिक मित्र के पास या फिर महल।

सामुदायिक मित्र से बातचीत के बाद ये निष्कर्ष निकल कर सामने आया की पहले महल देख लेना चाहिए। जब तक मैं महल देखूंगा तब तक मित्र भी अपने दफ्तर से मुक्त हो चुके होंगे।

बस अड्डे से सीधा महल की ओर बढ़ चला। यहाँ साथी घुमक्कड़ का मन भ्रमित हो रहा है। अचानक कानपुर जाने की जिद पर अड़ गया है। इस लिहाज से मैने उसे समझाया की जब वो मैसुरु तक आ ही गया है तो कम से कम पैलेस तो घूम ही ले।

उधर मैं लगातार सामुदायिक मित्र के संपर्क में हूँ। जो अपने घर पर अमंत्रित कर रहे हैं। यहाँ पर मुझे दो मित्र मिले हैं। जिनके घर मैं जा सकता हूँ।

साथी घुमक्कड़ भी चल पड़ा फिलहाल के लिए मैसुरु पैलेस तक। शायद उसके बाद कानपुर के लिए किसी ट्रेन में बैठ कर निकल जाएगा।

अम्बा विलास महाराजा महल

घड़ी में छह बज रहे हैं और मैं दक्षिण दरवाजे से परिसर में दाखिल हो चुका हूँ। हालांकि महल के अंदर तक प्रवेश बंद हो चुका है। बैग रखने की सुविधा कहीं भी नजर नहीं आ रही है।

प्रवेश द्वार पर बात करने पर निराशा ही हाथ लगी। भारी बैग को टांगे टांगे ही घूमना पड़ रहा है। एक छोर से दूसरे छोर उत्तर दिशा के दरवाजे तक आ गया।

मुख्य द्वार यहाँ हमेशा बंद रहता है। बंद होने का समय हो चला है अन्यथा गाइड अब तक आगे पीछे लग चुके होते। स्थानीय लोग यहाँ अच्छा समय गुजारने आते हैं। महल के सामने बहुत ही बड़ा बरामदा है जिस पर आने के लिए कोई शुल्क नहीं है।

जगह जगह लोग दिखाई पड़ रहे हैं बैठे जो इस मौसम का लुत्फ उठा रहे हैं। जाने क्यों चील कौए महल के ऊपर आधे घंटे से मंडरा रहे हैं। समझ से परे है।

सूरज भी ढल चुका है। घूमते हुए इसके अंतिम छोर पर आ खड़ा हुआ। यहाँ देखने में आ रहा है की जनता को बाहर का रास्ता दिखाया रहा है।

महल के भीतर से निकाल कर अवधि समाप्त होने के कारण बाहर कर रहे हैं। मूत्रालय की ओर जाने और फिर बाहर निकलने के बाद नजारा ही बदला नजर आ रहा है।

पलक झपकते ही अंधेरा हो चला है। अंधेरे में डूबे महल को प्रकाश से सराबोर कर दिया गया है। ना सिर्फ महल को बल्कि बाहर लगे खंबों को भी। बाहर के दरवाजों को भी।

इधर महल की रोशनी निरंतर बदलती जा रही है। कभी कम कभी इतनी की आंखों पर जोर पड़ रहा है। इस जगमगाहट को देख कर दिवाली की याद आ रही है।

महल की रोशनी इतनी ज्यादा है की बाकी हर जगह अंधेरा नजर आ रहा है। तस्वीर भी काली आ रही है। मेरे कैमरे से तो पूरा महल कैद नहीं हो रहा है चाहें जितना दूर निकल कर आ जाऊं।

यहाँ गोप्रो से ही पूरे महल की तस्वीर कैद हो रही है। पर अंधेरे में गोप्रो कैमरे में कैद तो सब हो रहा है पर साफ कुछ भी नहीं दिख रहा।

शाम के समय मैसुरु पैलेस

मैसुरु महल में विशेष प्रबंध

इतनी जगमगाहट हो चली है की महल के भीतर तक देखा जा सकता है की किस कक्ष में कहाँ क्या रखा है। एक घेराव के बाद महल के आसपास भी कोई नहीं भटक सकता। सिर्फ कुत्ता ही है जो अंदर भी घूम कर आ गया है।

जैसे जैसे रोशनी बढ़ रही है वैसे वैसे यहाँ पर भीड़ बढ़ रही है। जहाँ उजाले में सन्नाटा पसरा हुआ था अब धक्का मुक्की तक हो जा रही है।

कुछ तो महल के भीतर से बाहर भेजे गए हैं। कुछ शहर भर से घूमते हुए यहाँ आ धमके हैं। खिलौने वाले गुब्बारे वाले भी इसी मौके की फिराक में रहते हैं। ताकि उनकी ज्यादा से ज्यादा बिक्री हो।

यहाँ से साथी घुमक्कड़ अलविदा ले रहा है। यानी अब वो निकल पड़ा है कानपुर। बाकी का सफर मुझे अकेले ही तय करना होगा। आज सामुदायिक मित्र के घर पर भी एक ही व्यक्ति रुकेगा।

कुछ दस मिनट बाद देखा की साथी घुमक्कड़ वापस मेरी ही दिशा में आ रहा है। पूछने पर पता चला की अभी यहाँ से कोई ट्रेन नहीं है। एक दिन और बिता कर जाएगा। शायद कल सुबह यहाँ से निकल जाए।

करीब एक घंटे की रोशनी के बाद आठ बजते ही इधर महल को बंद करने का समय हो चला है। बत्तियां जला बुझा कर इसका संदेश देते नजर आ रहे हैं। सुरक्षाकर्मी भी चौकन्ने हो चले हैं।

मैदान से सिटी बजा कर भीड़ को छाटने का काम शुरू हो गया है। अचानक से सुरक्षाकर्मी ढूंढ ढूंढ कर लोगों को बाहर का रास्ता दिखा रहे हैं।

बेशर्म भीड़ भी धीरे धीरे कर निकल रही है। मैं भी टाल मटोल करते हुए बाहर की ओर जाने लगा। पहले दक्षिण द्वार की ओर फिर नाचते हुए सामने वाले द्वार की ओर निकल पड़ा इस लालच में की महल की कुछ तस्वीरें सामने से भी निकाल लूंगा।

अचानक पसरे सन्नाटे में सुरक्षाकर्मी भी गायब और जनता भी। शायद यहाँ मैं अंतिम दर्शक हूँ जो यहाँ से निकल रहा होऊंगा। पर अचानक इस बदलाव से मैं स्तब्ध हूँ। एकाएक लोग ऐसे गायब हुए जैसे भूत।

महल की तस्वीर सामने से लेने लगा और खुद की भी। करीब दस मिनट तस्वीरबाज़ी के बाद लगा निकलना चाहिए इससे पहले की कोई विशेष तौर पर आ कर रोक टोक करे।

उद्यान के रास्ते दरवाजे पर पहुंचा तो पाया फाटक ही बंद कर दिया गया है। अब खामखा मुझे यहाँ से कूद कर सड़क पर पहुंचना पड़ेगा। बारी बारी से हम फाटक को लांघ कर सड़क पर आ गए।

सड़क पर खड़े लोगों ने बताया की आज सरकारी छुट्टी होने के कारण महल को जगमगाया गया है। कुल मिलाकर सात तरह की बत्ती से इसे जगमगाया गया है।

एक जानकर ऑटोवाले के मुताबिक यहाँ पर कुल 97200 बल्ब है जिनके कारण ये चमक पैदा हुई।

यहाँ का महल गोथिक कला के अनुरूप तैयार किया गया है। वैसे ही रेलवे स्टेशन, हाई कोर्ट, मिन्सिपल कॉपोरेशन का दफ्तर भी।

मुख्य द्वार से निकलने से पहले की तस्वीर

सीएफटीआरआई में बीतेगी रात

पहले सामुदायिक मित्र के घर जाने का विचार त्याग रहा हूँ। व्हाट्सएप पर बात करते समय उसकी हरकते कुछ ठीक नहीं लग रही। जाने कैसे अजीब अजीब बाते कर रहा है जो असहज बना रही हैं।

इसलिए दूसरे सामुदायिक मित्र से संपर्क साधते हुए निकल पड़ा उनके द्वारा भेजे गए पते पर सरकारी संस्था सीएफटीआरआई। जहाँ अनुसंधान से संबंधित कार्य होते हैं।

कुछ यहाँ से पांच किमी दूर स्तिथ है। मुख्य सड़क से ऑटो करते हुए निकल पड़ा सीएफटीआरआई। कुछ दस मिनट के सफर में पहुंच गया फाटक तक।

हालांकि मैं मुख्य फाटक पर आ पहुंचा हूँ। शायद थोड़ा आगे निकल आया हूँ। यहाँ खुद प्रशांत मुझे लेने आए हैं। ऑटोवाले को पैसे थमा कर चलता किया।

प्रशांत के आते ही हम निकल पड़े उनके क्वार्टर की ओर जहाँ आज की रात बीतेगी।

कोइम्बटोरे से मैसुरु तक का कुल सफर 226किमी

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