मैकलोडगंज, स्टोरीज ऑफ इंडिया, हिमाचल प्रदेश
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मैकलोडगंज में सजी संगीत की महफ़िल

अमृतसर से जम्मू तवी से कुछ घंटे के सफर में रात के तीन बजे तक पठानकोट पहुंचा। ट्रेन अपने समय से स्टेशन आई है। उठने में थोड़ी चूक हो गई।

लोअर बर्थ पर रखे चश्मे पर उठते समय मेरा हांथ पड़ते ही चश्मे का नाश हो गया। अब बाकी बचे दौरे में मैं नज़र वाला चश्मा पहनने से वंचित रेह जाऊंगा। फिलहाल तो मैकलोडगंज पहुंचने पर ध्यान है।

ट्रेन के रुकते ही सारा सामान लेकर स्टेशन पर कूद पड़ा। स्टेशन पर पसरा सन्नाटा डरावना तो नहीं है। पठानकोट पर हुआ अतंकी हमला कुछ दिनों पहले तक चर्चा का विषय बना हुआ था।

प्लेटफार्म संख्या एक से बाहर निकलते निकलते चार बज गए। इतना वजन टांग कर चलने के बाद आंखो से नींद ओझल हो चुकी है।

बस का इंतज़ार

अगली चुनौती है धर्मशाला पहुंचने की। इतनी भोर में धर्मशाला के लिए बस कहाँ से मिलेगी ये पूछते पूछते स्टेशन के बाहर कुछ लोगों ने सहायता करने की मंशा से मार्गदर्शन किया।

स्टेशन के ठीक सामने खड़े रहने का सुझाव दिया, हालांकि उनके मुताबिक बस अड्डा ज्यादा दूर नहीं, लेकिन यहीं पर खड़े रहने की हिदायत पर जोर दिया और साढ़े पांच पर बस के आने का समय बताया।

मैं अपने बोरिया बिस्तर के साथ वहीं खड़ा इंतजार करने लगा। आर्मी कैंप ठीक मेरे पीछे है। एक टूक नजर पड़ी तो वर्दीधारी दो जवान गेट पर मुस्तैद हैं।

पठानकोट आर्मी कैंप को देख उस आतंकी हमले कि स्वत संज्ञान हुआ। सोच में पड़ गया कितनी चालाकी से आतंकीयों ने सेंध मारकर हमला किया होगा।

गेट की तरफ देख ही रहा था कि गेट पर मुस्तैद कमांडो मुझे शक की निगाह से देखने लगे। अरे भई मैं वो नहीं हूँ जो तुम समझ रहे हो। इनमें इनका कोई कुसूर नहीं।

हमला करने वालों ने अपने आप को अपग्रेड कर लिया है। उनका मुझे इस तरह से देखना मन में घबराहट पैदा करने लायक है।

उनके और अपने इत्मीनान के लिए मैं नज़रें फेर इधर उधर देखने लगा। हालांकि ना मैं गलत ना वो, लेकिन हाल ही के दिनों में कुछ ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं जिससे किसी को भी संगदिग्ध की निगाह से देखना लाजमी है।

सुबह की सैर पर कैंप से ही एक सज्जन निकले अपनी बेटी को स्कूल भेजने के इरादे से और बगल में आ खड़े हुए। भारतीय सेना में भर्ती होना एक सपना था जो सपना ही रह गया।

एक दो बसे निकल गईं लेकिन उनमें से धर्मशाला की ओर जाने वाली कोई नहीं थी।

सफर की शुरुआत

ठीक साढ़े पांच बजे एक खाली बस आई, मुझे अंदेशा हुआ शायद ये भी ना जाए धर्मशाला, पर बस के शीशे की पीछे भी धर्मशाला का बोर्ड तो नहीं टंगा दिख रहा है।

कंडक्टर से पूछने पर पुष्टि हुई, तब जा कर बस में बैठ निकल गया मैक्लोडगंज। सन् 2016 के बाद एक दफा फिर इन वादियों, पहाड़ियों के बीच में कुछ एक दिन गुजारूंगा

सुनहरी बर्फीली वादियां

पहाड़ों की बीच मानव की मनोदशा में भी बहुत परिवर्तन होता है। सुबह है लेकिन ठंड लगभग ना के बराबर है। बस हिचकोले खाते हुए आगे बढ़ रही है।

जैसे ही बस हिचकोले खाती वैसे सवारियां एक दूसरे के ऊपर डोलती नजर आती। सुबह का वक़्त है, स्कूली बच्चे, कर्मचारी अपने अपने काम से घर से बाहर निकल पड़े हैं।

कुछ इसी बस का इंतजार कर रहे थे कि कब उन्हें लेने आएगी। खाली बस स्टॉप दर स्टॉप भर रही है।

पहाड़ी इलाके तक आते आते बर्फ की चादर देखने को मिली। प्रदूषण के प्रकोप के कारण इन वादियों में भी धूप जैसे मानो कुच रही हो।

दो घंटे के सफर में मैं गाग्गल पहुंचा। बस में चड़ते समय बैग साथ में ही रखा था, पर जैसे जैसे सवारियां भर्ती गईं उनकी सुविधानुसार बैग बस की छत पर रखवा दिया था।

अब उसी बैग को निकालने एक लड़का चढ़ा और बारी बारी से सबके बैग फेकने लगा। ये आया मेरा बैग आसमान से टपका सीधे मेरी छाती पर अटका। गनीमत ये रही कि बैग लेके ज़मीन पर नहीं धड़ाम हुआ।

बैग के एक किनारे आ खड़ा हुआ। धाएं से ये बस निकल गई। यहाँ बने बस अड्डे पर खड़े कुछ लोगों से मालूम पडा की मैकलोडगंज के लिए बस कुछ ही क्षणों में आती होगी।

सोचा तब तक क्यों ना एक प्याली चाय ही हो जाए। पास में लगे ठेले पर चाय का आर्डर देने ही चला की बस फटाक से आ टपकी। बैग उठा मैं भागा बस की तरफ और भरी बस में चढ़ गया।

बैठने को तो नहीं मिला पर खड़े होने की जगह है। कांगड़ा नदी के समांतर चलते हुए कुछ समय में धर्मशाला पहुंच जाऊंगा।

धर्मशाला, नाम सुनते ही सबसे पहला खयाल जो मन में आता है वो है बुद्घ धर्म गुरु दलाई लामा। तिब्बत से चाइना से जान छुड़ा

भागे दलाई लामा भारत के धर्मशाला में ही ठहरे हुए हैं। बर्फ से ढकी पहाड़ी, बेहती कांगड़ा नदी का अनोखा संगम मन को मोह लेने वाला हैं।

 

बैग से कैमरा निकाल कर ज़ूम कर के देखा तो पहाड़ियों की चोटी पर जमा बर्फ अत्यंत आकर्षित कर देने वाली हैं। ऐसा लग रहा है, इसी कैमरे में घुस कर उन चोटियों पर पहुंच कर बर्फ से खेलता रहूँ।

ये इतना खूबसूरत है जिसका कोई जवाब नहीं। नदी इतनी साफ और मन मोहक, इतना तेज़ बहाव मन को बहा कर ले गया।

देखते देखते बस में इस कदर भीड़ हो चुकी है कि गलती से किसी ने अपने पैर की जगह मेरा पैर खुजला दिया। अरे भई ऐसी भी क्या खुजली, अपना अपना खुजलाओ।

धर्मशाला में इंतज़ार

सुबह के आठ बजे तक धर्मशाला आ पहुंचा। बस से उतरते वक्त ऐसा लगा जैसे मुंबई की लोकल ट्रेन से उतर रहा हूँ। मैं बैग लादे उतरा तो दो लोग लपेटे में आकर वो भी उतर आए नीचे तक।

मंद मंद मुस्काए वो यात्री वापस बस में चढ़ गए। बस में भीड़ इस कदर थी कि कुछ लोगों ने पसीना छोड़ दिया।

चौराहे किनारे से चलते हुए बीच चौराहे पर मैं आ खड़ा हुआ। किनारे लगे बोर्ड को निहारने लगा जिसमे पंच दिशा मार्ग चित्र बना है।

मैकलोडगंज चौराहा

पांच मार्ग देखने के बाद दिमाग पांच भागों में बंट गया, ठीक से कुछ नहीं पता चल पा रहा है कि मंजिला किधर है।

क्योंकि घुमक्कड़ी समुदाय मित्र प्रयेश अवस्थी ने गूगल नक्शे पर अपनी बताई हुई जगह पर आ जाने का पता तो दिया लेकिन ये नहीं पता उस पते तक पहुंचना कैसे हैं।

चंडीगढ़ में रहते ही मेरी प्रयेश से बातचीत हो चुकी थी। पहाड़ों पर अक्सर गूगल नक्शा बौरा जाता है, जाना हो दाएं तो दिखता बाएं है। बंद पड़ी दुकान के आगे बैग रखा और अंगड़ाई ली। कॉल लगा उन्हें अपने आने की सूचना दी।

फोन के उस तरफ से इतनी मोटी आवाज़, कुछ पल्ले नहीं पड़ी। फोन पर उन्होंने टैक्सी बुक कर के ऊपर की ओर आने का इशारा किया। लेकिन यहाँ पांच रास्तों में से ऊपर की तरफ दो रस्ते जा रहे हैं।

ये भ्रमजनक स्थिति पैदा हो गई मेरे सामने। मेरी समस्या समझते हुए उन्होंने किसी होटल की छांव में तब तक खड़े होने की हिदायत दी जबतक वो ना पहुंच जाएं। मैं खड़ा एक किनारे प्रयेश के आने का इंतजार करने लगा।

माहौल और मौसम दोनों हल्के फुल्के हैं ना जुड़ा ठंड का नामोनिशान है ना मानवों का। अचानक एक चार पहिया गाड़ी आ मोड़ पर रूकी और ज़ोर ज़ोर से हॉर्न बजाने लगी।

मुझे लगा ना ट्रैफिक है ना ही गाडियां तो फिर क्यों ये बंदा हॉर्न पे हॉर्न दिए जा रहा है। सिर घुमा दाईं तरफ देखा तो प्रयेश अपनी चार पहिया वाहन में बैठे हुए हॉर्न बजा हमारा ध्यान खींचना चाह रहा है।

हाय हैलो हुआ और जितनी देर में मैं बैग उठा कर कार में रखता उतने में पीछे से एक गाड़ी और आकर खड़ी हो गई।

अभी तक तो नहीं लेकिन अब जरूर जाम की स्थिति बन रही है। प्रयेश ने हमें चौराहे पर पहुंचने का संकेत दिया, गाड़ी घुमाई और मैं वहीं विराजमान हो गया।

कार के अंदर सबने अपना अपना परिचय दिया, मैं दोनों बैग के साथ लाठसहब की तरह पीछे वाली सीट पर बैठ गया। चौराहे से घुमा वापस चल पड़ी गाड़ी मैक्लोडगंज।

यथास्थिति फिर वही ठीक उसी जगह जाम की कहानी शुरू हुई। आगे चार पहिया टैक्सी पीछे एक लोडर, बगल में पान की दुकान, विषम परिस्थिति।

थोड़ा हटके दुकान को बचाते हुए दाएं से फिर बाएं से आगे पीछे करते करते खाली सड़क पर ज़ोर का एक्सेलेरेटर मार आगे निकल आए उन सभी मुश्किलों से जिन्होंने जकड़ लिया था।

यही जीवन है। अति विषम चढ़ाई में गाड़ी की भी सांस फूल रही है। कई दफा तो लगा गाड़ी बंद हो कर ढुलकते हुए वापस नीचे ना पहुंच जाए जहाँ से आया था।

मैकलोडगंज में प्रयेश के घर

तकरीबन दो किमी की चढ़ाई के बाद हम प्रयेश के घर पहुंचे। उसने गाड़ी बाहर ही लगाई और अन्दर जाने के लिए जैसे ही फाटक की तरफ बढ़ा वहां ताला लगा मिला।

जिसकी चाभी उसके पास नहीं है। दरवाज़े के किनारे से हम जाली फांद कर अन्दर पहुंचे। इतना बड़ा कैंपस किसी सरकारी संस्था का लगता है।

थोड़ा चल कर मैं मुख्य कंपाउंड में पहुंचा जहाँ एक महिला हाथो में अखबार लिए बहुत ध्यान से पढ़ रही हैं।

अटल बिहारी मौटेनीरिंग इंस्टिट्यूट धर्मशाला

ये प्रयेश की मां है जिनसे प्रयेश ने परिचय कराया। जिज्ञासावश उन्होंने मुझसे मेरे शहर के बारे में जानना चाहा। मुखातिब होने के बाद मैं अन्दर प्रयेश के कक्ष में आ गया। एक किनारे बैग रखा और सुस्ताने लगा।

यहाँ ठंड महसूस की जा सकती है जो धर्मशाला में ना के बराबर थी। कुछ देर बातों का दौर यूं ही चलता रहा। कुछ देर बाद प्रयेश ने मुझे मेरा कमरा दिखाने अपने कंपाउंड से बाहर ले आया।

मैं बैग उठा कमरे के बाहर बड़े से कंपाउंड से गुजरते हुए रूम तक पहुंचा। कमरा थोड़ा चढ़ाई कर पहले माले में बना है। कमरे की हालत के साथ मेरी हालत भी खस्ता है।

थकान सिर चढ़कर बोल रही है। बैग खटिया जैसे बिस्तर पर पटक सारा सामान निकाल कर बिखेर दिया। असंतुलित बैग वजन और बढ़ा देता है इसलिए उसे दोबारा से व्यवस्थित किया।

कमरा थोड़ा ऊंचाई पर बना हुआ है इसलिए बाहर का नज़ारा बहुत ही खास है।

पानी से थर्राया बदन

कुछ देर आराम ही कर लूं, तब तक अजय को भेज दिया स्नान के लिए और सारे इलेक्ट्रॉनिक प्रकरण लगा दिए चार्जिंग पर। अजय के आने के बाद स्नान करने की अब मेरी बारी है।

कंपाउंड में बने दुसलखाना तक पहुंचने के लिए कमरे से बाहर तो आना ही पड़ेगा। मैं कपड़ों सहित आंटी जी से नज़रे बचाते हुए दुसलखाना पहुंचा। काफी पुराने इस दुसलखाने ने मुझे अपने उन्नाव के क्वार्टर की याद दिला दी।

जब स्नान करने को बाल्टी हांथ डाला तब ठंडे पानी से आत्मा थरथरा गई। प्रयेश ने गरम पानी के लिए स्विच खोलने की बात कही थी। मुझे इस अंधेरे में वो स्विच मिला ही नहीं।

दुसलखाने के बाहर हलचल हुई। मैंने दरवाज़े की चिटकनी खोली और बाहर दद्दू दिखे उनसे गरम पानी का स्त्रोत जानने की लिए बटन पूछा। निर्देश देते हुए वो खुद ही अन्दर चले आए स्विच खोलने।

अन्धकार में लगे स्विच को खोलते जिस नलके से पहले ठंडा पानी आ रहा था अब भड़भड़ा के गरमा गरम पानी आने लगा। अब चैन है।

स्नान कर तैयार हो मैं अजय को ले रसोइए में पहुंचा जहाँ प्रयेश ने दिन के भोज में आमंत्रित किया है और खाने में है खिचड़ी। अहा! मेरा अति प्रिय भोजन।

उसने खिचड़ी खाने से पहले एक नई तरकीब दिखाई। आचार को सिरके में भिगो कर खाना। स्वादिष्ट! खाने के दरमियान प्रयेश ने अपने दिल्ली और चंडीगढ़ के किस्से सांझा किए की कैसे वो हर महीने दिल्ली आते जाते रहते हैं।

खिचड़ी बाद के बाद प्रयेश ने शाम तक तैयार रहने को कहा। तेज धूप में गीले कपड़े सुखाने को टांग तो दिए लेकिन कुछ घंटो की धूप में इन कपड़ो का पूरी तरह सूखना लगभग असम्भव है।

टेहेलते हुए कमरे में पहुंचा और दो ढाई घंटे जमकर सोया।

देर शाम सैर सपाटा

उठने में एक घंटा की देरी हुई लेकिन थकान मिट गई। वादे के मुताबिक हम शाम को मिले। मैं, अजय और प्रयेश कंपाउंड के पीछे के रास्ते से निकल पड़े मैकलोडगंज की गलियों में।

अंधेरा काफी हो चुका है जिस कारण पहाड़ियों की इन दुर्गम रास्तों से एक पहाड़ी निवासी ही भली भांति परिचित हो सकता है सो प्रयेश है, लेकिन समतल में रहने वालों के लिए भटकाऊ और मुश्किल भरा।

मैकलोडगंज में विदेशी सैलानियों का अंबार है। यहाँ प्रयेश हर किसी से परिचित है, चाहे वो सब्ज़ी या फल की दुकान। घूमते फिरते प्रयेश ने मेरा इंटरव्यू कैमरे में रिकॉर्ड किया और भिन्न भिन्न प्रकार के सवाल पूछे।

संगीत में रुचि रखने वाले प्रयेश हमें एक संगीत के उपकरणों की दुकान में लाए जहाँ ऐसे वाद्य यंत्र हैं जिन्हें मैंने शायद ही पहले कभी देखा हो।

प्रयेश आजकल बांसुरी बजाना सीख रहा है। संगीत के मंदिर से निकले तो कई भंड विदेशी मिले जो सालों से या फिर महीनों से इन्हीं पहाड़ियों में जीवन व्यापम कर रहे हैं।

एक से दूसरी, दूसरी से तीसरी पहाड़ी तक घूमते फिरते हम जाएंगे बांसुरी बाबा के दरबार। बसुरी बाबा ने अपनी कला से पूरे मैकलोडगंज को मंत्र मुग्ध कर रखा है।

इस अंधेरे में मैं कहाँ को का रहा हूँ मुझे कुछ खास आभास नहीं हो रहा है बस प्रयेश के साथ चलता चला जा रहा हूँ।

सैर सपाटे के दौरान मैकलोडगंज में एक संगीत की दुकान

लेकिन चाहें दिन हो या रात मुझे ये रास्ता भी याद होता जा रहा है। रास्ते भर कोई ना कोई मिलता गया कभी देसी तो कभी विदेशी। कुछ विदेशी तो ऐसे हैं जो यहाँ सालों से डेरा जमा कर बैठे हुए हैं।

उनमें से अधिकांश इसराइली हैं। इनको भारत बहुत प्रिय है और उससे भी प्रिय धर्मशाला। और हो भी क्यों ना भारत इजरायल के बड़े भाई सामान है।

जब दुनिया ने यहूदियों पर अत्याचार के रही थी तब भारत ने आगे बढ़कर उनको अपने हिस्से का टुकड़ा दिया।

रास्ते भर जो मिलता प्रयेश उसे बाबा की कुटिया पर आमंत्रण देता चलता। कुछ दूर तक गौतम नाम का लड़का हमारे जमावड़े का हिस्सा बना फिर कहीं भटक गया और पीछे छूट गया।

अलग अलग रेस्तरां से गुजरते हुए संगीतकारों को प्रयेश बाबा की कुटिया पर आमंत्रित करता चल रहा है। संगीतकार छोटे बड़े रेस्तरां में परफॉर्मेंस भी देते दिखे।

बांसुरी बाबा से परिचय

बातों बातों में हम बाबा जी की कुटिया पहुंच गए। एक छोटे से कच्चे पके घर में कुल दो स्थाई लोगों का निवास।

जैसे पूर्वी भारत में एक दूसरे को भाई कह कर संबोधित करते हैं वैसे यहाँ एक दूसरे को बाबा कह कर उसके प्रति अपना आदर व्यक्त करते हैं।

बाबा की कुटिया में पहले से ही एक विदेशी महिला और पुरुष अपना गिटार लिए धुन मिलने में लगे हुए हैं।

यहाँ तो पहले से ही संगीत की महफ़िल जमी हुई है कमी है तो सिर्फ दर्शकों की वो मैंने आ कर पूरी कर दी।

महफ़िल जमने से पहले बाबा ने खुद का परिचय दिया और खुद के संगर्ष के दिनों को याद किया। उधर उन्होंने ने अपने दिनों को याद किया इधर मुझे अपनी तैयारियों के दिन याद आ गए

कैसे वो इलाहाबाद में फौज की भर्ती के लिए गए, भर्ती तो ना हुई लेकिन उनकी एक भिखारी ने रोटी की सीख दे डाली। महफ़िल जमी गायक प्रयेश ने अपना गला साफ किया।

बांसुरी बाबा ने गिटार उठाया। मेरा दूर दूर तक संगीत से कोई लेना देना नहीं है और ना ही कुछ बजाना जानू मैं। सो अच्छे श्रोता की तरह सुनने को तैयार हूँ। बाबा के चेले ने बक्से जैसे वाद्य को बजाना चालू किया।

बाबा गिटार के साथ मैकलोडगंज 

विदेशी गिटार वादक बाबा के गिटार से धुन में धुन मिलने की कोशिश कर रहा है। उनके बगल में बैठी मोहतरमा दोनों और से भरपूर आनंद ले रही हैं।

प्रयेश ने अपने लहजे में पंजाबी रैप गाना शुरू किया एकदम हॉलीवुड गायक एमिनेम के अंदाज़ में। ये सिलसिला चलता रहा और मैं पंजाबी गीत को समझने कि कोशिश करने लगा।

चूंकि पंजाबी भाषा से कोई खास लेना देना नहीं है इसलिए ठेठ पंजाबी समझने में थोड़ा जोर डालना पड़ता है। रैप खतम हुआ, बांसुरी बाबा कछु देर के लिए लेट ही गए।

उनके चेले ने फटाफट चंपी की और अब लय पकड़ वो मैदान में फिर से उतर आए हैं।

संगीत स्पर्धा

अब कुटिया में एक और सज्जन दाखिल हुए अपना गिटार लेके। देखने में गिटार वादक ही मालूम पड़ते हैं। अब होगा तगड़ा संगीत मुकाबला। राजा रजवाड़ों के बड़े बड़े दरबारमें ऐसे मुकाबले हुआ करते थे।

हममें से शायद ही कोई ऐसा मुकाबला कभी देखा हो। टीवी में आने वाले शो की बात नहीं कर रहा, वो तो होते ही निर्धारित हैं, हार जीत तक तय रहती है उसमें।

बाबा ने आखिरकार अपना ब्रह्मास्त्र बांसुरी उठाई, नमन किया, थोड़ा गला साफ किया और जैसे ही अपने होंठो को बांसुरी पर लगाया वो मधुर ध्वनि पैदा हुई जिसका जवाब नहीं।

ये बरसों की मेहनत है जो सुन सकता हूँ मैं। उसके बाद तो सिर्फ उन्हीं की मधुर बांसुरी कमरे में बैठे दो दो गिटार वादकों को मात दे रही है। दोनों गिटार वादक अपना पूरा ज़ोर लगा रहे हैं उन्हें हराने में पर विफलता हाथ लग रही हर बार।

इसी बीच दो चार विदेशी मेहमान आते रहे जाते रहे। सिलसिला बरकरार रहा। मुकाबला और भी कड़ा हो चला है। माना गिटार वादक अपने क्षेत्र में उत्तम हैं लेकिन आज के दिन बासुरि बाबा सबसे सर्वश्रेष्ठ साबित हो रहे हैं।

संगीतकार के अलावा अलग अलग देशों से सुनने समझने वाले पैर जमा कर बैठे हैं। कोई अमरीका कोई फ्रांस। अपनी जगह से कोई नहीं हिल रहा। मन सिर्फ उनकी बांसुरी सुनने को जोर दे रहा है।

धीरे से एक गिटार वादक ढेर हो गया, लेकिन उसने वापसी की और अंत तक गया। संगीत की ऐसी महफ़िल में मैंने पहली बार शिरकत किया है।

संगीत की महफ़िल मैकलोडगंज 

अंदाज़ा लगा सकता हूँ जब राज दरबार में ऐसी प्रतिस्पर्धा होती होगी तो लोग कायल हुए बिना रह नहीं पाते होंगे। आधे घंटे चले इस मुकाबले में बांसुरी बाबा ने सबको चारो खाने चित्त कर दिया।

बांसुरी बाबा कि कुटिया में उनके आगे कोई ना टिक सका। बस जयघोष के नारे लगने की देरी है। इसी के साथ बाबा की कुटिया से अलविदा ले कर हम तीन प्राणी घर के लिए वापस निकल पड़े।

इसराइली भोज

घर जाते समय चर्चा हुई की आज इसराइली खाने का स्वाद लिया जाएगा। दो तीन पहाड़ियां पर करने के बाद रास्ते में ही कहीं प्रयेश ने इसराइली ढाबा ढूंढ़ निकाला।

बाकी कई ढाबे और रेस्तरां बंद हो चुके हैं। यहाँ पहुंचा तो देखा पहले से ही इसराइली झुंड मौजूद हैं। बेहद अनुशासित और सज्जन। ऐसा इसलिए भी कि इनको तीन वर्षों तक फौज की कड़ी ट्रेनिंग से गुजरना होता है।

जिसके बाद ये इनके ऊपर निर्भर होता है जारी रखना है या छोड़ देना है। कुर्सी मेज़ जैसी व्यवस्था कुछ भी नहीं है यहाँ।

जूते बाहर ही उतार दिए ये देख कर की हमें भी दरी के ऊपर बिछी चटाई पर ही बैठना होगा बाकियों की तरह। और ये स्वास्थ के लिहाज से भी अति उत्तम है। लंबी लंबी चौकियों पर रख कर आराम से खाने का आनंद लिया जा सकता है।

अजय और प्रयेश ने अपने लिए इसराइली खाना और मैंने भारतीय मूल का दाल चावल के ऑर्डर दिया। जबतक ऑर्डर आता तब तक चर्चा होने लगी मेरे बाकी के दौरे की।

धर्मशाला स्टेडियम जाने की बहुत तमन्ना है। बात कर है रहा था कि इतने में पास बैठी एक मोहतरमा के पैर में जोर का झटका लगा। फ़ौरन उनके एक साथी ने उन्हें ज़मीन पर लिटा उन्हें छुटकारा दिलाया। तब जा कहीं राहत की सांस ली।

दाल चावल से पहले इसराइली भोजन आया, चख कर देखा तो वाकई स्वादिष्ट लगा। बड़ा मज़ा आया स्वाद ले कर। मूह में पानी भर आया। इतने में दाल चावल और रोटी भी आ गई।

पूछा तो मालूम पडा चावल कम पड़ गए है इसलिए रोटी दी जा रही हैं। वाह जी वाह। इत्मीनान से कहा पी कर जो भी बिल बना उसका भुगतान किया और निकल पड़ा माउंटेन ऐरिंग इंस्टीट्यूट जहाँ डेरा डाल रखा है आज।

आज का मेनू मैकलोडगंज 

खरी खोटी

रास्ते से गुजरते हुए गली कूचों को पार कर बाज़ार तक आ गए जहाँ काफी दुकानें बंद हो चुकी हैं सिवाय एक के। इस दुकान से दो आदमी निकले इनमे से एक ने प्रयेश को दबोच लिया और बीती बाते करने लगा।

ना मेरी ना अजय की समझ में कुछ आ रहा है। भला ऐसा क्या हुआ जो इस आदमी ने प्रयेश की गर्दन पकड़ ली? खुद ही उसने धीरे धीरे बताया की कैसे पारिवारिक विवाद के चलते इनकी नौकरी चली गई।

प्रयेश ने गर्दन छुड़ाई और माफी मांगने लगा पुरानी बातों पर पानी डालने को ज़ोर डाला और जान छुड़ा भागा यहाँ से। रास्ते में उसमे पूरे पुराने घटनाक्रम का वर्णन किया की कैसे और किन हालातों में उनकी नौकरी उनके कर्मों से छीनी।

सूनसान रास्ते और अंधेरी रात में मैं प्रयेश के भरोसे चल रहा हूँ। रात के लगभग साढ़े ग्यारह बज चुके हैं और मैं अभी भी घर के दरवाज़े पर नहीं पहुंचा। ठंड कड़ाके की पड़ रही है। आखिरकार हम पहाड़ी श्रेत्रों से होते हुए घर पहुंचे।

काफी थकान भर चुकी है शरीर में, और सोने को जी चाह रहा है। पर प्रयेश ने कुछ देर कंपाउंड में रुकने की दरख्वास्त की।

अन्दर अपने कमरे में गया सारा सामान पटका और बाहर आ गया। उसने बताया उसका भाई भी आया हुआ है। अपने भाई के बारे में परिचय देते देते अंधेरी रात में सरकारी इंस्टीट्यूट दिखाया।

किनारे किनारे जंगल दिखाएं, ठंडी हवाएं चल रही हैं और बदन पर भी कुछ नहीं है। चलते चलते इतनी गर्मी भर चुकी है शरीर में की जैकेट भी उतार कर हांथ में ले ली है।

इस ठंडी हवा का आनंद ले रहा हूँ। अब नींद आंखों में पूरी तरह भर चुकी है। प्रयेश से अलविदा लिया और अपने कक्ष में जा कर धड़ाम हो गया।

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नमस्ते, मैं ऐश्वर्य तिवारी हूं। ये उन दिनों की बात है जब मैं अपने जुनून का पालन करने के लिए अपने कॉर्पोरेट जीवन को पीछे छोड़ दिया।भारत को जानने के मेरे अंदर हमेशा एक जिज्ञासा थी क्योंकि इस देश में हर कुछ मील के बाद विविधता, विभिन्न संस्कृति है। हर दिन मेरे लिए एक नए शहर में एक नई प्राणी के साथ एक नया दिन है। मैं एक घुमक्कड़ हूं जो के विभिन्न हिस्सों में घूमना पसंद करता है और जल्द ही भारत से बाहर हो सकता है।

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