मुश्किल हुआ जानकीचट्टी में छत मिलना

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भोर हुई देहरादून में

रात्रि के साढ़े आठ बजे जब बस चली तो लगा अब ये नए सफर पर निकल रहा हूँ। जो पुराने सारे यात्राओं से बिल्कुल अलग होने वाला है।

थोड़ा जटिल थोड़ा कठिन। क्यूंकि चार धाम यात्रा परियोजना के नाम से मशहूर यमनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ जो चारों अलग अलग पहाड़ी पर बसे होने के कारण यात्रियों को बहुत चक्कर काटने पड़ते हैं।

अगर कोई पर्वतारोही हो तो शायद वाहन के मुकाबले वो इन पहाड़ियों तक पहले है रास्ता नाप दे। देहरादून के लिए बैठा मैं सुबह आंख भी पांच बजे ही खुल गई।

और ऐसी खुली की खुली की खुली रह गई। इतनी भीषण गर्मी। जब सन् २००० में आया था तब जून माह में भी बद्दर ठंड का प्रकोप झेलना पड़ता था।

ये तो कहानी है मानव के प्रकोप की। कुदरत के केहर की कल्पना सोच से भी परे है। जिसका आंकलन कोई धरतीवासी नहीं कर सकता।

हरिद्वार बाईपास कलमेंट टाउन के पास बस आकर रुकी। बस से उतर कर इत्मीनान से मामी जी को फोन कर इक्तल्ला कर दिया कि मैं देहरादून पधार चुका हूँ।

चूंकि चार धाम यात्रा शुरू करने से पहले बेहतर यही रहेगा कि बैग का वजन और हल्का कर लिया जाए। वापसी में वो बैग लेता जाऊंगा वापस दिल्ली।

दिल्लवालों की दिल्ली अभी दूर है। इधर मामी ने सहूलियत के लिए मामाजी को कार सहित भेज दिया। मामी जी से तो मिला हूँ पर मामाजी को पहली बार देखूंगा।

आप सोच रहे होंगे ये कैसा वाक्या है। चूंकि ये दूर के रिश्तेदार है इसलिए। मामाजी अपनी लाल गाड़ी के साथ पधार गए। फोन पर बात करने से मालूम पड़ा यही हैं।

कार एक किनारे लगाते हुए, पहले तो बैग रखवाए आराम से। फिर परिचय हुआ। कुछ किमी का सफर तय कर हम आ पहुंचे गोविंद गढ़।

चूंकि मामजी टीचर हैं तो गर्मियों की छुट्टियां बच्चों के साथ। मां का घर में होना सभी को प्यारा लगता है। पर मेरा बचपन कुछ अलग ही बीता है।

घर पर तैय्यारी

फटाफट बैग से कपड़े निकाल बैग व्यवस्थित करने लगा। देखते ही देखते दो झोले भर गए। और सिर्फ उनी कपड़े ही बचे हुए हैं मेरे पास।

उधर साथी घुमक्कड़ को चार धाम जाने के लिए नक्शा बनाने के लिए काम पर लगा दिया। इधर जब तक मैं नहा धो कर आता नक्शा तैयार हो गया है और सुबह का नाश्ता भी।

आओ भगत में मामी कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं। मेरे लाख मना करने के बावजूद उन्होंने दिन का खाना भी पैक कर दिया। उधर नक्शा बनने के बाद ये तय हुआ कि देहरादून से बड़कोट तक के लिए बस मिल जाएगी।

बड़कोट से रानाचट्टी तक के लिए जीप से दूरी तय करी जा सकती है। ऑनलाइन बस टिकट करने के दौरान बड़कोट तक कि बस के लिए कोई सीट खाली नहीं दिखा रहा है। लेकिन बस के निकालने का समय पता चल गया।

मामा जी बाहर ही हैं तो वो उधर से पता करते हुए आ गए। इधर घंटे भर के भीतर सारा समान समेट कर सबसे अलविदा के कर निकल पड़ा लक्खी बाग़ बस अड्डे।

पहुंचा तो भारी भरकम भीड़ से सामना हुआ। लग रहा है शायद ही टिकट मिले। फिर भी पूरा प्रयास करते हुए टिकट खिड़की तक आया तो मालूम पड़ा बस भी उपलब्ध है और सीट भी।

फटाफट जेब से पैसे निकाल दो टिकट ले लीं। बस की अंतिम सीट पर दो अंतिम टिकट बुक हुई। टिकट ले बाहर निकला और बैग के साथ इंतजार के रहे साथी घुमक्कड़ को साथ लेके मामा से अलविदा लिया।

बस में अफरा तफरी का माहौल है। कंडक्टर ने दो टूक बोल दिया है कि सिर्फ वही यात्री जा सकते हैं जो जिनके पास टिकट है। खड़ी कर के सवारी ले जाना नियम के विरुद्ध है।

शुक्र है मेरे हाँथ में टिकट है। बैग लेके कर बस में चढ़ा और ऊपर बनी अलमारी में फीट कर के बैठ गया अपनी सीट पर। जिनके पास टिकट नहीं है उनको बाहर का रास्ता दिखा कर ड्राइवर ने बस चालू करी।

नया सफर: बरकोट

धड़धड़ाते हुए निकल पड़ी बस मंज़िल की ओर। शहर की धूल धक्कड़ से बाहर निकलते हुए बस उस जगह से गुजरने लगी जहाँ बचपन से जाने की दिली तमन्ना थी।

नेशनल डिफेंस एकेडमी के सामने से गुजरते हुए बस यही खयाल आ रहा है। मुझे यहाँ होना चाहिए था। पर शायद बराबर प्रयास ना किए हों।

कुछ क्षणों के लिए सिर झुका फिर उठा तो जलता हुए कूड़े के ढेर को देख मन क्षुब्ध हो गया। पहाड़ों कि ऐसी दुर्गति और शायद आने वाले समय में पहाड़ मानव की इससे भी बुरी दुर्गति करें।

प्रदूषण वाले इलाके से बाहर निकलते हुए बस घने जंगलों से गुजरने लगी है। मौसम में कुछ बदली सी है। और शायद बारिश के भी आसार हैं।

काले बादलों ने आसमान को घेर लिया है, और मैंने खिड़की को। बारिश में तो चाय पकौड़े खाना सबको अच्छा लगता है। पर मुझे फिलहाल इस बारिश को बस की खिड़की से देखने में मज़ा आ रहा है।

इधर बस ड्राइवर साहब ने पुराने मधुर गीतों का दौर चला दिया है। इन हरे भरे पेड़ो पर पानी की बूंद पड़ने से मानो पेड़ भी खिलखिला उठा हो।

शायद अब बस देहरादून के दायरे से काफी बाहर आ चुकी है। बारह बजे की चली बस तीन बजे आ रूकी है बेडियाना। यहाँ पर सभी सवारियों को कुछ वक्त के लिए आराम दिया जा रहा है।

उत्तराखंड के दुर्गम रास्ते

कहने का मतलब है पेट पूजा कर सकते हैं। बस तो लगभग खाली हो चुकी है। आगे बैठी काकी को छोड़ सब उतर गए है। सामने दिख रहे ढाबे पर या तो चाय या फिर समोसा गापकने में लगे हुए हैं।

मैंने साथी घुमक्कड़ को बस में बैठे रहने को कहा। कुछ शरारती तत्व बस के पिछले हिस्से में हैं इसलिए भी। और उतरकर एक कप चाय का ऑर्डर दिया।

साथ ही याद आया जो मामी जी ने कचौड़ी का डिब्बा बांधा था। बस में चड़कर वो डिब्बा खोल कर स्वादिष्ट कचौड़ियों का भरपूर आनंद ले रहा हूँ।

साथी घुमक्कड़ पानी की खाली बोतल लेकर नीचे उतर गया। और अपने लिए भी एक कप चाय के साथ भरी बोतल लेता आया। इधर जबतक चाय होंठो से लगता कि बस दोबारा चालू हो गई।

आसपास जमी खड़ी सवारियां भागते हुए आईं और लद गईं बस में। चाय संभालते हुए सीट पर बैठा और जल्दी ही खत्म करने लगा।

मोड़ दर मोड़ सवारियों के उतरने का सिलसिला शुरू हो चुका है। शायद घंटे भर में मुख सड़क, गली कूंचो से होते हुए बस पहुंच जाएगी बड़कोट।

कुछ ऐसा ही होता दिख रहा है। शाम हो चली है और सूरज भी सस्ती लेने लगा है। अगर अंधेरा होने से पहले जानकीचट्टी पहुंच जाता हूँ तो वारे न्यारे हैं।

अन्यथा तो भटकना भी पड़ सकता है। बड़कोट आते आते बस खाली हो गई है। पर मुझे लगा शायद और आगे जाएगी। अगर आगे नहीं जाएगी तो अभी तक जितने भी सफर किए उनमें से सबसे छोटा सफर साबित होगा ये।

और ऐसा ही होता दिख रहा है। जब पूछने पर बस ड्राइवर ने कहा कि इसके आगे बस नहीं जाएगी। जानकीचट्टी पहुंचने के लिए जीप करनी पड़ेगी।

जानकीचट्टी तक जीप सफर

भरे बाज़ार से गुजरने के बाद बस के किनारे लगते ही मैं नीचे उतरने लगा। उतरा ही हूँ कि गेस्ट हाउस वालों का पुकारना चालू हो गया।

एक बार तो मन में खयाल आया कि यहीं रुक जाऊं और सुबह सवेरे जानकीचट्टी पहुंचने के बाद यमनोत्री की यात्रा की शुरुआत करूं।

पर साथी घुमक्कड़ इस पर राजी ना हुआ। मैं सुविधा के अनुसार काम कर रहा हूँ। लेकिन समय आगे बढ़ने को मजबूर कर रहा है। देर से ही सही मगर जानकीचट्टी तक के लिए जीप मिल ही गई।

खुली जीप में सफर करने के मौके को हाँथ से कैसे जाने दूं। लपक कर चढ़ गया। पर अभी कुछ ही सवारी और लेके ही चलेगा ये नौजवान ड्राइवर।

एक सवारी और आईं और मुझे जबरन सिकुड़ कर बैठना पड़ा रहा है। इस तरह से जीप या ऑटो में सवारियां ठूंस ठूंस कर भरने की प्रथा काफी पुरानी है।

ऊपर से नेहले पर दहला तो तब देखने को मिला जब गाड़ी का ये पिछला दरवाज़ा बंद ही ना हो रहा। मतलब की ज़रा सी चूक हुई नहीं कि सवारी सड़क पर।

बगल मे बैठे हस्ट पुस्ट चचा ने दरवाजे को अपने बलवान शक्तिशाली हंथो से कसकर पकड़ लिया। और मैंने सीट का पिछला हिस्सा।

गाड़ी चालू हुई और दनदनाते हुए चल दी। ड्राइवर भी नौसिखिया मालूम पड़ रहा है। तकरीबन एक घंटे का समय बता कर बैठाया है।

पर ये महाशय एक को आधा करने में कोई कसर नही चोध रहे हैं। ऐसे कटिले पहाड़ों में गाड़ी ऐसे नचा रहे हैं जैसे फिसलने पर नीचे नहीं बल्कि ऊपर जाएगी।

ऊपर जाएंगे तो प्राण अगर गाड़ी नीचे पहुंची। अचानक से कुछ देर के लिए गाड़ी का रुकना हुआ। पहले तो लगा शायद तेल खतम हो गया हो।

पर जब लगातार पानी गिरने की आवाज़ आई तब समझ आया किसका तेल निकल रहा है। ड्राइवर को देख बगल में बैठे चचा को भी याद आया कि वो भी अपनी टंकी खाली करलें।

उठे और मटकते हुए चल पड़े। शायद ड्राइवर का साथ निभाने गए हैं। कुछ ही देर बाद दोनों गाड़ी में लद गए। शुक्र है पास में पानी का नलका भी था।

अन्यथा आज अनर्थ हो उठता। कुछ दूरी का रास्ता और पचास मिनट में हम आ खड़े हुए जानकीचट्टी। जहाँ से यमनोत्री की चढ़ाई शुरू होती है।

जानकीचट्टी: मिल गई मंज़िल

ड्राइवर को पचास मिनट का पचास रुपया थमाया और चल पड़ा बाज़ार से होते हुए। यमनोत्री नदी के दूसरी पहाड़ी पर बने मंदिर को देख कर पहले यही लगा शायद यही मंदिर है।

पर बोर्ड पर लिखे मार्ग का इशारा देख पता चला मंदिर का रास्ता इसी पहाड़ी से है। थकान दूर करने के लिए चाय की दुकान खोजने लगा।

पर जैसे जैसे आगे बढ़ रहा हूँ वैसे वैसे होश फाख्ता हो रहे हैं। यहाँ कचरे का ढेर तो नहीं पर किसी धार्मिक स्थल पर इतनी गंदगी पहले कभी नहीं देखी।

घोड़े, खच्चर तो हैं पर साफ सफाई ना के बराबर। कोई ग़लती से अगर गलत जगह पहुंच जाए तो वापस आते आते उसका सत्तेयनास हो जाए।

जानकीचट्टी से दीखता पर्वत

हर जगह गोबर और खच्चर। साथ ने चल रहे एक बेहद ही फुर्तीले वृद्ध दादाजी भी हैं। जिनका जोश और हौसला देख मेरी थकान मानो उड़ गई हो।

ये भी हमारे साथ ही आए हुए हैं अपने एक साथी के साथ देहरादून से। दद्दू भी अपने सोने की व्यवस्था देख रहे हैं। फिलहाल मुझे तो एक चाय की दुकान दिख रही है।

और यहीं बैग रख पहले तो चाय पियूंगा। फिर उसके बाद सोने का ठिकाना ढूंढता हूँ। चाय की जितनी उम्मीद कर रहा था उसकी की आधी नसीब हो रही है।

प्याली इतनी छोटी की मन भी ना भरे और दाम बहुत ऊंचे। खैर दो घूंट में चाय पी, पैसे दिए और निकालने लगा। चाय वाले भाईसाब ने एक दो जगहें बताई हैं जहाँ रुक सकते हैं, तो पहले वहीं जाऊंगा।

पास में एक टूट फूटे मकान का ऊपर वाला हिस्सा खाली पड़ा है और अलग थलग भी। एक काले रंग की तिरपाल है। पहुंच कर मुआयना किया तो लगा कि ये किसी के सोने का स्थल है।

डेरा तो यहीं डालने की इच्छा हो रही है। मगर साथ में ये भी लग रहा है कि रात बिरात कोई हनक जमाते हुए आ जाए कि ये जगह उसकी है तब क्या होगा। इसी विचार के चलते ये स्थान पर सोने का खयाल भी त्यागना पड़ रहा है।

बैग ले कर चल पड़ा निरी गंदगी से गुजरते हुए। थोड़ा नीचे नजर पड़ी तो बस अड्डा दिखाई पड़ा। जहाँ सैकड़ों गाडियां और जीप सवारियां ढोते हुए नजर आ रही हैं।

सूरज ढल चुका है और अंधेरे की पहली लेहर शुरू हो गई है। वजनी बैग लेके तकरीबन एक किमी चलने के बाद भाईसाहब ने जहाँ तक बताया वहां तक मैं आ पहुंचा। पर ऊपर जाने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा है।

सिवाय गंदगी के। एक रास्ता है तो सही मगर बैग सहित ऊपर चढ़ना समझदारी भरा नहीं होगा। मेरे नजरो के सामने औरतें और बुज़ुर्ग चढ़ गए। सो दूसरा रास्ता तलाशने लगा।

आगे से तो कोई भी रास्ता नहीं है, बल्कि बंद और पड़ा है। देखा तो वापस पीछे जा कर एक रास्ता दिखाई दे रहा है। उसी की ओर चलते हुए आ गया।

बैग सहित यहाँ से चढ़ना थोड़ा सरल जान पड़ रहा है। आगे आगे एक अधेड़ उम्र के आदमी ने अपने मेहरारू को चढ़ाया फिर खुद भी चढ़ गया।

मेरे चढ़ने की बारी आई तो हाँथ दे कर मुझे भी ऊपर ले लिया। ऐसे ही करके साथी घुमक्कड़ भी ऊपर आ गया। ऊपर आया तो खुद को एक बाज़ार में पाया।

ना मिला होटल ना गेस्ट हाउस

यमनोत्री जाने वाले मार्ग पर खुद को पाया। तेज़ी से दुकानों के शटर गिर रहे हैं। अभी तक जितने भी गेस्ट हाउस या होटल में पता किया तो सबमें रूम बुक ही सुनाई पड़े हैं।

रुकने का तो थोड़ी देर में भी देख सकते हैं पहले पेट की सेवा कर ली जाए। दो चार दुकान छोड़ कर ही एक रेस्त्रां है। इसके अलावा इक्का दुक्का और भी खुले हुए हैं।

थोड़ा आगे वाली दुकान में खाने के रेट लिए तो महंगा लगा। इस रेस्त्रां में थोड़ा सस्ता लगा। खैर अभी तक एक बात समझ में तो आ चुकी है। जिस हिसाब से यहाँ भीड़ है उस हिसाब से लूट भी।

खुद को कम ठगा हुआ महसूस करते हुए मजबूरन यहाँ खाना खाने के लिए आ गया। बंद पड़ा रसोई का चूल्हा मुझे देख फिर से चालू हो गया।

फटाफट तवे पर रोटीयां सिकने लगीं। मलिक ने ऊंचे स्वर में बताया की पांच से अधिक रोटी नहीं मिलेगी और कुछ चावल। खाना परोस कर जब सामने आया तो पनिया दाल देख बहुत तरस आया।

पर अन्न ही मिल रहा है ये काफी है। सो पांच ही रोटियां ही खाई गईं। अपने हिस्से के चावल साथी घुमक्कड़ को से दिए। मेरा इतने में ही पेट भर गया है।

पैसे दिए और चल पड़ा। चलने से पहले सोने की व्यवस्था जाननी चाही तो मलिक बोले अभी कुछ देर में दुकान का शटर गिर जाएगा तो आप भी यहीं सो सकते हो। बस चंद रुपयों की बात है।

बात चंद रुपयों की नहीं बल्कि सामान की है। ना जाने किस किस वर्ग का आदमी सोएगा और क्या होगा? ऐसा नज़ारा लगभग हर दुकान में नजर आ रहा है।

व्यवस्था तो सही है लेकिन निचले तबके वाले के हिसाब से बेहतर। हताश निराश होकर एक बेंच पर आ बैठा। मानो लग रहा है इसी बेंच पर सोना पड़ेगा।

पीछे दिखे रहे सरकारी लॉज में खूब भीड़ है। मालूम किया तो रेत आसमान छू रहे हैं। तो इसको अपने अंतिम लिस्ट में डाल लिया। अगर कहीं ठिकाना ना मिला तो यहीं सो जाऊंगा।

पुलिस का सहारा

सामने दिखे रहे पुलिस स्टेशन को देख एक आस जगी मन में शायद ये सेवाकर्मी ही कुछ मदद कर सकें हमारी। साथी घुमक्कड़ से तीखी बहस में ये तय हुआ कि पुलिस स्टेशन में बात करने साथी घुमक्कड़ ही जाएगा।

बेंच पर बैग रख साथी घुमक्कड़ अंधेरे में डूबे पुलिस स्टेशन के दरवाजे को खटकाने लगा। अपने पिताजी का परिचय देते हुए उसने सारी व्यथा एक सांस में गा दी।

बनियान में निकले पुलिस वाले को इतना कहते हुए सुना की वो दिनभर की ड्यूटी के बाद हमसे भी ज्यादा थके मांदे हैं। वो अपने कोतवाली में पनाह नहीं दे सकते।

बाहर पड़ी जगह पर बिछौना बिछाने की सलाह दी। पर साथी घुमक्कड़ अपनी बात रखते हुए उस भिखारी कि ओर इशारा करते हुए बोला
“रात अंधेरे में हम सो तो जाएंगे यहाँ पर क्या गारंटी है सुकून से सो पाएंगे। कब कौन लूट मचाने आ जाए क्या भरोसा।”

इस पर पुलिस वाले भाईसाहब की कुछ देर के लिए तोती बंद हो गई। कुछ पल सोचने के बाद बोले आगे एक बिरला हाउस है जहाँ खाली जमीन पड़ी हुई है।

एक बार वहां के निरक्षक से बात कर के देख लें। वो मान जाएं तो आप जा सकते हैं। साथी घुमक्कड़ ने पुलिस वाले से बात करने के बाद मुझसे सारी कहानी बयां की।

रात्रि के दस बजने को आएं हैं। एक बार बिरला हाउस में भी देख लिया जाए। सो साथी घुमक्कड़ चला गया। पुलिस वाले चाचा छाती खुजलाते हुए अन्दर चले गए।

इन्होंने ने काफी मदद कर दी। भारत की पुलिस का चेहरा काफी बदल रहा है। उधर साथी घुमक्कड़ दौड़ते हुए आया और बोला इजाजत मिल गई है।

जैसे मन से बोझ हल्का हो गया हो। पिछली सारी पुरानी लड़ाई झगड़ा बहस बाजी एकदम से भूल कर चल पड़ा बिरला हाउस। योजना तो यही है कि यहाँ के गार्डन में तम्बू लगा दूंगा।

पर निरक्षक बातों से इतना प्रभावित हो गए की खाली पड़े कमरे में हमें जाने की इजाज़त दे डाली। और कुछ उस तरह उथल पुथल से भरे दिन का अंत होने जा रहा है।

शिमला से देहरादून से जानकीचट्टी 410km

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