मुग़लों की पूर्व राजधानी मुर्शिदाबाद

पश्चिम बंगाल | भारत | मुर्शिदाबाद

कल रात कश्मकश के बीच जो सीट की घेराबंदी की है वो ताउम्र भुलाए नहीं भूलूंगा। शायद यही फॉर्मूला आने वाले दिनों में लगाता रहूँ अगर ऐसी भीड़ से मुकाबला करना पड़ा तो।

ट्रेन में भीड़ गजब की है। कुछ लोगों की तो कहा सुनी भी हो गई थी आपस में।

हालांकि मौके की नजाकत को देखते हुए मैने एक सीट पर कब्जा कर लिया तो। उस पर दो लोगों के लेटने लायक जगह थी।

उसमे भी कुछ लोगों ने मेरी सीट पर आने का प्रयास किया था पर जोर जबरदस्ती करके आने नही दिया किसी को भी।

अन्यथा दूसरी सीटो पर तो छह छह लोग सवार थे। अगर यही नीचे की सीट पर लेटा होता तो ये कतई मुमकिन नहीं था।

सुबह चार बजे का समय है कसीमबाजार स्टेशन पहुंचने का। ऊपरवाले की मेहरबानी से घुम्मकड़ समुदाय से संदीपन ने अपने घर आमंत्रण भी दिया है।

इसी आमंत्रण को स्वीकारते हुए मैं आज वहीं जाऊंगा स्टेशन पर उतरने के बाद।

चोरी पकड़ी गई

अचानक से नींद टूटी। लघुशंका के बहाने अपनी सीट से नीचे उतर आया। पाया की मेरा कला बैग नदारद है। बैग के ना मिलने पर मानो मेरे पैर से जमीन खिसक गई हो।

नकद आठ हजार रुपए जो कल रात ही निकाले थे। शुक्र इस बात का है की मोबाइल मेरे जेब में है। चिंता के कारण पसीने छूट गए।

घुमक्कड़ी के दौरान अलग अलग जेब और बैग में समान रखने से एक साथ सबका नुकसान तो नहीं होगा अगर चोरी हुआ तो।

इन्हीं सब जटिल परिस्थितियों से बचने के लिए ये सब करना पड़ता है। आज वो परिस्थिति आ ही गई जब बैग गायब हो गया।

मेरे बैग के बदले दूसरा काला बैग रखा हुआ है। पर वो मेरा बिलकुल भी नहीं है।

मुझको नीचे खड़ा और चिंतित देख साथी घुमक्कड ने उंगली से बाईं खिड़की की ओर इशारा करते हुए बताने लगा की बैग वहाँ है।

जैसे साथी घुमक्कड ने उस आदमी को बैग उठाते वक्त देख लिया हो कभी रात बिरात। थकान के चलते मैं रात भर बेधड़क सोया। उठने पर स्लीपिंग बैग में सामान भी बिखरा पाया।

इसीलिए स्लीपिंग बैग में सोया ताकि जेब से सामान निकले भी तो बैग में ही गिरे।

जिस ओर साथी घुमक्कड की अंगुल जा रही है वहाँ देखने पर एक अधेड़ उम्र का आदमी खिड़की से चिपका बैठा दिख रहा है।

उसको देख कर यहीं प्रतीत हो रहा है कि वह सोने का नाटक कर रहा है। बिना किसी देरी के उसे हिला कर पूछने लगा।

देखा तो मेरा बैग अपनी पीठ के पीछे सीट से सटाए बैठे था। बैग मिलने की खुशी भी हो रही है और इस आदमी पर गुस्सा भी आ रहा है।

जब पूछा की मेरा बैग क्यों उठाया तो बोला की उसके बैग का रंग भी काला है। एक ही रंग के बैग होने के कारण अपना समझ के उठा लिया।

पर मेरा बैग छोटा है और इसका बड़ा। हांथ लगाने पर भी समझ आ जाएगा चाहें कितना भी नींद में हो।

वेशभूषा और उसका बोलने का अंदाज़ बता रहा है। साथ ही इसकी लड़खड़ाती जबान शंका को और बढ़ा रही है।

जी तो चाह रहा है इसका सिर खिड़की की जालियों के बीच फसां के छोड़ दूं। लेकिन ऐसा करना संभव नहीं है।

बैग मिलने के बाद साथी घुमक्कड को पकड़ाते हुए मैं लघुशंका करने निकल गया। रात भर में हालात बदले नही हैं।

कासिमबाजार स्टेशन पर पसरा रहता है सन्नाटा

कासीमबाजार से कागरा

वही भीड़ जमीन पर पड़ी हुई। पैर रखना भी मुश्किल हो रहा है। निकलने में जो कष्ट है वो अलग।

कासीमबाजार पहुंचने में मात्र आधा घंटा है। मोबाइल ऐप पर देखने पर पाया की ट्रेन अपने निर्धारित समय से पहले चल रही है।

सुबह के चार बज रहे हैं और अगला स्टेशन कासिमबाज़ार है। इस स्टेशन पर भी कुछ सवारियां उतरी हैं। अब तक साथी घुमक्कड भी उठ चुका है।

सारा सामान समेट लिया है और कमर भी कस ली है। भीड़ के बीच उतरना कठिन हो सकता है। क्या पता कहीं फस ही जाऊं और ट्रेन चल पड़े!

बस होती तो चालक को बोल कर रुकवाया भी जा सकता है। पर ट्रेन में ऐसी कोई संभावना नहीं होती।

ट्रेन रुकी और आहिस्ता आहिस्ता मैं उतर गया। मुर्शिदाबाद जाने के लिए इसी स्टेशन पर उतरना है। स्टेशन पर अंधेरा बहुत है।

अपने जीवनकाल में ऐसा स्टेशन पहली बार देख रहा हूँ। ना कोई स्टेशन ऑफिस है ना क्वार्टर।

दूर जहाँ स्टेशन खतम हो रहा है वहाँ जरूर एक छोटा सा ऑफिस जैसा बना है।

या तो ये स्टेशन को पता नहीं है की भारत आजाद हो चुका है। या फिर ये वाकई काफी पिछड़ा है।

अंधेरे में चल पड़ा इस छोटे से कमरे की तरफ। उसके बाहरी तरफ थोड़ी रोशनी है।

जहाँ ऑटोवाले खड़े दिख रहे हैं। अंधेरी सुबह में अब थोड़ी आ बंधी है।

वरना ऐसे लावारिस स्टेशन पर सिर्फ डरने के सिवाय कुछ भी नहीं है। इधर स्टेशन से ट्रेन भी चल पड़ी अपनी मंजिल की ओर।

कोठरी जैसे दफ्तर को पार करने पर ऑटो वालों की कतार लगी है। यात्रा समुदाय से संदीपन रॉय के घर तक जाने के लिए घर का पता बता कर बैठ गया।

साथ में सिर्फ एक और सवारी बैठी हैं। जिन्हे शायद उसी मार्ग पर जाना है। गली में लगे सरकारी बल्ब की रोशनी में ऑटो नाचता हुआ चल रहा है।

आधे रास्ते तक आते आते सनदीपन को अपने आगमन की खबर से रूबरू करा दिया। फोन पर मालूम पड़ा वो जाग ही रहे हैं।

संदीपन का घर

आधे घंटे जे भीतर मैं संदीपन की घर की ओर जाने वाली गली के सामने उतर गया। पर थोड़ा आगे। गूगल नक्शे की मदद से थोड़ा आगे ही निकल गया।

गूगल नक्शा भरोसेमंद भी है और कभी कभी धोखा देने वाला भी। संदीपन को एक दफा और फोन मिलाते हुए उनका घर पूछने लगा।

घर के निकट तम होने से वो सुविधा अनुसार बाहर ही आ गए अपने घर से। सुबह सुबह जोरदार स्वागत हुआ।

रात भर काम करने के बाद अब संदीपन भी सोने की तैयारी में हैं और मैं भी। ट्रेन की लकड़ी वाली सीट पर सोने का अर्थ है टूटे रखता पर सोने जैसा।

उनके पूज्यनीय बापू जी भोर में उठ गए हैं। संदीपन रात से नहीं सोया है। अपने आईटी प्रोजेक्ट ख़तम करने में चक्कर में सुबह तक जुटा रहा।

अपने सोने से पहले उसने हमारी भी सोने की व्यवस्था कर दी। मैं बिस्तर पर ऐसा कूदा जैसे कोई बिछड़ा यार मिल गया हो।

भयंकर नींद के चलते जमकर सोया। आंख खुलती है तो समय काफी हो चुका है। सुबह के आठ बज रहे हैं।

कमरे से बाहर निकलने पर देखता हूँ की संदीपन भी उठ चुका है। बारी बारी से स्नान ध्यान करने के लिए वस्त्र निकालने लगा।

संदीपन का पुराना आशियाना है। जिसके कारण खुले आंगन में ही स्नान करना होगा। पुराने घरों में रहने का भी अलग ही अनुभव होता है।

सकारात्मकता का स्त्रोत भी उमड़ उमड़ कर बहता है। छुटपन में जब भी किसी रिश्तेदार के घर में जाता था तो पुराने घरों में निवास करते थे। वहाँ अलग ही आनंद की प्राप्ति होती थी।

इधर मैं स्नान करके तैयार हुआ उधर संदीपन कहीं से साइकिल घुमा कर वापस घर आ गया। शायद सुबह के नाश्ते का इंतजाम है।

संदीपन की माता जी जगन्नाथ मंदिर गई है। जो सलाना वो जाती ही हैं। कुछ दिनों में मैं पूरी पहुंच जाऊंगा। इसलिए घर में सन्नाटा पसरा हुआ है।

घर में खाना पकाने वाला कोई नहीं है इसलिए वह नाश्ता खरीद लाया।

साथी घुमक्कड के स्नान करते ही मैं, संदीपन और उनके पिताजी बैठ कर नाश्ता करने लगे।

मुर्शिदाबाद में घूमने लायक जगहें

सुबह की व्यस्त दिनचर्या से निजात पा कर मैं निकल पड़ा मुर्शिदाबाद के इतिहास को खंगालने।

यहाँ घूमने को बहुत कुछ है। मुर्शिदाबाद मुझे लखनऊ की याद दिलाता है। वहाँ भी इमामबाड़ा, यहाँ भी इमामबाड़ा। वहाँ भी मुगल शाशन था और यहाँ भी।

पैदल गूगल नक्शे के सहारे तंग गलियों से गुजरते हुए कागरा बाजार पहुंचा।

नाव पर गाडी ले जाती सवारियाँ

जाने तालाब है या नदी लेकिन लोग इसे नाव से पार कर रहे हैं। कुछ अपनी गाड़ी पाटा नाव पर रखकर उस पार जा रहे हैं।

कागरा बाज़ार में तालाब किनारे ही टेंपो भी खड़ी हैं। जैसा संदीपन ने मार्गदर्शन किया है उसके मुताबिक मुझे कठगोला चौक तक तो पहुंचना ही है।

एक खाली टेंपो खड़ी मिली जो काठगोला तक जा रही है। लप्प से बैठ गया। पर टेंपो चालक मेरी तरह जल्दी में नहीं हैं।

पूरा टेंपो भर कर ही निकलेंगे। जगह जगह टेंपो रुकने का सिलसिला जारी है और सवारी भरने का भी। नदी को पुल के सहारे पार करते हुए कठगोला (right place?)पहुंच गया।

यहाँ से दूसरा ऑटो करना होगा जो कठगोला चौक तक जाता हो। गुजरता हुआ बैट्री रिक्शा मिल गया जो उधर की ही तरफ जा रहा है।

ऊबड़ खाबड़ रास्ते से होते हुए कठगोला चौक पहुंचा। पर ऑटोवाले ने बताया की यहाँ से दो किमी पैदल चलना होगा तब जा कर चौक आएगा।

पैसा दिया और चलता किया। अब मुझे भी काफी चलाना पड़ेगा। दिन के साढ़े बारह बज चुके हैं और अभी तक पहली जगह ही नहीं पहुंच सका हूँ।

खेत खलिहान से होते हुए कठगोला के रास्ते पर निकल पड़ा। इधर साथी घुमक्कड की माता जी का फोन आ गया। जिनसे वो बतियाने लगा। शायद साथी घुमक्कड की शादी को ले कर चर्चे हैं।

धूप तेज है और जमीन बंजर। गांव वालों से रास्ता पूछते हुए ही आगे बढ़ रहा हूँ। मोड़ से दाहिने मुड़ते हुए गली के रास्ते। यहाँ अनाड़ी बच्चे खेलने में मगन हैं।

शाही कठगोला

किले जैसी निर्मित दीवार के सामने से गुजरने लगा। शायद अब कठगोला आ गया है। गांव वालों का भी यही कहना है। घूमते हुए जाने के बाद मुख्य द्वार आ जाएगा।

कच्चे रास्ते पर चलते हुए कुछ ही क्षणों में मैं मुख्य द्वार के सामने खड़ा था। जिस रास्ते से मैं आया हूँ उस रास्ते से कोई और नही आया।

यहाँ और भी जनता आई हुई है। ऑटो चालक भी सवारियों को छोड़ कर जा रहे हैं। शायद ये पक्के रास्ते से आए हैं।

कठोगोले का निर्माण जब भी हुआ हो पर इसका परिसर काफी बड़ा है। देख कर मालूम पड़ रहा है किसी काल में शाही परिवार रहता होगा।

प्रवेश द्वार से कुछ अंदर ही टिकट घर है। कठगोला देखने के लिए इसकी तय राशि चुकानी होती है। कुछ नौ जवान राशि सुन कर ही उल्टे पांव भाग लिए।

जो वाकई घूमने आए हैं वो टिकट ले कर अंदर आ रहे है। अय्याशी करने वाले बाहर। प्रवेश द्वार से इमारत तक का इलाका घने पेड़ों से ढका है।

आज मामूली सी इमारत दिखने वाला यह महल किसी समय यहाँ राज करने वाले नवाबों के बंगाल, ओडिसा और बिहार प्रांत की राजधानी हुआ करती थी।

काठगोले से पहले ही तमाम तरह के छोटी सुंदर इमारतें हैं। जो उस समय की रानियों के लिए समय गुजारने के लिए बनाई गई होंगी।

इनमे आज ताला जड़ा है। उद्यान में ही सीमेंट से बनी में कुर्सी भी है। जिस पर किसी जमाने में शाही परिवार चाय पर राजनीति करता होगा।

कठगोले का काफी हिस्सा क्षतिग्रस्त दिख रहा है। जो बचा कुचा है उसे सहेजने की कोशिश जारी हैं।

आज आम के पेड़ लहलहाते मिलेंगे किसी समय यही ज़मीन काले गुलाब उपज करती थी।

इमारत के सामने एक बड़ी सी झील है जो इसकी सुंदरता में चार चांद है। इमारत के दाहिने तरफ पक्षी घर है। जिसे देखने का मूल्य प्रवेश शुल्क में ही समिलित है।

यह लोगों को लुभाने का भी तरीका कहा जा सकता है लेकिन मैं पशु पक्षियों को कैद करने का हमेशा से ही घोर विरोधी रहा हूँ।

कठगोले में प्रवेश से पहले मेज कुर्सी पर पैर पसारे बैठे सज्जन को टिकट दिखाने पर ही दाखिला मिल रहा है। सो मैने किया।

कठोगोला के भीतर के कमरों की तस्वीरें लेना मना है। ऐसा साफ साफ शब्दों में लिखा हुआ है।

शायद मैं भी ना लूं। ऐसा कर पाना भी संभव नही है। क्योंकि टिकट जांच कर रहे जनाब ने अपना एक आदमी इसी काम के लिए छोड़ रखा है।

पहले कमरे में दाखिल होने पर देखता हूँ एक स्नूकर मेज़। जिसे संजो कर रखा हुआ है।

शाही परिवार में खेला जाने वाला खेल। भीड़ कम है इसलिए इतमीनान से देखने में सुकून है।

दूसरे कमरे में एक बड़ी मेज़ जिसपर बैठ कर खाना होता होगा। हर कमरे में आला दर्जे का फर्नीचर रखा हुआ है। दीवारों पर पुश्तैनी तस्वीरें लटक रही हैं।

किसी कमरे में डबल बेड तो किसी हॉल में भारी भरकम शीशा। हॉल में बैठने लायक अनेकों सोफे। पर हमें बैठना यहाँ तक कि छूना भी मना है।

साजो सज्जा का भी सामान सजाया गया है जो पुराने काल का प्रतीत हो रहा है।

देखने में अच्छा है। बाहर आने पर पहले माले की तरफ बढ़ने पर मालूम पड़ा की ऊपर जाने का अलग से टिकट लगेगा।

ऊपर भी यही सब कुछ है। मेरे आगे खड़े दो पर्यटक तो निकल पड़े। मुझे जरूरी जान नहीं पड़ रहा ऊपर जाना।

कठगोले के आगे आम के पेड़ लहलहा रहे हैं। पास में है जर्जर इमारत। शायद इसका संरक्षण करना चूक गए। इसे चारों ओर से बंद कर रखा गया है।

शाही कठगोला जिसमे कभी रहती थी हलचल आज पसरा है सन्नाटा

कुछ आगे चल कर एक और इमारत नजर आ रही है। ये शायद कोई मंदिर या मस्जिद है।

लोग चप्पल उतार कर अंदर जा रहे हैं। कठगोला बस यहीं तक है। आगे बनी ऊंची दीवार इस बात का संकेत दे रही है।

इस इमारत का निर्माण कार्य चालू है। बनावट से मस्जिद ही जान पड़ रही है। कुछ लोग इक्कठा हो कर खड़े किसी महाशय की बाते बड़े ध्यान से सुन रहे हैं।

मैं पास आ तो गया। पर जूते उतार कर अंदर जाने की इच्छा नहीं हो रही। वापस चल पड़ा मुख्य द्वार की ओर।

बगीचे में टहलते हुए कठगोले के सामने बनाई गई झील के पास एकाएक रुक गया। बताया जाता है की इस झील को बनवाने में लाखो रुपए खर्च कर डाले थे शाही परिवार ने।

उस समय इस झील में क्या होता होगा मालूम नही पर अभी मछलियां दिखाई पड़ रही हैं। छोटी से ले कर बड़ी।

कोई दाना डालता तो झट से उधर ही चली जाती। बड़े से कठगोला की छवि जब पानी पर पड़ रही है। तो कठगोला और भी सुंदर लग रहा है।

झील दर्पण का काम कर रही है। मैने साथी घुमक्कड को कैमरा थमाते हुए अपनी कठगोला के साथ तस्वीर निकलने को कहीं।

जिस साथी घुमक्कड ने बखूबी अंजाम दिया। हर तरफ से तस्वीर। वापस घूम कर आने के बाद साथी घुमक्कड की भी ऐसी ही तस्वीरें निकाली।

तस्वीर लेने के कार्यक्रम के बाद निकलने की सोच रहा हूँ। जो चिड़ियाघर शुरुआत में छोड़ दिया था अब उसकी ओर कदम बढ़ चले हैं।

कठगोला में ही नव निर्मित ये चिड़ियाघर यहाँ पर्यटकों को अपनी ओर खींचने वाला नमूना है। दाखिल होने पर यहाँ किसी तरह का कोई टिकट नहीं लगा।

ना कोई जांच करने वाला। अंदर आया तो तमाम पक्षी देखने में आ रहे हैं। चिड़ियों की अलग अलग प्रजाति से ले कर तोते तक।

कुछ समय व्यतीत करने के बाद अब यहाँ से निकलने का जी चाह रहा है। बाहर आ कर बंद पड़ी नीचे को जाती इमारत पर नजर पड़ी।

जो शायद औरतों का स्नानघर हुआ करता होगा। आज यहाँ ताला पड़ा है। तकरीबन एक घंटे से भी ज्यादा का समय बिताने के बाद निकल पड़ा जगत सेठ की कोठी।

जगत सेठ की कोठी

जगत सेठ को सिराज उड़ दौला के खिलाफ गद्दारी करने का आरोप मढ़ा जाता रहा है। जो अंग्रेजो के साथ शामिल हो गया था।

जगत सेठ की कोठी कठगोला से ज्यादा दूर नहीं है। कुछ कदम की दूरी पर स्थित कोठी तक पैदल ही आ गया। हालांकि रास्ते में मदद लेनी पड़ी।

कल्पना के अनुसार मैने इसे काफी बड़ी इमारत समझा था। पर यहाँ आ कर पता चल रहा है की इस कोठी से बड़ा तो मेरा घर है।

बहुचर्चित जगत सेठ की कोठी में कार्य प्रगति पर है। यहाँ पर कोठी देखने का शुल्क अदा करना होगा।

एक मंजिला ये कोठी में कुछ खास नहीं लग रहा मुझे। या यूं कह लें जैसे कठगोला में सामान का प्रदर्शन किया गया था। ठीक वैसे ही यहाँ भी यही हाल होगा।

दरअसल जगत सेठ का असली नाम फतेह चंद हुआ करता था। इस खिताब से तो इन्हे मेहमूद शाह ने नवाजा था। ये साहब उस जमाने में बहुत धनी व्यक्ति थे।

इसे देखने भी लोग यहाँ उपस्थिति दर्ज कराने आए हुए हैं। पर ज्यादा भीड़ नहीं है। बाहर से तो ये आम घर जैसा ही लग रहा है।

शायद लोगों के ना आने का ये भी एक कारण है। बेहद सादगी वाला ये घर अपनी ओर ज्यादा पर्यटकों को खींचने में नाकाम हो रहा है।

बाहर ही टहलते और चर्चा करते हुए आगे बढ़ गया। गूगल पर देखा तो मुर्शिदाबाद गाइड के नाम से जानी मानी जगह आई।

सो निकल पड़ा अगली मंज़िल की ओर मुर्शिदाबाद गाइड। जगत सेठ की कोठी से चांद कदमों की दूरी और मुख्य सड़क पर है ये स्थल।

अब तक के अनुभव से ये जान पड़ गया है की मुर्शिदाबाद का संरक्षण ठीक से नहीं हो रहा है।

ना तो यहाँ के इतिहास का और ना ही ऐतिहासिक धरोहरों का भी। कई तो पहचान में भी नही आ रही। जैसे मुर्शिदाबाद गाइड भी नही आ रही।

मुर्शिदाबाद गाइड

सड़क से गुजरते वक्त बाईं ओर पड़ी इमारत को ध्यान से देखने पर समझ आया की ये मुर्शिदाबाद गाइड है। अन्यथा आम सैलानी की तरह मैं भी अनभिज्ञ अवस्था में आगे निकल जाता।

द्वार के ठीक बगल में बनी कुठारिया में टिकट वितरण चालू है। अंदर जाने से पहले ये पूछने पर पता चला की अंदर है काफी कुछ देखने समझने लायक।

दो टिकट कटाए और अंदर निकल आया। मुंडेर पर चारपाई पर सोता हुआ एक मोटे आदमी को जगाया गया। ताकि हमें भीतर प्रवेश करने देने से पहले वो टिकट फाड़ सके।

मोटा आदमी जब तक जगता तब तक मैं आगे बढ़ गया। इधर पुराने आंगन के जैसा ही सब कुछ नजर आ रहा है।

यह एक घर जैसा महल है। वर्षों पुरानी भगवान की मूर्तियों मंदिर, फर्नीचर और कई कीमती वस्तुएं मौजूद है।

कुछ बड़े मंदिर कुछ छोटे। फर्नीचर पड़े पड़े धूल खा रहा है। खिड़की से झांकने पर देखा जा सकता है की क्या हालत बना रखी गई है।

धूल में बंद कमरों की कथा ही अलग है। जिसका वर्णन करने वाला कोई नहीं।

सरकार अगर थोड़ा ध्यान दे तो शायद इस महल की भी काया कल्प ही पलट जाए।

कुछ वक्त बिताने के बाद वापस मोटे आदमी की तरफ बढ़ने लगा। अब मोटा आदमी भी जाग रहा है। टिकट फाड़ने हुए अंदर संग्रहालय में जाने से रहा है।

मौजूदा संग्रहालय देखने के लिए अन्दर घुसा तो घनघोर अंधेरा पाया। सोच में पड़ गया कि यह भी विरला ही संग्रहालय है भारत में।

तभी किसी ने अंदर कमरों कि बत्तियां जलाईं जिससे कमरे रोशन हुआ।

अभी तक मैं अपने मोबाइल की टॉर्च का प्रयोग कर रहा था। जिसकी मदद से दीवारों पर लगी चित्रकारी को देख रहा था।

रात के अंधेरे में कोई यहाँ आए तो शायद भूतों के डर से ही नौ दो ग्यारह होले।

यहाँ बनी एक चित्र उन दिनों की कहानी बयां कर रही है जब मुर्शिदाबाद में जबरजस्त हलचल हुआ करती थी, इस महल की भी।

अगले कमरे में भी जमकर अंधेरा था जिसको दूर भागते हुए आया। पुरानी सामग्री और रोजमर्रा की जरूरतमंद चीज़े ही हैं। साथ में कुर्सी में विराजमान एक महिला।

जो यहाँ पर निगरानी करने के लिए बैठाई गई हैं। अंदर ही अंदर सीढी चढ़ते हुए पहली मंजिल पर आ गया।

यहाँ सिर्फ सन्नाटा और कुछ तस्वीरें मौजूद हैं। जर्जर पड़े इस मकान को कभी आलीशान तरीके से इस्तेमाल किया जाता रहा होगा।

मुर्शिदाबाद गाइड को कुछ इस तरह सवारने का प्रयास हो रहा है

पहली मंज़िल से बाहर जाने का रास्ता है। ये ठीक वैसा ही नजारा है जैसा चित्रकारी में दर्शाया गया है। अंदर है तो बड़े प्रवेश द्वार का और जनता का।

बंगाल, बिहार, ओडिशा की राजधानी होने के कारण यहाँ बहुत ही भीड़ हुआ करती थी। राजधानी के पलायन करते ही जनता भी यहाँ से पलायन कर गई।

आकर्षक है तो बाहर का बड़ा मुख्य द्वार। किसी जमाने में यहाँ सभा लगती होगी। मुर्शिदाबाद की सड़क निर्मित हो जाएं तो भी ये सारे स्मारक में रौनक आ जायेगी।

खाली पड़े दरवाजे पर ढेरो तस्वीरें निकाली और निकलवाईं। जनता के भी आने का सिलसिला शुरू हो चुका है। इसलिए तस्वीरों में भी अवरुद्ध आने लगा है।

निकल पड़ा मुर्शिदाबाद गाइड से निजमात इमामबाड़ा की ओर। जो शायद यहाँ पर आखिरी आकर्षण का केंद्र है।

तेज धूप में कच्ची सड़क पर पैदल चले चले हालत पस्त हो गई है। ऊपर से दिन का खाना भी नसीब नहीं हुआ सो अलग।

सामने से एक रिक्शा आता दिखाई दे रहा है। जिसे हांथ हिला कर रोका और निकल पड़ा निजमात इमामबाड़ा और हज़रदौरी महल।

निजमात इमामबाड़ा और हज़रदौरी महल

कहा जाता है की ये भारत का सबसे बड़ा इमामबाड़ा है। जहाँ पर निज़ामत इमामबाड़ा स्थित है। वहाँ पर पहले सिराजुद्दौला का इमामबाड़ा था।

सिराजुद्दौला इमामबाड़े के स्थान पर निज़ामत इमामबाड़े का निर्माण किया गया था। रिक्शेवाले ने झूलती सड़क पर समय से पहले ही पहुंचा दिया।

द्वार पर खड़े सुरक्षाकर्मियों ने बताया की आज शुक्रवार के दिन यह जगह बंद रहती हैं। अब मेरे पास दो विकल्प हैं या तो बाहर बाहर का उद्यान देख कर मन को संतुष्टि दे लूं।

या फिर द्वार से ही वापस निकल जाऊं। अंदर जाना माना नहीं है पर संग्रहालय आज के दिन बंद रहता है।

हज़रदौरी जैसा कि नाम दर्शाता है ठीक वैसे ही इस महल में प्रवेश करने के लिए हजार द्वार हैं। हजार द्वार दुश्मन को भ्रम में डालने के लिए बनवाए गए थे।

इसे पहले बड़ी कोठी के नाम से जाना जाता था। भागीरथी नदी के किनारे बसे इस तीन मंजिले इमारत में 114 कमरे और सौ असली दरवाज़े बने हुए हैं। बाकी 900 दरवाज़े पत्थर के बने हुए हैं।

इन्हीं के कारण हमलावर पकड़े जाते थे। इस महल में नवाब अपना दरबार लगाने आया करते थे।

निज़ामत इमामबाड़ा याद दिलाता है लखनवी इमामबाड़े की

यहाँ के संग्रहालय में 2700 से अधिक हथियार और विंटेज कारों का अद्भुत संग्रह है जिसक दीदार के लिए विशेष अनुमति लेनी पड़ती है। पर आज अंदर जाने की भी अनुमति नहीं है।

द्वार पर लगे हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू बोर्ड पर इतनी जानकारी पत्थर पर लिखी हुई है। बैग ले कर इमामबाड़े की तरफ चलने लगा। इस फिराक में की शायद यहाँ प्रवेश मिल जाए।

बंगाल सरकार अगर मुर्शिदाबाद जैसे शहरों पर ध्यान दे तो यह इतना जगमगाएगा जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।

उद्यान काफी बड़ा और सुसज्जित है। यहाँ रोज की साफ सफाई भी देखी जा सकती है। महल और इमामबाड़ा आमने सामने हैं।

दोनो इतने बड़े हैं की तस्वीर लेने के लिए भी बहुत दूर खड़ा होना पड़ रहा है। घूमते घूमते इमामबाड़े में चला आया।

बड़े से दरवाजे को जब खटखटाया तब अंदर से आए एक जनाब ने दरवाजा खोला।

इमामबाड़ा काम मदरसा ज्यादा लग रहा है। ये जनाब भी खुद किसी दूसरे शहर से आए हुए हैं। इमामबाड़ा भी आज के लिए बंद कर रखा गया है।

वापस महल की ओर मुड़ा और अब इधर बाहर ही जितना देखना समझना है वही है। बाकी जगह तो ताला पड़ा है। बाहर रखी तोप भी युद्ध की गवाह जान पड़ रही है।

पास में बनी एक छोटी सी इमारत में महिलाएं ठिठोली। माह को कैमरे में कैद किया। खुद को भी महल के साथ तस्वीरों में भी।

भूख के चलते विपरीत दरवाजे की तरफ मुड़ा। जहाँ से बाहर जाने का रास्ता है और आगे है ढाबा। भूख और समय को देखते हुए आ गया यही दिन का खाना खाने।

मुआयना करने के बाद खाने की में पर बैठा। दिन में दाल चावल मिल जाए तो क्या बात है। मिला भी यही।

भोजन के बाद अब निकलना बेहतर रहेगा संदीपन के घर के लिए। रात के ग्यारह बजे की ट्रेन को अगर लपकना है तो यहाँ से समय से अलविदा लेना होगा।

मुर्शिदाबाद में देखने को बहुत कुछ है और यही वजह रही जो मुझे यहाँ तक खींच लाई। शायद आने वाले सालों में अगर कुछ और सुधार हुआ तो कलकत्ते की तरह ये शहर भी पर्यटकों के आने का मुख्य स्थल हुआ करेगा।

जनता एक बार फिर मुर्शिदाबाद आयेगी। जिसकी छवि काफी कुछ लखनऊ जैसी है।

कागरा से कठगोला, जगत सेठ कोठी, इमामबाड़ा, महल तक में कुल यात्रा 227km

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