स्पीति वैली, स्टोरीज ऑफ इंडिया, हिमाचल प्रदेश
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मुद गांव जहाँ हैं मिट्टी के घर

काज़ा बस अड्डा

बस अड्डे पर पैदल ही आ पहुंचा। पंजाबी ढाबे से अड्डे तक ज्यादा दूरी नहीं है। आम शहरों के मुकाबले यहाँ भीड़ तो नाममात्र की ही है।

और खड़ी बसे धूल चाट रही हैं। एक बस तो खड़े खड़े इतनी पुरानी लग रही है जिसे देख कर मालूम पड़ता है मानो वर्षो से इसका संचालन ही ना हुआ हो।

बस अड्डे के आकार को देखते हुए खड़ी बसें खिलौने की तरह प्रतीत है रही हैं। अड्डे के मुख पर ही दो बसें अगल बगल ऐसे खड़ी हैं मानो जुड़वा बहने हों।

किसी भी बस में कोई हलचल ना होने से संशय और बढ़ गया है। की आखिर कौनसी बस मुद गांव के लिए रवाना होगी। इसी बीच बस अड्डे पर कुछ हलचल हुई।

वही चालक और कंडक्टर दिखे जिनके साथ सुबह चिचम गांव से निकला था और किब्बर उतर गया था। तभी दोनों लपक कर एक बस में चढ़े।

ये संकेत है यही बस जाएगी पर कहाँ ये जानने के लिए तो पूछताछ करनी पड़ेगी। बैग उठा कर जब बस के पास पहुंचा तो मालूम पड़ा दस मिनट के भीतर यही बस मुद गांव के लिए निकलेगी।

फिर क्या था। बैग लेकर अन्दर चढ़ा। धूल की चादर में लिपटी सीट पर पहले तो बैग रखा फिर देखने लगा सबसे कम धूल किस सीट पर है।

जैसे जैसे पीछे की सीटों पर नजर पड़ रही है वो उतनी ही धूमिल नजर आ रही हैं। बेहतर होगा आगे की ही सीट ही कब्ज़ा ली जाए।

देखते देखते दो चार सवारियां और आईं और चार बजते ही बस चालू हो गई।

उधर कंडक्टर साहब सवारियों की उपलब्धता को देखते हुए आग्रह करने लगे कि दोनों बड़े बैग बस की छत पर रख दिए जाएं तो बेहतर है।

बैग बस की छत पर। सोचते ही विचार आने लगता है कि कहीं ज़ोर का झटका लगा तो बैग तो गिर कर ना जाने कौन सी पहाड़ी पर मिले?

फिर भी हिम्मत दिखाते हुए अजय को ऊपर चढ़ा दिया और बारी बारी से बैग देता गया। अजय ने बैग लेकर उसे कसकर रस्सी से बांध की सुनिश्चित कर दिया कि ये बैग कहीं नहीं जाने वाले।

ढलते दिन में सफर की शुरुआत

पहाड़ियों पर बस का समय से निकालना बहुत ही आवश्यक हो जाता है। क्योंकि रास्ते में अक्सर मुसाफिर बस की राह देखते हैं। इसलिए अगर शुरुआत ही देर से हुई तो मंज़िल पर पहुंचते पहुंचते काफी वक्त जाया हो जाएगा।

चार से पांच ही मिनट बीता है कि देखते ही देखते बस चल पड़ी। सड़क पर काजा की ओर गाड़ी चल पड़ी।

कुछ दूरी चलने के बाद भीमकाय जैसी स्पीति नदी को पुल के द्वारा पार करते हुए उस पहाड़ी पर आ गई।

कीचड़ जैसी दिख रही नदी को देख कर पता चल रहा है कि पहाड़ों से गिरा मलबा कितना अधिक मात्रा में है। यहाँ अमूमन पहाड़ियों का पानी ऐसा ही देखने को मिलता है।

या तो पहाड़ियों में डायनामाइट लगा कर विकास के नाम पर उनमें विस्फोट किए जाते हैं। या फिर बिजली के नाम पर थर्मल प्लांट से निकालने वाला मैला पानी नदियों को दूषित करता है।

पर यहाँ सिर्फ गिरती हुई पहाड़ियों का। बहते पानी के ऊपर बने पुल को पार करना ही हुआ की कुछ एक सवारियां मिली। और इधर कंडक्टर साहब भी आ गए हैं टिकट काटने।

कल शाम से गीना जाए तो वही ड्राइवर वही कंडक्टर वही बस कुछ डिस्काउंट तो टिकट में बनता है ना। ये मेरा इनके साथ तीसरा और अगर कल सुबह आया तो चौथा सफर साबित होगा।

डिस्काउंट का कहना ही था और कंडक्टर साहब हसी खुशी मां गए। उनकी खिलखिलाती मुस्कान ने ही इस प्रश्न का उत्तर दे दिया था।

बस में अच्छी खासी भीड़ हो गई है। खेत खलिहान से वापस लौटने के बाद ये पहाड़ के किसान अब अपने अपने घर को जा रहे हैं।

कोई अपने गांव मूड तो कोई खार गांव तो कोई किसी अपने आशियाने जाने को उतावला है। खिड़की से ठीक बगल सीट होने का फायदा रहता है।

गहरी पहाड़ियां और दुर्गम रास्ता

दुर्गम रास्ते

नई जगहों पर खिड़की से बाहर झांकने से खुद को रोक ना पाना दर्शाता है। हमारे अंदर का बच्चा अभी ज़िंदा है। खिड़की से बाहर झांका तो अगल बगल की पहाड़ियों पर जमी बर्फ देख मन प्रसन्न हो गया।

ये अभी तक के दौरे कि सबसे निकटतम जमी हुई बर्फ की झलक है। कच्ची पक्की सड़क पर बस से सवारियों का चढ़ने उतरने का सिलसिला जारी है।

ऊपर की पहाड़ियों से नीचे ज्यादा देर देखने पर ऐसा लगने लगता है जैसे मानो बस सहित हम सब वहीं ना पहुंच जाएं। पर ऊपर से इतनी गहराई तक नज़ारा थोड़ा डरावना ही है।

शायद कमजोर दिल वाले इसे ना देख पाए। कुछ आगे चल कर पहाड़ी से हो कर गुजरने वाला ऐसा रास्ता भी देखने में आया। जिसपे अगर चला जाए तो शायद स्पीति नदी तक पहुंचा जा सकता है।

अधिकतर जगह पहाड़ से सड़क पर बेहता हुआ पानी नजर भी आया और आगे फिर वही दिख रहा है। ये खतरनाक तो है ही साथ ही सफर में दिक्कतें पैदा कर देने वाला भी।

क्या पता पानी के ऐसे बहाव के कारण सड़क धंस जाए और कोई अप्रिय घटना घटित हो जाए। पर ऐसा ना ही हो तो ही बेहतर है घाटी के वासियों और शहर से आए सैलानियों के लिए भी।

हल्के फुल्के बाहाव को पार करते हुए सफर ठीक ही जा रहा है अभी तक। की अचानक कुछ दूरी तय करने के बाद गाड़ी आ धंसी एक बहाव पर।

ऐसी धंसी है कि बस आगे बढ़ने का नाम ही नहीं ले रही। कुछ एक सवारियों को उतारना ही पड़ा। मेरे मन में भी विचार आया क्यों ना मैं भी उतर कर रॉबिन हुड बं जाऊं।

पर इतने अधिक मात्रा मे लोग उतर चुके हैं कि मेरा उतारना नाममात्र का रह जाएगा। जोर का धक्का लगा और कुछ आगे गाड़ी बड़ी।

इधर बस के अंदर बैठे ड्राइवर ने सूझ बूझ के साथ बस को संभालते हुए आगे बढ़ाया। और उतरी हुई सवारियों को वापस अन्दर लिया।

छाती फुलाए कुछ वीर जवान इसी मे अपनी शान समझ रहे हैं। वैसे समझे भी क्यों ना उनके अलावा तो बाकी गाड़ी में ही सवार रहे। और बेहतर भी है। सकरी पहाड़ी में सभी यात्रियों का उतारना भी ठीक नहीं।

मिले और भी घुमक्कड़

बस के है भीतर एक नौजवान महिला और उसके अंग्रेज़ मित्र की खिंचाई करते नजर आ रहे हैं। ये किस बात पर ये तो वो ही जाने।

पानी के बहाने बात हुई तो पता पड़ा पूरा दल हफ्ते भर की रुकने की मनोदशा से आया है। बाद में विस्तार से महिला जिन्होंने अपना नाम शिवानी बतलाया अपने घुमक्कड़ी के अनुभव सांझा किए।

बताया जब बहुत दिन घर से बाहर रहती हैं तब कैसे वो अपने घरवालों से संपर्क स्थापित करती हैं। कैसे निरंतर पल पल की खबर घर तक पहुंचाती रहती हैं शिवानी जी।

तभी अचानक से बस यू टर्न लेते हुए दूसरे रास्ते निकलने लगी। पहले तो समझ नहीं आया ये क्या हो रहा है।

बाद में जब वहाँ दूर सवारियां उतरी तब जा कर समझ आया कि आखिर इतनी दूर आने का कारण क्या था। हर सवारी की जिम्मेदारी।

वैसे इतनी खुली छूट के साथ घूमना हर किसी के बस की बात भी नहीं। फिर चाहे वो लड़का हो या लड़की। स्पीति के अपने अनुभव को बताते हुए और ज़ोर देते हुए कम से कम एक हफ्ते रुकने का सुझाव दिया।

मैं उनकी बात से पूरी तरह सहमत हूँ। बात चीत का दौर चल ही रहा है। की दो घंटे के भीतर हम आ पहुंचे मुद गांव। देखते ही देखते चमकता सूरज अब कहीं भी नजर नहीं आ रहा है।

और आसमान में बस कुछ उजाला है। बस में अधिकतर यहाँ के निवासी ही हैं। सिवाय कुछ को छोड़ के। अब जैसे सामने खड़े नवयुवकों के हुजूम को ही ले लीजिए।

जिनके भाव नहीं धरातल पर हैं। सफर के दरमियान कुछ वाक्यों से ऐसा ही प्रतीत हुआ। घुम्मकडी अमीर गरीब होने का खेल नहीं।

ये तो वो अहसास से जिसे हर कोई अपने तरीके से जी सकता है। कम पैसे वाला कमतर तरीके से। अमीर अपनी जेब के हिसाब से पर सबको समान बनाएगी पहुंचने वाली मंजिल।

आखिरकार मुद गांव

बस से उतरा तो होश आया कि बैग तो बस की छत पर रखे थे। अब देखना है कि वो बचे हुए हैं या निकल लिए किसी पहाड़ी में लुड़कुडी खाते हुए।

जितनी तेज़ी से बस से नीचे उतरा उतनी दुगनी रफ्तार से बस की छत पर भी चढ़ गया। बैग तक पहुंचा और बारी बारी से दोनों बैग बस की छत से अजय को थमा दिए। और सीढ़ी के बदले यहीं से कूदना बेहतर समझा।

हालांकि की ज्यादा ऊंचाई पर तो नहीं है। पर अब लग रहा है ऐसा नहीं करना चाहिए। शायद जाने अनजाने में खुद को ही चोंट पहुंचा दूं।

देखते ही देखते बस खाली हो चुकी है। और लगबग सभी यात्री निकल पड़े हैं मुद गांव की गलियों में। मैं एकाएक एक किनारे खड़े इस सबको ये सोच को के ऐसे निहार रहा हूँ।

मानो ये सभी यात्री यहीं के रहने वाले हों। मेरे लिए अभी ये गांव भी नया है और चुनौतीभरा भी। सबसे पहले तो आज रात का प्रबंध करना बहुत जरूरी है।

सफ़ेद चादर ओढ़े पर्वत

बर्फीली पहाड़ियों के बीच में अगर तम्बू गाड़ने का भी सोचूं तो खुद के साथ अन्याय होगा। वो इसलिए भी कि पूरे के पूरे मिट्टी के बने इस गांव में इं घरों में होमस्टे ना लेकर।

कंडक्टर बाबू से कल की समय सारिणी भी पूछ ली। हर हालत में बस पकड़नी है। फिर अरुण के साथ हिक्किम गांव के लिए भी निकालना है। वैसे तो नौ बजे तक का समय दिया है उसने, शायद मैं और भी जल्दी पहुंच जाऊं!

रेन बसेरा

बैग उठा कर कुछ आगे ही बढ़ा की पहला होटल देखने को मिला। इस भाव से कि कहीं कोई और ठिकाना हो ना हो एक बार होटल ही सही।

होटल के मलिक के दरख्वास्त पर कमरा भी देखा और दाम के हिसाब से वाजिब भी लगा। पर बात वहीं आकर अटकने लगी रुकना तो मिट्टी के बने घरों में है। चाहे कुछ भी ही जाए।

इसी सोच के साथ होटल से बाहर निकल आया। बाहर आकर आगे की ओर और भी होटल और प्राइवेट होमस्टे देखने को मिले जो कि बनावटी लगे।

कोई कुटिया में कोई ईंट का बना पक्का घर। आगे चौराहे पर कुछ भीड़ सी लगी है। ये किसलिए है ये तो नहीं मालूम पर गांव वालो से उन घरों का पता लगाने में जुट गया जहां होमस्टे मिलेगा।

घर के चौखट पर खड़ी महिला से उन घरों के बारे में जानकारी जो अपने यहाँ मेहमानों को ठहराते हैं। और बदले में पैसा लेते हैं।

ऐसे ही एक घर का दरवाज़ा खटकाने लगा। इसी आस में शायद यहाँ कोई व्यवस्था हो जाए। दो मंजिला बने इस मिट्टी के घर के बाहर घोड़े अपने में मस्त चारा खाने में जुटे हुए हैं।

यहाँ लगभग हर किसी के पास घोड़ा है। ऐसा इसलिए भी कि शायद ये घोड़े का उपयोग करते हों सामान लाने ले जाने में। जैसे प्राचीन काल में हुआ करता था।

मिला होमस्टे

तभी खट्ट से चौखट खुली और एक लंबा चौड़ा आदमी निकला। और आने का कारण पूछने लगा। उसके हाव भाव देख कर तो लग ही गया है की क्या बात करनी है।

बात और सरल हो गई और मैंने रुकने की इच्छा प्रकट की। कुछ रुपए की चर्चा हुई और इन भाई साहब ने हमें अन्दर ले लिया। बाहर गाय अन्दर बकरी।

और ढेर सारा अंधेरा। अभी ना जाने और किन किन पशु पक्षियों से मुखातिब होना बाकी है। लकड़ी की बनी सीढ़ी के पास स्विच पर हाँथ लगाया तो एक टिमटिमाता हुआ बल्ब जला।

सीढ़ी इतनी सकरी की अगर सीधे सीधे चढ़ा तो सिर फूटने के अवसर अधिक हैं। मकान के मलिक हमसे पहले ही ऊपर जा पहुंचे।

और ऊपर से एक एक कर बैग घसीटने लगे ताकि हम सहूलियत से ऊपर आ सकें। पर मुझे एक पल को ऐसा लगा मानो ऊपर बैग घासीत कर ऊपर की और जाने वाली सीढ़ी का दरवाजा ना बंद करदें।

और मैं बकरे के साथ नीचे खड़ा सिर्फ ताकता रह जाऊं। मेरी सोच के परे ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। सकरी सीढ़ी के रास्ते ऊपर पहुंचा।

तो सामने खड़े मकान मलिक ने सामने की ओर इशारा करते हुए हाँथ धोने का निवेदन किया और अपने कक्ष में निकल लिए। जबतक मैं हाँथ धोता पीछे से अजय भी आ गया।

जब सब कुछ धुल पूछ गया तब हमें अंदर कक्ष में प्रवेश करने का मौका मिला।

घी की बनी चाय

स्पीति घाटी और यहाँ के लोग आज भी प्राचीनता से रहते हैं। और बीसवीं सदी में तो इनका क्या ही लेना देना रहता होगा शहर के लोगो से। ये तो कुछ वर्षो से यात्रियों का आगमन की शुरुआत हुई है।

अन्दर भी यही देखने को मिल रहा है। चूल्हा और उसपे खाना बनाने का तरीका भी प्राचीन। गैस सिलेंडर का कोई नमो निशान नहीं।

एक छोटी सी भट्टी जिसका धुआं चिमनी के जरिए बाहर निकल रहा है। कमरे में भाईसाहब ने अपनी पत्नी से मुलाकात कराई।

घी की चाय बनती हुई

मकान मालिक के विपरीत उनकी पत्नी काफी बूढ़ी नजर आ रही हैं। हालांकि अभी तक जितने भी जगहों मे गया वहाँ मुझे पहाड़ी लोग फुर्तीले और चुस्त दुरुस्त जवान नजर आए।

अपना परिचय देते हुए दिल्ली का निवासी बताया जो वो आसानी से समझ गईं। शायद कानपुर बताया तो मुश्किल होता। पर भाई साहब कानपुर शहर का नाम सुना है।

ये सुन कर अच्छा भी लगा और थोड़ा आश्चर्य भी। भाईसाब ने इसके पीछे भी कारण उनका दिल्ली आना जाना बताया। जब वो यहाँ उगाई हुई फसल या कुछ बड़ी खरीदारी के लिए दिल्ली ही जाते हैं।

गुफ्तगू हो ही रही है कि चूल्हे के ऊपर चाय चढ़ गई। पर उनके चाय बनाने के अंदाज़ से मालूम पड़ रहा है कि आज स्पेशल चाय होंठो तक आयेगी।

मैडम ने अपनी दबी आवाज़ में बताया की वो आजतक इतनी उम्र होने के बाद कभी इस गांव से बाहर नहीं गई। कारण उनका उनके गांव के प्रति स्नेह और प्रेम।

स्पीति घाटी है ही इतनी अनोखी की कोई भी यहाँ आए तो शायद यहीं का होकर रह जाए। इतने में चाय छन कर स्पेशल चाय बनकर तैयार भी गई।

कप में डली तो हतप्रभ रह गया। उम्मीद की थी दूधिया चाय और मिली ना जाने कौन सी चाय। पूछने पर पता चला ये ऐसी वैसी नहीं बकरी के दूध की सुद्ध देसी घी की चाय है।

पहले तो पीने से हिचकिचाया पर पीते ही ऐसी तरो ताजगी आईं जिसका जवाब नहीं। एक प्याला खतम नहीं हुआ कि एक और प्याला ले लिया।

पर इस चाय को बनाने की विधि क्या है? वो भी बताने लगी मैडम जी। कहीं लिख तो नहीं पाया पर सुन अच्छे से लिया। आज कुल मिला कर मैंने सुबह से अबतक तीन तरह की चाय पी चुका हूँ। उनमें से मिंट और घी चाय का सेवन पहली बार करने को मिला।

मिटटी के बने घर के बहार

मुद गांव की सैर

चाय के बाद मैंने मुद गांव देखने की इच्छा हुई। कुछ देर के लिए सभी से अलविदा ले कर घर के बाहर निकल आया। घोड़े के अस्तबल के नीचे बने रास्ते से वापस उसी दिशा में बढ़ने लगा जिधर से आया था।

हल्का हल्का अंधेरा होने लगा है। सख्त तो नहीं पर कुछ एक तारे जगमगाते देखे जा सकते हैं। चौराहे पर लगी भीड़ में इजाफा होता है जा रहा है।

इसका कारण क्या है वो तो पता नहीं। पर कुछ ही आगे एक ऊंचे टीले पर बनी एक दुकान पर कुछ शहर के निवासी दिखाई पड़ रहे है।

बोलचाल से तो हिंदी भाषी ही लग रहे हैं। चाय के बहाने मुखातिब हुआ तो मालूम पड़ा उत्तर भारत के अलग अलग शहरों से यहाँ घूमने आना हुए है।

कोई पंजाब, हरियाणा तो कोई दिलवालों की दिल्ली से। सबने यहाँ पर लगभग कुछ ना कुछ दिनों से समय गुज़ार ही रहे हैं। किसी ने आगे पहाड़ी पर बर्फीला चीता देखने की बात कही।

तो किसी ने कुछ और दिन बिताने का जिक्र किया। मुझे ना ज्यादा रुकना है ना बर्फीले चीते का निवाला बनना है। इसलिए कल हिक्किम निकल जाना है।

उन्ही में से एक आकाश ने बस अड्डे के आगे बर्फीले पहाड़ को और नजदीक से देख पाने का विकल्प भी सुझाया। तभी सचिन ही बोल पड़े यहाँ की रात आसमान को तारों से ऐसा ढकती है मानो एक सफेद चादर ऊपर भी हो।

समय की उपलब्धता को देखते हुए मैं निकल पड़ा वो सफ़ेद चादर देखने जो आकाश ने सुझाव के तौर पर बताया। भागते दौड़ते जाने लगा।

चौराहे पर एक किनारे खड़ी बस को देख कर ऐसा लग रहा है कि वो अभी निकल जाएगी। पर ऐसा बिल्कुल नहीं होने वाला। चालक और कंडक्टर नदारद हैं।

पर्वतों पर जमी बर्फ के ऊपर मदहोश लेखक

बर्फ ही बर्फ

जैसे जैसे आगे बढ़ रहा हूँ बर्फ के और नजदीक आता जा रहा हूँ। ये पहाड़ी पर जमी बर्फ ठीक वैसे ही है जैसे हमें टीवी में दिखाया जाता है शिमला या श्रीनगर जैसी जगहों पर।

और हो भी क्यों ना पिन घाटी और पीर पिंजल घाटी ज्यादा दूरी पर नहीं है एक दूसरे से। मैं भागते हुए बर्फ के ऊपर दौड़ने लगा। दौड़ते दौड़ते इतना आगे निकल आया कि अजय ओझल हो गया।

दूसरी पहाड़ी पर बने कुछ घर दिखाई से रहे हैं। जिनके बारे में कहा जाता है उस पार बने घरों में बौद्ध संत महात्माओं का निवास है। जिनका दिन में निकालना ही नहीं होता है। वो सिर्फ रात में निकलते हैं। इसी वजह से भी उधर जाना वर्जित है और कोई निवासी जाता भी नहीं।

बर्फ की दिशा देख कर तो ऐसा ही लग रहा है कि यहाँ पहले कभी नदी रही होगी जो अब पूरी तरह से जम चुकी है। ज्यादा देर बर्फ पर रहना भी घातक हो सकता है।

क्या पता बर्फ के एक छोटे/बड़े हिस्से के धसने से मैं भी धंसा मिलूं। प्रकृति से खिलवाड़ भारी पड़े इससे पहले ही किनारे हो लेना बेहतर है।

अंधेरा भी काफी हो चुका है। बमुश्किल कुछ दिखाई दे रहा है। आसमान में तारे भी जगमगा उठे हैं। वापसी करने में ही समझदारी है।

अंधेरे में बर्फीले तेंदुए का तो शिकार नहीं होना चाहेगा कोई भी। वो होटल जहां कमरे का सौदा करने गया था। फिलहाल तो बंद दिखाई पड़ रहा है।

जगह जगह सोलर लाइट का इंतजामात देखने को भी मिल रहा है। वही होमस्टे और कुछ एक होटल। उसी चाय की टपरी पर कदम आ ठहरे जहां उत्तर भारत से आए कुछ सैलानी मिले थे।

चर्चा में सबके अपने दिल की बात उजागर की किसी को नॉर्थ पोल का सितारा देखना अच्छा लगा तो किसी को यहाँ को आबो हवा। किसी को मिट्टी के बने घर तो किसी को यहाँ का रेहेन सेहन।

चौराहे पर जमी भीड़ अब ना के बराबर दिख रही है। मालूम पड़ा पिछले महीने गांव वालों ने मिल कर पूरे गांव की सफाई की है। इसमें से कई बौद्ध धर्म के अनूनाई है। जिनका मानना है कि एक दूषित गांव या घर खुद को पाप के भागीदार बनाने के बराबर है।

ये बात अगर सैलानी भी समझ ले तो शायद घोर सफाई की जरूरत ही न पड़े।

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नमस्ते, मैं ऐश्वर्य तिवारी हूं। ये उन दिनों की बात है जब मैं अपने जुनून का पालन करने के लिए अपने कॉर्पोरेट जीवन को पीछे छोड़ दिया।भारत को जानने के मेरे अंदर हमेशा एक जिज्ञासा थी क्योंकि इस देश में हर कुछ मील के बाद विविधता, विभिन्न संस्कृति है। हर दिन मेरे लिए एक नए शहर में एक नई प्राणी के साथ एक नया दिन है। मैं एक घुमक्कड़ हूं जो के विभिन्न हिस्सों में घूमना पसंद करता है और जल्द ही भारत से बाहर हो सकता है।

1 Comment

  1. Akash Gulati says:

    Halank mai manta hu universe main cheese connected nhi hai. Vo toh acha coincidence tha aap log mile

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