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मेघालय सड़क दुर्घटना में बाल बाल बचा

एलिफेंटा से डावकी गांव

एलिफेंटा झरना मेहेज घंटे भर के अंदर ही भ्रमण हो गया। खास है तो सिर्फ वो झरना जो भारत के किसी और कोने में ना मिले। वापसी में जिस दुकान में बैग रखे हुए थे वहीं से थोड़ा नाश्ता करना बेहतर लगा।

नाश्ता भी इसलिए ही किया क्योंकि दुकानदार ने हमारा बैग रखवा कर काफी बोझ हल्का कर दिया था। जिस कारण झरना इत्मीनान से देखना संभव हो पाया।

आखिर इंसान ही इंसान के काम आता है। और ये इंसानियत अभी ज़िंदा है। सैलानी होने का फायदा भी यही है की दूसरे शहर में लोग अक्सर मदद के लिए हांथ आगे बढ़ा ही देते हैं।

चार कोस दूर खड़ी स्कूटी को चालू करके ले आया दुकान के पास। एक बैग आगे ठूंसा और दूसरा बैग अजय ले कर बैठ गया पिछली सीट पर।

फिलहाल कुछ दूरी तक गाड़ी मैं ही चलाऊंगा और उसके कुछ दूरी तक अजय। ये क्रम ऐसे ही चलता रहेगा शाम तक जबतक मंज़िल पर पहुंच ना जाऊं।

गेट के पास पहुंचा तो यहाँ पार्किंग की रसीद मांगने लगे। बटुए से रसीद निकाल के उनकी संतुष्टि के लिए दिखा भी दी।

दिन के दो बज कर चालीस मिनट पर एक बार फिर झोला झंडा उठा कर स्कूटी में लादा और निकल पड़ा दरांग गांव के लिए। प्रवेश द्वार पर कटी हुई पार्किंग की पर्ची दिखाने की देर है।

लोगों के हुजूम का आना जारी है वो भी बड़ी बड़ी गाड़ियों से जो अधिकतर दूसरे राज्यों से हैं। मेघालय में जो प्रमुख भाषा उपयोग में है वो है खासी और घोरो।

यहाँ से कुल सफर अभी भी 70 किमी दिखा रहा है। जिसे दो घंटे में पूरा किया जा सकता है। मतलब पर्याप्त समय है पहुचनें के लिए।

प्रवेश द्वार से निकलने के बाद उसी हरी भरी गली से गुजरते हुए हाईवे पर आ गया। कोशिश यही रहेगी की अंधेरा होने से पहले ही डावकी गांव पहुंच जाऊं।

मेघालय की संज्ञा के विपरीत फिलहाल आसमान में ज्यादा बादल नहीं नजर आ रहे हैं। और आसमान भी साफ और हल्की धूप है।

रास्ते भर छोटी छोटी पथरीली वीरान पहाड़िया ही दिखाई पड़ रही हैं। कुछ हरी भरी भी हैं जिनमें खेती करी गई है। मगर ऐसा कोई बसेरा नहीं दिख रहा यहाँ।

जो दिख भी रहे हैं वो सिर्फ खेती बाडी के लिहाज से बने हुए हैं। रास्ते भर सुमो, टूरिस्ट गाड़ी और बड़े बड़े ट्रक देखे जा सकते हैं।

पत्थर इस किस्म के हैं मानो किसी और ही जगह से यहाँ ला कर रखे गए हों। बेहती नदी के ऊपर बने पुल को पार करते हुए आगे बढ़ रहा हूँ।

सड़क पर बादल

हरियाली में रत्ती भर की कमी नहीं है। इतना आगे बढ़ आने के बाद अब हल्की हल्की धुंध चालू हो गई है। आसमान भी बादलों से घिरने लगा है।

गाड़ी अब ऐसी पहाड़ी पर चल रही है जहां सड़क पर भी बादलों को छुआ जा सकता है। कुछ मीटर गाड़ी चलाने के बाद आगे का रास्ता नजर ही नहीं आता है।

सड़क पर चल रही तमाम गाडियां हैड लाइट जलाने पर मजबूर हैं। इधर पहाड़ी की तरफ सिर्फ चट्टान और खाई की तरफ सिर्फ बादल ही बादल नजर आ रहे हैं।

बादल से घिरी सड़क पर चलने की तैयारी में

नज़ारा ऐसा है जैसे मसूरी के किसी शांत पहाड़ी पर आ गया हूँ। खाई की तरफ वाले हिस्से पर ईंट की दीवार बनी है ताकि इंसान गाड़ी ले कर उस पार ना निकल जाए।

पर ये दीवारें भी बहुत पुरानी और कमजोर जान पड़ रही हैं। एक ही लात में धडधड़ा के नीचे ही गिर जाएं। बादल जरूर हैं पर ठंड जरा भी नहीं है।

इस बात का आभास है की पानी कहीं भी बरस सकता है बरसाती जैकेट पहले ही पहन ली है। अब समय है बहुत ही संयम से चलने की।

ना तो पहले कभी पहाड़ पर दुपहिया वाहन चलाया है और शहर में तो इतने घने धुंध में भी शायद ही कभी। पर वो ठंड का मौसम हुआ करता है। यहाँ ठंड ना के बराबर है।

खाई की तरफ तो सिर्फ बादल नजर आ रहे हैं। ये कुदरत का छलावा है। यहाँ भी उत्तराखंड की पहाड़ियों की तरह प्लास्टिक जा कचरा नजर आ रहा है।

घुमावदार मोड़ खतरनाक हैं वो भी इतनी धुंध में जब पता ही ना चल रहा हो कि सामने से कौन आ रहा है और कौन पीछे से। हर कुछ दूरी पर इन पहाड़ियों पर ये मोड़ जानलेवा हैं।

सड़क पर बादल इस कदर हक जमाए हुए हैं जैसे ये सड़क उन्हीं की हो। शायद ही इतनी भीषण हरियाली और कहीं देखी हो! आश्चर्यजनक

सड़क पर पहाड़ों के बीच से छोटे छोटे झरने भी देखे जा सकते हैं। स्कूली बच्चे अपना बस्ता लादे घर की ओर रुखसत हो रहे हैं।

कुछ दूरी बाद गाड़ी मैंने अजय से अपने हांथ में ले ली और चालक की कमान अब मेरे ऊपर आ गई है।

मानो ऐसा लग रहा है बादलों के ऊपर ही सैर कर रहा हूँ। जब भी गाड़ी ढलान पर आती तो मैं गाड़ी को बंद कर देता उतनी देर के लिए ताकि तेल की खपत कम हो।

जितना आगे जा रहा हूँ उतना घोर हो रहा है धुंध। कुछ ही आगे इक्का दुक्का दुकानें और एक व्यू प्वाइंट दिख रहा है। जहां भीड़ तो नहीं पर गजब की धुंध है।

व्यू प्वाइंट

गाड़ी आगे निकल आने के बावजूद मैंने वापस घुमाई और उस दिशा की ओर आ गया। यहाँ एक मोहतरमा अपने कपड़े की दुकान लगाए बैठी हैं।

जो सैलानियों को व्यू प्वाइंट पर अलग अलग पोषक में तस्वीर खींचने के लिए किराए पर कपड़े दे रही हैं। मर्द और जानना दोनों के लिए।

पर शायद व्यू प्वाइंट पर जाने का ही अलग से टिकट है। इधर भी धंधा बना रखा है। भला इतने बादलों के बीच क्या ही दिखेगा!

पास में दिख रही दो दुकानो में ठीक ठाक भीड़ है। जहां चाय और नाश्ते करते दिख रहे हैं लोग। मैं भी चाय नाश्ते के वास्ते यहीं आ गया।

पर लग रहा है एक बार समय से पहुंच कर इत्मीनान से नाश्ता पानी करना ठीक रहेगा। इसलिए हेलमेट ले कर वापस निकलने लगा।

फिलहाल यहाँ नज़ारा कुछ ऐसा है कि खाई में बादलों के सिवाय कुछ नहीं दिख रहा। सामने बैठी महिला ने तस्वीर में बिना बादलों वाला नज़ारा दिखाया जो बहुत ही खूबसूरत नजर आ रहा है।

मोहतरमा बता रही हैं कि कुछ देर के भीतर वो यहाँ से अपनी दुकान समेट कर निकल पड़ेंगी। खैर मैं अपना बोरिया बिस्तर समेट कर निकलता हूँ।

स्कूटी स्टार्ट की और सड़क पर उतरा कर निकल पड़ा। सड़क पर ट्रक का हुजूम निकल रहा है। देश के अलग अलग हिस्सों से ट्रक यहाँ पर व्यापार करने आते हैं।

घुमावदार और मक्खन जैसी सड़क पर बादलों के इस धुंध के बीच चलने में और ही मज़ा आ रहा है। मानो स्वर्ग में गाड़ी चल रही हो।

पर जैसे जैसे आगे बढ़ रहा हूँ वैसे वैसे धुंध और बढ़ती ही जा रही है। देखने का दायरा भी कम हो चला है। वाहन और सावधानी से चलाने की जरुरत है।

सड़क पर इतनी धुंध है कि मालूम ही नहीं चल रहा है किधर को जा रहा हूँ। सिवाय खाई के। मार्ग विभाजित दिख रहा है तो पक्की सड़क पर ही चलने का फैसला किया।

ट्रकों की आवाजाही इतनी ज्यादा है कि कहीं भी रोक कर खड़ा नहीं हुआ जा सकता है। जिसमे सभी की जान को खतरा है।

व्यू पॉइंट के पहले का नज़ारा

चार बज रहे हैं और स्कूटी आ कर रोकी एक रेतीले मैदान में। जहां सिर्फ और सिर्फ पत्थर जमे हुए हैं। और छोटे तालाब जैसा दिखने वाला जलभराव।

स्कूटी भी ठीक इसी जलभराव के मुहाने आ कर रूकी। नजर पड़ी तो जलभराव ने छोटी छोटी मछलियां तैरती हुई नजर आ रही हैं।

धुंध से इतर ये ही एकमात्र जगह दिख रही है जहां कुछ दूरी तक देखा जा सकता है। सड़क पर तो सिर्फ तीन मीटर तक ही देख पा रहा हूँ।

कुछ देर रुकने के बाद गाड़ी ले के चल पड़ा। कुछ हलचल भरा इलाका नजर आ रहा है। ट्रक भी लबालब भरे खड़े हैं। और आगे आया तो यहाँ मैकेनिक की दुकान और गैराज भी हैं।

कहीं कहीं बादल नहीं है तो रैन बसेरा भी नजर आ रहा है। लोगों के होने का सबूत मिल रहा है। वरना अभी तक तो ऐसा ही लग रहा था कि मानो जंगल में चल रहा हूँ।

वीरान गांव

सड़क पर से गुजर ही रहा हूँ कि अजय को बाएं हांथ पर दिखाई पड़ती है एक वीरान जगह और झरना। पर गाड़ी आगे ही खींच लगा हूँ मैं।

अजय के बार बार कहने पर गाड़ी वापस घुमाई और आ गया इस वीरान जगह। एक तो इतने बड़े भारी वाहन चल रहे हैं कि ज़रा सी चूक और दुर्घटना का भय।

स्कूटी लगाई किनारे और अजय अपना कैमरे ले कर निकल पड़ा इस वीरान जगह में खोजने। बैग उतरा तो देखा छोटे वाले बैग की चैन ऐसे खुली पड़ी है जैसे कुछ समान निकला हो।

गनीमत ये है कि जरूरी समान सुरक्षित है। अजय नीचे आया तो बताने लगा ऊपर कोई गांव बसा हुआ है। जिसका ये शॉर्टकट है। लंबा रास्ता पहले ही देख चुका हूँ।

आखिर कैसी दिखती है ये वीरान और सुनसान जगह ये देखने का तो मेरा भी मन हो है। बैग रख चल पड़ा सीढ़ी चढ़ते हुए ऊपर की ओर।

अंधेरा और पेड़ की छांव इस कदर है की रोशनी का नामोनिशान नाम मात्र का ही है। छोटे से बने एक कुंड में दो बच्चे खेलते दिख रहे हैं।

मगर जैसे ही मैं पास पहुंचा वो ऊपर की ओर चल पड़े। शायद ऊपर वही गांव हो जिस तक आने के लिए ये सीढ़ियां बनी हुई हैं। उनके खेमे में पहुंच कर उनको तंग करने का कोई इरादा नहीं है।

इसलिए उल्टे पंव वापस आने लगा। सीढ़ियों से नीचे आने के बाद स्कूटी चालू की और निकल पड़ा। डावकी अब कुछ किमी दूर और शेष है।

शायद सूरज ढलने के पहले उस गांव तक पहुंच जाऊं। खेत खलिहान और बसेरा पार करते हुए आधे घंटे के भीतर आ पहुंचा ऐसी हरी भरी जगह जहां दूर दूर तक कोई नहीं है।

यहाँ अधिकत्तर खासी आदिवासी या ईसाई समुदाय के लोग ज्यादा हैं। क्यूंकि जगह मिलते ही कब्र या फिर किसी अंग्रेज़ का नाम गुदा दिख ही जाता है। पर अभी तक जितनो से वार्तालाप हुई है फिर चाहे हो मजदूर वर्ग का हो या फिर ऊपरी सबसे अंग्रेजी भाषा में ही बातचीत हुई।

एक बार को अंग्रेज़ी में पूछने में मैं झंझका भी कि इनको समझ आएगी या नहीं। पर जस्टिन बीबर के गाने सुन सुन के इनकी अंग्रेजी बहुत ही ज़बरदस्त हो चुकी है। हिंदी कम समझते है ये लोग शायद।

कब्रिस्तान के पास इठलाते लेखक

है तो सिर्फ कब्रिस्तान। स्कूटी किनारे लगा काम कर रहे एक मजदूर से पूछताछ की तो उसने बताया कि वहां जाना मना है। वहां ना सही पर उसके सामने ही कुछ पल बिता लेता हूँ।

कुछ एक शानदार लम्हे बिताने के बाद निकल पड़ा वापस अपनी मंज़िल की ओर। लंबी लंबी सड़कों पर ऐसा लग रहा है मेरे सिवाय अब कोई और है ही नहीं।

समय बीतता जा रहा है और जगह जगह गाड़ी रोकना भी ठीक नहीं। इसलिए अब नजारों कि कुर्बानी देनी पड़ेगी। इसी लंबी सड़क पर वाहनों को संख्या में इजाफा हो गया।

क्यूंकि आगे पीछे सब मिला कर कई सारी गाडियां इकट्ठी हो गई हैं। धूल धुए के बीच से गुजरता हुआ आखिरकार इन जटिल परिस्थितियों से भी गुजरता जा रहा हूँ।

पूर्वोत्तर भारत में इतनी कम जनसंख्या है इस बात का अंदाज़ा ही नहीं था। उधर उत्तर भारत में तो ज़रा सी जगह में सौ लोग बस जाते हैं।

अगर ऐसा पूरे भारत में होता तो इस कदर भगदड़ ना मचती जो आज मची है। भीड़ तो फिलहाल इस सड़क पर भी हो गई है। जिससे निकलना बेहद जरूरी है।

ढलता दिन

कुछ मिनट भी धुंध भी समाप्त हो गई। ये ऊंची पहाड़ियों पर बड़े बड़े मैदान भी। बादलों का घेराव तो बहुत पहले ही खत्म हो चुका था।

रास्ते में कुछ फार्म हाउस जैसा भी देखने को मिल रहा है। या कॉटेज भी कहा जा सकता है। अब आसमान साफ है। जिस कारण गाड़ी चलाने में भी सहूलियत हो रही है।

अभी तक कहीं भी सड़क पर गड्डे देखने को नहीं मिले पर अब जरूर मिल रहे हैं। इसलिए सफर का पता ही नहीं चला। पहाड़ी सड़के होनी तो बेहतर चाहिए सुरक्षा के लिहाज से।

बादल हटें है तो पहाड़ियों का सुन्दर नजारा देखने को मिल रहा है। मेघालय के पहाड़ इतने खूबसूरत हैं पता नहीं था। भारत के पहाड़ी राज्य जैसे हिमाचल और उत्तराखंड के पहाड़ भी बिल्कुल अलग हैं।

सड़को पर गड्ढे होने के कारण अधिक सावधानी के साथ चलना होगा। पहाड़ियों का नजारा इतना मनमोहक है कि अजय मुझे बार बार याद दिला रहा है सड़क पर देखने को बजाए पहाड़ पर।

अब लग रहा है किसी शहरी इलाके में दाखिल हो रहा हूँ। उत्तर भारत में जैसे क्रिकेट के मैदान देखना सामान्य है वैसे पूर्वोत्तर में फुटबॉल के मैदान।

आबादी भी इतनी कम जिसे उंगलियों पर गिना जा सके। कच्चे घर और बाहरी दीवार के तौर पर बांस की बल्ली खड़ी कर रखी हैं।

काली पीली टैक्सी भी खूब देखने को मिल रही हैं। कुल मिला कर ऐसी जगह पर स्कूटी से सैर करना एक अच्छा अनुभव रहा।

समय तेज़ी से बढ़ रहा है। इससे पहले सूरज ढले मुझे डावकी पहुंच जाना चाहिए। बाते करते करते गलत रास्ते पर निकल आया।

सड़क दुर्घटना के कुछ देर पहले तक

तकरीबन आधा घंटा इसी मे बर्बाद हो गया। जब मालूम पड़ा तो वापस गाड़ी घुमा कर सही रास्ते पर आया। पता भी पूछने पर चला। मोबाइल में तो नेटवर्क ना के बराबर है।

सड़क दुर्घटना

सड़क पर वाहन भी पहले के मुकाबले कम हो गए हैं। कुछ एक ट्रक नजर आ रहे हैं। दुपहिया या टैक्सी तो ना के बराबर हैं।

डावकी गांव के लिए कुछ ही किमी का सफर बचा है। एक पहाड़ी से उतरते वक्त ढलान पर सड़क के ऊपर गिट्टियां बिखरी पड़ी हैं।

अंधेरा होने के पहले पहुचनें के लिए स्कूटी भी तेज़ भागा रहा हूँ। जैसे ही इस ढलान पर आया और गिट्टियां देखीं तो लगा गाड़ी पर लगाम लगाना जरूरी है।

वरना गाड़ी इसके ऊपर तेज़ी से निकलने के चक्कर में रगड़ खा कर नीचे खाई में गिर सकती है। पर मैंने गिट्टियों पर जैसे ही ब्रेक मारा उसके बाद कुछ होश नहीं।

रफ्तार में चल रही गाड़ी में अचानक खलबली हुई और बहुत ज़ोर की दुर्घटना हुई। होश आया तो खुद को सड़क पर पाया।

सिर बाएं तरफ गिट्टियों पर पड़ा है और स्कूटी मेरे पैर के ऊपर। चिल्ला चिल्ला कर अजय को पुकार रहा हूँ स्कूटी उठाने के लिए ताकि सड़क से उठ कर किनारे आ सकूं इससे पहले कि कोई गाड़ी आए।

गनीमत ये है कि ना कोई गाड़ी पीछे से आ रही थी और ना ही आगे से। इसलिए किसी और गाड़ी से दुर्घटना होने से भी बचा और अधिक चोट खाने से।

गिरा हूँ तो देखा अजय और आगे जा कर गिरा है। पुकार सुनते ही अजय ने पैर के ऊपर से स्कूटी उठाई तो कुछ संभालने का मौका मिला।

अभी तक अजय जिस कैमरे से वीडियो बना रहा था वो कैमरा उसके हांथ से छूट कर कहीं गिर गया। मेरे उठने के बाद उसके चेहरे के हाव भाव ही बिगड़ गए जब उसने अपना कैमरा हांथ में ना पाया।

ये सुनने की देरी थी कि मेरे भी पसीने छूट गए की इतना महंगा कैमरा आखिर कहां गया होगा। सड़क पर सारा समान ऐसे ही बिखरा छोड़ कर लग गए कैमरा ढूंढने में।

ऊपर वाले से भी प्रार्थना करने लगा कि है कैमरा जल्दी से जल्दी मिल जाए। अच्छी बात ये है कि खाई ज्यादा बड़ी नहीं है। कैमरा ढूंढते ढूंढते जब खाई के नीचे वाली सड़क पर नजर पड़ी तो वहां से ट्रक को ऊपर आते देखा।

इतने में ही पीछे झाड़ी में अजय को अपना कैमरा मिल गया। हांथ पैर में चोंट तो एक पल के लिए भूल ही गया। दर्द बेइंतहां हो रहा है।

और बरसाती जैकेट और पैंट फट चुके हैं। वो ट्रक भी चढ़ कर ऊपर आ गया है। और सड़क पर सामान ऐसे बिखरा पड़ा है जैसे घर के सोफे पर बिखरा रहता है।

ट्रक वाले का हॉर्न मारना हुआ और जल्दी जल्दी हम सामान उठाने लगे। अजय ने स्कूटी को किनारे लगाया और ट्रक को जाने का रास्ता दिया।

सामान बिखेरे कर वापस से लगाया और स्कूटी अजय को दे दी बाकी के सफर के लिए। घुटने में गजब की चोट आईं है। और खून से काला कपड़ा भी जम गया है।

शायद हेलमेट ना होता तो एक आधी गिट्टी सिर के अंदर ही घुस जाती। हेलमेट की कीमत पहले भी पता थी और आज और पता चल गई।

गाड़ी स्टार्ट की और वापस चल पड़ा। इस बार मैं पिछली सीट पर बैठा हूँ। अभी तक जितनी मौज मस्ती की वो सब एक पल में निकल गई।

ना मैं अजय से बात कर रहा हूँ ना ही अजय कुछ बोल रहा है। बस एक अजब सा सन्नाटा है। स्कूटी तेज़ चलाने के बजाय और धीमी रफ्तार में चल रही है।

सूरज ढल चुका है और शायद मैं डावकी गांव के आगे निकल आया हूँ। पूछने पर पता चला कि ये दर्रांग गांव है। वापस पीछे जाने में समय नस्ट होगा।

इसलिए बेहतर होगा आगे बढूं और नदी की तरफ जाऊं। कच्ची सड़क पर से गुजरते हुए और आधे घंटे का समय लेते हुए आखिरकार पूछते हुए आ गया ऐसी जगह जहां से कुछ ही दूरी पर नदी है।

जिसके लिए रास्ता नीचे सीढ़ियों से जा कर है। अंधेरा पूरी तरीके से अभी नहीं हुआ है। पर दिन ढल चुका है। सीढ़ियों के बगल में बनी दुकान पर कुछ नाश्ता पानी कर लिया जाए तो बेहतर।

बैग लेके आ गया इसी झोपडी जैसी दुकान में और दो कप चाय का ऑर्डर दे डाला। दुकान ही घर है और इसी घर में दिखी सिर्फ एक बच्ची।

जो कुछ देर में चाय लेकर प्रस्तुत हो गई। फिलहाल भूख बहुत जोरों की लगी है। खाना भी रितेश भाई के यहाँ सुबह शिलोंग में खाया था।

पीछे लगा दलाल

तब से शायद ही अबतक कुछ खाया हो। इतने में आसपास के इलाके में खबर फैल गई की सैलानी आए हुए हैं। इधर खबर फैली उधर एक लड़का आस लिए आ खड़ा हुआ मेरे पास।

और अपने रेस्ट हाउस में रुकने का प्रस्ताव देने लगा। पर मुझे यह प्रस्ताव इसलिए भी स्वीकार नहीं है क्योंकि मेरे पास खुद का तंबू है।

जिसे गाड़कर उसी में सोऊंगा। पर ये सनकी आदमी पीछा छोड़ने का नाम ही नहीं ले रहा। बैग रख स्कूटी बड़े से मैदान में पार्किंग में लगा कर आ गया।

वापस आ कर ढाबे से बैग उठाया और चल पड़ा नीचे की पर। अंधेरा इस कदर बढ़ गया है कि कुछ भी देख पाना संभव नहीं है। जिसके कारण सिर पर टॉर्च लगानी पड़ रही है।

पैर में चोंट, ऊपर से ये भारी बैग और ये आदमी लग्गे की तरह पीछे लग गया है। इससे लड़ झगड भी नहीं सकता। इसी के इलाके में हूँ पता नहीं क्या रुख अपनाए।

चिंतन मुद्रा में लेखक

और लगातार दीमक की तरह दिमाग खाने में जुटा है कि आज की रात रुको तो इसी के यहाँ रुको। मैं अपनी बात पर अड़ा हुआ हूँ और ये अपनी।

डर भी लग रहा है कि क्या होगा अगर इसके यहाँ ना रुकूं तो। कहीं रात के अंधेरे में तंबू ही तो नहीं फूंक डालेगा। खैर अंधेरे में तकरीबन पैंतालीस मिनट तक चलने के बाद आखिरकार नीचे तक आ पहुंचा।

जहां नदी का शोर साफ सुना जा सकता है। एक टीले के ऊपर घर है मगर वो भी किराए पर से रखा है सैलानियों को। ये जिद्दी आदमी किसी और को बुला लाया की यहाँ तंबू ना गड़ें।

पर ये तो सरकारी ज़मीन है वो भी मनरेगा योजना के तहत बनी हुई। बहुत ज़ोर देने के बावजूद भी तंबू यही लगाया। पर उसकी आंखो मे खून देखा जा सकता है।

प्रस्ताव दिया कि उसी की ज़मीन पर लगा लो तंबू जिसका मूल्य चुकाना पड़ेगा। पर जब मेरा खुद का तंबू है तो भला क्यों ही रुकूंगा इन जनाब के ज़मीन पर।

डरते हुए तंबू तो लगा लिया पर यही लग रहा है कि रात में कोई अनहोनी ना हो जाए। जिस निगाहों से घूर रहा है उससे तो ऐसे ही प्रतीत हो रहा है।

सुबह ही पता चलेगा ज़िंदा मिलूंगा या मुर्दा।

एलीफैंटा से दररंग तक का 80किमी का सफर

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नमस्ते, मैं ऐश्वर्य तिवारी हूं। ये उन दिनों की बात है जब मैं अपने जुनून का पालन करने के लिए अपने कॉर्पोरेट जीवन को पीछे छोड़ दिया।भारत को जानने के मेरे अंदर हमेशा एक जिज्ञासा थी क्योंकि इस देश में हर कुछ मील के बाद विविधता, विभिन्न संस्कृति है। हर दिन मेरे लिए एक नए शहर में एक नई प्राणी के साथ एक नया दिन है। मैं एक घुमक्कड़ हूं जो के विभिन्न हिस्सों में घूमना पसंद करता है और जल्द ही भारत से बाहर हो सकता है।

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