मनाली, स्टोरीज ऑफ इंडिया, हिमाचल प्रदेश
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मनाली में मिली जमकर भीड़

उठते ही दिखा अद्भुत दृश्य

कड़ाके की शरीर गला देने वाली ठंड में सुबह चार बजे सोया था। इतनी गहरी निद्रा जिसका कोई जवाब नहीं।

सारे मोबाइल, कैमरे, सेल सब चार्जिंग पर लगा कर है सोया था। ताकि जब उठुं तो खाली फोन लेके ना निकलना पड़े। धकापेल नींद से भी नाटकीय ढंग से जगा। कल जिस हिसाब से सफर में समय बिता उसका तो कोई जवाब नहीं।

उसके बाद की थकान और भयंकर नींद। आलम ये रहा की नींद टूटी कुछ इस कदर की दरवाज़े पर नरेंद्र भाई को खड़ा पाया।

बिस्तर से उठा तो पाया अजय खिड़कियों से पर्दे हटा रहा है। और खिड़की के बाहर बने घर के पीछे के पहाड़ लाजवाब हैं। फिर तो नींद ऐसी उड़ी जिसका कोई जवाब नहीं।

सुबह दस बजे आकर नरेंद्र भाई ना खटकाते तो ना जाने और कितनी ही देर तक मैं सोता रहता। शायद अगला एक घंटा और। वो भी इसलिए आए ताकि कमरे की साफ सफाई हो सके।

चमकते सूरज के बाद ठंड में भी कमी आई है। कमरे के बाहर आया तो सामने पहाड़ी का अद्भुत दृश्य अत्यंत ही मनमोहक लगा।

पहाड़ी से धीरे धीरे गिरता झरना इसमें चार चांद लगा रहा है। पतली सी धार ऊपर से ऐसे आकर गिर रही है जैसे किसी ने हाथों से कटोरा भर पानी फेंका हो।

एक पल को निहारने पर ऐसा ही प्रतीत हो रहा है। इधर बातों बातों में नरेंद्र भाई से पिछली रात के विषय में चर्चा होती रही की कैसे मैं बस से उतरने के बाद कड़ी मशक्कत से यहाँ पहुंचा।

मनाली पहुंचने पर चर्चा

रात में घोर अंधेरा होने के कारण एक पल के लिए भटक भी गया था लेकिन जल्द ही सही रास्ते पर आ गया। एक किनारे आने के बाद नरेंद्र भाई लगातार फोन पर सहयोग कर रहे थे।

और जबतक मैं उनके हॉस्टल नहीं पहुंचा तबतक बराबर कॉल पर बने रहे। रात में तो कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। बस गूगल नक्शे के भरोसे आगे बढ़ता चला जा रहा था।

कुछ वक़्त बातों में बीत गया और इन्हीं बातों के बीच उन्होंने अपना हॉस्टल दिखाया जिसे वो किराए पर संचालित कर रहे हैं।

मैं पहली मंजिला में हूँ जहाँ कमरे कुछ बड़े बड़े हैं। धूप ना के बराबर है जिसके कारण माहौल ठंडा बना हुआ है। जरा सी हवा चलने पर सर्दी का एहसास होता।

बर्फ की चादर से ढके पहाड़ अपनी अलग ही रौनक बयां कर रहे हैं। इन पहाड़ों को देख कर मन में यहीं विचार आता है कि मन की गति से कमरे से निकल कर इन पर पहुंच जाऊं।

कुछ वक़्त पहाड़ी चोटियों पर बिताऊं और फिर वापस आ जाऊं। अगर चढ़ाई करने की बात आयेगी तो शायद पूरा एक दिन या एक रात भी लग सकती है पहुंचने में।

चढ़ाई देखने में जितनी आसान दिखाई पड़ती है उतनी ही जटिल है। देर से सोने के कारण दिन कि शुरुआत भी देरी से हुई। बातों का दौर खत्म हुआ और तैयारी करने लगा सैर सपाटे की।

रात भर में सारे मोबाइल और पावर बैंक चार्जिंग पर लगा कर सो गया था जिस कारण वो अब फुल चार्ज हैं। बैग से नए धूले कपड़े और मौसम के अनुसार जैकेट भी निकाल ली।

सोने से पहले लगाए गए सारे इलेक्ट्रॉनिक आइटम।

मॉलरोड जाने की तैयारी

बातों में और तैयार होने में काफी समय लग गया। डेढ़ बजे तक कमरे को ताला लगाकर निकला पड़ा मनाली देखने।

हॉस्टल के आंगन में ही नरेंद्र भाई ने अपनी कुटिया बनाई है जिसे खूब सजा रखा है। चाय पर चर्चा में उन्होंने अपने चार्टर्ड एकाउंटेंट मित्र अमित से मुलाकात कराई जो हॉस्टल सहयोगी भी हैं।

नरेंद्र भाई ने अपने घुमक्कड़ी का तकाज़ा सांझा किया जिसमें उन्होंने बताया कि कैसे वो भारत के अलग अलग हिस्सों में घूम चुके हैं सिवाय दक्षिण भारत को छोड़ कर।

मुझे हॉस्टल के गेट से निकलते हुए दो बज गए। दिन के उजाले में पहली मर्तबा मनाली के बाज़ार से रूबरू हो रहा हूँ।

जगह जगह स्वेटर की दुकानें ज्यादा दिखाई पड़ रही हैं। इस इलाके में विदेशी सैलानी ज्यादा हैं, जो कि अधिकांश इसराइली हैं। ये अक्सर अपनी आर्मी सर्विस के बाद भारत आना पसंद करते हैं।

मेरे दाहिने हाँथ पर एक रंगारंग कार्यक्रम के लिए कुछ विदेशी और कुछ देसी यहाँ बैठे हुए हैं। उत्सुकतावश मैं आगे बढ़ा और जानकारी ली कि ये आखिर किसलिए।

तब एक मोटे से आदमी ने अंग्रेजी पोकते हुए बोला रात में रंगारंग कार्यक्रम है जो कि सांस्कृतिक तो कतई नहीं है।

जिसमे हिस्सा लेने का एक आदमी का ₹२०० लेगा। ये सुनने कि देर थी और मैं आगे बढ़ गया।

कायदे का कोई रेस्तरां ढूंढने लगा जहाँ अच्छा भोजन कर सकूं। नदी के इस तरफ तो कोई अच्छा जान नहीं पड़ रहा है। कुछ ढाबे जैसे बने तो जरूर हैं लेकिन सफाई नाम मात्र भी नहीं है। कुछ के बगल में ठेके भी हैं।

अब आदमी खाना खाएगा या शराबियों से निपटेगा। खाओ पियो दोनों एक ही स्थान पर।

चलते चलते उस पुल पर आ पहुंचा जहाँ से चलते हुए गलत दिशा में मुड गया था। नदी पर पड़ी जिसका बहाव अति शीघ्र है।

पुल से गुजरते हुए नजर पड़ी नदी के ऊपर कुछ लोग रस्सी बांधे लोगों को ऊपर नीचे उछाल रहे हैं।

कुछ मौका परस्तो ने मौका पा कर नदी के ऊपर रस्सी बांध कर धंधा खोल लिया है। जिसपे वो कस्टमर रस्सी पर बांध कर उसे नदी के बीचों बीच लाकर उसे झूला झूलते हैं और जितनी देर झूलना हो उसके हिसाब से किराया लेते हैं।

हालांकि ये सब बिना जिला मजिस्ट्रेट के परमिशन के बगैर नहीं हो सकता। जान का कितना खतरा है वो तो झूला झूलने वाला ही बता सकता है।

नदी के ऊपर उछल कूद करते युवक।

पर मुझे तो ये एक बद्दा मज़ाक लगा। एक नदी के ऊपर के इस तरह झूला झूलने कितनी बुद्धिमानी है। बांध खुल जाए तो झूला झूलने वाले का जो हाल होगा सो होगा। झूला झूलाने वाले का पसीना छूट जाएगा।

दिन के दो बजे नाश्ता

पुल के ठीक सामने एक रेस्तरां दिखा जो कि अच्छा जान पड़ रहा है।

इसी रेस्तरां में घुसा। देखने में तो बढ़िया लग रहा है। उससे भी बढ़िया है मेहमानवाजी। घुसा ही था एक ऊर्जावान नौजवान फाटक से स्वागत के लिए आ खड़ा हुआ।

पड़ पड़ तोते की तरह मेनू सुनना चालू कर दिया। मैंने तसल्ली रखने को कहा और उससे भी पहले बैठाने को कहा। सभ्य बालक ने सीट पर बैठाया।

पूछा तो पता चला होनहार बालक बिहार से है। पहले तो सिर्फ चाय पीने का ही मन था पर चाय के साथ पराठे भी ऑर्डर कर दिए।

इस शानदार मौसम में चाय पराठे का मज़ा ही कुछ और है। जब पराठा प्लेट में सज के आता तब तक के लिए मैंने घर पर फोन मिला कर हालचाल ले लिए।

मेरा मनाली आना दूसरी मर्तबा है। तीन साल पहले परिवार के साथ यहाँ आ चुका हूँ। जब साथ में दो परिवार और भी थे।

कुछ देर जरूर हुई पर पहले चाय फिर पराठे आ ही गए। गरमागरम पराठा आया और मैं लपक पड़ा। भूख पहले से ही जोरो पर है। लजीज पराठे का स्वाद देख कर मैंने एक और ऑर्डर कर दिया।

मसाले दार चाय का पूरी ग्लास भर के प्रस्तुत हुई। इस रेस्तरां का एक अति उत्साहित बालक अपनी ऊर्जा से माहौल बनाए रख रहा है।

यात्रियों से खड़ा प्रभावित जान पड़ रहा है। बड़े बड़े होटल और रेस्तरां की यही खासियत होती है कि उनमें काम करने वाले कर्मचारी कितने प्रसन्न हैं।

पराठों की समाप्ति के बाद इत्मीनान से पेमेंट करने चला। जेब में टटोला तो चंद सिक्कों के अलावा और कुछ भी नहीं। फिर ऑनलाइन पेमेंट करना हुआ जिसे हम डिजिटल पेमेंट बोलते हैं।

मालरोड तक का सफर

रेस्तरां के बाहर निकला तो देखा हल्की हल्की बूंदबांदी हो रही है। अभी हल्की हल्की बूंदाबांदी हो है रही थी कि अचानक से ये बूंदाबांदी तेज़ बारिश में तब्दील हो गई। कुछ देर टीन के नीचे ही बारिश थमने का इंतजार करने लगा।

कुछ देर की छुट पुट बारिश में राहगीर तो भीग ही गए। बारिश थमने के बाद निकला मनाली बाज़ार की तरफ। नदी के ऊपर वो झूले वाला कार्यक्रम अभी भी जारी है।

मनाली के मॉलरोड जाते वक्त गाड़ियों का ताँता

बारिश के बाद गाड़ियों का तांता अचानक बढ़ गया। चलते चलते सड़क में से एक रास्ता तो नदी के मोड़ मुड गया। और उसके बाद आया पार्क जिसमे एक लाइन में लगे पेड़ उद्यान की शोभा बढ़ा रहे हैं।

जाम से बचते बचाते कभी गाड़ियों के अगल बगल से कभी बीच से निकल कर जगह बना रहा हूँ।

बाईं गली से मुड़कर इस पार्क में जाने की इच्छा हुई। पैदल पहुंचा तो एंट्री गेट पर गार्ड साहब ने बताया कि अन्दर घुसने का टिकट कटेगा।

माना लुभावना है लेकिन सैलानियों के लिए टिकट कैसा? सुनते ही चल पड़ा वापस अपनी राह पर। प्रकृति को देखने का टिकट कैसा??

बारिश के कारण पतली सी रोड पर भारी भरकम जाम लग गया। अब यहाँ तो ना कोई ट्रैफिक कर्मचारी ना कोई व्यवस्था।

उपर से हर ड्राइवर एक दूसरे के ऊपर गाड़ी झोकने पर तुला हुआ है। इनमे से सबसे अधिक टूरिस्ट गाडियां ही है। स्तिथि गंभीर है।

इसे देखते हुए मैं उनका सहयोग करने लगा जो जाम खुलवाने में पसीना छोड़ रहे हैं। बाज़ार जा रही गाड़ियों को रोका और बाज़ार से आ रही टूरिस्ट बसों को आगे जाने दिया।

इस तरह से ज्यादा मशक्कत किए बिना जाम खुला। रस्तेभर दाहिने हाथ पर दुकानें तो हैं लेकिन उनमें उतनी रौनक नहीं। कच्ची सड़क किनारे दुकानों में माल कम धूल ज्यादा भरी रहती है।

रास्ते में कुछ रेस्तरां भी मिले। जहाँ रात्रि भोजन की व्यवस्था को मद्देनजर रखते हुए खाने की व्यवस्था भी पूछता चलूं। दाहिने हाँथ पर दस सीढ़ियों के ऊपर सेठ जैसी दुकान पर पहुंचा।

एक महिला यहाँ काउंटर के बाहर ही खड़ी है। अकड़ से तो यही पता चल रहा है कि यही मालिकिन हैं। आहिस्ता दबी आवाज में पूछा तो पता चला ये रेस्तरां तो आठ बजे के बाद बंद हो जाता है।

मुझे शायद बाज़ार में समय लग जाए। और लौटने में भी। वापस निकल लिया अपनी राह।

मालरोड

डेढ़ दो किमी पैदल चलने के बाद मैं पहुंचा मालरोड जहाँ सब भीगा भीगा नज़र आ रहा है। काले मेघा और मूसलाधार बारिश के बाद ज्यादा भीड़ भड़क्का नहीं है।

भारतीय सैलानियों के लिए ये आम शहर है। नव विवाहित जोड़े अक्सर शादी के बाद शिमला कुल्लू मनाली में हो दिखाई पड़ेंगे उसके बाद सारी ज़िन्दगी घर पर।

हनीमून का तीर्थ स्थल हैं ये तीनों जगह। इधर उधर हर तरफ भीड़ ही भीड़। बाज़ार में अधिकतर दुकानें वूलेन कपड़ों की हैं।

बारिश के कारण मॉलरोड पर सन्नाटा

पास में बना इकलौता छोटा मंदिर भी है जिसमें ज्यादा भीड़ तो नहीं लेकिन भक्तजन का आना जाना बरकरार है। भीगीं भीगीं सड़कों के बीच लोगों का आना जाना भी चालू हो गया है।

उंडर ग्राउंड मार्केट

कोई मनाली आ रहा है तो कोई विदा ले रहा है। इसी बीच मैं आगे बढ़ा और एक उंडर ग्राउंड मार्केट में जा पहुंचा।

नीचे उतरा तो मालूम पड़ा इस मार्केट का संचालन महिलाएं करती हैं। यहाँ तरह तरह सर्दियों के कपड़ों की दुकानें हैं। कोई स्वेटर बेच रहा है तो कोई ऊनी मफलर मोजे।

एक छोर से घुसा और दुकानें देखते देखते दूसरे छोर से निकल आया। चलते चलते काफी थक गया हूँ।

मैन मार्केट

बाहर आया और मैन मार्केट के सामने वाली दुकानें के पास मंडराने लगा। दो चार दुकानों में और गया जहाँ मेरे साथी को जैकेट लेने की तलब लगने लगी है।

उनमें से बाहर की एक दुकान में दाखिल हुआ। घुसा ही हूँ कि पता नहीं क्या सनक सवार हो चली दुकानदार के की वो सीधे मुझे जैकेट के सेक्शन में लेे आया।

ना कोई ब्योरा मांगा ना हाल चाल जाना। सिर्फ माल दिखाने से मतलब है। वो मंहगी मंहगी जैकेट दिखाने लगा। जिनका ना कोई रंग ना कोई ढंग।

ऐसे कपड़े पहनने का आखिर क्या फायदा। जिसमें पैसा भी लगा दो और उनमें चमक भी ना आए? धीरे धीरे सरकते हुए बाहर जाने लगा।

बाहर आकर अब कोई कायदे कि दुकान तलाशने लगा जहाँ ऊनी स्वेटर मिल सके।

लेना पड़ गया स्वेटर

घूम फिर के मैं उसी अंडरग्राउंड मार्केट के सामने आ पहुंचा। जहाँ के एक छोर से निकल गया था।

फिर से नीचे दाखिल हुआ। लाइन से लगी दुकानों को ठीक से देख रहा हूँ इस बार। की कुछ समझ आए और कुछ हाँथ लगे।

सब अपनी अपनी दुकान का माल दिखाने को लालायित है। कोई इधर बुलाता कोई उधर। इसी उधेड़बुन के बीच मार्केट की तीसरी दुकान में आ खड़ा हुआ जहाँ मोहतरमा कुछ स्वेटर दिखाने लगीं।

हाल फिलहाल जम्मू में बैग को खाली किया था और चंडीगढ़ में वो अनावश्यक सामान रखवाया था। हर कदम पर दुकानों पर कपड़े देख कर। बैग को दोबारा भारी भरकम बनाने की तैयारी कर रहा हूँ।

ये मोहतरमा मुझे अनेकों स्वेटर दिखा दिए। जिसमे से एक स्वेटर मुझे बड़ा पसंद आया। इस स्वेटर से हवा के आर पार गुजरने की गुंजाइश ना के बराबर है।

स्वेटर की कीमत पूछी तो दाम आसमान छू रहे हैं। पहले तो लगा यहीं रख के निकल जाऊं। फिर सोचा छोड़ो मुझे भी तो जरूरत है स्वेटर की।

मोल भाव करते करते स्वेटर के दाम मजबूरन देवी जी को आधे दाम में देना पड़ा। जो स्वेटर आठ सौ में बेंच रही थीं उसे आधे दाम खरीदा।

मनाली के मॉलरोड से दिखती अद्भुत पहाड़ी

ठंडी जगहों पार यही खेल चलता है। हम समतल से आने वाले लोग ऐसी ठंडी जगहों में जाम कर खरीददारी करते हैं। पर कभी कभार ठग भी जाते हैं।

हालांकि इससे भी कम दाम में ले सकता था अगर साथी अपनी चोंच ना अड़ाते तो। स्वेटर लेे कर इस सुरंग मार्केट से बाहर निकल आया। काफी भीड़ हो चली है यहाँ।

मालरोड पे बढ़ती भीड़

घूमते घूमते अच्छी कसरत हो गई है। शाम भी हो चली है और जो सड़के भीगीं थी वो भी सूख गई हैं। जैसे जैसे शाम हो रही है वैसे वैसे मालरोड पर भीड़ बढ़ती ही जा रही है।

लेकिन ये भीड़ मुझे रास नहीं आ रही। पहले कभी इतनी भीड़ नहीं हुआ करती थी इन ठंडे इलाकों में। गजब का टूरिस्ट स्पॉट बन गया है कुल्लू शिमला और मनाली।

आसान भी पड़ता है यहाँ पहुंचना सिवाय कहीं और के। मैं अपना दिमाग उलझाने के लिए कैमरे से कभी पहाड़ों की तो कभी सफेद कबूतरों की तस्वीर कैद करने लगा।

इधर बहुतेरे लोग मनाली से विदा भी लेे रहे हैं। अधिकतर परिवार सहित आते हैं और परिवार सहित निकल जाते हैं। एक ही शहर के ऊपर इतना दबाव पड़ने से जिले की हवा पानी पर भी असर पड़ता है।

सरदार जी की 70 साल पुरानी दुकान

खैर अब वक्त भी हो चला है वापस होटल रवाना होने का। आसमान से धूप अभी भी नदारद है लेकिन काले मेघा छट गए हैं। वापस होटल को चल ही रहा हूँ कि रास्ते में एक लॉन्ड्री कि दुकान दिखी।

जहाँ सरदार जी को बैठे देखा। जो उम्रदराज हैं लेकिन इतने भी नहीं। मैं जिज्ञासावश दुकान में प्रवेश कर गया। नाम मात्र का एक मलिक और एक नौकर। जिसके ऊपर दुकान के अलावा किचन का भी बोझ है।

उनके यहाँ भरपूर मात्रा में ऊनी जैकेट दिख रही हैं। संगी साथी ने उन्हें परखने की इच्छा जताई।

सरदार जी से जैकेट देखने के बारे में पूछा तो उन्होंने ने हमें ऊपर जाने का इशारा किया। ऊपर से मेरा मतलब है, ऊपर वाले मंज़िल पर।

सरदार जी की भरी हुई दुकान

कलेक्शन

सरदार जी की दुकान और उनका उनी कपड़ो का कलेक्शन देख कर आजादी के पहले वाला हिंदुस्तान की झलक दे रहा है।

ऊपर जाने से पहले प्यास लगी। उनके दुकान पर सुस्ता रहे नौकर से मैंने पानी मांगा। चुस्ती के साथ वो दरवाज़े पर आया और अपनी पुरानी दुकान के रसोइए का दरवाज़ा खोलने लगा।

कड़कड़ाते हुए दरवाज़ा खुला और वाकई में पूर्व भारत दर्शन हो गए। ऐसा पुराना रसोइया शायद ही पहले कभी देखा हो। पुरातत्व विभाग वालों को आना चाहिए।

वो रसोइए से पानी लेे आए। पानी पीने के बाद मैं ऊपर चल दिया। ऊपर पहुंचा तो देखा एक से एक जैकेट और स्वेटर रखे नजर सा रहे हैं।

जैसे सर्दियों में हम अपने सारे घर के ऊनी कपड़े इक्कठा करके एक जगह रख दें ठीक वैसे। चारों ओर से कपड़ो से घिरा हुआ हूँ।

इतनी जैकेट। कुछ तो पन्नी में बंधी रखी हैं। कुछ गठरी में। मैंने सब खोल डाली पर कुछ पसंद ना आया। बमुश्किल एक लाल रंग के जैकेट बाकी से ठीक लगी।

वही जैकेट लेे कर नीचे आ उतारने लगा। कपड़ो के अंबार में से निकलते हुए काउंटर पर आ खड़ा हुआ।

भड़का सरदार

सरदार जी ने एक सांस में दुकान का इतिहास और अपनी जायदाद उंगलियों पे गिना दी। सरदार जी को पसंद किस हुआ जैकेट दिखाने लगा।

उनके रेट बताने की देरी थी कि मुझे रेट सुन के ठंड लगने लगी। मोल भाव के नाम पर तो सरदार जी भड़क गए। मैंने दाम घटाने की बात कही तो हाँथ से स्वेटर छीना और अपने ऊपर पटक लिया।

ऐसा मुझे इनका ये बंदरों वाला स्वभाव पसंद कम आया। मुझसे अपनी हसी छुपाए नहीं छुप रही है इसलिए मैं बाहर आ गया।

सरदार जी अन्दर बड़बड़ाते रहे और मैं निकल गया होटल के रास्ते। आजादी से भी पुरानी दुकान से मैं आजाद हो गया। हल्का हल्का अंधेरा छाने लगा है।

होटल रवानगी

आईस क्रीम के ठेला दिखा तो मन में इस ठंड के मौसम में आईस क्रीम खाने को लालायित हो गया। आईस क्रीम के काउंटर से दो वनीला आईस क्रीम ली और रास्ता नापने लगा।

अब तक कई दुकानें बंद होने लगी हैं। वो रेस्तरां भी जहाँ दिन में रेट पूछा था। बाज़ार से होटल तक का आधा सफर तय कर लिया है।

मनाली में भालू जैसे कुत्ते अनेक मिलेंगे।

रास्ते भर मुझे विदेशी सैलानी दिखाई पड़े। इनमे से अधिकतर इसराइली हैं। वैसे ये भारी तादाद में तो धर्मशाला में ही पाए जाए हैं।

आसमान में असंख्य तारे और पहाड़ों के बीच चमकता चंदा अलग से ही नज़र आ रहा है। उस रंगारंग कार्यक्रम का आयोजन भी चालू हो गया है जहाँ दिन में पड़ताल की थी।

सब मस्त है यहाँ। अच्छी बात ये भी है कि मालरोड से इतनी दूर वो नवविवाहित जोड़े ना के बराबर हैं।

पक्की रोड और कच्ची गलियों के रास्ते होटल पहुंचते पहुंचते आठ बज चुके हैं। मैंने अभी तक रात्रि भोजन ना किया। इधर होटल पर नरेंद्र भाई ने अपने सहयोगी मित्र से मुलाकात कराई जो पेशे से चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं।

चाय पर चर्चा

गरमा गरम चाय भी चढ़ा दी चूल्हे पर। खौलती चाय जब गिलास में गिरी तो उसकी सोंधी खुशबू में मैं गिर गया। हर कप को हर एक हाँथ ने उठाया और होंठों से लगा चाय के प्रति इश्क़ का इजहार किया।

चाय पर काफी चर्चाएं हुईं। नरेंद्र भाई ने बताया कैसे वो ये होटल का संचालन करते हैं। कैसे सारी व्यवस्था गर्मियों में अलग सर्दियों में अलग।

कुछ ही देर में मैं निकल गया रात्रि भोज पर।

खरीदी जैकेट

होटल से निकलते वक़्त रास्ते में एक ऊनी दुकान मिलीं जहाँ तरह तरह कि जैकेट रखी हुई हैं।

इस तरह की आकर्षक जैकेट मैंने पहली मर्तबा देखीं हैं। हाथ से बुनी हुई इतनी बेहतरीन कलाकारी। इस तरह की कुल तीन जैकेट हैं इस दुकान में।

असमंजस में हूँ खरीदूं या ना खरीदूं। दुकान में दो इसराइली छोरियां भी हैं। मन शाशंकित है कि कहीं ये ना खरीद लें। पर वो तो किसी और ही काम से आईं हैं।

जैकेट ट्राई करने पर अच्छा महसूस हो रहा है। ना ठंड लग का पता चल रहा है ना थकान। तीन में से मेरा तो दो जैकेट लेने का मन है पर अगर घर जाना होता तो जरूर दो लेता। बहुत जांच पड़ताल के बाद आखिरकार एक अपनी पसंद की उठा ली।

तीन में से एक जैकेट मैंने ले ली और एक एक अजय ने। मगर ये तय था कि मैं मनाली से सीधा कानपुर जा रहा होता तो वो तीसरी जैकेट खुद के लिए के लेता। दो जैकेट का भुगतान कुछ ₹6000 हुआ।

मनाली बाजार से खरीदी हुई दो नेपाली-जैकेट।

कैश में भुगतान कर निकल पड़ा रात्रि भोज के लिए। उसी रेस्तरां में जहाँ सुबह वो ऊर्जावान बालक मिला था। दिनभर की थकान अच्छा खाने से भी दूर हो जाती है।

ठोस भोजन के बाद वापस होटल की ओर चल पड़ा। अब रात हो चुकी है तो वो नदी के ऊपर करतब करने वाले भी नदारद हैं।

चाँद तारे

होटल पहुंच कर नरेंद्र भाई को अपनी जैकेट दिखाई। दाम सुन के तो वो और भी भौचक्के रह गए। खुद ट्राई किया तब जैकेट की मजबूती का पता चला उन्हें भी।

इसी बीच उन्होंने अपना होटल दिखाया। छत पर ले आए जहाँ आसमान में असंख्य तारे देखने को मिले। इतने की बचपन याद आ गया।

छुटपन में जब रात के आठ से ग्यारह लाइट चली जाती थी तब हर रोज़ ये नज़ारा देखने को मिलता था। अब इस आधुनिक युग में हम सिर उठा कर जीना भूल गए हैं।

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नमस्ते, मैं ऐश्वर्य तिवारी हूं। ये उन दिनों की बात है जब मैं अपने जुनून का पालन करने के लिए अपने कॉर्पोरेट जीवन को पीछे छोड़ दिया।भारत को जानने के मेरे अंदर हमेशा एक जिज्ञासा थी क्योंकि इस देश में हर कुछ मील के बाद विविधता, विभिन्न संस्कृति है। हर दिन मेरे लिए एक नए शहर में एक नई प्राणी के साथ एक नया दिन है। मैं एक घुमक्कड़ हूं जो के विभिन्न हिस्सों में घूमना पसंद करता है और जल्द ही भारत से बाहर हो सकता है।

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