मदुरई का मीनाक्षी अम्मन मंदिर

तमिलनाडु | भारत दर्शन | मदुरई

त्रिचिपल्ली से मदुरई

मेरी यह घोर अभिलाषा है कि त्रिचिपल्ली में हाजिर होने के बाद तिरूचीपल्ली के मंदिरों में अवश्य जाऊ। सुबह जल्दी उठ गया हूँ पर बहुत जल्दी नहीं।

गणेश ने बताया की यहाँ कृष्णापुरम मुसीरी से पहली बस सुबह आठ बजे और दूसरी बस सुबह साढ़े दस बजे निकलती है।

पहली बस तो निकल गई अब सारा दारोमदार दूसरी बस पर टिका है। स्नान ध्यान कर सारे बिजली के उपकरण चार्जिंग पर लगा दिए। इधर कमरे में बिखरा समान समेट कर बैग में भर लिया। निकलने से पहले मोबाइल जितना चार्ज हो जाए उतना बेहतर।

कल जिस टीले पर गणेश ले गया था अब उसी टीले पर जा रहा हूँ सैर सपाटा करने और साथ ही कुछ तस्वीर लेने भी। ग्यारह बजे तक कुछ ना कुछ तो करना होगा।

सब जानवर घर के बाहर ही आ कर इकट्ठा हो चले हैं। इन्ही में से कुछ साथ चल पड़े। खेत खलिहान से होते हुए टीले पर आ खड़ा हुआ।

यहाँ से टाटा का सौर नामिका से बिजली उत्पादन देखने आ गया। साथ है मेरे लेबरेडोर कुत्ता जो मेरे पसंदीदा हैं। बदल घने है और धूप भी नहीं है। इसलिए इतने इत्मीनान से खड़ा हूँ यहाँ पर।

स्विमिंग पूल के पास खेल करने से साथी घुमक्कड़ भी बचा नीचे जाने से। पर लेबरेडोर नहीं। लेकिन वो वापस तैर कर आ गया बाहर। पर साथी भी गीला हो गया।

कैमरे की दूरबीन से झोपड़ी में अपना कमरा देख सकता हूँ। कुछ देर समय बिता कर वापस चल पड़ा झोपड़ी की ओर। नवीन कल रात में ही अलविदा ले कर अपने घर को निकल गया था। मेरी उनसे वो आखिरी मुलाकात थी।

सुबह सुबह गणेश का बेटा मेरे कमरे में उपस्थित हुआ। जिसके साथ मैने जमकर आनंद लिया। अपनी उम्र से बढ़कर बातें करता है ये बच्चा।

सुबह सुबह श्रद्धा जी ने हमारे लिए नाश्ता बना कर तैयार कर रखा है। नाश्ता करते समय भी कोई ना कोई कुत्ता आसपास ही घूमने लगता है।

स्वादिष्ट नाश्ता पानी करने के बाद सबसे अलविदा ले कर दूसरी बस का इंतजार उद्यान के भीतर ही करने लगा। मुख्य द्वार के पास बने टीले पर साथी घुमक्कड़ चढ़ने की कोशिश में है।

पर इस नकली पेड़ के टीले को बनाया गया है। जो अभी और भी बुरी हालत में है। तभी बाहर सड़क पर से एक बस गुजरी जो विपरीत दिशा की ओर जा रही है।

गणेश के मुताबिक इसी बस में बैठना था। पर असल में ये वो बस नहीं है। त्रिचि जाने वाली बस तो सीधी दिशा में जानी चाहिए गूगल नक्शे के अनुसार। दूसरी बस भी छूटते छूटते रह गई। गनीमत है कि वो गलत बस थी।

बैग ले कर मैं बाहर निकल आया पर साथी घुमक्कड़ झोपड़ी के कमरे में ही अभी तक समान बैग में भर रहा है। बाहर निकलना ही हुआ है की सामने से सीधी बस आते हुए दिख रही है।

भागदौड़ यहाँ भी होने लगी। बस का रुकना हुआ और सवारियों का उतरना। इधर मैंने बस में चढ़कर साथी के लिए बस रुकाई। उधर वो उद्यान से दौड़ता हुआ बस की ओर आता दिखाई दिया।

भारी बस में लद के निकल पड़ा तिरूचिपल्लि रेलवे स्टेशन। इस बस में खड़े होने की जगह भी नहीं है। कुछ और पड़ाव के बाद मुझे बैठने के लिए सीट खाली मिल गई।

कुछ ही देर में मैं बस अड्डे आ पहुंचा। तिरूचिपल्लि बस स्टेशन पहुंचते ही भारी बारिश शुरू हो गई। जिसके चलते छाया में थोड़ी देर के लिए आ खड़ा हुआ।

बारिश का बहाना ले कर पास के ठेले से चाय ली और बारिश का आनंद लुत्फ उठाने लगा। इस बारिश में पकोड़ी तो मिलने से रहीं उसके अलावा सो दक्षिण भारत के इस स्थान पर पकोड़ी के बजाय आलू के लच्छे मिल रहे हैं।

चाय आलू के लच्छे और बारिश क्या जबरदस्त संयोजन है। यहाँ एक दो नहीं बल्कि कई ठेले लगे हुए हैं। जहाँ जबरदस्त बिक्री हो रही है।

विचार है त्रिचिपल्ली के मंदिरों में जा कर दर्शन करने का पर दिन के समय शायद मंदिर बंद रहते हैं। अन्यथा मैं बैग अमानती घर में जमा करवा कर निकल जाता मंदिर।

मदुरई

बारिश रुकते ही बस अड्डे से रेलवे स्टेशन पैदल ही निकल पड़ा। बारिश की वजह से उमस बढ़ गई है। स्टेशन बहुत ही निकट है इसलिए पैदल तय किया जा सकता है।

दिन की एक चालीस की ट्रेन है मदुरई के लिए। इसी रेल लोह पथ गामिनी से मदुरई निकल गया।

यहाँ मीनाक्षी मंदिर काफी प्रसिध्द है। जिसकी चर्चा पूरे देशभर में है। चार घंटे के सफर के बाद मदुरई स्टेशन पर ट्रेन थोड़ी विलंब हो गई है। इसलिए मैं भी स्टेशन पर देर से आ पाया हूँ।

फिर से वही पुराना ढर्रा बनाते हुए की अमानती घर में बैग जमा कर निकल जाओ घूमने।

स्टेशन पर ही इधर उधर अमानती घर ढूंढने लगा ताकि बैग जमा करवा कर मंदिर को दर्शन के लिए निकल जाऊं। बहुत ढूंढने के बाद मालूम पड़ा की अमानती घर स्टेशन के द्वार पर बसा है।

स्टेशन के बाहर निकल कर अमानती घर पर पर्ची कटाई और जमा कर दिया अपना बैग। अभी तक मैं जितने भी अमानती घर गया हूँ हर अमानती घर का दृश्य अलग ही पाया है।

कोई बहुत सुसज्जित कोई बहुत ही खस्ता हाल में। कोई किसी दुकान में तो कोई किसी गोदाम में।

छह बजे तक बैग जमा करवा कर निकल लिया मंदिर के ओर। ज्यादा दूर नहीं है और पैदल चलने लायक रास्ता भी है। हल्की बूदाबांदी के बीच गाना गुनगुनाते हुए इं भीगीं गलियों से रेनकोट पहने गुजरता चला गया।

बारिश की बूंदे रेनकोट पर पड़ती और सर सराते हुए फिसल के ज़मीन पर गिर जाती।

मंदिर के प्रथम सुरक्षा परत पर किसी जाने माने नेता का भाषण चल रहा है जो मेरी समझ से बाहर है। शायद तमिल भाषा में। पर इनके भाषण को सुनने के लिए काफी भीड़ एकत्रित हुई है।

गलियों से होते हुए मीनाक्षी मंदिर के द्वार तक आ गया। जैसे काशी विश्वनाथ का मंदिर घरों से घिरा हुआ है वैसा ही कुछ यहाँ भी दृश्य है।

बाहर ही काउंटर लगा है। जिसमे यंत्र, मोबाइल, कैमरा, बैग सब जमा हो जाएगा। अंदर खाली हाथ जाना है। बैग, मोबाइल, कैमरा निकाल कर सब जमा करा करना होगा। सो कर के टोकन प्राप्त कर लिया।

ना सिर्फ मंदिर में बल्कि इस मार्ग में भी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम हैं जो कि मंदिर की ओर जाते हैं। सुरक्षा जांच पर जांच कराने के बाद भीतर जाने को मिल रहा है।

शायद बारिश के चलते इतनी भीड़ नहीं है। लेकिन जिस तरह से द्वार के बाहर भी रेलिंग लगी है उससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है की यहाँ त्योहारों में किस हद्द तक भीड़ रहती होगी। धक्का मुक्की, कतार में घंटों खड़े रहना भी भक्तों की तपस्या है।

मंदिर का मुख्‍य गर्भगृह पैंतीस सौ साल से भी अधिक पुराना माना जाता है। मीनाक्षी मंदिर भारत के सबसे अमीर मंदिरों में से एक है।

मीनाक्षी शब्द का अर्थ है जिसकी आँखे मछली की तरह हो। यह मंदिर महादेव की अर्धांगिनी माता पार्वती का अवतार और भगवान विष्णु की बहन का है ।

दक्षिण भारत के भव्य मंदिरों की सूची में इस मंदिर को अव्वल दर्जा प्राप्त है। यह अत्यंत सुन्दर और भव्य निर्माण का उदारण प्रस्तुत करता है।

यहा के शिव को सुंदरेश्वर और पार्वती को मीनाक्षी के नाम से जाना जाता है। महादेव का यह रूप स्वयं विष्णु ने विवाह के पूर्व उन्हें स्वयं अपने हाथो से दिया था।

मीनाक्षी की उत्पति

देवी मीनाक्षी को राजा मल्‍लय द्वज पांडिया और रानी कांचन माला की बेटी माना जाता है, जो कई यज्ञों के बाद पैदा हुई थीं। यह तीन वर्ष की बालिका अंतिम यज्ञ की आग से प्रकट हुई थीं।

राजकुमार मीनाक्षी बड़े होकर एक सुंदर महिला में परिवर्तित हो गई जो अनेक भूमियों के संघर्ष में विजयी रही और शक्तिशाली से शक्तिशाली राजाओं को उन्होंने चुनौती दी।

जब यह प्रकट हुआ कि राजकुमारी वास्‍तव में पार्वती जी का अवतार हैं। जो पृथ्‍वी पर अपने पिछले जीवन में कांचन माला को दिए गए वचन का सम्‍मान करने के लिए आई है।

इस प्रकार शिव मीनाक्षी से विवाह करने के लिए सुंदरेश्‍वर के रूप में मदुरई आए और यहाँ कई वर्षों तक शासन किया तथा दोनों ने उस स्‍थान से ही स्‍वर्ग की यात्रा आरंभ की जहाँ यह मंदिर आज स्थित है।

रथ यात्रा का भी चलन है। मीनाक्षी मन्दिर सुबह 5 बजे से दोपहर 12.30 बजे तक खुला रहता है। फिर इसके पट्ट बंद कर दिए जाते है जो पुन: संध्या के 4 बजे खुलते है और फिर रात 9.30 बजे तक खुले रहते है।

मंदिर परिसर में पुरानी मूर्तियां देखी जा सकती हैं। प्रांगण में देवी की मूर्ति तक पहुंचने के लिए भी एक रेलिंग से दूसरी रेलिंग तक जाना होता है।

दक्षिण में जितने भी मंदिर देखे उनमें से शायद ही किसी मंदिर के प्रांगण में जाने देते होंगे। मूर्ति तक पहुंचने को किसी की आज्ञा नहीं है। यहाँ भी चार प्रवेश द्वार हैं।

कतार के आगे बढ़ते बढ़ते मीनाक्षी माता के दर्शन भी हो गए। सोने की चमकती छोटी मूर्ति बहुत ही भव्य लग रही है। जिनको कई पंडित घेरे हुए हैं। मंदिर में एक दीपक लगातार जगमगा रहा है।

प्रांगण के बाहर निकल आया पर मन अभी भी भीतर ही अटका हुआ है। इधर बाहर भीड़ जल्दी जल्दी निपट रही है। कुछ लोग किनारे से घुसने की असफल कोशिश कर रहे हैं पर अफसोस।

मंदिर के भीतर पिछले हिस्से में बल्कि प्रांगण के चारो ओर मूर्तियां हैं। खासतौर पर पीछे जहाँ शिव पार्वती और विष्णु की मूर्ति है। जो दर्शा रही है को विष्णु जी पार्वती के हाथो शिव के हाथो पानी अर्पण करा रहे हैं।

मंदिर के पिछले तरफ ही शिवलिंग है। बाहर निकलते हुए छत की दीवार पर शिवलिंग की चित्रकारी बनी है। जो हर दिशा से एक जैसी दिखाई देती है।

यहीं मंदिर परिसर में दुकान से अनोखा प्रसाद खरीद कर ग्रहण किया। जो बहुत ही स्वादिष्ट है।

जब अब्दुल कलम ने दिलाया भरोसा

जब अब्दुल कलम ने दिलाया भरोसा

मंदिर के बाहर पश्चिम दरवाजे से निकल आया जिसके कारण काउंटर तक पहुंचने में थोड़ा विलंब हुआ। टोकन दे कर अपना सामान लिया। मंदिर के पास कुछ तस्वीरें ली और थोड़ी देर में मैं स्टेशन की ओर रवाना हो चला।

यहाँ सामुदायिक मित्र अन्नामलाई मुझे लेने आ रहे हैं अपने घर की ओर। स्टेशन परिसर के बाहर ही इंतजार करते करते थकने से पहले ही वो अपने मुस्टंडे मित्र के साथ अपने वाहन से आ गए हैं लेने।

अन्नामलाई जैसा उनका नाम वैसा चरित्र, शांत सुद्घ, गंभीर, दयालु। वह मदुरई से 130 किमी दूरी से हमें लेने आए हैं। शंका हुई की कोई इतना दूर क्यों ही आएगा लेने और यह शंका तब तक बनी रही जब तक उनके घर नहीं पहुंचा।

उनके साथ उनका मित्र भी है। हम सभी ने आधी दूरी तय करने के बाद भोजन किया, उनके मित्र का साथ यहीं तक का है।

अन्नामलाई जी के घर पहुंचे, तो देखा उनका कमरा डॉ एपीजे अब्दुल कलाम की तस्वीरों से सुसज्जित है। यह तस्वीरें किसी की व्यक्तित्व को बयां करने के लिए काफी हैं।

दस बज चुके हैं लेकिन उनकी टूटी फूटी अंग्रेजी को समझते हुए उनके काम को समझा और उनकी बांते भी।

मुसिरि से त्रिचिपल्ली से मदुरै से करईकुडी तक कुल यात्रा 296किमी

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