लुंगलेई, थेंजवाल या चम्पई

चम्पई | भारत | मिजोरम

रियक से ऐज़वाल  वापसी

रियक पीक से लौटने के बाद अब कहाँ जाऊं कुछ समझ नहीं आ रहा। सुमो से वापसी हुई मिलेनियम सेंटर पर। पान की गुमटी लगाए बिहारी बाबू से पूछा तो मालूम पड़ा की दूसरे गांव जाने के लिए वाहन एसबीआई बैंक के पास से मिलेगा जो नीचे है।

रियक जाने से पहले भर पेट नाश्ता किया। पर इस बार उस दुकान के आसपास भी नहीं हूँ जहाँ रियक जाने से पहले किया था। रेस्त्रां से समोसे और जलेबी की खुशबू अपनी ओर खींच रही है।

पेट पूजा के लिए इस अनजान शहर में यही सही है। अन्यथा यहाँ शाकाहारी भोजन बहुत कठिनाई से मिलता है। एक एक समोसा और जलेबी सुबह का नाश्ता हैं।

मजेदार बात जो आज देखने को मिली वो ये की बिहारी आदमी भारत के हर कोने में है। यहाँ तक कि पूर्वोत्तर भारत में भी जमकर आबादी है। अगर बिहारी ना हो तो शायद कुछ वक्त के लिए भारत की अर्थव्यवस्था ही चरमरा जाएगी

जैसे यहाँ ही मिजो भाषा को समझने में मेरी मदद पान की गुमटी लगाए हिंदी भाषी बिहार के लाला ने की। जिनकी अति उत्तम मिजो भाषा है। जिसका अनुवाद करके भी उन्होंने कई दफा मदद की। पर थोड़े व्यवसायी और खडूस लगे।

सड़क पार करके पहाड़ी के नीचे बाजार के बीचों बीच चल पड़ा। यहाँ हर दुकान पर महिला ही दिखाई पड़ रही है जो मेहनत करने आती हैं। कपड़े की दुकान से ले कर दवाईखाने में भी महिला।

ना जाने यहाँ के मर्द क्या करते हैं। शायद ही किसी दुकान पर मिजो का मर्द दुकान चलाते दिखा हो मुझे अभी तक। अंधेरी गली में धीरे धीरे सीढियां उतर रहा हूँ।

घूमने वाली जगह का चयन

अगर दक्षिण में जाना है तो लुंगलेई, सर्चिप होते हुए थेंजवाल है जहाँ काफी बड़ा झरना है। दूसरी और पूरब में मणिपुर की दिशा में चंपई से रह दिल झील है। अब दिशा के हिसाब से चंपई निकलना बेहतर होगा।

महज एक झरना देखेने क्या ही जाएं थेंजवाल। मेरा और साथी घुमक्कड़ का यही मत बना। सुमो के पास खड़े लोगों से पूछा तो मालूम पड़ा की चंपई के लिए बुकिंग आगे की दुकानों से होगी। 

दुकान पर एक नौजवान मिला जो मूह में सिगरेट लिए, सिर पर टोपी लगाए कापी पर कलम चला रहा है। अंग्रेजी में चंपई के लिए सीट पूछी तो मालूम पड़ा की अभी पूरी सुमो खाली है। सिर्फ आगे की दो सीटें बुक हो चुकी हैं।

चंपई जाने के लिए एक आदमी का ₹6०० लगेगा। अब जाना है तो किराया देना ही है। कुछ वक्त में दो सीटें बुक करा ली और बैग भी इन्ही महाशय के दुकान में रखवा दिया। सुमो के निकलने का समय चार बजे है। अभी घंटा भर तो है ही।

तब तक के लिए मैं साथी घुमक्कड़ के साथ यहीं पास का बाजार देखने के लिए निकल आया। बाजार में घूमने से भी स्थानीय लोगों से रूबरू होने का मौका मिलता है और साथ ही उनके रहने और पसंद नापसंद के बारे में भी पता चलता है। जिससे घुमक्कड़ी में थोड़ा फायदा तो होता ही है।

यहाँ शाकाहारी खाना तो मिलने से रहा। एक दुकान में दाखिल हुआ। यहाँ मालिक उत्तर भारत के लग रहे हैं। समान इधर उधर बिखरा पड़ा है। दुकान को संभालने के लिए कुछ सहायक भी मौजूद हैं।

इन्ही सहायक की मदद से कुछ बिस्कुट के पैकेट और एक बड़ी माजा की बोतल रास्ते के लिए खरीद ली। चंपई तक के सफर में मेरे लायक भोजन की आशंका भी नाममात्र है।

दुकान से निकलने के बाद बाजार की ही तरफ और आगे बढ़ने लगा। सड़क किनारे एक महिला विक्रेता सेब बेंच रही है। 

मैडम से सेब के दाम पूछे, बोलीं की ₹30/किलो। दिल झूम गया। इतनी भारी छूट, पूर्वोत्तर राज्यों में इतने सस्ते सेब। हमारे यहाँ तो महंगे हैं। रोमांच के कारण यही है की ऐजवाल में इतने सस्ते फल कैसे। उत्तर भारत में तो काफी महंगे हैं।

बैठ कर तौलवाने लगा। पर पासा तब पलटा जब मैंने ₹30 पकड़ाए और वो ₹300 मांगने लगें। तब समझ आया भारी छूट नहीं बल्कि सुनने में भारी चूक हुई। वापस उन्ही की टोकरी में डलवा कर चल पड़ा। उनको पूरा विवरण दिया जिसे धैर्यपूर्वक उन्होंने सुना। अबतक समय भी हो गया है निकलने का इसलिए वापस रुख कर लिया है सुमो काउंटर पर।

30 रुपया किलो सेब तुलवाते लेखक

न लुंगलेई न थेंजवाल बस चम्पई

काउंटर पर पहुंचने पर देखा की सुमो की ज्यादा सवारियां नहीं हुई हैं। पर चालक तो निकलने के लिए बाध्य ही है। मैंने अपना बैग सुमो में रखवाया और बैठ गया। समय पर सुमो चल पड़ी चंपई की ओर।

एक वजह ये भी रही की पूरी रात सुमो में ही बीत जाएगी तो सुबह पहुंचते ही रह दिल झील निकल जायेंगे। ऐजवाल के बाजार से होते हुए हमारा कुछ बाहर ही निकलना हुआ की तेज बारिश होने लगी।

खाने को बिस्कुट और पीने को माजा तो है पर पानी नहीं है। कहीं जगह देख कर पानी की बोतल मिले तो लेने की बात चालक से कही। चालक ही ज्यादा बेहतर जानता होगा की कहाँ मिलेगा आखिर पानी।

शहर के बाहर एक महिला तख्त पर पानी की बोतले बेंच रही है। बगल में नलका भी लगा है। चालक ने गाड़ी रोंक दी है। मेरे आगे बैठी महिला उतर कर पानी लेने पहुंच गई। दो मैं भी पहुंचा पर सील पैक बोतल लेने से बेहतर है नलके का पानी।

क्योंकि मुझे तो दोनो ही फायदेमंद है और मैं इसका आदि भी हूँ। पानी से भरी बोतल ले कर बैठना हुआ ही की एक बार फिर से मूसलाधार बारिश शुरू हो गई।

अब तक अंधेरा भी होने लगा है। मेरे अनुमान में चालक को पहाड़ी पर इस बारिश में परेशानी तो हो रही होगी। खासतौर पर तब जब सामने से ट्रकों की सेना मोड़ से मुड़ते हुए सीधा इधर ही चली आती है।

पहली बार नसीब हुआ शाकाहारी भोजन

शाम के छह बज चुके हैं। अबतक ड्राइवर को भी भूख लग आई है। इसलिए गाड़ी एक ढाबे के सामने आ कर रुकी। यहाँ ढाबे को संचालित कर रहा है एक पूरा परिवार। पर शायद ही यहाँ शाकाहारी भोजन मिले, जो अभी तक नसीब तो नहीं हुआ।

पर बाहर खड़ी मालकिन ने ये शंका भी दूर कर दी। ढाबे में हस्ट पुष्ट कुत्ते भी रखे हैं। जो पैसा नहीं देते होंगे उनसे ये कुत्ते वसूली करते होंगे।

खाने से पहले सारी सवारियां जो भरी बैठी हैं वो एक एक कर सब हल्के होने ढाबे के पिछले हिस्से में पहुंच रहे है। मैं भी पिछले हिस्से में आ खड़ा हुआ अपनी बारी के इंतजार में।

लघुशंका के बाद जो हम शाकाहारियों के लिए खाने लायक है वो है दाल चावल। मिजोरम में यही पर्याप्त है। एक दंपति जो सुमो में साथ में चली थी उन्होंने खाने से पहले सिगरेट फूकना जरूरी समझा।

खाते समय भी मालिकों को चैन नहीं है और उन्होंने रखवाली के लिए अपने कुत्तों को खुला छोड़ रखा है। जो खाते समय थाली के पास अपना मू्ह मार रहे हैं। दुकान बंद करने का समय है इसलिए ये जो परिवार इस दुकान का संचालन कर रहा है वो भी रात्रि भोजन कर सोने की तैयारी कर रहे हैं। परिवार काफी बड़ा है।

आधे घंटे चले खाने के इस कार्यक्रम में सब अपना पेट भरने के बाद चल पड़े। यहाँ भी खा कर सबसे आखिर में मैं ही उठा हूँ। पर जो बात अजीब लगी वो ये की ये बचा कूची दाल या सब्जी वापस से भगाउने में ही पलट देते हैं।

अब बाकी के सफर में जमकर सोऊंगा। सुमो निकल पड़ी और मैं सो भी गया। रात के अंधेरे में बाहर कुछ भी दिखाई नहीं पड़ा रहा।

रात के करीब दो बज रहे होंगे की अचानक गाड़ी कंपन करने लगी। जो रुकने का नाम ही नहीं ले रही। मेरे अलावा सब यात्री जब चुके हैं। ध्यान दिया तो देखा सुमो इस समय कीचड़ से लबालब रास्ते पर तेज रफ्तार में निकल रही है।

यहाँ कीचड़ में एक कार और एक सुमो पहले से ही फसी हुई है। करीब 2०० मीटर के इस रास्ते पर अगर हमारी सुमो भी रुक गई तो यही हाल होगा। फिर शायद हमें भी धक्के मरते हुए बाहर निकलना पड़े।

पर चालक की कुशलता से गाड़ी ने पूरा कीच सहजता से पार कर लिया। ऐसे लंबे कीचड़ दलदली रास्तों पर गाड़ी की रफ्तार के साथ संतुलन बहुत अहम हो जाता है।

सुबह के तीन बजे ड्राइवर ने एक चौराहे पर गाड़ी ला कर बंद कर दी आज सो गया। अब तक अगली सीट पर बैठी सवारियां उतर चुकी हैं। जब ड्राइवर दोबारा उठा तब ज्ञात हुआ कि हम चंपई आ चुके हैं। कुछ इस तरह आगमन हुआ चंपई में।

रिएक से ऐज़वाल से चम्पई तक की कुल यात्रा 227km

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *