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ले कोबुशैर ने बसाया चंडीगढ़

कल रात दिल्ली  से नौ बजे की ट्रेन से मैं सुबह सवेरे तीन बजे मॉडर्न सिटी चंडीगढ़ आ पहुंचा। ट्रेन अपने निर्धारित समय से आधे घंटे पहले ही आ गई, ये भी मुसीबत है। अगर पहले आ गई तो ट्रेन पहले खाली करो।

चैन की नींद आधे घंटे पहले ही भंग हो गई। कभी कभार समय से पहले पहुंचना भी भारी पड़ जाता है। टूटी नींद के साथ ट्रेन से उतरा। सुबह के चार बज रहे हैं। इतनी सुबह तो बचपन में पिताजी मार मार कर उठाया करते थे।

स्टेशन पर भी लोग अचेत सो रहे हैं, कुछ हरकत में भी हैं। नींद तो मुझे भी आ रही है और सोने का बड़ा मन है। मैं स्टेशन पर ही जगह देखने लगा जहाँ थोड़ा आराम किया जा सके।

प्लेटफार्म के बाहर और एंट्री गेट से पहले मुझे खाली जगह खाली अवसर के रूप में दिखी। अगल बगल में लेटे मुसाफिरों को आगे पीछे सरकाया।

कंधे से बैग नीचे उतर कर रखा। बैग में हाँथ डाल चद्दर टटोलने लगा। पर हाँथ आयी कमीज। आँख बंद कर दोबारा टटोला यादास्त के अनुरूप खोजने पर इस बार चादर ही निकला। मैंने यहीं चद्दर बिछाया।

बैग को ही तकिया बना हांथ में फसा पैर पसार कर लेट गया। पता ही नहीं चला कब आँख लग गयी सो गया। हालाँकि बीच में आँख जरूर खुली।

बैग का ठिकाना

सुबह के पांच बज रहे हैं। आँख खुली तो देखा सफाई कर्मचारी चला आ रहा है झाड़ू लगाते हुए मेरी और। सब अपना अपना बोरिया बिस्तर उठा किनारे हट गए। कुछ उठकर ही चले गए।

मैंने अपना चाद्दर समेट उठ खड़ा हुआ। होश आया सोने नहीं पर्यटन के लिए आया हूँ। सुबह के पांच बजे रहे हैं।

मैनें मोबाइल से दनादन तीन चार ट्रैवल कम्युनिटी मित्रों को फोन घुमाया। उसमें से एक मित्र तोशीब ने बीती रात मिलने के संकेत दिए थे। इतनी सुबह किसी ने भी कॉल का जवाब नहीं दिया।

साल 2016 में जब यहाँ अपनी फ़ैमिली के साथ आया था। तब पास के ही रेलवे क्वार्टर में व्यवस्था हो गई थी। उस समय चंडीगढ़ भारत का सबसे स्वच्छ शहर था, आज इंदौर है।

तोशीब के भी फोन ना उठाने से यही लगने लगा कोई दूसरा विकल्प खोजना पड़ेगा। इसी आस में पुराने ज़माने के रेलवे इंजन के पीछे बने विश्राम गृह में घुसा।

क्यारी में घास छील रहे माली ने आने का कारण पूछा। उनको संक्षेप में कहानी सुनाई और अपना परिचय दिया। घास और खुर्पी हवा में लहराते हुए रिसेप्शन हॉल की तरफ जाने इशारा किया।

पचास मीटर दूर रिसेप्शन पर पहुंचा। यहाँ एक और सज्जन मिले। हाँथ में कंचुली लिए खड़े भाईसाहब ने आने का कारण पूछा।

उन्हें सारी कथा सुनाई। पास पड़े सोफे पर बैठाल अपने इंचार्ज को बुलाने चल दिए। कुछ एक मिनट में इंचार्ज हाज़िर हुए।

इस दौरान चाय की सोंधी सोंधी खुशबू नाक के नीचे से निकल गई। सब कुछ भूल के बस ये चाय की प्याली होंठो से लगाने का मन कर रहा है।

चाय पराठे की महक रसोई में न्योता दे रही है। इसी दौरान एक आदमी चाय सुड़सुड़ाते हुए हाल में आया। स्पष्ट करते हुए उन्होंने रूम से संबंधित पूछा।

इंचार्ज निकले उन्होंने जानकारी देते हुए कमरा ना खाली होने की बात कही। ये अचरज की बात नहीं है, रेलवे क्वार्टर में अक्सर क्वार्टर भरे ही रहते हैं।

नतीजन मैं कैंपस के बाहर निकल आया। अब तो एक आखिरी रास्ता है अमानती घर में बैग जमा करो और घूमने निकल जाओ।

उसी के मुताबिक कार्य भी करने लगा। अच्छी बात ये है कि यहाँ दुसलखानें की व्यवस्था है। स्टेशन के एसी दुसलखाने में स्नान के बाद तरोताजा हो गया।

अमानती घर ढूंढने लगा। टेहेलते टेहेलते प्लेटफार्म नंबर एक पर आगे जा कर एक दुकान दिखी जहाँ शटर आधा गिरा है।

इस खंडहर जैसे दिखने वाले कमरे के बाहर भी अमानती घर जैसा कुछ नहीं लिखा है। अन्दर से बाहर आते हुए सज्जन निकले, बातचीत में पता चला यही अमानती घर है।

लेकिन बैग की सुरक्षा की भी कोई गारंटी नहीं ली। यानी कोई भी आकर अपना बैग समझ कर ले जा सकता है। ये सुनते ही मैं भौचक्का रह गया।

यहाँ बैग रखने में भी आत्मा कांप रही है। यात्रा का पहला दिन ही अंतिम दिन ना बने इससे बेहतर है मैं अपने बैग को पूरे चंडीगढ़ में लादे लादे फिरूं। चर्चा चल ही रही थी की फोन की घंटी बजती है।

तोशीब से मुलाकात

देखता हूँ ट्रैवल कम्युनिटी से तोशीब का फोन आया है। सुबह आंख लगने कि वजह से फोन ना उठाने का हवाला दिया। सादरपूर्वकअपने घर पर आमंत्रित किया।

ये कॉल संकटमोचक साबित हुआ। फटाफट स्टेशन से बहार निकला। इधर स्टेशन के बाहर ऑटो वाले तो ऐसे तैनात खड़े है जैसे सेना।

स्टेशन की सीढ़ियों से नीचे उतरा नहीं कि मौका पाते ही ऑटोवालों ने धावा बोल दिया। हाहाकार मच गया सवारी आ गई भाई सवारी आ गई।

छीना झपटी की नौबत आती उससे पहले ही एक ऑटो मे बैठ गया। ऑटो बुक कर के सुबह के सात बजे रेलवे फाटक से निकल गया।

सुबह के सात बजे हंगामेदार ट्रैफिक तो नहीं है लेकिन सड़कों पर हलचल है। इधर एक साइकिल वाला मेरी ऑटो से रेस लगाने लगा होना क्या था हार गया। मुड़ के देखा तो दांत दिखा रहा है। जरा सी भी टक्कर पड़ जाती तो गिरता औंधे मुँह।

मॉडर्न सिटी चंडीगढ़

सनसनाते हुए आधे घंटे में पहुंच गया मॉडर्न सिटी चंडीगढ़ के सेक्टर 23 तोशीब से मुलाकात करने। धीरे धीरे ट्रैवल एप और घुम्मकड़ी समुदाय के बारे में भी समझ आ रहा है कि इसका इस्तेमाल कैसे करना है। क्या फायदे और नुक़सान हो सकते हैं। चंडीगढ़ में सब घर एक जैसे दिख रहे हैं।

बताए हुए रास्ते पर ऑटो आ पहुंचा। ऑटोवाले को पैमेंट कर चलता किया। हमशक्ल घरों में से मैं गूगल नक्शे के द्वारा निर्देशित घर में दनदनाते हुए घुसता चला गया।

घुसा ही था कि बगल वाले घर से लड़का निकल आया। हंसते हुए बोला “केडे घरे वादी जरेयां मामा”। इस पतले लंबे कद काठी वाले ने इतना बोला ही और ये समझ आ गया कि यही तोशीब है।

इससे पहले कि इस गलत घर से बाहर आकर कोई खैरियत पूछे। मैं बिना किसी को तंग किए निकल कर उसके घर आ गया। तोशीब के घर में जाने में थोड़ा सकुचाया।

शायद ये मेरा पहली मर्तबा है किसी ऑनलाइन एप के जरिए किसी अनजान से मुखातिब होना। जल्द ही उनके माता पिता ने इस चीज को भांप लिया और मिनटों में अपने व्यवहार से बहुत ही सहज महसूस कराया।

गर्म जोशी से स्वागत किया। सुबह की कशमकश के बाद चाय की प्याली ख़तम करते ही दिमाग की बत्ती जली। चाय पर चर्चा छिड़ी की इतनी सुबह कहाँ को जा सकते हैं।

आंटी अंकल अपनी राय सलाह दे रहे हैं। उनके मुताबिक सुबह सवेरे गार्डन जाना ज्यादा बेहतर होगा। कुछ ही देर में मैं निकलने कों तैयार बैठा था। उधर तोषीब भी फटाफट निकलने की तैयारी करने लगा।

बड़े बैग से छोटा बैग निकाल कर कैमरा और जरूरी सामान डाल लिया। मुझे उम्मीद नहीं थी कि तोशीब भी हमारे साथ चलेगा।

पिछले दौरे की अधिकांश जगहें मेरे दिमाग में छपी हैं। मन ही मन ये खयाल उतपन्न होने लगे कि तोशीब के बिना भी मैं सक्षम हूँ चंडीगढ़ घूमने को। यही सोच सोच कर छाती गद गद होती रही।

मॉडर्न सिटी चंडीगढ़ की डबल डेकर

साढ़े नौ बजे तक मैं, अजय, तोशीब निकल गए चंडीगढ़ की खूबसूरती देखने। पास के हॉकी स्टेडियम से गुजरते हुए सेक्टर 17 से शिवालिक होटल पहुंचा।

इतर मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा है तोशीब ले किधर जा रहा है। होटल के ठीक सामने डबल डेकर बस खड़ी है।

तोशीब ने समझाया कि ये स्पेशल डबल डेकर बस सरकार द्वारा ख़ास पर्यटकों के लिए है। वाह! ये अच्छी सुविधा है सैलानियों के लिए बशर्ते इस बारे में आपको मालूम होना चाहिए।

तीन टिकट लेके मैं चढ़ा। ये पहली दफा है जब मैं किसी डबल डेकर बस में सफर करूंगा। बस के अंदर तो हर बार ही बैठता हूँ। इसलिए मैं नीचे ना बैठ कर बस की खुल्लमखुल्ला छत पर ताज़ी हवा खाने निकल गया।

पूरा पैसा वसूल। बस की छत पर हम तीनो के अलावा कोई नहीं है। और ना ही नीचे ज्यादा सवारियां है। सन्नाटे का माहौल छाया हुआ है। लग ही नहीं रहा घूमने आया हूँ। बस को निकलने में अभी समय है।

डबल डेकर बस की छत पर चैन की सांस लेते हुए

दस बजे तक चल पड़ी अधभरी बस चंडीगढ़ की सैर पर।बस की छत से अनोखा ही अनुभव हो रहा है। मैं लोगों को और लोग मुझे निहारे जा रहे हैं। उनके शहर में उनके लिए तो ये आम बात होनी चाहिए।

गुलाब उद्यान के पास से गुजर ही रहे हैं कि तभी बाहें फैलाए खड़े पेड़ की डंठल मेरे सिर पर ज़ोर से पड़ी। इससे एक बार में ही दिमाग तर्र हो गया।

जब तक मैं संभाला तब दूसरे पेड़ की डंठल मेरे सिर पर पड़ने को तैयार थी। लेकिन इस बार मैं चौकन्ना रहा और झुक कर खुद को कुदरत की मार से बचाया।

बस उन सभी मशहूर पर्यटक स्थलों के दर्शन करा रही है, ये तो तोशीब है जो मुझे हर स्थल के बारे में बता रहा है। शहर की गहराई से जानकारी वहां का रहने वाला ही रख सकता है, और एक पर्यटक तो एक पर्यटक ही होता है।

सुखना झील

घूमते घामते मैं पहुँच गया सुखना। यहाँ सभी सवारियों को उतारा और बस वापस निकल ली शिवालिक होटल। सफ़र काफी अच्छा रहा और मजेदार भी, थोड़ी चोट जरूर पहुंची मगर दर्द के बिना सफर का क्या ही मज़ा!

सुखना झील बहुत विशालकाय और सुंदर है। वो तो मेहरबानी है कि सूर्य देवता आज नदारद हैं अन्यथा इतनी तसल्ली से घुमक्कड़ी का लुत्फ नहीं लिया जा सकता है। सुखना से हिमालय की पहाड़ियां आसानी से देखी जा सकती हैं।

मुझे याद है तीन साल पहले मैं इसी शहर में जून के महीने में धूप से हाल बेहाल हो गया था। यहाँ सुबह या शाम में टेहलने या जॉगिंग के लिहाज से इससे बेहतर जगह पूरे चंडीगढ़ में नहीं हो सकती।

दो किमी लंबे लेख के किनारे बने ट्रैक पर बहुतेरे मौसम का मजा ले रहे हैं। झील में स्थिर दो बड़े बड़े स्टॉप दिखाए जिसपे झील के खतरे वाला निशान चिन्हित है।

तोशीब ने बताया झील की गहराई का अन्दाज़ा कोई ना लगा सका है आजतक ना जाने कितने समां गये है मौत के मुँह में। किनारे पर सीमेंट की सड़क बनी है लोगों के चलने दौड़ने के लिए।

सुखना झील से पहाड़ियों की चोटी साफ़ देखी जा सकती है सोच रहा हु जब आसमान एकदम साफ होता होगा तो समूचा पहाड़ दिखता होगा।

सुखना झील में जितना ढलती शाम को मज़ा आता होगा उतना दिन में कहाँ। एंट्री गेट से कुछ आगे एक बड़े से बरगद के पेड के निचे कुछ देर सुस्ताया। काफी समय बीता लेने के बाद मैं निकल पड़ा कहाँ ये सिर्फ तोशीब ही बता सकता है।

कैपिटल कॉम्प्लेक्स

सुखना से कुछ मीटर दूर कैपिटील काम्प्लेक्स तक तोशीब पैदल ही घसीट लाया। एक छोटे से बने ऑफिस में दाखिल हुआ। यहाँ देखा तो मेरे जैसे कुछ और भी आगंतुक हैं।

तोशीब ने रिसेप्शन पर सारी जानकारी एकत्रित की। मालूम पड़ा कि अंदर जाने के लिए पंजीकरण कराना अनिवार्य है। बटुए से पहचान पत्र निकाल कर बाकायदा जांच कराई।

रिसेप्शन पर बैठी मैडम जी ने हमें कुछ देर तक के लिए सोफे पर बैठ कर इंतज़ार करने को बोला गया।

थोड़ा थक गया हूँ सुबह से अबतक की भाग दौड़ में। मालूम पड़ा कैपिटील काम्प्लेक्स को देखने और समझने के दो निर्धारित समय हैं एक सुबह 11 बजे दूसरा दिन में 2 बजे।

यहाँ मैं खुशकिस्मत रहा कि 11 बाजे का स्लॉट मिल गया हालांकि अभी आधे घंटे ऊपर हो गया है। इंतज़ार खत्म हुआ और सभी बैठे लोगों को जाँच कर अंदर भेजा जाने लगा।

सुरक्षाकर्मी ने बेहतरीन ढंग से जांच की और अजय के पास से पाया एक चाकू। वही चाकू जो कल मेट्रो स्टेशन पर सुरक्षाकर्मी ने आगे बढ़ने से आना कानी की थी।

जांच पूरी हुई। चाकू काउंटर पर जमा करने का आदेश मिला। सारी प्रक्रिया पूरी होने के बाद मैं अन्दर दाखिल हुआ। इस दल में हम तीन के अलावा एक परिवार है जो आर्किटेक्चर समझने अपने बच्चों के साथ आए हैं।

हरयाणा पंजाब हाई कोर्ट चण्डीगढ़ कैपिटील काम्प्लेक्स

जिस हिस्से से मैं अन्दर आया वो काफी पुराना और ना इस्तेमाल होने वाला रास्ता मालूम पड़ता है। गाइड ने अपना काम चालू कर दिया और यात्रियों ने अपना सुनने का।

मुझे कुछ बातें जानकर बड़ी हैरानी हुई जैसे ये एक ऐसी बिल्डिंग है जिसकी रचना कुछ इस प्रकार की गई है कि चाहें जितनी भी भीषण गर्मी क्यों ना पड़ रही हो इसमें कभी अभिव्यक्ति को गर्मी का अहसास मात्र भी नहीं होगा। ले बुशैर द्वारा निर्मित ये रचना अद्भुत है।

वो स्विट्जरलैंड के जाने माने आर्किटेक्ट थे जिन्हें पंडित नेहरू ने भारत का न्योता दे इस शहर की रचना करने का प्रस्ताव दिया था।

लेकिन इन सबमें बेहद ही आश्चर्य कर देने वाली चीज है वो है लोहे का बना घूमता हाँथ जो शांति, समृद्धि और एकता का प्रतीक।

ये खास बात नहीं है, खास बात तो ये है कि ये लोहे का बना हाँथ इतने सालों से बारिश, धूप, आंधी, तूफान में ऐसा का ऐसा ही टिका हुआ है और हवा की दिशा में घूमता है।

आज हवा ना के बराबर चल रही है इसलिए ये बहुत धीरे धीरे घूम रहा है। ठीक इस हाँथ के पीछे घना जंगल है जहाँ से नील गाय या हिरण अक्सर इस इलाके में घुस आते हैं।

मैंने अपने कैमरे से जूम करके देखा तो वाकई में एक झुण्ड नज़र आया। कैपिटल के सामने दुगनी बड़ी बंद पड़ी इमारत है जिसे अब किसी कारण बंद कर दिया गया है।

जिसका निर्माण तो ऐसा है जैसे स्टार वार्स फिल्म में किसी यान का। चंडीगढ़ पंजाब और हरियाणा दोनों की राजधानी होने के कारण यहाँ दोनों जगह की सुनवाई होती है।

कड़ी धूप में कुछ वक़्त गुज़र जाने के बाद गाइड साहब हमें कोर्ट में भी घसीट लाए। कानपुर की कचहरी के अलावा मैं कभी कोर्ट के बाहर भी नहीं गया था। लेकिन ये पहली मर्तबा है जब किसी कोर्ट में आया हूँ।

कोर्ट कम पढ़ाई का कॉलेज ज्यादा लग रहा है। काले कोट में कुछ पुराने तो कुछ इंटर्नशिप करने आए वकील भी दिखाई दे रहे हैं।

अन्दर बाहर सब जगह की रचना और इतिहास समझने के बाद कोर्ट से एक बजे तक एग्जिट कर गया। कुल डेढ़ घंटे हाई कोर्ट में चक्कर लगे।

एफिल टॉवर

अभी भी हम कहाँ को जा रहे हैं ये सिर्फ तोशीब ही बता सकता है। बेजान हुए शरीर को चार्ज करने के इरादे से रेस्तरां ढूंढने लगे।

कैपिटील काम्प्लेक्स से सेक्टर 23 नाप दिया पैदल। प्राण तो सूख ही चुके हैं अबतक। आज पहले दिन ही ये हाल है तो धर्मशाला में क्या होगा जब पहाड़ियां चढ़नी पड़ेंगी

रेस्तरां तो मिला लेकिन बाज़ार के पिछले हिस्से में। धूप भले ही ना के बराबर है लेकिन गर्मी महसूस कि जा सकती है। आर्डर किया गया शाही व्यंजन पनीर।

एक और गलती बहार का तैली खाना खाने जा रहा हूँ। खैर कुछ ही देर में खाना आया और उतनी ही जल्दी निपटाया। खाना पीना कर खुद को ऊर्जावान बना मैं दोबारा निकल पड़ा।

अभी तक का सारा कारवां पैदल ही निपटाया है और आगे भी उम्मीद है। वो इसलिए भी क्योंकि सब आजू बाजू में ही है। तोशीब के दिमाग में चंडीगढ़ का नक्शा बसा है।

हम वहां आ पहुंचे जहाँ गेडियां मारने नौजवान आते है। मुझे इसके बारे में बाद में पता चला कि असल में ये होता क्या है।

अगले मैदान में पाकिस्तान से 1972 के युद्ध में जीता हुआ टैंक रखा है। जाहिर सी बात है सेना के इस शौर्य और जीत कर लाए इस टैंक के साथ कौन कैमरे में कैद नहीं करना चाहेगा।

इस टैंक को देख कर ही छाती फूली नहीं समा रही है। इधर मैं फोटो खिंचवा रहा हूँ उधर दो पर्यटक मेरे हटने का इंतजार कर रहे हैं। मेरे हटते ही खड़े हो गए। हर कोई भारतीय फ़ौज पर फख्र करता है।

कुछ कदम की दूरी पर अगला मैदान आ गया जहाँ सात अजूबा गार्डन है। ये मैदान वाकई में अपने आप में एक अजूबा है।

मैदान का पिछला हिस्सा तो एक दम ही खँडहर पड़ा है और और कुछ स्कूटी सवार झाड़ियों के पीछे घुसड़पंच कर रहे हैं। लग रहा है ये अपना अजूबा खुद बनाएंगे।

एफिल टॉवर देखने के लिए पेरिस जाने की जरुरत नहीं चंडीगढ़ के पास यहाँ अपना खुद का है । भारत में चंडीगढ़ जैसे शहर होने चाहिए जहाँ कोई भाग दौड़ भरी जिंदगी में खुल कर मन बहला सके।

यही कारण है कि नोएडा और चड़ीगढ़ जैसे शहर कंपनियों को ज्यादा लुभाती हैं। चंडीगढ़ अपने उद्यानों के लिए ज्यादा प्रसिद्ध है।

चंडीगढ़ का एफिल टावर

गुलाब उद्यान(Rose Garden)

चलते फिरते समय बिताते बिताते इन्हीं उद्यानों में से एक गुलाब उद्यान में आया। तीस एकड़ में फैला ये गार्डन अपने आप में एशिया का सबसे बड़ा गुलाब गार्डन माना जाता है।

तोशीब ने बताया कि इस गार्डन में कम से कम पंद्रह प्रकार के गुलाब हैं। एंट्री गेट से आगे तक जिस तरह सजाया गया है वो भव्य है। एक फाउंटेन और उसके आस पास काले, लाल, पीले, गुलाबी, सफेद गुलाबों से सजी क्यारियां।

लेकिन चंडीगढ़ के जोड़ों के लिए ये स्थल अतिप्रिय मालूम दिख रहा है। जैसे जैसे गार्डन की गहराई में जाते जा रहा हूँ वैसे वैसे संख्या बढ़ती जा रही है।

हद्द तो तब हो गई जब एक छोटी सी बेजान पुलिया के नीचे दो लड़के पकड़े गए। और आगे बढ़ा तो एक मैदान में फूल की तरह चारों दिशाओं में जोड़े बिखरे पड़े हैं।

गार्डन की बाउंड्री पर ऐसे कई जोड़े देखे जा सकते हैं जो फूलों के पीछे गुल खिला रहे हैं। इन जोड़ों को भगाते भगाते सिक्योरिटी भी पक चूकी है।

ऐसे ही सिक्योरिटी गार्ड डंडा लेके दौड़ा दीवार की तरफ। थकान से चूर शरीर के कारण गार्डन हम सब यहीं हम तीनों कुछ देर के लिए पेड़ के नीचे सुस्ताने लगे। एक गिलहरी मेरे हाँथ के पास से गुज़र गई।

रोज गार्डन चंडीगढ़ में खिलखिलाती गिलहरी

अगर ध्यान से इनको देखे तो बेहद मासूम जान पड़तीं हैं। अपने छोटे छोटे हांथो से किसी भी चीज़ को कुतरना। विश्राम करते करते आधा घंटा कब गुजर गया पता ही नहीं चला।

मौज मस्ती में चार बजे रॉक गार्डन को कूच कर गया। इन सभी आशिकों को अलविदा कह कर। उनको भी जो यहाँ आये तो मौज मस्ती के लिए हैं पर हुआ मनोरंजन।

ये इन सभी गार्डन से बाहर और सुखना लेख की तरफ है इसलिए दूरी और समय को ध्यान में रखते हुए हम टेंपो से रॉक गार्डन पहुंचे।

रॉक गार्डन

कुछ दस मिनट में रॉक गार्डन के सामने वाली सड़क पर आ पहुंचा भुगतान कर बढ़ चला गार्डन की ओर। रॉक गार्डन की चपठी दीवार में घुसा हुआ टिकट काउंटर नज़र ही नहीं आ रहा है। टेंपो से उतरने के बाद पता ही नहीं चल रहा टिकट कहाँ से लेना है।

सिर खुजलाते हुए दाद्दु से पूछा तो तपाक से जवाब आया “ओथहे जा पुत्तर, उधर ही पवां टिकट”। खिड़की से तीन टिकट भी ले लिए और प्रवेश फाटक से अन्दर भी आ गया । रॉक गार्डन का इतिहास बहुत ही मजेदार है।

एक सरकारी अधिकारी बड़े ही गुपचुप तरीके से सरकार से छुप छुप कर इसको 1957 में बनाया था। वो और कोई नहीं बल्कि नेक चंद थे। दुनिया भर के तमाम अनावश्यक, अनुपयोग चीजों से बने ये गार्डन बहुत ही शानदार है।

यकीन मानिए हर शहर में सबका अपना रॉक गार्डन हो सकता है। कहीं चूड़ी के ढेर से, कहीं टूटे पुराने अलुमिनम के गोलाई, तो कहीं टूटे टाइल्स, मटका, बर्तन इत्यादि कई प्रकार के चीजों से सुसज्जित है।

मानव निर्मित झरना, गुफा भी है। मन बहलाने के लिए सब है यहाँ। नेक चंद जी बना कर गए सो गए। बाकी का निर्माण सरकार ने अपने हांथों लिया और भी बहुत कुछ अलग से निर्माण कराया।

दाखिल होते ही पुराने मटको से सजी इमारत दिखी। और आगे पुरानी संस्कृति कैसे हमारे पूर्वज गुज़ारा करते थे। एक पतले से गलियारे में टूटी हुई चूड़ियों और टाइल्स से बनी मूर्तियां खड़ी हैं। मानो कह रही हों मेरी तरह इंसान भी अपने टूट चुके रिश्तों को जोड़ सकते हैं।

इन पत्थर के बने गलियारों से गुजरते हुए बनावटी झरने की ओर मुड़ गया। पहुंचा तो देखा भीड़ ही भीड़। इतनी भीड़ जितनी रेलवे स्टेशन पर देखने को मिलती है।

जैसे किसी रेलवे स्टेशन पर ट्रेन के आगमन का इंतजार हो रहा हो। वैसे ही यहाँ आगे बढ़ कर वो बनावटी चीज़ों को देखने का। बनावटी झरने का पानी इतना शुद्ध और साफ़।

वो तो मनाही है नहाने की वरना बतख की तरह कुछ मानव भी तैरते दिखाई पड़ते। झरने के पीछे से निकलते हुए बनावटी गुफा में घुसा जो मात्र कुछ मीटर तक की है।

लेकिन रॉक गार्डन में मनोरंजन भरपूर होगा इसकी गारंटी है। मैं इन बनावटी झरने और गुफा को देखता हुआ एक मैदान में जा पहुंचा जिसमें बच्चों के लिए झूले लगाए गए हैं ताकि वो भी मन बेहला सकें।

लेकिन कुछ शरीर से बड़े बच्चे उन झूलों पर झूल झूल कर अपना बचपना सामने ला रहे है। बचपना दिखाना गलत नहीं है लेकिन बचपना छुपाना गलत माना जायेगा। हम बड़े चाहें कितने भी हो जाए कहीं ना कहीं एक बचपना सबमें रहता है और रहना भी चाहिए।

मैदान में झोपड़ी जैसी कुठरिया में तोशीब हमें ले कर आया। यहाँ तोशीब अपनी सहेली के साथ फोटो खींचने लगा। मिलना तो बनता है जी उनकी सहेली से। इसी तरह की कई सहेलियां हैं यहाँ।

मटकों से सजी ईमारत रॉक गार्डन चंडीगढ़

अमृतसर के लिए रवानगी

समय काफी बीत चुका है और शाम की ट्रेन से अमृतसर के लिए रवाना होना है । इसी को ध्यान में रखते हुए मैं रॉक गार्डन से साढ़े पांच तक निकल गया।

हर हालत में शाम सात बजे की ट्रेन पकड़नी ही है। मनसा देवी मंदिर जाने की बहुत इच्छा है लेकिन शायद ये अधूरी ही रह जाएगी। दिमाग इसी उधेड़बुन में उलझा है कि किसी भी हालत में ट्रेन नहीं छूटनी चाहिए।

बाहर आकर पहले टेंपो से तोशीब के साथ उसके घर पहुंचा तो घर में ताला लटका मिला। अब क्या? ने अपनी जेब टटोली और उससे ताले कि चाभी मिल गई, शुक्र है!

सुबह निकलते वक्त तोशीब ने एहतियातन शायद इसी वक़्त के लिए रख ली थी। ताला खुला, मैं कमरे की तरफ भागा। ट्रेन छूटने के डर से मैं और अजय अब हरकत में आ चुके हैं। अपना सारा बुरिया बिस्तर बांधा, बैग उठाया। कुछ ही मिनटों में तोशीब की मम्मी भी आ गईं।

उधर आंटी जी का आना हुआ और मेरा निकलना। तोशीब मुझे मुख्य सड़क तक छोड़ने आया। मोबाइल एप से स्टेशन तक के लिए रेंटल कार बुक कर ली।

कुछ समय लगा गाडी आने में जिससे धड़कने बढ़ गईं। उधर ट्रेन पकड़नी है इधर बुक कराई हुई गाडी इतनी लेट लतीफ़। कार की डिक्की न खुलने के कारण बैग उठा पीछे वाली सीट पर रख लिए। और यहीं बैठ गया।

इसी उम्मीद से गाड़ी से स्टेशन के लिए रवाना हो गया। शुरुआती सफर में तो रोड खाली ही रही। लेकिन जैसे जैसे ऑफिस की छुट्टियां हो रही हैं वैसे वैसे सड़क पर वाहन की तादाद बढ़ रही है।

चंडीगढ़ जाना मन आईटी हब है। चिन्ताजनक स्तिथि तो तब हो गई जब रास्ते में भीषण जाम लग गया। अब ट्रेन का मिलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन लग रहा है।

जाम से झूझते हुए सात बजने से काफी पहले मैं स्टेशन पहुँच गया। पीछे सीट पर रखे दोनों बैग निकाले। पेमेंट किया और दौड़ते हुए स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर एक पर पहुंचा। दौड़ते भागते प्लेटफार्म पर आ खड़ा हुआ।

ट्रेन नजर ना आई, पता चला ट्रेन तो पांच बजे ही निकल गई है। ट्रेन एप पर पड़ताल किया तो ये सही साबित हुआ। भ्रमण के पहले दिन इतनी बड़ी चूक कैसे हो गई! एप पर भी अब अमृतसर जाने के लिए कोई ट्रेन नहीं दिखा रहा।

ट्रेन छूटने का ज्यादा मलाल इसलिए भी नहीं हुआ क्योंकि अमृतसर ज्यादा दूर नहीं। इसी पर चर्चा छिड़ी हुई है कि पास से गुजर रहे सरदार जी ने हाल जाना।

अमृतसर को जाने वाली बस से निकल जाने को सलाह दे रहे हैं। एक दूसरे सज्जन ठीक इसके विपरीत चंडीगढ़ से रेंटल कार एप से जाने की सलाह दे रहे हैं।

ना मैंने इनकी सलाह मानी न उनकी दोनों की सलाह सुनी और गूगल बाबा को समझाने के लिए पकड़ा दी। इंटरनेट पर देखा तब इसका फॉर्मूला समझ आया।

वो ये कि जो भी कोई अमृतसर जा रहा होगा अगर उसकी कार में सीट खाली होगी तो किराए पर सवारी ले जाएगा। दिन का उजाला रात के अँधेरे में तब्दील हो चला है।

मैंने इसे डाउनलोड करके देखा और रेट जानने चाहे। डाउनलोड करने के बाद देखा तो इस एप पर रेट तो चार घंटे की यात्रा के हिसाब से आसमान छू रहे हैं।

दो चार कार वालो से संपर्क साधा। लेकिन जिससे भी बात करता वो पिछले वाले से ज्यादा ही रेट बताता। ये अच्छा विकल्प है लेकिन ट्रेन छूटने के बाद अपने दाम के हिसाब से मुझे किफायती नहीं लगा। बजट से बाहर।

भागम भाग

बस का सुझाव जेब के लिहाज से भी अच्छा जान पड़ रहा है और समय के मद्देनजर भी। समस्या ये है कि यहाँ बस अड्डे दो हैं एक लोकल दूसरा एसटीडी मतलब बाहरी शहरों के लिए।

अनजान शहर की अंधेरी रात में मुझे ये बात समझने में थोड़ा समय लगा। एसटीडी वाला दस किमी दूरी पर है। अमृतसर जाने के लिए वहीं पहुंचना है।

सरदार जी ने बताया था कि रात के दस बजे के बाद तो वहां से भी बस नहीं मिलेगी। अबतक स्टेशन पर आए हुए मुझे दो घंटे बीत चुके हैं।

कूदते फांदते रेलवे स्टेशन से बाहर निकला और सामने से बस पकड़ी। कंडक्टर से मैंने कई मर्तबा पूछा की क्या ये आईएसबीटी ही जाएगी जहाँ से अमृतसर के लिए बस मिलेगी ताकि दोबारा वही गलती ना हो।

हौले हौले रेंगते हुए बस बढ़ती रही कभी जाम में फसी कभी रास्ते में। जब भी कंडक्टर से पूछता आईएसबीटी बस अड्डा तो पहुंच जाएगी ना! तो वो सिर हिला कर आश्वस्त कर देते।

मगर जवाब संतोषजनक नहीं मिलता। मन में संशय है की ट्रेन की तरह ये आखिरी बस भी ना छूट जाए। क्या एक घंटे में पहुंचा जा सकता है?

सफ़र का पहला दिन ही इतना रोमांचक होगा इसका अंदाज़ा ना था मुझे। रेंगती हुई बस से डेढ़ घंटे में किसी तरह आईएसबीटी बस अड्डे पहुंचा। कंडक्टर ने इशारा करते हुए बताया कि अमृतसर को जाने वाली बस किधर खड़ी है।

बस न तो रुकी है अभी न उतरा हूँ अभी। बस रुकी और मैं उतरा तेज़ी। में अमृतसर को जाने वाली अंतिम बस मेरी आंखो के सामने से निकलने ही वाली है। इससे पहले बस ओझल हो मैं वजनी बैग लादे हुए भागा उस आखिरी बस की ओर दौड़ा, जितना तेज़ हो सका है उतना।

यहाँ मैं किसी फिल्म के क्लाइमैक्स की तरह बस के निकलने से पहले कंडक्टर से बस रुकवाते हुए चढ़ा। खचाखच भरी बस में सिर्फ पांव रखने की जगह है, बैठने की तो कहीं नहीं।

थकान के कारण मैं गियर बॉक्स के ऊपर ही बैठ गया। गरम तो है साथ ही ड्राइवर के निकट भी। जैसे ड्राइवर को पता हो, वो मुझसे पूछे कहाँ से आया हूँ मैं?

उनका इतना पूछना था और ये मेरे लिए एक संकेत की अभी इस तरह के तो अनेकों सवालों से जवाब देना होगा। इसकी आदत मुझे डाल लेनी चाहिए।

बस में कब झपकी लग गई पता ही नहीं चला। गनीमत है ट्रेन छूटने के बाद बस नहीं छूटी। वरना शायद बस अड्डे पर ही रात कटती।

रॉक गार्डन गुफा

3 Comments

  1. Akash Gulati says:

    Boht hi intersting way main likha hai

  2. Swati mishra says:

    Ye Wala kafi accha tha, last wale se better And you have a good sense of humor 😂☺️

  3. George says:

    Didn’t parents ever object to you going out alone on a vagabond trip like this. Abroad I understand but Indian parents are generally very possessive. I am surprised.

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