सफर के दौरान लौटाया खोया मोबाइल

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ब्रम्हमूर्त की बस

अलार्म बजा तो देखा चार बज रहे हैं। सारे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जो रात में सोने से पहले चार्जिंग पर लगाए थे वो अब फुल चार्ज हो गए हैं।

लंबे सफर में उपकरण चार्ज रहने बहुत जरूरी हैं अन्यथा बहुत तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। पांच बजे की बस पकड़ने के लिए तैयार होने लगा।

पेट साफ करने के बाद कमरे में बिखरा सारा सामान समेटने लग गया। नहाने धोने का समय तो नहीं है और ना ही वातावरण उस लायक है।

सुबह के समय बहुत ठंड हो रही है। तैयार होने से पहले वो मनाली वाली मोटी जैकेट निकाल ली। और ओढ़ ली। साढ़े चार बजे तक सब कुछ निपटा कर नीचे गेट की ओर जाने लगा तो ताला बंद पाया।

जीना इतना सकरा है कि बैग सहित पूरा घूम जाऊं तो जीने में ही मौत है जाए। किसी तरह खुद को मोड़कर बीच वाले माले के कमरे से मलिक के बेटे को ताला खोलने को बोला।

कमरे के दरवाज़े को मेरा खटकाना हुआ कि वो जाग उठा। और ताला खोलने के लिए चाबी ले कर आ गया। दस पांच मिनट तो यही निपट गए।

पहले चाभी मेन फिर हम अपने बड़े बड़े बैग के साथ। बाहर बिल्कुल सन्नाटा और अंधेरा पसरा हुआ है। पर बस अड्डा कुछ ही कदमों कि दूरी पर है।

बस स्टॉप

पैदल चलते हुए बस अड्डे पहुंचा तो यहाँ अच्छी खासी भीड़ देखने को मिल रही है। बस अड्डे पर एक के बजाय दो बसें दिख रही हैं।

आते ही कंडक्टर से एक टिकट वाली बात छेड़ी। दूसरे आदमी की कहीं ना कहीं व्यवस्था करने का हवाला देते हुए हमें बैठने का हुक्म दिया।

बैग डिक्की में रखवा बैठने से पहले थोड़ी चहल कदमी करने लगा। दूसरी बस के आगे फुर्तीले दद्दू से मुलाकात हुई। सुबह सवेरे उन्होंने अपने साथ ना चलने का दुखद समाचार सुनाया।

उनके सोनप्रयाग अचानक निरस्त करने के बारे में पूछा तो अपने साथी के मन ना लगने की बात करके कुछ असंतुष्ट दिखाई पड़े। पर जब उनको अकेले चलने को कहा तो भी वह कुछ बंधे से नजर आए।

“इससे बेहतर तो मैं अकेले ही आता तो ज्यादा बेहतर था।”

दद्दू के ना जाने का समाचार झकझोर देने वाला है। क्यूंकि अभी तक यमनोत्री से गंगोत्री तक दद्दू की फुर्ती मुझमें और उत्साह प्रकट करती है।

उनके इस कदर बीच में ही घर जाने के फैसले को स्वीकारना कठिन हो रहा था। पर फिर कभी आने की बात कह कर मुस्करा दिए।

हल्का उजाला होने के साथ मौसम भी हल्का हो चला है। दद्दू की बस पहले प्रस्थान कर गई। साढ़े पांच बजे तक रवाडी जिले के लिए हमारी बस भी चल पड़ी अपनी राह।

देखना ये है कि 222 किमी का ये सफर कितने समय में पूरा होगा।

मैं बस के केबिन में आ बैठा। अभी तक यमनोत्री और गंगोत्री के रास्ते लगभग एक ही जगह से होकर जाते रहे हैं।

रवानगी

अब केदारनाथ के लिए पहली दफा पूरब दिशा की ओर मुड़ी है।

अभी तक पड़ रही हल्की सर्दी गर्मी में तब्दील हो चुकी है। सड़क पर अभी गाडियां कम है। इतनी सुबह निकलने का कारण पूछा तो बताया कि आधा एक घंटे की देरी भी घंटो की देरी में बदल जाती है रात में।

हरी भरी पहाड़ियों पर से गुजरते हुए बहुत ही आनंद आ रहा है। सूरज भी अपने उफान पर धीरे धीरे परवान चढ़ रहा है।

शुरू में तो सड़क सही ही मिली पर अभी ऐसी उबड़ खाबड़ सड़क से गुजरना पड़ रहा है कि पूरे शरीर की अलग से मसाज हो रही है।

ऐसी घुमावदार पहाड़ी पर जिस संतुलन से गाड़ी को चला रहे हैं वो भी स्पीड को बरकरार रख कर वो काबिले तारीफ है।

मन्दाकिनी नदी

बताते हैं 2013 में बाढ़ सिर्फ केदारनाथ में ही नहीं बल्कि चारो धामों में आईं थी। बकौल ड्राइवर यहाँ पर ड्यूटी पर तैनात एक एसडीएम दुबारा आईं बाढ़ की चपेट में बह गया था।

जिनकी सरकार ने बहुत खोज की। उनके लिए अलग से सर्च ऑपरेशन चलाए गए पर वो ना मिले।

छोटे मोटे मंदिर घर तो ऐसे ही बह गए थे। जो नदी किनारे थे उनके समय रहते खाली करवा लिया गया था। जान और माल दोनों का भारी नुक़सान हुआ था।

कान तो मेरे तब खड़े हो गए जब ड्राइवर साहब ने बताया उत्तरकाशी का एसडीएम बह गया। एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी में भी कुदरत के केहर ने भेदभाव नहीं किया।

जाम

काफी लंबा सफर बिना रुके तय करने के बाद अब जा के कहीं दो घंटा बीत गया है।

जाम से अभी तक तो रूबरू नहीं हुआ हूँ पर अब करना पड़ रहा है। एक पहाड़ी पर बस आ रूकी। एक के बाद एक सब गाडियां एक के पीछे एक खड़ी हो गई जिसके कारण भारी भरकम जाम लग गया है।

आगे खड़ी गाड़ियों के ड्राइवर से खबर मिली कि किसी गाड़ी का पहिया रोड के हवा वाले हिस्से में लटक गया है।

एक ट्रक वाला ओवरटेक करने के चक्कर में, वो ट्रक आगे की ओर फिसला। ऐसा करते ही पिछले हिस्से का दायां टायर हवा में लटक गया। उस ट्रक को निकलने में वक़्त लगेगा।

कुल मिला कर गाड़ी नीचे भी लुढ़क सकती है। इस स्तिथि से बचाने के लिए बचाव कार्य चल रहा है। बस से सवारियां एक एक कर उतरने लगीं।

शायद ही कोई बस में बचा होगा। कैमरा बड़े वाले बैग में है जो बस की छत पर रखा हुआ है। यही मौका है कैमरा हाँथ में लेने का।

जब तक नहीं निकलेगा तब तक के लिए सभी यात्री अपनी अपनी गाड़ियों से बाहर निकल आए हैं और आस पास घूमने फिरने या बतियाते हुए समय व्यतीत कर रहे हैं।

बस से उतरकर सीधा छत पर चढ़ गया। बैग से कैमरा निकाला और छत से ही सड़क पर छलांग लगा दी। फैंटम बनने के चक्कर में अगल बगल खड़े बड़े बूढ़े गुस्साए।

शायद उनके अपने उम्र के तजुर्बे के लिहाज से उनका कहना भी सही है। पर मेरा शरीर इस समय एकदम चुस्त दुरुस्त मुद्रा में है।

खोया मोबाइल वापस लौटाया

यहाँ पर सड़क किनारे नीचे की ओर फलदार पेड़ लगा है। जितनी भी गाडियां रूकी हुई हैं लगभग सब की सवारियां फल के लालच में नीचे की ओर चली गई हैं।

जाम में फंसे होने के कारण सड़क किनारे वक़्त बिताते लेखक

काफी नीचे से नदी के बेहने की आवाज़ भी साफ सुनी जा सकती है। मैं सड़क किनारे बैठ कर ये नजारा देख रहा हूँ।

जाने कब बस प्रस्थान करेगी। इसी के चलते मैं भी नीचे उतरने लगा। जमीन पर पड़े फल अबतक लोग ले जा चुके हैं भर भर के।

जाने क्यों घाटी से अजीब सी चिड़िया जैसी आवाज़ आ रही है। मैं थोड़ा ऊपर हूँ। साथी घुमक्कड़ काफी नीचे पहुंच गया है। उसे और नीचे जाने का इशारा किया।

साथी घुमक्कड़ नीचे और नीचे चलता चला गया। की एक समय के लिए नजरों से ओझल भी हो गया। वहीं से चिल्लाते हुए बोला “अबे यहाँ मोबाइल पड़ा मिला है”

जाहिर है जानवर तो इस्तेमाल करेंगे नहीं। कोई ना कोई आया ही होगा इतना नीचे की उसका मोबाइल रह गया। या फिर किसी गांव वाले का होगा।

रोड पर सफेद शर्ट में एक आदमी कान पर फोन लगाए घूमता हुआ दिखा जो थोड़ा विचलित भी दिखा। समझने में ये देर ना लगी कि हो ना हो इन्हीं महाशय का मोबाइल गिरा हुआ है।

पसीने से लथपथ किसी दूसरे आदमी के साथ खोज बीन कर रहे हैं। अब ये पूरी तरह से तय हो चुका है यही अपने फोन पर घंटी बजवा रहे हो। की अगर आसपास पड़ा हो तो हाँथ लग जाए।

उधर लगातार फोन कि घंटी बज रही है। शायद साथी घुमक्कड़ को वो सफ़ेद शर्ट में खड़े महाशय नहीं दिख रहे हैं। मैं इधर से चिल्लाता हुआ बोल रहा हूँ कि शायद इन्हीं का मोबाइल है।

तभी ये इतने हैरान परेशान और कान पर फोन लगा कर अपने फोन को ढूंढने का प्रयास कर रहे हैं।

ये महाशय भी लगातार नीचे की तरफ देखते हुए आगे बढ़ते रहे हैं। उधर हल्ला मच गया कि जाम खुल गया है। साथी घुमक्कड़ नीचे से मोबाइल लेता हुआ आया और उनको पकड़ा दिया।

उनके चहरे पर सुकून भरी एक लालिमा देखने को मिली। जिसे देख मुझे आती प्रसन्नता हो रही है। मैंने उनको मोबाइल थमाया और उन्होंने मुझे अपना विजिटिंग कार्ड।

हड़बड़ी में हाल चाल पूछे और हैदराबाद आने का न्योता दे डाला। जब वो जाने लगे तो एक बात पर मैं सिर खुजता रह गया। की हैदराबाद का रहने वाला शख्स इतनी शुद्ध हिंदी कैसे बोल सकता है?

खैर जो भी हो किसी का नुकसान होने से तो बच गया। इधर कंडक्टर हड़बड़ाहट में सबको गाड़ी ने बैठाल रहा है। शायद उसे इतनी भी समझ नहीं आ रही की यहाँ किसी की जान अटकी थी।

कंडक्टर अपना भला तलाशते हुए काम कर रहा है ताकि वो वजह ना बने पीछे खड़ी गाड़ियों के लिए जाम का। धड़ाधड़ गाडियां स्टार्ट हो कर चल पड़ी एक के पीछे एक।

सुबह सवेरे शुभ काम से मन प्रसन्न हो गया। चल पड़ी घने जंगल और जाम से पार पाते हुए। हो सकता है अंकल ने ऊपर की जेब मे मोबाइल रखा है और झुकते समय शर्ट की जेब से लुढ़क गया हो।

लौटते हुए लेखक

राहत

बैठने की जगह तो मिल गई है। रात की थकान के बाद हल्की नींद मार लूं तो बेहतर रहेगा। क्या पता सोनप्रयाग कब तक पहुंच पाऊं।

केबिन के बाहर एक भी सीट खाली नहीं है। अन्दर सो नहीं सकता वरना ड्राइवर सो जाएगा तो सबके सोने के आसार ज्यादा हैं।

बेहतर है जगता ही रहूँ। गर्मी इस कदर है जिसका कोई हिसाब नहीं है। सड़को पर और भी जीप और बसें देखने को मिल रही है।

जो केदार की ओर रुखसत हो रहे हैं। जाने वालों की संख्या आने वालो की संख्या से कहीं ज्यादा है। इस कदर भक्तों की भीड़ देखने लायक है।

दिन के बारह बज रहे हैं। बस ने आखिरकार पहला हाल्ट लिया। पता नहीं चल पा रहा है हाल्ट लिया है या खराबी आई है बस में।

बस से कुछ ही यात्री उतरे हैं। कोने में दिख रहे एक मात्र रेस्त्रां में सबने कुछ ना कुछ ऑर्डर कर दिया। किनारे लगे हैंडपंप में हाँथ साफ करने के लिए भीड़ जमा हो गई है।

मैले कुचैले हाँथों को साफ करके आ गया रेस्त्रां में। एक आलू पराठा ऑर्डर दे दिया। अगल बगल में बैठे मुसाफिरों ने भी समोसा खस्ता मंगाया।

पर बहुत इंतजार करने के बाद एक प्लेट पराठा आया। जबतक पराठा खतम होता तब तक बस का हॉर्न बज उठा। लगता है खराब बस ठीक हो गई है।

भुगतान करने के लिए पैसे निकाले तो महाशय के पास पर्याप्त टूटे पैसे ही नहीं मिले। आधा पराठा हाँथ में ले कर मजबूरन भागना पड़ रहा है।

अगले स्टॉप पर उतरने के लिए खड़ी महिला

हर बार की तरह इस बार भी बस की आखिरी सवारी बन कर चढ़ रहा हूँ।

कुछ किमी पहले ही से बस से सवारियों के उतरने का सिलसिला शुरू हो चुका है। अब ज्यादा सवारियां नहीं है बस में। आगे वाली सीट से उठ कर सबसे पीछे आ बैठ गया।

रावाड़ी

करीब दो घंटे के सफर के बाद बस आ पहुंची रावाड़ी। साढ़े नौ घंटे के सफर में हालत पस्त हो गई है बैठे बैठे। और बस की सवरियां भी उब गई थी इस सफर में।

धूल मिट्टी से अब तक सन चुका हूँ। सबसे आखिर में मैं ही उतर रहा हूँ। अगल बगल फल से सजे ठेले पांव रखते ही मुझे फल बेचने की होड़ लग गई।

ठेले वालों से मालूम पड़ा कि सोनप्रयाग तक पहुंचने के लिए पहले रुद्रप्रयाग तक पहुंचना होगा।

सो चौराहे पर खड़े हो कर रुद्रप्रयाग के लिए वाहन का इंतजार करने लगा। इससे पहले वाहन पकड़ता साथी घुमक्कड़ को याद आया कि उसकी गरम जैकेट जो मनाली से कि थी वो बस में ही रह गई है।

भागा भागा वापस अन्दर मार्केट वाली रोड पर आया। बस तो कहीं भी नजर नहीं आ रही। उनमें से ठेला लगाए एक सज्जन से जब बस अड्डा पूछा तो आसमान की तरफ उंगली उठा कर सामने वाली दिशा में जाने को कहा।

सामने खड़ी बस की तरफ पहुंच पर वो बस ना थी। अन्दर बने मैदान में जाना हुआ ही की कंडक्टर साहब दिख गए। अपनी बस की तरफ इशारा भर करना था कि साथी घुमक्कड़ भाग कर बस के अंदर से अपनी जैकेट निकाल लाया।

जो उसी हालत में मिली पर थोड़ी मैली हो गई है। ढाई बज चुके है। समय कितनी तेज़ी से बीत रहा है पता ही नहीं चल रहा। चौराहे पर वापस आना हुआ और कुछ देर के इंतजार में बस का मिलना हुआ।

अगर देवभूमि में ये प्राइवेट बसें और जीप ना हो तो ना जाने जानता का क्या हाल हो जाए। सिर्फ सरकारी बसों के भरोसे तो हिला भी ना जाए।

रवाडी से रुद्रप्रयाग तक का टिकट काटने के लिए पधार गए कंडक्टर साहब। कुछ एक आदमी का ₹20 लगा और चल पड़े।

कितने समय लगेगा पहुंचने पर आसमान की तरफ उंगली दिखा कर बताने की कोशिश कर रहे हैं शायद एक घंटा।

शहर में गाडियां बहुत हैं। देवभूमि उत्तराखंड पूरी तरह से पर्यटकों और यात्रियों पर निर्भर करता है। अगर इनमे कमी आई तो शायद इस प्रदेश की अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर पड़े।

और भीड़ ज्यादा हो गई तो घाटी पर। सवारियों का चढ़ने का सिलसिला लगातार चालू है।

रुद्रप्रयाग

ठीक चार बज रहे है और बस आ पहुंची है समाज कल्याण विभाग रुद्रप्रयाग।

90 कम दूर केदारनाथ :फोटो श्रेय अभिनव शाह

कंडक्टर साहब ने सभी सवारियों को यहीं पर उतार दिया और आगे पेड़ के पास से बस वापस घुमा कर निकल लिए। जाते जाते ये भी बता गए की सोनप्रयाग के लिए यहीं से जीप मिलेगी।

यहाँ पर कहाँ से मिलेगी ये कौन बताएगा? ये पूछने के लिए मुझे दुकानदारों का सहारा लेना पड़ेगा। पूछने पर पता चला जीप सोनप्रयाग तो नहीं गुप्तकाशी तक जाती है वो भी बुकिंग में।

पूछ कर वापस आ गया पीपल के पेड़ के पास टैक्सी के लिए। पास खड़े एक टैक्सी वाले से पूछा तो ये महाशय दो लोगों का इतना पैसा वसूल कर रहे हैं कि इतने में तो एक आदमी दिल्ली पहुंच जाए।

पास में खड़ा एक पांच लोगों के दल को भी सोनप्रयाग जाना है। इनमे सलाह मशवरा किया तो ये सहमति बन गई की गुप्तकाशी तक के लिए एक जीप बुक कर लेते हैं।

बात करने लगा दूसरी जीप वाले से जो सही मूल्य पर राजी हो गया। इन चार लड़की के साथ एक बुज़ुर्ग व्यक्ति भी मौजूद हैं। अपना अपना सामान लाद कर सब चढ़ गए जीप में।

सामान इतना ज्यादा है कि जीप का पिछले हिस्से का दरवाज़ा ही अटकने लगा। आगे पीछे करके थोड़ा दबा कर बंद करने पर ही दरवाज़ा बंद हुआ।

गाड़ी चल पड़ी बाज़ार के रास्ते सकरी रोड पर। जाम इस कदर लगा हुआ है कि उम्मीद कम नज़र आ रही है खुलने की। आधे घंटे की मशक्कत के बाद आखिरकार जाम से पिंड छूटा।

बगल मे बह रही मंदाकिनी के समांतर जाती सड़क पर धड़ल्ले से गाडियां दौड़ रही है। इनमे से अधिकतर जीप ही हैं। या फिर प्राइवेट बस। लाखों की तादाद में भीड़ सोनप्रयाग पहुंच रही है।

पर सोनप्रयाग को जाने वाले इस रास्ते पर इतनी धूल धक्कड़ है जिसका कोई हिसाब नहीं। शीशे खुले रह जाने के कारण थोड़ी धूल अन्दर भर आई है।

ड्राइवर ने बताया कि ये सब नया रास्ता बनने की वजह से ऐसा धुआंधार माहौल है। जिसे बनने में अभी कुछ महीनों का वक्त लगेगा।

कुछ डेढ़ घंटा गाड़ी चलने के बाद जीप आ रूकी। सबने मौका देख अपनी अपनी टंकी खाली करने का मौका तलाशा। उसमे ड्राइवर साहब भी शामिल हैं। ये उन्हीं का प्लान है।

निर्माण के किनारे पानी की बड़ी टंकियों के बीच मूह धोने पर आधा किलो मिट्टी निकली। रास्ते में अभी और चिपकेगी। मुश्किल से दस मिनट का ये स्टॉप बड़ा कारगर साबित हुआ।

अब समझ आ गया है धूल वाले इस रास्ते पर गाड़ी के हर कोने को दबा कर बंद रखना है। चल पड़ी एक दफा फिर धूमिल सड़क पर।

गुप्तकाशी

गुप्तकाशी :फोटो श्रेय अभिनव शाह

महज़ आधे घंटे में हम आखिकार आ पहुंचे गुप्तकाशी। पैसे पकड़ाए और इन महाशय ने तो गाड़ी ही किनारे खड़ी कर दी। लगा कुछ देर में किसी दूजि बस या जीप से जा सकते हैं।

काफी देर इंतजार के बाद भी जब कुछ ना मिलता दिखा तो पास में खड़ी टैक्सी वालों से कुछ सवाल किए। जिनमे से कुछ ने बोला बसें आती जाती रहती हैं और कुछ ने हाँथ खड़े कर दिए।

उम्मीद डोलती दिख रही है। सड़क पार बनी दुकान से कुछ नमकीन स्वाद खातिर ले आया। साथ मे खड़े हैं हरयाणवी बालक जो जीप से यहाँ तक साथ आए हैं।

दूर से आती बस कुछ उम्मीद ले कर आ रही है। तकरीबन आधे घंटे खड़े रहने के बाद अब जा कर कोई साधन मिला है। पहले से भरी बस में कदम रखा और बैठने को भी मिल गया।

अपने बड़े बड़े बैग पीछे तान दिए। नाम मात्र के लिए बस रूकी और चल पड़ी खचाखच भरे रास्तों पर।

घुमावदार पहाड़ और मंदाकिनी के समांतर बस जैसे जैसे आगे बढ़ रही है वैसे वैसे भीड़ से सामना हो रहा है।

रात के अंधेरे में बाहर वाहन कि टिमटिमाती बत्ती के सिवाय कुछ भी नजर नहीं आ रहा। लोगों की भीड़ से अंदाज़ा लगाया जा सकता है की हुजूम किस कदर है।

पहाड़ी के रास्ते में ऊपर नीचे हर तरफ सिर्फ जाम का माहौल नजर आ रहा है। चारो तरफ हॉर्न बजने के कारण सिर में दर्द चालू हो गया है।

और सामने से पड़ रही ज्यादा बीम वाली लाइट आंखो मे पड़ने के कारण कुछ ठीक से दिखाई ना पड़ रहा है। पता नहीं किस नरक में आ गया हूँ।

रेंगते रेंगते गाडियां आगे बढ़ रही हैं। जिसे देख कर लगा रहा है बैग लेकर खुद ही निकल जाऊं। सामने होटल दिख तो रहा है। मगर ये नहीं पता है किस जगह पर खड़ा हूँ।

सोनप्रयाग में गाडा तंबू

घंटा भर जाम में बिताने के बाद और सफर के दो घंटे बीत जाने के बाद सोनप्रयाग आना हुआ। सोनप्रयाग में कारों और जीप के झुंड को देख ऐसा लग रहा है कि किसी जिले में आ गया हूँ।

भीषण जाम के कारण बैग लेके पहले ही उतरना पड़ रहा है। अगर बस अड्डे तक आने का इंतजार करता तो शायद दस बज जाते।

सोनप्रयाग में इस कदर भीड़ की उम्मीद ना थी मुझे। लाखों की संख्या में यहाँ पर लोग नजर आ रहे हैं। हर तरफ भीड़ ही भीड़। इस जन सैलाब में मैं भी खोने वाला हूँ।

भीड़ इस कदर है की अगर इस जगह मैं खड़ा हो जाऊं तो लोगों के धक्के देने से बहुत आगे निकल सकता हूँ।

आज रात का ठीकाना ढूंढते हुए एक होटल में आया। जहाँ कमरा खाली ही नहीं मिला। दूसरे होटल का भी यही हाल है और तीसरे का भी।

कुल मिलाकर एक बात समझ आ रही है वो ये की यहाँ पहले से ही बुकिंग करवा कर आने का फायदा है। अन्यथा भटको इस भीड़ में।

खाने के दाम भी आसमान छू रहे हैं। चारों तरफ लूट मची हुई है। ट्रैवल कम्युनिटी काउचसुर्फिंग में भी रुकने की दरख्वास्त की थी जो व्यर्थ ही गई।

एक दो आश्रम ने भी पता किया पर कहीं कोई ठिकाना नहीं मिल रहा। सारा खाका छान मारा पर कहीं जगह नहीं मिली।

अब दिमाग में खुजली हो रही है कि कहीं खाली जगह मिल जाए तो वहीं तंबू गाड दिया जाएगा। पर पहले पेट पूजा।

आसपास सभी रेस्त्रां में भीड़ है पर इंसानियत कहीं नज़र नहीं आ रही। सब पैसे कमाने में लगे हैं। एक रेस्त्रां ने पूरा परिवार ही जुटा हुआ है खाना बनाने में।

रेट पता किया तो वाजिब लगा। बैग लेके आ गया इसी रेस्त्रां में। एक प्लेट खाना लिया जो कुछ ही देर में आ गई।

राजमा, सब्जी रोटी खा कर सारी थकान मिट गई। भुगतान करके बाहर निकल आया। वक्त साढ़े दस हो चला है। अब बारी है खाली जगह ढूंढने की।

सोनप्रयाग के बाज़ार के पिछले हिस्से में खाली जगह पड़ी मिली। यहाँ एक टेंट पहले से लगा हुआ है। और पिछले हिस्से में दुकानें बनी हुई हैं।

आज शायद यहीं ठिकाना मिलेगा।

उत्तरकाशी से सोनप्रयाग 275km

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