शिमला, स्टोरीज ऑफ इंडिया, हिमाचल प्रदेश
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क्यों ना जाएं शिमला!

रामपुर रोड

सुबह आंख खुली तो देखा अगल बगल की सवारियां जैसे कि तैसे सो रही हैं। कुछ बदला है तो पिछली सीट का नजारा। जहां अब कोई नहीं है।

ड्राइवर साहब और कंडक्टर बाबू तो बस से ही नदारद हैं। उन्होंने पक्का अपनी व्यवस्था ढाबे के किसी कोने में तलाश कि होगी। वैसे भी ढाबा है ही इतना बड़ा।

बगल मे सो रहे अजय को उठाया। सुबह के छह बज रहे है। अभी बस की क्या स्तिथि है ये तो ड्राइवर साहब ही बता सकते हैं।

बस से उतर कर नीचे आया तो पाया ड्राइवर और कंडक्टर कुल्ला मंजन करने में व्यस्त हैं। सात बजे तक यहाँ से निकलने का समय बताया।

अभी काफी समय है प्रस्थान करने में। ढाबे के पिछले बने सौंचालय का सही सदुपयोग हो रहा है। पूछने पर कंडक्टर साहब ने वहीं जाने का इशारा किया।

बस में कुल मिलाकर 4-6 ही सवारियां रह गई हैं। जो मेरी तरह इसी ज़िद्द में रह गई की जाना है तो इसी बस से। सुबह की नित्य कर्म के बाद ढाबे में ही चाय पराठे का ऑर्डर थमा दिया।

उधर ड्राइवर और कंडक्टर भी इत्मीनान से नाश्ता करते दिख रहे हैं। सात तो अभी ही बज गए हैं। इधर अजय भी आ गया और नाश्ता भी।

ड्राइवर साहब मानो नाश्ता करने के बाद हमारा ही इंतजार कर रहे हों। ऐसा लग रहा है किसी बारात में आया था अब विदाई का समय हो चला है।

माहौल भी कुछ वैसा ही है बस कम हैं तो बाराती (सवारियां)। बाकी सवारियां जाने क्यों अन्दर से बाहर ही नहीं निकलीं। बस बात ये नहीं हज़म हो रही है कि ऐसा रातों रात क्या हो गया बस में जो सुबह ठीक हो चुकी है।

शिमला कूच

नाश्ता पानी के बाद बस के हॉर्न बजते ही निकल भागा ढाबे से बस की ओर। कुछ आगे बढ़ चली है बस लगता है ले जाने की फिराक में नहीं है।

अब योजना पूरी तरह से बदलनी होगी। जहां आज सुबह देहरादून पहुंचना था अब शिमला पहुंच रहा हूँ। उधर देहरादून में फोन करके मामी जी को इक्ताला कर दिया कि रात तक या कल सुबह ही आ पाऊंगा।

उनकी हामी भरने का मतलब है जब मन हो तब आओ देहरादून के द्वार खुले हैं। पहले योजना नहीं थी शिमला घूमने की पर अब समय की नज़ाकत को देखते हुए शिमला घूम कर ही देहरादून निकलना समझदारी भरा होगा।

धड़धड़ाते हुए बस आधा रास्ता तय कर चुकी है। गूगल नक्शे पर बराबर रास्ता नाप रहा हूँ मैं। पहाड़ों में होने के बावजूद भयंकर गर्मी लग रही है।

जब साल 2016 में आया था तब हालत फिर भी बेहतर थे। अब तो जगह जगह कूड़ा जलता भी दिखाई पड़ रहा है। पहाड़ों का कोई ऐसा कोना शायद ही बचा हो जहां मानव ना बसा हो।

काफी दिल दहला देने वाली घटना से आज रूबरू हुआ। पहाड़ों पर कूड़ा जलता देख मेरी तो रूह कांप गई। कहाँ एक वक्त था गर्मियों में भी कड़ाके की सर्द हवाएं चलती थी।

पिछले बीस सालों में माहौल जैसे पूरा पलट गया हो। नौ बजने को आए हैं और मैं शिमला की सड़कों पर दखल दे चुका हूँ। भीड़ भाड़ हो जाम के बीच के बस गुजर रही है साथ है बद्दर गर्मी का भी सामना करना पड़ रहा है।

रास्ते में ये बस किसी के लिए भी नहीं रूकी जाने क्यों। बिना किसी अतिरिक्त सवारी को लिए आगे बढ़ती चली आई। जाम से जूझते हुए कुछ ही क्षणों में बस अड्डे पर आ धमकी।

बस अड्डा कम हवाई अड्डा ज्यादा दिखाई पड़ रहा है। ऊपर नीचे हर तरफ बस आती जाती दिखी रही हैं। पहले माले पर भी वही हाल है और दूसरे पर भी।

बस में कुल गिने चुने यात्री हैं जो ऊपर माले पर बस के पहुंचते ही उतरने लगे। मैं भी गाने सुनते हुए उतरा। व्यवस्था देखनी है तो देहरादून पहुंचने की।

इंटर स्टेट बस टर्मिनस

पूछताछ खिड़की तक भी पहुचने के लिए पूछताछ करनी पड़ रही है। दस लोगों से पूछने के बाद अब जा कर एक कर्मचारी ने बताया एंट्री गेट के पास ही है।

दनदनाते हुए खिड़की पर पहुंचा तो यहाँ स्पीकर के पीछे से महिला कर्मचारी ने बताया कि देहरादून के लिए कोई भी बस फिलहाल दिन में नहीं है।

रात का ही इंतजार करना पड़ेगा। और उन्होंने हिमाचल प्रदेश की रोडवेज वेबसाइट पर टिकट बुक कर लेने का आग्रह किया। टिकट तो बुक हो जाएगा उससे पहले नित्य क्रिया कर लिया जाए तो बेहतर।

जहां बैग रखा है उसी के ठीक विपरीत बने बेहद स्वच्छ सौंचालाय में सुबह का काम निपटाया। जब दिन कि बस नहीं है तो बेहतर रहेगा दिन में शिमला की सैर हो जाए और रात से पहले निकल लिया जाए।

इसी मंशा से अमानती घर तलाशने लगा। जो बहुत ढूड़ने के बाद पहले माले पर बंद पड़ी दुकानों के पीछे लगा मिला। बैग तो इत्मीनान से जमा हो गया पर दिन में चार घंटे अमानती घर बंद होने की बात कही।

अपने को तो शाम को आना है दिन में तो भटकना रहेगा। मौके से दोनों बैग जमा करने के बाद बद्दर गर्मी में निकल पड़ा कुफरी टॉप।

बस अड्डे के बाहर से ही कुफरी टॉप तक के लिए बस मिल गई। जो शिमला का काफी मशहूर स्थल है। बस में हिमाचली लोकगीत सुन अलग ही दुनिया में आ गया हूँ।

भीड़ इतनी की लोग एक दूसरे के ऊपर खड़े होने को आमादा है। ड्राइवर साहब ऐसी खतरनाक गाड़ी चला रहे हैं मानो अभी बस ऊपर जाने के बजाय नीचे जाएगी।

इसकी घोर निंदा होने लगी है बस के अंदर जैसे हमारे राजनेता करते हुए पाए जाते हैं किसी दुर्घटना के बाद। खैर हिलते डुलते कुफरी टॉप के सबसे निकटतम बस अड्डे पर उतार, बस आगे बढ़ चली।

अब यहाँ से थोड़ा असमंजस में हूँ कि किस दिशा में आगे बढ़ा जाएं। आगे दिख रही ओमनी गाड़ी में कुछ नौजवान बैठे हैं। इनसे पूछना बेहतर रहेगा।

पूछने पर पता चला कुफरी टॉप के लिए तो पीछे के मार्ग से जाना पड़ेगा। सो कदम वापस खींच एक कच्चे रास्ते से चलना शुरू किया।

एप्पल टॉप के लिए चढ़ाई

ये रास्ता अपनी हालत बयां कर रहा है। शायद किसी समय इस रास्ते का भरपूर प्रयोग हुआ करता था। अब सब बंद पड़ा है। चढ़ाई चढ़ते चढ़ते सांस फूलने लगी है।

पर अगर पहाड़ी चढ़ते समय एक बार रुक जाऊं तो बार बार रुकने का जी करता है। इससे बेहतर है धीरे धीरे ही सही पर रुकना नहीं है।

इसी सोच के साथ अपना छोटा बैग लिए ऊपर चढ़ता जा रहा हूँ। पसीने से हालत बुरी हो चुकी है मेरी। उधर पीछे से एक पहाड़ी बच्चा दनदनाते हुए ऊपर तक चड़ता चला गया।

जब और भी लोग साथ ने चढ़ते हैं तो एक दूसरे को पीछे छोड़ते का जज्बा भी आने लगता है मन ही मन। पीछे मुड़ कर देखा तो कुछ इसी प्रकार दो युवक और चढ़ते हुए दिखाई दे रहे हैं।

बस मन में ठान लिया इनको खुद से आगे नहीं निकालने देना है। और इसी जज्बे के साथ और रफ्तार के साथ फर्राटे से कुछ ही मिनटों में ऊपर आ पहुंचा।

ऊपर पहुंचते ही मेरा स्वागत हुआ घोड़े के अस्तबल में। जहां घोड़ों का रखरखाव करा जा रहा है। जो जरूरी भी है। इंसान हो या जानवर पर्याप्त विश्राम तो सभी को मिलना ही चाहिए।

और आगे बढ़ता की देखा एक किनारे बारी बारी से घोड़ों पर इंसान लद लद के और आगे भेजे जा रहे है। मालूम पड़ा अभी कुफरी टॉप चार किमी आगे है।

सोचने लगा क्यों बेचारे इन घोड़ों को कस्ट दिया जाए। बेहतर यही है की ग्यारह नंबर की बस पकड़ कर निकल लिया जाए ऊपर।

उधर एक दुकान से कुछ लोग टोकन बनवा कर बारी बारी से अपनी घुड़सवारी का इंतजार कर रहे हैं। एक तरह घोड़े का मलिक अपना घोड़ा संभाले खड़ा है दूसरी तरफ से सवारी के पैर में पट्टा फंसा कर उसे बैठाने की कोशिश कर रहा है।

कुफरी टॉप पर जाने के लिए एकमात्र रास्ते पर ऐसी भीड़ लगी है जिसका कोई हिसाब नहीं। घोड़े के गोबर की दुर्गन्ध और ऊपर से इंसान घोड़े सब आगे पीछे ही खड़े हैं।

मेरे आगे चल रही महिला ने भूत का अवतार धारण कर लिया है। खुद को सफेद कपड़े से ढक कर बंद कर लिया है। हल्की फुल्की चहेलकदमी से भीड़ आगे खिसक रही है और साथ में मैं भी।

खुद को कोस भी रहा हूँ कि क्यों आया हूँ यहाँ दोबारा जब एक दफा सन २०१6 में आ चुका हूँ तो। पर साथी घुमक्कड़ तो नहीं आया हैना शिमला शायद इसीलिए।

घोड़ों से घेराव को पार करते हुए लगभग आधा किमी तो सांस लेना दूभर हो गया है। इतनी लीद इस रास्ते पर। हालत और भी बदतर हो चले हैं और भी सालों में।

लगातार बढ़ रही तादाद से शिमला के ऊपर काफी अधिक मात्रा मे दबाव भी पड़ रहा है। अंग्रेजो के जमाने को बसा ये शहर अब बूढ़ा हो चला है।

रास्ता कच्चा ही है। कच्चे रास्ते पर घोड़ों के चलने के कारण धूल के गुबार से सांस लेना दूभर हो गया है। उधर सामने सभी खाली घोड़े दौड़ते हुए ऐसे चले आ रहे है जैसे कोई जंग का मैदान।

शुक्र है थोड़ा कच्चा रास्ता बगल में भी है। जहां से मेरे जैसे और भी पैदल यात्री चल रहे हैं। पर सबसे घिनौनी हरकत ये देखने को मिल रही है वो है जगह जगह कचरे का ढेर।

कुफ्री टॉप के रस्ते जमा कचरे का ढेर

ये दृश्य देख मेरा ह्रदय विचलित हो उठा है। जाने कब हम अपनी इन बीच प्रवत्ति वाली हरकतें करना छोड़ेंगे। यहाँ इतना कचरा जमा है जिसको अगर साफ भी कर जाए तो महीनों लग जाएं।

पहाड़ी पर जितने नीचे तक नजर जा रही है वहां तक पन्नी, प्लास्टिक, बोतल का ढेर दिखाई पड़ रहा है। पता नहीं जानता के साथ साथ सरकार क्यों सोती है।

ऐसे पहाड़ों पर पन्नी, प्लास्टिक की बोतलों को बैन कर देना चाहिए। ताकि पर्यावरण के साथ कोई खिलवाड़ ना कर सके। धूल के गुब्बार में सांस लेना भी कठिन है।

ऊपर से ये घोड़े के मालिक अपनी मन मर्ज़ी चलाते हुए दिख रहे हैं। कोई इतना तेज़ घोड़ा दौड़ा रहा है जिससे सवारी बेचैन होती दिख रही है। कोई अपने परिवार से ही बिछुड़ गया है।

बतमीज़ मालिकों की बहस भी होती सुनाई से रही है सवारियों के साथ। ऊपर पहुंचते हुए एक दो बार तो एक संकरे रास्ते से गिरते भी बचा मैं।

कुफरी टॉप

थकान और प्यास के साथ पहुंचा कुफरी। जो घोड़ों पर सवार होकर आए हैं उनसे अलग से एंट्री फीस ले रहे हैं। ये कैसा नियम है?

देखते ही मैं किनारे किनारे ही कुफरी टॉप में प्रवेश कर गया। नज़ारा बेहद ही वाहियात है। इतनी भीड़। ऊपर से जगह जगह दुकानें इसको और बद्दा बना रही हैं।

मैं अजय से यही बोल रहा हूँ यहाँ कभी दोबारा ना आऊं। जी तो चाह रहा है भाग जाऊं यहाँ से। पर और आगे देखने के लिए कदम आगे बढ ही गए।

देखूं तो सही क्या क्या परिवर्तन आए हैं पिछले चार साल में। भीड़ दोगुनी, गंदगी चौगुनी ही दिख रही है बस। बंदर और मानव जा बेजोड़ दिखाई पड़ रहा है।

एक तरफ खड़े याक के साथ सैलानी अजीबो गरीब पोषक में तस्वीरें निकलवा रहे हैं। दूसरी ओर तिरपाल से ढके बाज़ार के भीतर कपड़ों की धड़ल्ले से बिक्री चालू है।

अगर किसी व्यक्ति जन्मों का भूंखा है तो यहाँ वो अपनी भूंख़ मिटा सकता है। घर की साजो सज्जा का समान लेना है तो वो भी महंगे दाम में उपलब्ध है।

हर तरफ बस लूट। यहाँ दुकानदारों को सैलानी के रूप में पैसा नजर आता है। खुला पानी भी बिकाऊ है। जितना नोच सको नोच लो।

उधर मेरे बाएं हाँथ पर भारी मात्रा में भीड़ मौजूद है। मानो लग रहा हो कोई बखेड़ा खड़ा हो गया हो। हाँथ में पानी की बोतल लिए पहुंचा यहाँ तो अलग ही नमूना भरा नज़ारा सामने देखने में आया।

एक दूरबीन से चीन का बॉर्डर दिखाने का दावा ठोंक रहे हैं। ये नमूना पिछली बार भी देखने में आया था। तो किसी को देहरादून दिखाने का दावा कर रहे हैं।

ना तो मैं पिछली बार गया था देखने ना अभी जाने वाला हूँ। क्यूंकि दूरबीन से वो क्या दिखाते है देखने वाले तो पागल ही बने हैं।

मजेदार बात ये है अगर आपको चीन का बॉर्डर देखना है तो ज्यादा कीमत चुकानी पड़ेगी। नजदीक शहर के लिए मामूली रकम।

इधर आगे गार्डन में अब जाली लगा दी गई है जो पहले नहीं हुआ करती थी। दाईं तरफ दिख रहे मंदिर में पिछली बार भी गया था और अब उसी दिशा में प्रस्थान कर रहा हूँ।

वैसे मैंने कहीं पढ़ा था कि शिमला में दुनिया का सबसे ठंड में उत्सव मनाया जाता है। जिसमे अलग अलग तरह की गतिविधियां और प्रतियोगिताओं का आयोजन होता है। और ये अपने आप में एकमात्र है।

अब गर्मियों में तो आने लायक बचा नहीं है शिमला सो कभी ठंड में ही सही। पर ऐसा ना हो कि ठंड में भी गर्मी पड़ने लगे। शायद तब तक धरती का विनाश हो जाएगा।

पैदल ही एक पठार से दूसरे पठार पर आ गया। जूते रखने की व्यवस्था भी है। बाकायदा टोकन मिल रहा है। जूते एक कमरे में उतर कर टोकन ले मंदिर में प्रवेश किया।

मंदिर अभी अधूरा निर्मित है। इसे बनने में काफी समय लगेगा। पिछली बार सिर्फ एक पत्थर ही रखा था। अब कुछ और मूर्तियां भी हैं और सुसज्जित भी है।

पास में बनी एक मजार के आसपास भीड़ है। और बाहर की जाली पर सैकड़ों मन्नत के धागे बंधे हैं। देख कर पता चल रहा है कितनी अधिक मान्यता है इस पवित्र स्थल की।

सही समय से दर्शन करने के बाद बाहर निकलने लगा। हजारों की तादाद में नव विवाहित जोड़े देखे जा सकते हैं। ये कुल्लू, मनाली और शिमला में अधिक संख्या में पाए जाते हैं।

हंसते बिलखते कभी कभी झगड़ते हुए भी। वो थोड़े पुराने होते हैं। जूते पहन मंदिर की सीढ़ियां उतरने लगा। दूर तक सामने दिख रही पहाड़िया अपनी रंगत दिखा रही हैं।

अब बस यहाँ से भागने का मन कर रहा है। और अगला पड़ाव होगा एक और भीड़ भाड वाली जगह जिसका नाम है मालरोड। जहां जमकर भीड़ मिलने वाली है।

कुफरी टॉप का व्यस्त नज़ारा

वापसी

इस रंग बिरंगी कुफरी टॉप जहां तिरपाल ही तिरपाल चमक रहे हैं और उसके नीचे सजी दुकानों से अलविदा लेने का समय आ गया है।

बिना कुछ खाए पिए, बिना कुछ खरीदे या उलूल जुलूल जगह पैसा खर्च किए बिना ही चल पड़ा वापस नीचे की ओर। घोंडो की एक कतार नीचे जाने के लिए खड़ी है।

उसके ऊपर लदी है आलसी है मजबूर सवारी। कुछ डरे सेहमे कुछ खिलखिलाते। मलिक घोड़े ले ऊपर हाँथ सहलाते हुए उसे तैयार कर रहे हैं एक दौड़ के लिए।

घोड़े तो नहीं फिलहाल मैं दौड़ पड़ा हूँ नीचे की ओर। इससे पहले रास्ता बचे ही ना पैदल चलने लायक। बेहतर है घोड़ों के आने से पहले एक सुरक्षित जगह पर चलने लगूं।

इधर मेरे कच्ची सड़क पार करने के पहले ही किसी ने घोड़े दौड़ा दिए। इससे पहले कि घोड़े पास आ पाते। मैं लपक कर सड़क के इस पर आ गया।

जान बची। वही समांतर चल रहे कच्चे रास्ते पर चलने लगा। और कुछ ही देर में उस दुर्गन्ध वाली जगह पर आ गया। जहां खड़ा होना तो दूर चलना भी मुश्किल है।

बखेड़ा ये खड़ा हो गया कि अजय और मेरा साथ छूट गया। इधर मुझे लगने लगा साथी काफी पीछे छूट गया। आखिरकार हार मानकर आगे चलने लगा।

पाया इधर अस्तबल के पास अजय मेरा इंतजार कर रहा है। अजब खेल है दुनिया का। जैसे शिवखोड़ी में हुआ था।

समय अभी चार बजनें को आए हैं। और हमे पहुंचना है मालरोड। उसके बाद रात की आठ बजे की बस भी पकड़नी है। मतलब कम समय में ज्यादा का वादा वाला काम।

दुर्गन्ध और जोखिम भरे रास्ते जहां खाली घोड़े खुद बखुद दौड़ते हैं वहां से बाहर निकला। कुछ सवारियों को तो धक्का मारते हुए भी निकले हैं ये घोड़े।

किस्मत वाले थे वो बच गए। भैया जितना खतरनाक ऊपर जाने का रास्ता उससे कहीं अनर्थ कुफरी टॉप। ना कभी किसी को जाने की सलाह दूंगा। ना खुद जाऊंगा।

अबकी बार नीचे जाने की जरूरत ही नहीं पड़ी। यही अस्तबल के टोकन स्थल से ही मालरोड तक जाने की बस मिल गई। फटाफट बैग लेके चढ़ गया खाली बस में।

बैठने को जगह भी आराम से मिल गई इस बद्दर गर्मी में। कुछ दूरी तक तो बस दनदनाते हुए निकल गई पर इसके बाद जो भीषण जाम मिला है उसने छक्के छुड़ा दिए।

सच कहूँ तो एक समय ऐसा लगने लगा था मालरोड जाने की योजना रद्द करनी पड़ेगी। पर ड्राइवर की सूझबूझ के आगे एक ना चली किसी की।

मालरोड

समय रहते बेमलोई पहुंचा दिया। यहाँ बस से उतरते ही मालरोड तक जाने के लिए सामने बनी सीढ़ी ही सबसे सरल माध्यम दिख रहा है।

पर कुछ ही आगे भीड़ है। ऊपर जाने की भीड़। ऊपर से मेरा तात्पर्य है लिफ्ट से। मैं भी भागा दौड़ा यहाँ पहुंचा पर रेट देख कर वापस उतनी ही गती से सीधी के पास दोबारा आ गया।

भला ज़रा सी दूरी का सौ रुपया कौन लेता है भैया। खैर एक आखिरी बार लिफ्ट की ओर देखते हुए सड़क पर की और ऊपर चढ़ने लगा।

चड़ाई लम्बी है। पर दूरी तय तो करनी ही पड़ेगी। मेरे साथ साथ और भी लोग हैं। पर लिफ्ट के मुकाबले बहुत ही कम लोग हैं जो सीढ़ी के द्वारा जाना पसंद कर रहे हैं।

हम आज मॉडर्न टेक्नोलॉजी के गुलाम हो गए हैं और आने वाले समय में इसमें बुरी तरह खुद को जकड़ा हुआ पाएंगे। मैं और अजय बाते करते करते दस मिनट के भीतर ऊपर आ गए।

उधर लिफ्ट लेने के लिए लंबी कतार है। जैसा अंदाज़ा था वैसा ही देखने को मिल रहा है। कुफरी टॉप से भी दुगनी भीड़। पर वहां की तरह यहाँ मेला तो नहीं लगा है कम से कम।

मालरोड का मुख्य स्थल आसपास की दुकानों में पूछते थाछते आगे बढ़ने लगा। बड़े से स्पीकर में से गुरु की अरदास सुनाई पड़ रही है।

और कुछ ही आगे जमा है भीड़। पास गया तो पाया मुफ्त चाय का वितरण और भोजन ग्रहण। मैं भी आ पहुंचा एक कप चाय की सिसकी लेने।

चाय पीते ही मानो शरीर की थकान छूमंतर हो गई हो। जबरन एक कप चाय और पी और खुद को तरोताजा किया। खाली पर को अब अन्न कि तलाश है।

सो जा खड़ा हुआ भोजन ग्रहण के वास्ते उस कतार में जो ज्यादा लंबी नहीं है। देखते ही देखते खाना भी परोसा हुआ सामने आ गया।

जैसे मानो आज अन्नपूर्णा देवी बहुत प्रसन्न हो जो इतना स्वादिष्ट भोजन उपलब्ध हो रहा है। पेट भरने से पहले मन भर गया। और मन भर भोजन पेट भर भोजन से कई गुना बेहतर है।

कहा जाता है भोजन के उपरांत टेहेलना जरूर चाहिए। जो पानी पी कर निकल आया मालरोड पर सजी बाज़ार के आगे। मालरोड के मुख्य चौराहे पर लगे झंडे को देख जान पड़ रहा है कि यही है मुख्य स्थल।

चौराहे के आगे ही कोई रंगमंच सजा हुआ है। जिसमे बच्चे अपने मधुर गीतों से मन मोह रहे हैं। काफी भारी मात्रा में पुलिस भी तैनात है। और कुछ स्पेशल कमांडो भी।

इधर वर्ल्ड कप का मैच भी चल रहा है। मालरोड पर लगी बड़ी सी टीवी स्क्रीन पर लोग भारत का मुकाबला दक्षिण अफ्रीका से हो रहा है।

ऐसे बड़े मैच बड़ी स्क्रीन पर बड़ी जगह पर देखने का मज़ा ही निराला होता है। जिसमे दर्शक भी दुगने उत्साह के साथ एकसाथ मिलकर मैच देखते हैं।

मैच लगभग खत्म होने वाला है और समय भी हो चला है निकालने का। वापस लक्कर बाज़ार होते हुए घूम फिर कर बिमलोई आ पहुंचा।

शुक्र है यहाँ से समय रहते बस मिल गई। शाम के सात बज रहे हैं। फटाफट अमानती घर से बैग निकलवा कर पहुंचा बस अड्डे के क्रमांक 7 पर जहां देहरादून के लिए बस कुछ ही क्षणों में आ जाएगी।

कुछ चैन के पल

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नमस्ते, मैं ऐश्वर्य तिवारी हूं। ये उन दिनों की बात है जब मैं अपने जुनून का पालन करने के लिए अपने कॉर्पोरेट जीवन को पीछे छोड़ दिया।भारत को जानने के मेरे अंदर हमेशा एक जिज्ञासा थी क्योंकि इस देश में हर कुछ मील के बाद विविधता, विभिन्न संस्कृति है। हर दिन मेरे लिए एक नए शहर में एक नई प्राणी के साथ एक नया दिन है। मैं एक घुमक्कड़ हूं जो के विभिन्न हिस्सों में घूमना पसंद करता है और जल्द ही भारत से बाहर हो सकता है।

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