मनाली के बुद्ध मंदिर में जाना आखिर क्यों घुमाते हैं चक्र?

मनाली | भारत | हिमाचल प्रदेश

होटल की सुबह

कल के मुकाबले आज आंख जल्दी खुल गई। लेकिन सुध नहीं है करना क्या है? खिड़की पर नजर पड़ी तो देखा। कमरे के बाहर से खिली खिली धूप की किरणे खिड़कियों से आर पार होते हुए अन्दर आ रही हैं।

यही किरणे जब चेहरे पर पड़ी तो फिर नींद ना आई दोबारा।  शरीर में थकान इतनी है की जी चाह रहा है मनाली में एक दिन और रुक जाऊं। हल्का हल्का बुखार भी महसूस हो रहा है।

जो सुस्ती मैकलोडगंज से लगी है वो अभी तक जाने का नाम ही नहीं ले रही। कभी कभार एक गलती भी भारी पड़ जाती है। जिसका भुगतान लंबे समय तक करना पड़ता है।

उठ तो गया पर कल की थकान नहीं गई। दरवाज़ा खोल कमरे के बाहर निकलने पर थोड़ी हल चल दिख रही है। कल की मुलाकात में अमित भाई कुछ इस्राइलियों के साथ वार्तालाप करते नजर आए।

पहले तो मुझे आभास हुआ कि शायद इनको हीब्रू भाषा का ज्ञान होगा। ठीक से सुना तो समझ आया अंग्रेजी में बातें हो रही हैं। अगर विश्व में अंग्रेज़ी भाषा का असतित्व को सबने स्वीकार ना किया होता तो ना जाने क्या अनर्थ मचाते धरतीवासी।

कुछ ही देर में रूम सर्विस के लिए आंटी जी भी आ गईं। अगल बगल के कमरों में सफाई करने जुट गईं। होटल के लगभग सभी कमरे फुल हैं। इन कमरों के बाहर की शांति देख ऐसा नहीं लगता पर अन्दर मानुष पाए जाते हैं।

कुछ ही देर में काम वाली बाई मेरे कमरे में जा पहुंची साफ सफाई करने। थोड़ा मंथन करने लगा कि मनाली में आज करु तो करु क्या?

कहाँ घूमने जाऊं? कुछ खास या ऐसा कुछ भी नहीं है यहाँ सिवाय हिडिंबा मंदिर के। जहाँ मैं पिछली बार हो आया था। फिलहाल हिडिंबा मंदिर जाने की इच्छा नहीं हो रही।

एक तो वहाँ की भीड़। दूजा इतनी भीड़ के बीच पता नहीं दर्शन करने का कब नंबर आए। लेकिन हिडिंबा मंदिर के  आस पास का इलाका बहुत खूबसूरत और सुनहरा है।

कहाँ जाना है कुछ खबर नहीं। बाई ने भी कमरे की चका चक सफाई करदी है। निचले स्तर के लोगों का महत्व बहुत होता है। मेरा मानना है कि हर व्यक्ति किसी ना किसी माध्यम से एक दूसरे से जुड़ा है।

बाई के जाने के बाद मैं कमरे में पहुंचा। बैग से कपड़े निकाले और कल की तरह चार्ज हो रहे मोबाइल और पावर बैंक इत्यादि को समेटा और बैग में भर दिया।

होटल के बाहर की दुनिया

सब कुछ हिल्ले लगा कर तैयार होने लगा। कुछ नहीं तो कम से कम होटल से बाहर ही निकलना बेहतर रहेगा।

होटल में रुके रह कर दिन ज़ाया करने का कोई फायदा नहीं। सारा सामान समेट बैग एक किनारे लगा दिए। गरमा गर्म पानी से नहा धो कर एकदम अच्छे बच्चे की तरह तैयार हो गया।

लेकिन बाहर उस पहाड़ी को देख अलग ही ठंड लगने लगती है। जिसमे से बेहद नज़रंदाज़ करने वाला झरना दिखता है। कमरे से बाहर निकल आया।

बैग से अपना ताला निकाल ही लिया है लगाने को। ताला लटकाया और चल दिया बाहर की तरफ।

अपनी कुटिया में आराम कर रहे नरेंद्र भाई को इक्कतला कर के होटल के बाहर आ गया। सुबह सुबह थोड़ी बहुत हलचल है बाज़ार में।

होटल से बाहर जीना उतारते लेखक

धीरे धीरे दुकानें खुल रही हैं। सुबह का वक़्त है इसलिए थोड़ी ढिलाई है। लोग अभी आलसी हैं। दिन में दुरुस्त हो जाएंगे।

यही दिन होता तो अब तक सभी दुकानों पर से ताला हट चुका होता।

रेस्तरां बना अड्डा

गली कूचों से होते हुए होटल से सीधा रेस्तरां पहुंचा। वही रेस्तरां जहाँ कल दिन में दो दफा गया था। ये मेरा अस्थाई अड्डा बन चुका है। वही रेस्तरां जहाँ ऊर्जावान लड़का है।

एक ही दिन में होटल में जान परिचय अच्छा हो गया है। गद्दी पर विराजे मलिक से आंखे चार हुई और सीधा दन दनाते हुए अन्दर।

इस बार नीचे ना बैठ कर सीधा पहली मंजिला की ओर जाने लगा। थोड़ी शांति में कुछ पल बिताना चाहूँगा। और ऊपर भीड़ भी नहीं होगी।

लकड़ी की बनी सीढ़ियां चढ़ते वक़्त थर थरा रही हैं। ऊपर से पहाड़ियों का नज़ारा काफी शानदार है। बैग रखा ही था कि देखा पीछे पीछे वो ऊर्जावान लड़का भी आ पहुंचा।

रेस्त्रां में नज़ारे का लुत्फ़ उठाते लेखक

ऑर्डर लेने। पहले आगे वाली मेज़ पर बैठा। पर यहाँ से बाहर का नज़ारा कुछ जम नहीं रहा है।

सोचा पीछे वाली मेज़ पर बैठ कर देखूं। हालांकि यहाँ सामान रखा हुआ है। फिर भी सारा समान लेे कर बैठ गया। फटाक से ऊर्जावान नौजवान ने मेज़ पर से सारा सामान हटा कर ले गया।

रेस्तरां की ये मंज़िल पूरी लकड़ी से निर्मित है लेकिन मजबूत भी है। लकड़ी के ऊपर बुना हुआ जाल बिछा है। मंथन कर है रहा था कि क्या ऑर्डर किया जाए उतने में ध्यान आया कि डाटा का बैकअप लेे लिया जाए।

साथ में पराठे और चाय का आर्डर भी दे डाला। छोटे बैग से कार्ड कैमरा निकाल कर सब मेज़ पर बिखेर दिया। कैमरा, पेन ड्राइव और मेमोरी कार्ड बैग से निकाल मोबाइल में खोंस कर सारा डाटा ट्रांसफर करने लगा। इतनी देर में पराठा भी प्रस्तुत हो गया।

दो दिन के भीतर मैं यहाँ का विशेष ग्राहक बन गया हूँ। चाय भी आ गई। आज मौसम में कल वाली बात नहीं। जहाँ कल काले बादल आसमान में मंडरा रहे थे आज तेज़ धूप अपनी छाप छोड़ रही है।

पहाड़ की चोटी पर जमी बर्फ इतनी आकर्षक लगती है जिसका कोई जवाब नहीं। मेज़ पर गोप्रो रख टाइम लेप्स बना डाला।

घंटाभर कब गुजर गया पता ही नहीं चला। इतनी देर बैठने के बाद सोच रहा हूँ मॉलरोड निकला जाए। सामान पैक किया सारे केमरे और कार्ड अंदर डाले, चल दिया मनाली बाज़ार की तरफ।

मॉलरोड को कूच

जहाँ कल इसी रोड पर भीगी सड़कों पर चल रहा था आज इन्हीं सड़कों पर धूल का गुब्बारा उड़ता दिखाई पड़ रहा है। कल की तरह आज चप्पल में आने की गलती नहीं दोहराई। कल चप्पलों में को दुर्गति हुई थी वो मैं है जनता हूँ।

कच्चे पक्के रास्ते में, कडी धूप में चलते चलते मालरोड आ पहुंचा। कल के मुकाबले आज माल रोड में भीड़ ज्यादा है। चूंकि बारिश नहीं इसलिए भी। ये खिले खिले चेहरे कुछ आए है कुछ का जाना हो रहा है।

मॉल रोड पर भद्दर भीड़ है। भीड़ भाड़ वाली जगह पर टूरिस्ट का भी मन लगा रहता है। कम भीड़ में ये भी सोचते हैं भीड़ क्यों नहीं है। भीड़ से ही जगहें प्रसिद्ध होती हैं।

क्या घूमा जाए? कहाँ जाया जाएं? यही प्रश्न मन में बार बार उठ रहा है। मॉल रोड में तो ज्यादा दर खड़ा नहीं रहने वाला।

गूगल नक्शे पर मनाली में घूमने लायक जगह देखी तो उसमे कई सुझाव आए। उनमें से एक सुझाव बुद्ध मंदिर घूमने का भी आया।

जिसका रास्ता गलियों से हो कर जाता है ऐसा इसमें दिखा रहा है। सामने बर्फीली पहाड़ी की चोटी पर भी जाने की इच्छा है। पर वहाँ तो जा नहीं सकता अभी।

सो चल दिया बुद्ध मंदिर की ओर। इससे पहले थोड़ी पेट पूजा हो जाए तो बेहतर है।

कुछ आगे जाकर दाहिने हाँथ की पहली गली में मंदिर जाने का रास्ता पूछा तो सामने एक रेस्तरां दिखा जहाँ उचित व्यवस्था दिख रही है भोजन की। लेकिन अभी भोजन करने का कोई विचार नहीं।

यही ठीक लगा दिन का खाना खाना। मंदिर से आने के बाद यहीं आऊंगा पेट पूजा के लिए। दवा खा लेनी चाहिए इसलिए अगल बगल दवाखाना ढूंढने लगा। नक्शे पर देखा तो मंदिर और दवाखाना की राह अब एक ही हो चली है

मनाली में ये आम बात हो गई है किसी भी गली में घुसो तो पहाड़ की बर्फ से ढकी चोटी दिखाई पड़ती है जहाँ लगता है उड़ कर पहुंच जाऊं।

पहाड़ की चोटी।

बुद्ध मंदिर

कभी दाएं तो कभी बाएं चलते चलते मंदिर के पिछले हिस्से तक तो पहुंच गया। पर यहाँ कोई गेट नज़र नहीं आ रहा है। इसलिए मजबूरन घूमते हुए मंदिर के मुख्य द्वार पर भी आ गया।

बुद्ध मंदिर में हल्की फुल्की भीड़ है। पर शांति बहुत उत्तम। गेट से अन्दर जाते ही कैंपस में दो प्राचीन छोटी इमारतें बनी हुई दिखाई दे रही हैं।

मुख्य द्वार के ठीक सामने मंदिर है। बाहर ही पड़ी बेंच पर बैठ कर सब जूते चप्पल उतार रहे हैं। फोटो खींचने की लालसा है मगर  यहाँ फोटो खींचना सख्त मना है ऐसा एक बोर्ड में पढ़ कैमरा वापस बैग में डाल दिया।

मैंने पहले साथी घुमक्कड़ को अन्दर भेज दिया। तब तक बाहर बैठ जूतों की रखवाली की बारी मेरी है। जब साथी घुमक्कड़ बाहर आया तब मेरी बारी आई और जूते उतार कर मैं अंदर पहुंचा।

एक अजब सी शांति बिखरी हुई है यहाँ। मेरे दाहिने हाँथ पर तीन चार महंत बैठे हैं जो बुद्ध ग्रंथ पड़ते हुए नजर आ रहे हैं। दीवारों पर बुद्ध के जीवन पर आधारित कलाकृतियां बनी हुई हैं।

जिन्हें देख कर ये अनुमान लगाया जा सकता है की कैसे और किन कठिनाइयों के बीच भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त किया था। मंदिर में जगह जगह पैसे बिखरे पड़े हैं।

इधर एक छोटी सी बुद्ध प्रतिमा भी स्थापित है। जिसके सामने निरंतर दिया प्रज्ज्वलित है। बेहद ही अनुशाहित माहौल है यहाँ का। जिसका अभाव हम आम जीवन में महसूस करते हैं।

सब कुछ इत्मीनान से देख लेने के बाद मंदिर से बाहर निकल आया। कुछ ही दूरी पर दूसरा मंदिर भी बना है। फिर क्या जूते पहनें की बजाय पैरों में बांध कर चल पड़ा। इस मंदिर की साजों सज्जा देखने।

दूसरी इमारत बेहद छोटी है, और अन्दर ज्यादा जगह भी नहीं है। पहले की तरह साथी घुमक्कड़ को अन्दर भेजा तब तक मैं बाहर निगरानी करता रहा।

आसमान की ओर देख कर यही आस लगा रहा हूँ थोड़ा मौसम बिगाड़ जाए तो घूमने का और अधिक आनंद मिले। इतने में ही साथी घुमक्कड़ बाहर आ गया।

अन्दर पहुंच तो देखा एक बड़े से आकर का लकड़ी का चक्र बना हुआ है। जिसे जो भी अन्दर आता जोर से घूमा कर छाती चौड़ी कर लेता।

मैंने भी घुमाया पर धीरे धीरे। क्योंकि इसके घुमाने का मतलब नहीं पता है इसलिए भी। इसे घुमाने का कारण क्या है?

एक बौद्ध धर्म के आनुनाई आए और चक्र घूमा कर बुद्ध के सामने गिड गीडाने लगे। तब मेरी दिमाग में ये बात समझ आई ऐसा क्यों करते हैं!

मॉलरोड में बना मंदिर

अपनी प्रार्थना स्वीकार करने हेतु इसे अनुनाई घूमाते हैं। वो फर्क नहीं पड़ता इसे आप धीरे घूमाते हैं या पूरी ताकत से। लकड़ी से निर्मित ये चक्र घूमने से मतलब है।

खैर आज एक नया ज्ञान मिला। लोगों का आना जाना बरकरार है। इसमें किसी प्रकार की कोई कमी नहीं है।

अब सब जगह के दर्शन हो गए तब बाहर जाने का रास्ता तलाशने लगा। जूते पहन चल पड़ा। मंदिर के पिछले हिस्से से जाने की कोशिश की। पहुंचा तो देखा बंद पड़ा है। इसलिए वापस सामने के द्वार की ओर चलने लगा।

ये तो एकदम जलियावाला बाग़ की तरह निकला। जिसमे सिर्फ एक द्वार।

शुरू हुई खरीददारी

कल के स्वेटर और जैकेट लेने के बाद भी साथी घुमक्कड़ का मन नहीं भरा। बुद्ध मंदिर से निकलते ही सामने सजी एक दुकान में जा घुसा। स्वेटर तो नहीं पर गर्म दस्ताने और मोजे खरीदने के लिए।

यहाँ मलिक के बजाय मलिकिन दुकान संभाल रही हैं। दुकान और उनकी हावभाव देख कर लग रहा है दुकान अभी खुली है।

कुछ मोजे दिखाए। पसंद आए। मोल भाव करके सही दाम में एक जोड़ी मोजे खरीद लिए गए। पर मैंने नहीं साथ में चल रहे भाईसाहब ने।

अभी जनाब दिनभर में कितनी खरीद दारी करेंगे ये तो वही जाने। वापस घूम फिर के मालरोड आ पहुंचा।

मॉल रोड में एक दुकानदार स्ट्रॉबेरी बेच रहा है। और स्ट्रॉबेरी को देख मेरे मूह में अभी से पानी आने लगा। शायद ही इससे पहले मैंने स्ट्रॉबेरी का स्वाद चखा हो।

उसे देख मैं खुद को रोक ना सका और आखिरकार एक प्लेट लेे ही लिया। बेहद ही मुलायम। मूह में रखते ही गायब हो जा रहा है। मन प्रसन्न हुई गवा।

उफ्फ ये बर्फीला पहाड़ अपनी खूबसूरती से कटल्या कर देगा। इसलिए मैं घूम कर मैन मॉल रोड पर आ खड़ा हुआ।

टेहेलते हुए नजर पड़ी फुटपाथ किनारे एक आंटी जी पर। जो अपनी माफलर मोजे की दुकान सजाए बैठी हुई हैं। उनका मासूम सा चेहरा मुझे उनकी दुकान तक खींच लाया।

आगे की यात्रा को ध्यान में रखते हुए मैंने उनकी छोटी सी दुकान में आइटम खंगालने लगा। कुछ चीज पसंद अाई तो उन्हें अपनाना चाहा।

लेकिन आंटी जी तैयार ही नहीं हुई इनके दाम गिराने से। इस अनजान शहर मुझे ऐसा लगा जैसे कोई अपना मिल गया हो। काफी मोल भाव के बाद मैंने एक जोड़ी ऊनी मोजे और टोपा लेे ही लिया।

बड़ी सरलता से उन्होंने इसको लेने के फायदे गिनाए। की कैसे जब मैं स्पीति वाली पहुंचूंगा तो इन सबकी जरूरत पड़ेगी।

बड़ी दुकानों से सामान की खरीददारी करने से बेहतर होता है सड़क किनारे हाथ के बने हुए माल उठाना। इनकी भी कमाई हो जाती है। और जब आप इनसे सामान खरीदते हो तो इनके चेहरे की खुशी देखने लायक होती है।

शायद बड़ी दुकान वाले भी इन्हीं से खरीद कर अन्दर मंहगे दामों में बेचते होंगे?

ख़ुफ़िया गली में भोजन

खरीदारी तो चलती रहेगी कुछ पेट पूजा हो जाए तो बेहतर रहेगा।

जहाँ सुबह सवेरे गलती से पहुंचा था वहीं। खाने का समय भी हो चला है। इसके संकेत भी मिलने लगे हैं शरीर से। छोटे से रेस्तरां में दो प्लेट ऑर्डर कर दी।

स्वादिष्ट खाना आया और मैं टूट पड़ा। पर ज्यादा खाने की इच्छा नहीं हुई। और कुछ कम में ही आनंद की अनुभूति हुई। हल्का भोजन कर बाहर निकल आया। भुगतान किया और चल दिया।

मैं वापस उसी बाज़ार में आया जहाँ से कल एक स्वेटर खरीद लाया था। और आज एक मफलर खरीदा। हालांकि आज तबीयत नासाज लग रही है। ये सिलसिला काफी दिनों से चला आ रहा है।

चाह कर भी घर पर नहीं बताना चाह रहा हूँ फिर भी फोन घूमना पड़ा ताकि फैमिली डॉक्टर से सलाह मशविरा ले सकूं। फोन घुमाया और माता जी को सब कथा सुना दी।

उन्होंने डॉक्टर को सब बताया, डॉक्टर ने उन्हें दवाइयां सुझाई और मां ने मुझे कॉल लगा कर सुझाई हुई दवाइयां लेने को कहा। यहीं पास के दवाखाने से दवाइयां ली और थक कर सीढ़ियों पर बैठ गया।

देवी पूजन

देवी पूजन मानली मॉलरोड

दाहिने तरफ नजर पड़ी तो देखा बैंड बाजे के साथ एक बारात चली आ रही है जिसे सब टकटकी बांधे देख रहे हैं। किसी भी शहर या कस्बे का कल्चर देखने में बहुत मज़ा आता है।

एक तो वो हमारे लिए नया भी होता है और उसके बारे में जानने के लिए लालायित भी रहते हैं। कुछ ही देर में ये पूरी टोली मालरोड में बने मंदिर में देवी पूजन और मूर्ति लेे कर पहुंच गई। मैंने इसे अपने कैमरे में कैद कर लिया।

होटल रवानगी

शाम के चार बजे हैं इतने में नरेंद्र भाई का फोन आया। आनन फानन में उन्होंने किसी जरूरी काम के चलते होटल बुला लिया।

सब कुछ छोड़ मैं होटल के रास्ते निकल लिया। रास्ते में साथी  को फिर से ऊनी मोजे लेने का चस्का लगा। लग रहा है मानो पैसे की बरसात हो रही हो बैंक अकाउंट में।

फिर से खरीददारी

नेचर पार्क के ठीक पहले पड़ी एक ऊनी कपड़ो की दुकान में इसी मंशा से सामान देखने लगा। वाकई, अभी भी सामान लेना बाकी है?

दुकान में घुसते ही वहाँ का माहौल बदल गया। आसपास पड़े गत्ते को देख कर लग रहा है कि नया माल आया है।  सब तितर बितर हो लिए।

बड़ी सी इस दुकान में से १-२ एक्जीक्यूटिव आ गए सामान दिखाने। ब्रैंड वैल्यू के नए मोजे प्रस्तुत किए। साथी को पसंद कम आए।

फरमान दिया दूसरे दिखाने का, इत्तेफाक से वो पसंद आगए। फिर क्या था उसे पैक करा लिया, भुगतान किया और निकल गया होटल। इस दुकान से मैंने भी अपने लिए एक जोड़ी दस्ताने लिए।

मैं ऊपर वाले से दुआ कर रहा था आगे कोई ऐसी दुकान ना दिखे और दिखे भी तो वो खुली ना हो। अन्यथा भाई साहब फिर कूद पड़ेंगे उस दुकान में।

रास्ते में वो ऊर्जावान लड़का भी मिला और वो दुकान भी खुली मिली जहाँ से कल नेपाली जैकेट खरीदी थी। महज़ पंद्रह मिनट में होटल पहुंच गया।

कुल्लू जाने की तैयारी

होटल पहुंच कर ये तय हो गया है कि आज मनाली में नहीं रुकना है। तो फिर करना क्या है? नरेंद्र भाई और अमित से चर्चा करने के बाद ये निष्कर्ष निकला कि कुल्लू के लिए आज शाम को ही निकलना बेहतर होगा।

ज्यादा देर की तो कुल्लू जाने के लिए कोई साधन भी नहीं मिलेगा। मन तो नहीं है मनाली छोड़ के जाने का पर क्या करे! बैग तो पहले से ही पैक है।

सामान उठाया और सभी से अलविदा ले उजाले उजाले कुल्लू के लिए निकल पड़ा। गले मिले और जीवन में फिर दोबारा मुलाकात करने का वायदा किया।

रास्ते से गुजरते वक्त वो नेपाली जैकेट वाले कि दुकान से भी अलविदा किया जहाँ से दो जैकेट ली थीं। कसम से अगर कानपुर के लिए रवाना हो रहा होता तो एक और जैकेट लेे लेता।

जिस रेस्तरां में पिछले दो दिनों से भोजन चल रहा था जब उन्होंने जाते हुए देखा तब आभार के तौर पर कुछ फल भेंट किए। रास्ते में खाने के लिए। इतना प्यार लेे कर जाऊंगा तो खामखां याद आएगा मनाली।

बस की उपलब्धि

मालरोड पहुंचते पहुंचते अंधेरा हो चुका है। कुल्लू जाने का सबसे सरल साधन है वो है बस। परिवहन अड्डे पर आ खड़ा हुआ इसी मंशा से।

बस अड्डे पर हलचल बहुत कस के है। दूर से ही पूछताछ काउंटर दिखा। काउंटर के पीछे एक मुछड़ भाई साहब बैठे हैं।

पूछने पर मालूम पड़ा कि कुल्लू जाने के लिए एक भी बस उपलब्ध नहीं है। मुछड़ अंकल ही बोल पड़े कि कुल्लू जाने के लिए जीप से निकल जाओ।

मेरे विचार में यही एक आखिरी विकल्प है। जीप से निकलना। भारी भरकम बैग लेके बस अड्डे के बाहर निकल आया। आस पास जीप अड्डा देखने लगा तो किनारे एक पेड़ के नीचे लाइन से कई जीप खड़ी हुई नजर आईं।

सबसे पीछे वाली जीप में सामान रखा और बैठ गया। बस जीप भरने का इंतजार है। ड्राइवर साहब पूरे गले का ज़ोर लगा कर सवारियां बुला रहे हैं।

मुझे याद है जब अंतिम दफा २०१६ में आया था तब किस कदर जीप वाले ने धांधली कि थी। तीन दिन के पैकेज में दो दिन में ही छोड़ कर भाग गया था। आखिरकार जीप भरी और हम सभी कुल्लू के लिए रवाना हो गए

कैसा है ये सफ़र!

मॉलरोड मनाली में दिखा सफ़ेद कबूतर

कुछ दिन पहले की बारिश से रास्ते भर पहाड़ के गिरने के अवशेष देखे जा सकते हैं। ये यात्री के तौर पर डरावना तो है ही साथ में विचलित कर देने वाला दृश्य भी है।

एक तरफ पहाड़ तो दूजी तरफ बीस नदी। जिसके बहाव मात्र से अंदाज़ा लगाया जा सकता है की कितना ज़ोर है इस नदी में। इस नदी की आवाज़ मात्र से ही ये जाहिर हो पा रहा है की बरसात में कितना रौद्र रूप धारण कर लेती होगी ये नदी।

देर शाम कुल्लू

देर शाम कुल्लू पहुंचा। शाम के सात बज रहे हैं। यहाँ रुकने की अभी कोई भी व्यवस्था नहीं है। जीप से उतर कर पैसे थमा और एक किनारे बैग रख साथी घुमक्कड़ को भेज दिया व्यवस्था देखने।

बस अड्डे पर पसरा सन्नाटा ऐसा है मानो यहाँ कोई आता जाता नहीं। कर्मचारी भी नाम मात्र उपस्थिति दर्ज कराने के लिए हैं बस।

सब पता लगा कर साथी घुमक्कड़ आया और बस अड्डे के पास एक सरकारी गेस्ट हाउस होने की बात कही। शायद यहाँ कमरा खाली मिल जाए!

पर मेरा अनुभव कहता है कि सरकारी गेस्ट हाउस सिर्फ सरकारी कर्मचारियों के लिए खुले होते हैं वो भी प्री बुकिंग के तहत। अन्यथा तो ऐसे कमरा मिलना मुश्किल ही होता है।

धूमिल बस अड्डे से बैग लेे कर चल पड़ा इसी आस में की शायद कुछ भला हो जाए। आसपास इतनी धूल मिट्टी है जिसका कोई हिसाब नहीं।

सड़क भी कच्ची। गेस्ट हाउस के पतले से गेट से मैं दाखिल हुआ। गेट इतना महीन कि पहले बैग को अन्दर घुसेड़ फिर खुद को।

रात कहा गुज़रेगी?

गेस्ट हाउस में नीचे कुछ भी नहीं। ना कमरा ना रिसेप्शन। एक भाई साहब दौड़ते हुए नीचे की ओर आए। उनसे पूछा तो ऊपर जाने का इशारा किया।

ऊपर जाने का रास्ता सीढ़ियों से हो कर जा रहा है सो वही पकड़ ली। पहुंचा तो देखा रिसेप्शन पर मेज़ के सिवाय और कुछ भी नहीं है।

मैंने मेज़ पर खटकाया कोई नहीं आया। काफी देर हो गई। दोबारा फिर खटकाया तब भी कोई ना आया। लेकिन बाते करने की आवाज़ें अन्दर से आ रही हैं। तो तीबारा इतनी ज़ोर का खटकाया की रिसेप्शनिस्ट के साथ जो आसपास सो रहे थे वो भी उठ कर आ गए।

पैंट शर्ट पहने गमछा दाले तिलकधारी पधारे। उनसे कमरा खाली होने की बात पूछी। उन्होंने भी वही थेओरी बताई जो मेरे दिमाग में घूम रही थी।

पता चला यहाँ एक भी कमरा खाली नहीं है। फिर भी बातें जारी रहीं। स्टूडेंट का हवाला देते हुए कोई व्यवस्था करने को पूछा। बातें राजनीति से धर्म, धर्म से कर्म और फिर कर्म से वतन कि होने लगीं।

बातों बातों में गमछा डाले तिलकधारी रिसेप्शनिस्ट को लगा कि लड़के वतन परस्त मालूम पड़ते हैं। उनसे ये रहा ना गया और बोल ही डाला। वो हमारी देश भक्ति से काफी प्रभावित दिखे!

पहले जहाँ वो व्यवस्था कराने के भी सौ सौ रुपए लेने के इच्छुक थे अब वो भी नहीं। कमरा तो नहीं लेकिन उन्होंने टेंट लगने की जगह मुझे जरूर देदी। यहीं गैलरी में उन्होंने टेंट या मैट लगाने को बोला।

जगह देखने को बोला। जगह तो सही दिखी साफ सुथरी और स्वच्छ। रात गुजारने के लिए अच्छी है। सोने की तो व्यवस्था हो गई।

मनाली से कुल्लू जाते वक़्त घने बादलों का झुण्ड

विचित्र ढाबा

अब थोड़ी पेट पूजा हो जाए। इसलिए बैग उन्हीं के पास रखवा कर मैं निकला भोजनालय की ओर। फिलहाल मेरा भोजन का कोई भी विचार नहीं है।

जहाँ रुकने की उम्मीद नहीं थी वहाँ व्यवस्था हो गई। अन्यथा तो यहाँ कोई आस पास होटल भी नजर नहीं आ रहा जहाँ एक रात के लिए रुका जा सके।

सरकारी होटल से बाहर निकल कर सड़क किनारे चलते चलते एक ढाबा दिख रहा है जो रियायशी तो बिल्कुल नहीं जान पड़ता। पर पर की भूख शांत करने के लिए काफी है।

सड़क से नीचे बने इस ढाबे में बिल्कुल फिल्मों में दिखाए जाने वाले ढाबो की झलक दिख रही है। मैं सड़क से नीचे उतर कर इस ढाबे में जाने लगा।

भूख तो मुझे बिल्कुल भी नहीं है। ढाबे में अन्दर पहुंच कर वहाँ मेज़ के खाली होते का इंतजार करने लगा। कुछ ही देर में बीच की एक मेज़ खाली हुई और मैं वहीं विराजमान हो गया।

ढाबे में नींबू, अचार और प्याज थोक के भाव मेज़ पर रखे रहते हैं। इन्हे आप पैक कर के भी लेे जाएंगे तो भी शायद मलिक को कोई आपत्ती ना हो।

ढाबे पर तो कोई मेनू कार्ड होता नहीं। उनकी जबान में ही मेनू लटका होता है। वेटर कहना शायद ठीक नहीं होगा। एक भाई साहब आए ऑर्डर लेने और खर्रे की तरह सारे आइटम उंगलियों पर गिना डाले।

ठीक से तो शायद ही कुछ समझ आया हो। जो समझ आया  साथी घुमक्कड़ ने अपने लिए वही ऑर्डर कर दिया। भैय्या जी मेज़ पर कपड़ा मार कर चल पड़े।

एक समय के लिए तो दिमाग बंद हो गया कि आखिर चचा इतनी स्पीड में कैसे बोल गए ये सब? जब तक खाना आता तब तक यही बातें होती रहीं कल के दिन की योजना क्या रहेगी और कहाँ और कैसे जाना होगा।

उसे खाता देख मुझे भी भूख लगा अाई। मुझसे रहा ना गया और मैंने भी अपने लिए एक प्लेट ऑर्डर कर ही दिया। खाना आने में देरी भी ना हुई।

चूंकि अब ढाबा भी बंद होने वाला है इसलिए रोटियां सिकना भी बंद हो गई है। और मैं आखिरी कस्टमर के तौर पर अन्न ग्रहण कर रहा हूँ।

खाना खतम हुआ और अब जब पेमेंट देने की बारी आई तो मैं इधर उधर मलिक को ढूंढने लगा। देखा तो मलिक रोटियां सेंकने में जुटा है।

किसी भी धंधे को खड़ा करने में मेहनत लगती है आज देख भी लिया। यहाँ कई ड्राइवर ही मौजूद हैं जो पेट पूजा करने आए हैं।

भोजनालय से निकल कर बाहर आ गया। इतनी रात में कहीं और जाना ठीक भी नहीं। ना ही कहीं जाने वाली जगह दिख रही है।

बाहर धूल का गुब्बार। आसपास अध निर्मित गेस्ट हाउस। बस अड्डे के इलाके में ऐसा कुछ भी नहीं जहाँ खड़ा हुआ जा सके। भोजन पचाते हुए पैदल पैदल वापस गेस्ट हाउस आया। रिसेप्शन से बैग उठा अपने सोने की व्यवस्था करने लगा।

मुलाकात

ये बंद दरवाजों से ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो ये खाली हों। मैंने इसी मंशा से की कहीं कोई कमरा खाली हो तो मैं बुक कर लूं।

उसी में से एक कमरा खोला और अंदर वाकई में कोई नहीं दिखा। लेकिन बाथरूम में आवाज़ जरूर अाई, मुझे तो नहीं साथी घुमक्कड़ को सुनाई दी ये आवाज़।

जैसे का तैसा दरवाज़ा बंद कर के बाहर ही खड़ा हो गया। अचानक दो कमरे के दरवाजे खुले और वहाँ से कुछ दिग्गज पधारे।

बात चीत हुई तो पता चला किसी दफ्तर के पदा अधिकारी हैं।

नशे में चूर साहब अपने जवानी के दिनों को याद करने लगे। और कई किस्से सांझा किए। उनमें से एक उस गांव के बारे में बताने लगे जहाँ आर्यन समाज के लोग रहते हैं।

ये महाशय वहाँ भी जा चुके हैं। और कैसे आर्यन समझ से मुखातिब हुए उसका वर्णन भी किया उन्होंने।

मनु से होटल सत्कार से मनाली बाजार से कामाक्षा से सियल से मनु दुवारा से कुल्लू 51km

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