कुदरती बनावटी भीमलत झरना

भारत | भीमलत | राजस्थान

बूंदी से भीमलत

कल शाम गेस्ट हाउस में सामुदायिक मित्र सौरव से देर तक बातों का सिलसिला चला। जिसमे सौरव ने जिक्र किया बूंदी से कुछ किमी दूर झरने स्थित होने का।

जिसमे से एक का नाम है भीमलत जो निकटतम है। दूसरा मीनल झरना जो बूंदी से सत्तर किमी दूर है।

तय हुआ की कल भोर में ही निकल कर भीमलत और मीनल दोनो ही झरने जाऊंगा। आज सुबह कुछ देरी से उठना हुआ। फटाफट स्नान कर तैयार हो गया। फिर भी घर से निकलते हुए भी नौ बज ही गए।

सोच रहा हूं सौरव से किराए पर दुपहिया वाहन ले जाऊं। जिससे की दोनो जगह जाना हो जाएगा। अगर भोर में निकलता तो पहले मीनल झरना ही जाता जो ज्यादा दूर है।

गेस्ट हाउस में सौरव और उनकी पत्नी से मुलाकात करने लगा। यहाँ सौरव का भी कहना हुआ की सुबह निकल जाना चाहिए था। इनके यहाँ किराए पर गाड़ी भी मिलती है जो बुरा सौदा नहीं है।

फाटक की कुंडी लगा कर बाहर आ गया। गलियों से बाहर दाएं मुड़ते हुए नवल सागर के दाहिने ओर से चलकर मुख्य सड़क पर आ गया।

मुख्य सड़क पर पहुँचते ही यहाँ से लिफ्ट ले कर हाईवे पर निकल गया। नवल सागर के इस और से भव्य किला नजर आ रहा है। जिसकी रात में बहुत सुंदर तस्वीरें आयेंगी।

मस्जिद, गुरुद्वारा, मंदिर को पर करते हुए लिफ्ट दे रहे महोदय ने चौराहे पर उतार दिया। सोच रहा हूं भीमलत तक लिफ्ट मिल जाए तो बेहतर है। जब सुबह इतनी अच्छी शुरुआत हुई है। यहाँ से दूसरी लिफ्ट लेने के चक्कर में हूं।

चौराहे पर खड़े हो कर वाहनों का इंतजार करने लगा। कभी ट्रक वाले को हाथ देता तो कभी दुपहिया वाहन वालों को। पास में बैठे दद्दू ये सब देख रहे हैं।

इन्होंने पास बुलाकर समझाया की भीमलत के लिए कोई भी वाहन ऐसे नहीं जाएगा। बेहतर रहेगा की बस से निकल जाऊं। जो की चौराहे के उस पार से मिलेगी।

एक दूसरे सज्जन भी दद्दू की सलाह से पूर्णतः सहमत दिख रहे हैं। बस की ही बातें हो रही थी की कुछ देर इंतजार के बाद सरकारी बस आ गई। पूछने पर मालूम पड़ा की ये उसी रास्ते पर जाएगी।

स्थानीय लोगों की सलाह मानते हुए बस से बांका निकल पड़ा। बस में चर्चा करने पर एक यात्री को भीमलत के बारे जानकारी है। जिसने परिचालक को बांका तक का टिकट काटने का सुझाव दिया।

पीछे की खिड़की सीट पर आ कर बैठ गया। कुछ देर में परिचालक आए और बांका तक का टिकट काट कर निकल पड़े। बूंदी से बाहर पहाड़ी पर घुमावदार मार्ग के बीच से होते हुए जा रहा हूं।

यहाँ सरोवर भी है जिसमे पानी जमा करके रखा गया है। जो काफी बड़ी है। सरोवर से बिजली की उत्पत्ति भी होती है। पहाड़ियां बहुत ही बड़ी और सुंदर हैं।

यहाँ कभी राजा शिकार करने आया करते थे। करीब आधे घंटे के सफर में आ पहुँचा भीमलत को जाने वाले मार्ग पर।

सड़क मार्ग से भीमलत जाते हुए

कुछ दूर और

परिचालक ने सचेत आवाज़ में बस के दरवाजे पर बुलाया। गाड़ी रुकवाई, उतारा और निकल गया। ऐसा सन्नाटा यहाँ पसरा हुआ है जिसका शोर भी नहीं सुनाई दे रहा। इक्का दुक्का गाड़ियां ही नजर में आ रही हैं सड़क पर वो भी लंबे अंतराल के बाद।

ना हवा ना पेड़, ना पेड़ों के हिलने की आवाज। यहाँ से तीन किमी दूर भीमलत है। जिसको पैदल ही पार करना होगा। ऐसी लंबी सन्नाटे भरी सड़क जैसे अमेरिका की मृत्यु पहाड़ी।

भरी धूप में चलना शुरू किया। यहाँ कभी सड़क बनी होगी जो टूट फूट चुकी है। सड़क के दोनो ओर पत्थर की दीवार खड़ी कर रखी गई है भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा।

सामान सड़क पर चलने के बाद नीचे जाती हुई सड़क मिली। यहाँ से कितनी भी दूर देखने पर खाली मैदान और बिना छोर का रास्ता नजर आ रहा है।

कुछ आगे निकल आने के बाद दुपहिया वाहन पर एक जोड़ा बतियाते हुए दिख रहे हैं। मालूम नहीं पड़ रहा है की वो आ रहे हैं या जा रहे हैं।

कुछ वक्त बिताने के बाद देखा की वो मेरी ही और आ रहा रहे हैं। अगर विपरीत दिशा में जा रहे होते तो लदकर निकल जाता झरने तक।

बीच रास्ते में जोड़ा मिला जो वापस जा रहे हैं अपने दुपहिया वाहन से। बताने लगे की झरने से पहले रेल पटरी मिलेगी। जिसके पहले दीवार को लांघकर दूसरी ओर जाना होगा।

मुस्कुराते हुए ये दोनो निकल गए मुख्य सड़क पर। भरी धूप में कुछ और आगे चलने पर भेड़ और उनके पीछे गड़रिया नजर आ रहा है। जो अपनी भेड़ चरा रहा है।

गडरिए से मुलाकात हुई। राजस्थानी लिबास और अंदाज में गड़रिए ने बताया की झरना अब दूर नहीं। रेल पटरी पार कर के कुछ ही कदमों पर आगे झरना मिलेगा।

सीधी सड़क पर चलते हुए कुछ आगे दीवार भी दिखने लगी। जिस तक पहुँचता की उससे पहले टूटी हुई सड़क पाई। टूटी सड़क लांघते हुए दीवार के करीब आ खड़ा हुआ।

दीवार पर चढ़कर झांकने लगा आखिर किस ओर से कूदना आसान पड़ेगा। दीवार पर चलते हुए कुछ आगे आ कर छलांग लगा दी। जो काफी ऊंचा है।

पटरी पार कर मैदानी इलाके में आ गया। यहाँ से झरने की आवाज साफ सुनाई दे रही है। करीब तीन किमी का सफर पूरा होने को आया।

भीमलत महादेव मंदिर और रसोई

भीमलत महादेव मंदिर

मैदान पार करते हुए झरने की ओर बढ़ने पर इकलौता ढाबा नजर आ रहा है। बाकी जगह खंडहर कक्ष और इमारतें दिखाई पड़ रही हैं। कच्ची सड़क से आगे आ पहुँचा झरने के पास।

भीमलत में भी बंदरों की कमी नहीं है। दुपहिया वाहन से आए एक महाशय के हाथ से चने छीन कर भाग निकले बंदर। महोदय इन्हीं के खाने के लिए लाए थे। पर उनका तरीका अलग होता।

दूर दिख रहे झरने को निहारने के लिए यहाँ रेलिंग लगा रखी है। जिसके पास खड़े हो कर झरना देखा जा सकता है। पहाड़ियों के भंवर में ये झरना दूर से पानी की धार जैसी बहती दिख रही है।

रेलिंग के पास आ कर निहारने लगा। कुछ तस्वीर खिंचवाई। मालूम पड़ा महादेव मंदिर नीचे है। जिसके लिए सीढ़ी द्वारा मार्ग बनाया गया है।

सीढी पर भी सैकड़ों बंदर बैठे हुए हैं। सीढी के द्वार पर ही दो बंदर झगड़ते हुए ऊपर की ओर आए। भीड़ खड़ी की खड़ी रह गई।

हालांकि इनको ना छेड़ा जाए तो ये भी नहीं छेड़ेंगे। इसी सिद्धांत पर वानरों के बीच से गुजरते हुए भीमलत महादेव मंदिर निकल पड़ा। सीढियाँ पर हर जगह बंदर आपस में लड़ते झगड़ते नजर आ रहे हैं।

जैसे तैसे बचते बचाते नीचे आ पहुँचा। मोबाइल को जेब के अंदर डाल लिया है। जैसे वृंदावन में मोबाइल छीन कर फ्रूटी मांगते हैं वैसे यहाँ भी कर सकते हैं।

मंदिर के पास बंदरों का आतंक है। मुझे आता देख मंदिर को दर्शन के लिए खोला जा रहा है। बकायदा मंदिर के पुजारी लट्ठ लिए खड़े हैं वानर सेना से निपटने के लिए।

मंदिर के बाहर जूते उतार कर सीढ़ी चढ़ मंदिर में आ गया। यहाँ गौमुख के आकार की मूर्ति से निरंतर पानी निकल रहा है। पूछने पर पता चला की पानी के आने का स्त्रोत किसी को नहीं पता।

समय बारह बज रहा है। भूख भी लग रही है। केसरिया वस्त्र पहने महोदय से पूछने पर ज्ञात हुआ की घण्टेभर बाद भोजन बन कर तैयार होगा।

भीमलत में आसपास कहीं भी भोजन उपलब्ध नहीं है। ना बाहर कोई ढाबा है। बेहतर है यहीं भोजन कर लिया जाए। घंटे भर इंतजार ही सही।

रेलिंग से झांकने पर नीचे झरने के पानी तक जाने का मार्ग है। नीचे है तो बस पत्थर और पेड़।

जूते पहन कर सीढ़ी से होते हुए झरने की धरती पर आ पहुँचा। जहाँ झरना नदी का रूप ले रही है। सौरव ने बताया था की यहाँ सरोवर का पानी छोड़ा जाता है। जिस वजह से यहाँ पानी बना रहता है।

भीमलत झरना

नीचे उतरते वक्त सीढ़ियों पर दानियों का नाम लिखा हुआ है। जिन लोगों ने पत्थर या धनराशि जमा करी है। कई सीढियाँ तो नष्ट अवस्था में हैं।

धरातल पर पत्थर ही पत्थर पड़े हैं। गिरता हुआ झरना बहुत ही प्यारा लग रहा है। जिसके छीटें से मुख भीग रहा है। मगरमच्छ होने की आशंका है पर पानी का स्तर इतना कम है की संभावना नजर नहीं आ रही।

केसरिया पगड़ी में दद्दू ने बताया था की बरसात के मौसम में यहाँ सब कुछ जल मग्न हो जाता है। सीढियाँ तक पानी में डूब जाती हैं। बरगद के पेड़ के समीप टूटी हुई डालियां पड़ी हुई हैं।

धूप की किरणे आ तो रही हैं पर मात्रा कम है। ठंड के मौसम में ठहरने लायक तो नही हैं। बरगद के पेड़ के नीचे बैठ झरने की छीटों का आनंद ले रहा हूं।

भूख किलकारी मरते हुए मुख तक आ रही है। जिसे रोकने की भरपूर कोशिश है। कम से कम एक बजे तक। तस्वेरबाजी के फोन या कैमरा कुछ भी निकालने पर भीग रहा है।

जिसे झटपट पोछकर तस्वीर लेने की कोशिश है। शरीर की आड़ में छुपा कर कुछ तस्वीरें निकाल भी रहा हूं। झरने का पानी छूने पर ठंडा मालूम पड़ रहा है।

उठकर चल पड़ा आसपास की चीजों को निहारने। आगे ही झरने का निकलने का रास्ता है। जो किधर जा रहा है मालूम नहीं चल रहा।

कुछ तस्वीरें खींच कर वापस झरने के समीप आ गया। यहाँ भी लकड़ी की रेलिंग तैयार करी गई है। जो अब टूट फूट चुकी है। एक छोटा पुल भी तैयार है।

टूटी अवस्था में। टूटे पुल पर चढ़ कर दूसरे पत्थर पर आ गया। यहाँ से अलग कोण पर झरना दिख रहा है। कुछ देर यूंही घूमने के बाद भूख ऊपर मंदिर परिसर में घसीट ही लाई।

भीमलत झरने धरातल पर गिरता हुआ

प्रसाद

एक बजे तो नहीं बल्कि घंटे भर बाद भोजन बन कर तैयार हुआ। कम समय को देखते हुए अब मीनल जाने की योजना रद्द करनी पड़ेगी।

चोखा बाटी दाल और मीठे लड्डू। इतना तीखा खाना की हालत खराब हो चुकी है खाते खाते। चेहरा पूरा लाल और पसीने से लथपथ।

राजस्थान में शायद ही इतना तीखा खाना चखा होगा। केसरिया पगड़ी में दद्दू ने बताया की ये सभी पास के गांव से आए हुए हैं। जिनकी तरफ से मंदिर में भोजन का आयोजन हुआ है।

भीमलत
बूंदी से भीमलात 90किमी

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