कुछ यूं पड़ा कन्याकुमारी नाम

कन्याकुमारी | तमिलनाडु | भारत दर्शन

कन्याकुमारी में सूर्योदय देखने की तमन्ना

कल यही योजना बनाकर सोया था की सुबह उठकर तट पर सूर्योदय से पहले पहुंचकर सूर्योदय देखूंगा।

मैं तो बाद में उठा साथी घुमक्कड़ समय रहते निकल गया। लेटे लेटे विचार कर रहा हूँ जाऊं या ना जाऊं। एकाएक उठा और अपना बिस्तर ताहा कर बैग में रख लिया। चटाई एक किनारे। कपड़े पहने और निकल पड़ा दौड़ पड़ा समुद्र तट की ओर सुबह का सूर्योदय देखने।

मोबाइल पर देखने पर पता चल गया था की सुबह का सूर्योदय छह बजकर पंद्रह मिनट पर होना है। गूगल नक्शे के सहारे। रास्ते में किसी कारण अपना मोबाइल मैने साथी को पकड़ा दिया है।

मुझे अभी काफी रास्ता तय करना अभी भी बाकी है। अभी मुख्य सड़क से होते हुए तो मैं केवल मंदिर तक ही आ पाया हूँ।

शायद संभव है मुझसे पहले अजय पहुंच गया हो। मोबाइल ना होने के कारण संपर्क साधना कठिन हो गया है। वो किस जगह पर है ये जानने के लिए बात होना बहुत जरूरी हो गया है।

मंदिर के पास ही एक राहगीर को पूरा विवरण दिया। ये इतने भले मानुष है की इन्होंने अपना फोन ही पकड़ा दिया मुझे बात करने के लिए।

मदद ले कर सज्जन के फोन से अजय को बुलावा लगाया। चार पांच घंटी बजने के बाद जा कर फोन उठा। ध्वनि-विस्तारक पर यंत्र को लगा कर इन भाईसाहब को भी सुनाने लगा। ताकि इन्हे ये न लगे की मैं झूठ बोल रहा हूँ।

बात भी हो गई और जानकारी भी मिल गई की साथी आखिर है कहाँ। उसने बताया के वह मानव निर्मित पत्थर के तट पर सबसे आगे बैठा है। हैरान हूँ इतनी जल्दी पहुंच कर वहां बैठ भी गया।

बादलों ने घेरा सूरज

अब उस तक पहुंचना आसान है। आसमान में बादल हैं। सूर्योदय के लक्षण नहीं लग रहे। अगर ये तूफान के बादल ना होते तो सूर्योदय का भव्य दृश्य होता।

साथी को ढूंढ़ते हुए उस जगह पर आ पहुंचा जहां वो बैठा है। यहाँ भारी मात्रा में लोग सूर्योदय देखने आए हुए हैं। लेकिन समुद्र तट पर पहुंच कर निराशा हांथ लगी।

आसमान का बाकी हिस्सा तो साफ है लेकिन उस हिस्से पर काली घटा छाई है जहां से सूरज उगना है। यहाँ खड़े हजारों लोग धीरे धीरे मूह लटकाए वापस जाने लगे।

मैं भी साथी घुमक्कड़ के साथ बैठ गया। सूर्योदय ना सही भारत के अंतिम छोर से दुनिया देखने का मजा ही अलग है। बादलों ने आज सूरज को सामने ना आने दिया। पर आखिर कब तक।

बैठा तो सुना साथी घुमक्कड़ किसी धुन को मोबाइल में बजा कर आनंद उठा रहा है। बैठ कर मैं भी आनंद लेने लगा इन समुद्री लहरों का। समुद्र की लहरों के शोर का।

लगा कुछ तस्वीरें निकाल की जाएं तो बेहतर। इसी क्रम में पहले साथी को किनारे बैठा कर उसकी तस्वीर निकली। फिर उसे कैमरा पकड़ा कर खुद की निकलवाई।

पर हम दोनो की साथ में एक भी तस्वीर नहीं है। पास में खड़े भाईसाहब से आग्रह करते हुए उनसे तस्वीर निकलने को कहा।

मोबाइल पकड़ा कर पत्थर पर बैठते वक्त पैर आगे फिसलने से बाल बाल बचा समुद्र में जाने से। एक बार के लिए तो मैं डर ही गया था। कहीं चला ना जाऊं पूरा का पूरा।

मौसम बढ़िया है। कुछ कुछ सूरज निकल रहा है बादलों के बीच से। बादल भी ऐसे जैसे समुद्र से ही निकले हों। जो की सिर के ऊपर तक हैं।

डरावने ज्यादा लग रहे हैं। इनको देख कर ऐसा लग रहा है कहीं कोई तूफान तो नहीं आने वाला। पर मौसम विभाग की तरफ से ऐसी तो कोई भी चेतावनी नहीं आई।

आई होती तो यहाँ एक भी आदमी ना होता। अब सूरज काफी ज्यादा निकल आया है। थोड़ा चुभने भी लगा है। निर्णय लिया अब निकला जाए तो बेहतर।

लोगों को आना जाना जारी है। कई लोग बेहतरीन कपड़ो में आए हुए हैं यहाँ सिर्फ एक तस्वीर लेने।

करीब घंटे भर बैठने के बाद उठ कर निकल पड़ा। इस बार मोबाइल अपने साथ ले कर बजाए साथी को पकड़ा कर। मार्ग में वृद्ध जवान हर वर्ग का आदमी आया हुआ है।

हर शक्श की तमन्ना होती है की वो जीवन में एक बार कन्याकुमारी जरूर जाए। शायद वही तम्मन्ना लिए लोग यहाँ उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं।

भारत के अंतिम छोर पर बैठे युवक

कुछ ऐसे पड़ा कन्याकुमारी नाम

पैदल निकल पड़ा रेलवे स्टेशन की ओर। कन्याकुमारी भारत का वो अंतिम छोर है जहां राष्ट्रीय राजमार्ग 47 का अंत होता है।

वैसे मेरी तरह और लोगों के मन में यह प्रश्न अक्सर घूमता है कि इस शहर का नाम कन्याकुमारी ही क्यों है? किवदंती है बहुत समय पहले बानासुरन नाम का राक्षस था।

जिसने भगवान शिव की तपस्या कर उनसे वरदान मांगा कि उसकी मृत्यु कुंवारी कन्या के अलावा किसी से न हो। शिव ने उसे मनोवांछित वरदान दे दिया।

उसी कालक्रम में राजा भरत के आठ पुत्रियां और एक पुत्र था। राजा भरत ने दक्षिण का हिस्सा पुत्री कुमारी को संभालने को सौप दिया।

मान्यता है कि कुमारी को शक्ति देवी का अवतार माना जाता है। देवी कुमारी ने उस दौर में दक्षिण में कुशलतापूर्वक राज किया। कुमारी की हार्दिक इच्छा थी कि उसका विवाह भगवान शिव से हो।

जब ये बात शिव को पता चली तो वह भी विवाह के लिए राजी हो गए। लेकिन देवर्षि नारद चाहते थे कि बानासुरन का अंत कुमारी के हाथों ही हो।

इस विघ्न के चलते शिव और कुमारी का विवाह नहीं हो सका। इस दौरान जी बानासुरन को कुमारी की सुंदरता के बारे में पता चला तो वो सुनकर ही मोहित हो गया।

उसने कुमारी को विवाह का प्रस्ताव पहुंचाया। कुमारी ने शर्त रखी कि वह उसे युद्ध में हरा दे तो वह बानासुरन से विवाह कर लेगीं। दोनों में युद्ध हुआ और बानासुरन मारा गया।

शिव और कुमारी का विवाह अधूरा रह गया। इसलिए दक्षिण भारत के इस स्थान को कन्या कुमारी कहा गया। अधूरे विवाह की अलग कथा है। लेकिन अब वक़्त हो चला है कन्याकुमारी से विदा लेने का।

स्टेशन की ओर जाते हुए जिस मार्ग से गुजर रहा हूँ वहां पर चर्च भी है सालों पुराना। शायद अंदर प्रार्थना चल रही है। तभी ईसाई धर्म के अनुनायी अंदर की ओर जाते देखे जा सकते हैं।

रुक कर एक तरफ से कुछ तस्वीरें ली कुछ सामने से। कन्याकुमारी से समुद्र तट की ओर जाते वक्त ढलान है। अब यही रास्ता चढ़ाई हो गया है।

चढ़ने वक्त ऐसा लग रहा है जैसे पहाड़ चढ़ रहा हूँ। यहाँ अंडे मुर्गे की दुकान देखी जा सकती है। जिससे दुर्गंध की कोई सीमा नहीं। बस जल्दी से इस इलाके से निकलने का मन कर रहा।

पुराना चर्च

स्नान ध्यान

समय पर स्टेशन पहुंच गया। सड़क से स्टेशन सामने दिखता तो है पर खालीपन होने के कारण दूरी बहुत है।

अमानती घर से बैग निकलवा लिए। आज यहाँ जमाकर्ता दूसरे हैं। बिना ताला खोले खिड़की से ही फांदकर अंदर घुस कर पहले कमरे को खोला। फिर हमें भीतर आने की इजाजत दी।

कल रात निकाले गए सोने का थैले के बाद से बैग अस्त व्यस्त हो गया है। निकाला भी अजीज मित्र ने ही था। बैग ले कर चल पड़ा व्यवस्था देखने।

स्टेशन पहुंच पहले माले पर आ गया। जहां कल रात्रि सोया था। स्नान की व्यवस्था से पहले हल्का होने की व्यवस्था देखने लगा।

टहलते हुए मेज के सामने बने कमरों के साझा स्नानघर में घुस गया। उम्मीद नहीं थी इतनी उम्दा व्यवस्था होगी। लगे हाथ स्नान भी कर लिया।

स्नानघर में पानी से ले कर बिजली तक की अच्छी व्यवस्था है। बस कपड़े रखने की समस्या हो रही है। किसी तरह उसे भी टांग कर स्नान कर लिया।

ऐसा नहीं मालूम पड़ता है कि ये निजी या सार्वजनिक है। खुद नित्य क्रिया और स्नान ध्यान के बाद साथी घुमक्कड़ को भी वहीं भेज दिया।

तैयार हो कर निकल पड़ा बैग उठाकर स्टेशन की ओर। स्नानघर निजी था या सार्वजनिक ये तो पता नहीं। पर कोई रोकने वाला भी नहीं था।

यहाँ जो सुबह पकोड़ी और समोसा बिक रहा था सब वो भी खतम हो गया है। नजर दौड़ाने पर चाय की दुकान नजर आई। जहां चाय ली साथ ही बिस्कुट।

समय रहते स्टेशन पर नाश्ता भी ही गया। लेकिन यहाँ ज्यादा देर तक खाने पीने की सामग्री नहीं टिकती। दोपहर के एक बजते बजते सबका समापन हो जाता है।

यहाँ स्टेशन पर उसी को रुकने की अनुमति दी जा रही हस जिसके पास टिकट है। पुलिसकर्मी ऐसे बिना टिकट के यात्रियों को स्टेशन परिसर से बाहर खदेड़ रहे हैं।

ऐसा शायद ही किसी स्टेशन पर होते देखा हो। शायद सुरक्षा के लिहाज से। नाश्ता कर बैग उठाया और अपनी ट्रेन की ओर निकल पड़ा। टिकट कल रात ही आरक्षित करा लिए थे।

कन्याकुमारी से थिरुवनंतपुरम रवानगी

तिरुवनंतपुरम रवानगी

सुबह दस बजे की ट्रेन से केरल के थिरुवनंतपुरम में आज प्रवेश कर जाऊंगा। यह किसी भी शहर का सबसे लंबा नाम है। यह तो हम सभी बचपन से पढ़ते आए रहे हैं।

थिरुवनंतपुरम में दुनिया का सबसे अमीर मंदिर है। ये चंद लोग ही जानते हैं। ट्रेन का छूटने का समय हो गया है और तभी मेरी नजर पड़ती है दो विदेशी महिलाओं पर जो दौड़ते हुए ट्रेन पकड़ने के कोशिश में हैं।

वह उसी डिब्बे में चढ़ी जिसमें मैं बैठा हूँ। चलो अच्छा हुआ गार्ड ने इन दोनो को देख कर चलती ट्रेन को रुकवा लिया। ये आ कर बैठी भी जहां मैं बैठा हुआ हूँ।

ये दोनो महिलाए यात्रियों से कुछ जानकारी हासिल करना चाह रही हैं। पर जुटा नहीं पा रहीं। मुलाकात हुई कुछ बात हुई तो यह पता चला यह भारत के कई हिस्से घूम चुकी हैं और अब मदुरई जाना चाहती हैं।

थोड़ी और बात करने पर यह मालूम पड़ा कि यह फ्रांस से आई हुई मेहमान भी यात्रा समुदाय से जुड़ीं हैं। मैंने उन्हें कई अहम जानकारियां दी जो एक विदेशी नागरिक के लिए जरूरी हैं।

इनके मुताबिक़ यह दोनों केरल के कई हिस्सों में घूम चूंकि है सो उन्होंने काफी अहम जानकारियां मुझे मुहैय्या कराई। कुछ जानकारी केरल से जुड़ी ये मुझसे सांझा करने लगीं।

मदुरई जंक्शन आते ही वह दोनों मदुरई में उतर गई। जाते जाते एलेप्पी के होटल का परिचय कार्ड भी दे गई। ताकि मुझे ज्यादा समस्या का सामना ना करना पड़े अलापुड़ा में।

मैं दिन के एक बजे तक थिरुवनंतपुरम पहुंच गया। भारत का पूर्वोत्तर हिस्सा करने के बाद पश्चिमी हिस्से की यह नई शुरुआत है।

थिरुवनंतपुरम रेलवे स्टेशन देखने में काफी बड़ा दिख रहा है जो की है भी। इसके एक हिस्से में तेरह ट्रेन तो व्यर्थ ही खड़ी दिखाई पड़ रहीं हैं।

आज जिनके यहाँ मुझे रुकना है वह रेलवे में कार्यरत हैं। कुछ ही देर में मैं यात्रा समुदाय से अखिल जी के सरकारी क्वार्टर में पहुंच गया। बाकी का दिन इन्ही के घर विश्राम कर के बिताने का विचार है।

कन्याकुमारी से त्रिवेंद्रम तक की कुल यात्रा 95किमी

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