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केदारनाथ में चुकानी पड़ती है कीमत

साधना रात के बारह बज रहे हैं। घूम फिर के आया अब सोच रहा हूँ जैसा पंडित जी ने सुझाया वैसा ही के लिया जाए। दर्शन तो संभव नहीं। जूते उतार कर आ गया कपाट के सामने अध्यात्म करने। यहाँ एक माता जी पहले से ही अपने बीमार बेटे को लिए बैठी हैं। जो मंदिर के कपाट खुलने का इंतजार कर रही हैं। कपाट तो चार बजे से पहले खुलने से रहे। सो मैं भी इनकी तरह बैठ कर ध्यान लगा के देखूं। क्या पता खुद को हवा में महसूस करूं। जाली के अंदर आकर बैठ गया। अजय मेरी ओर मुख करके बैठा है। भगवान मेरे मुख पर थोड़ी हैं। इसलिए उसे टांकते हुए कपाट की तरफ बैठने को कहा। मंदिर की दीवार पर बहुत पुरानी मूर्तियां बनी हुई हैं। जो दीवार में चिन्हित हैं। दशकों पुरानी ये मूर्तियां कुछ संदेश देती नजर आ रही हैं। गणेश और पार्वती। आंख बंद की और ध्यान करने लगा। आंख बंद करने के बाद दस मिनट के लिए आंख भी लग गई। फिर से ध्यान करने की कोशिश …

कैमरे वाला बैग जब छूटा रेस्त्रां में

निकलने की तैयारी खाना पीना करने के बाद निकलने की बारी है। उत्तरकाशी ज्यादा दूर भी नहीं है और साधन भी बहुत से मिल जाते हैं इसलिए भी इत्मीनान से सारे काम कर रहा हूँ। खाने में वैसे तो एक ही पराठा ऑर्डर किया था। मगर पराठा इतना लज़ीज़ था एक और चट कर गया। और भूख भी जोरों पर थी। अब लग रहा है पेट में कुछ गया है। बाज़ार खूब जमी है गंगोत्री में जिसकी धूम है। खरीदने वाले खरीद भी रहे हैं। पर मुझे ऐसा लगता है ये आपके ही शहर से लाया हुआ समान आपको दुगने दाम में बेंचते हैं। भीड़ भाड़ वाले इस इलाके में इस कदर भी भीड़ नहीं है। मगर पूरे गंगोत्री का आकर्षण का केंद्र है गंगा मैया का वेग। जिसे कोई एक बार निहारे तो नज़रे ही ना हटा सके। एक दुकान से निरंतर भजन की गूंज सुनाई दे रही है। जो कि मंत्रमुग्ध कर रहा है। चलते फिरते टैक्सी स्टैंड आ पहुंचा। बस की समय सारिणी पता कि तो मालूम पड़ा दो बजे तक बस …

ग्लास हाउस में गुज़ारी रात

बस पकड़ने की फ़िक्र सुबह के चार बजे का अलार्म बजा और तड़के ही नींद खुल गई। रात में हुए वाक्ए के बाद अब लग रहा है जितनी जल्दी हो सके भागो यहाँ से। पता नहीं लवली भाई के मुख से सुने किस्से के बाद कैसे नींद आ गई। पर आधी रात में ऐसा किसी के साथ भी ना हो। फटाफट बिस्तर समेटा और सारा बिखरा हुआ समान बैग में भरने लगा। अजय के नित्य क्रिया पर जाने के बाद मैंने कमरे में बिखरा सारा सामान इक्कठा कर के बैग में भरा। गद्दे पर बिछे चद्दर को भी तय कर के बैग में डाला। बस के निकलने का समय तो छह बजे बताया है कंडक्टर महाशय ने। मुझे पहुचनें में ही शायद आधा घंटा लग जाए। अभी साढ़े चार बज रहे हैं। हर हालत में मुझे आधे घंटे पहले पहुंच जाना है। अजय के आ जाने के बाद अंधेरी सुबह में मैं निकल पड़ा कुल्ला मंजन करने। और बमुश्किल कुछ मिनटों में सब निपटा कर आ गया कमरे में। इधर अजय एकदम तैयार बैठा है। …

भूतिया बिरला हाउस की व्याख्या

यमनोत्री वापसी के बाद यमनोत्री धाम से लौटने के बाद सीधा बिरला हाउस ही आ पहुंचा। धूप तेज है इसलिए यहीं आगन में बैठ कर धूप की सिकाई में मस्त हो गया हूँ। थकान के कारण हालत पस्त है। लवली भैया से एक और रात की मोहल्लत मांगते हुए रुकने का प्रस्ताव रखा। जिसे उन्होंने बिना किसी शर्त के स्वीकार तो लिया। मगर शायद आज उस कमरे को भी बुकिंग के लिए उठना पड़ जाए। ऐसे में मैंने भी बोल दिया अगर बाहर टेंट लगा लिया जाए तो बेहतर होगा। हां इस स्तिथि में ये करना ही ठीक रहेगा। बिरला हाउस के ठीक बगल मे बने ढाबे में भोजन करने के लिए बाहर निकल आया। ढाबे में पहुंचा तो मालूम पड़ा ज्यादा कुछ भी नहीं है खाने को। फिर भी ये दो आदमी भर के लिए खाने की व्यवस्था करने लगे। भट्टी पर तवा चढ़ा और रोटियां सिकनी चालू हो गईं। खाना परोसा गया। खाना बेहद ही स्वादिष्ट बना है। ज्यादा ना खा कर थोड़े में ही पेट भर गया। भुगतान किया और अब योजना …

मुश्किल हुआ जानकीचट्टी में छत मिलना

भोर हुई देहरादून में रात्रि के साढ़े आठ बजे जब बस चली तो लगा अब ये नए सफर पर निकल रहा हूँ। जो पुराने सारे यात्राओं से बिल्कुल अलग होने वाला है। थोड़ा जटिल थोड़ा कठिन। क्यूंकि चार धाम यात्रा परियोजना के नाम से मशहूर यमनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ जो चारों अलग अलग पहाड़ी पर बसे होने के कारण यात्रियों को बहुत चक्कर काटने पड़ते हैं। अगर कोई पर्वतारोही हो तो शायद वाहन के मुकाबले वो इन पहाड़ियों तक पहले है रास्ता नाप दे। देहरादून के लिए बैठा मैं सुबह आंख भी पांच बजे ही खुल गई। और ऐसी खुली की खुली की खुली रह गई। इतनी भीषण गर्मी। जब सन् २००० में आया था तब जून माह में भी बद्दर ठंड का प्रकोप झेलना पड़ता था। ये तो कहानी है मानव के प्रकोप की। कुदरत के केहर की कल्पना सोच से भी परे है। जिसका आंकलन कोई धरतीवासी नहीं कर सकता। हरिद्वार बाईपास कलमेंट टाउन के पास बस आकर रुकी। बस से उतर कर इत्मीनान से मामी जी को फोन कर इक्तल्ला कर दिया …

रात गुज़ारी खाली बस में

चितकुल से करछम आंटी जी से अलविदा ले भागा भागा बस अड्डे की ओर भागा। कोई ठोस बस अड्डा नहीं है। बस किसी इमारत के सामने सालों से खड़ी होती है। तो बस ने ही इस जगह को अपना अड्डा बना लिया है। बस का अड्डा। कोने वाली दुकान से नमकीन पानी ले कर आगे बढ़ गया। टूरिस्ट स्पॉट होने के कारण यहाँ खाने पीने के दाम आसमान छू रहे हैं। उस जगह को पार करते हुए जहां कल कार से उतरा था मोड़ से मुड़ते हुए आगे आया तो पाया सन्नाटा। बस का कोई अता पता ही नहीं है। मुझे तो लग रहा है बस छूट गई है। इसी संशय को साफ करने के लिए स्थानीय लोगों से पूछा तो पता चला अभी आईं ही नहीं है। कोई कह रहा है आधे घंटे तो किसी के गणित के अनुसार पैंतालीस मिनट। बस तो नहीं आसपास बहुतेरी टूरिस्ट गाड़ियां खड़ी हैं। पर समझ नहीं आता लोग यहाँ पहाड़ी इलाके में पिकनिक मनाने क्यों आते हैं। एक शाही ढाबे में कई परिवार दिन का भोज करने …

बस अड्डे में किया कब्ज़ा

जल्दी उठने से तौबा आंख खुली मगर उठने का मन नहीं हो रहा है। अजय ने भी उठाने की कोशिश की पर मैंने उठने से इंकार कर दिया। कल रात में जो तय हुआ वो पूरा ना हो सका। सुबह जल्दी उठना, सूर्योदय(सनराइज) देखना। आखिरकार छह बजे आंख खुली। देखा तो टेंट में बैग और मेरे अलावा कोई भी नहीं है। सूर्योदय तो हो चुका है। शरीर में जकड़न और थकान दोनों है। टेंट के बाहर निकला तो देखा वो उपद्रवी लड़के अभी भी टेंट के अंदर सो रहे हैं। जिनकी कल रात पूरी घाटी में आग लगाने की योजना थी। आज शाम तक हर हालात में रेकोंग पियो पहुंचना है। टीले पर नजर पड़ी तो देखा वहाँ अजय वहाँ ऊपर वीडियो बना रहा है। पांच बजे उठ कर कुछ फोटो और वीडियो बनाने निकल गया था। अभी घाटी में लगभग काफी लोग टेंट के अंदर ही सो रहे हैं। शायद कुछ का रुकने का विचार हो पर मेरा नहीं। अजय के नीचे आते ही सारा सामान समेटने लगा। मूह धोने के लिए भी पानी …

भारत भ्रमण

इंडिया टूर पर मंडराया खतरा

भारत भ्रमण की तैयारी झोल ये हो गया है कि अजय का झोला अमेज़न से अभी तक नहीं आया। कस्टमर केयर पर एक एजेंट के मुताबिक आज सुबह छह सात आठ बजे तक आ जाना चाहिए। लेकिन जुमले सुनते सुनते बज गए दस। इस मुकाम पर एजेंट और थ्रोक विक्रेता दोनों ने ही हांथ खड़े कर दिए हैं। आगे क्या होगा किसी को नहीं पता। बैग आयेगा या नहीं! भारत भ्रमण समय से शुरू होगा या नहीं। मैंने अजय को साफ शब्दों में चेता दिया है। तुम्हारा बैग आए चाहें ना आए चंडीगढ़ जाने वाली ट्रेन का रिजर्वेशन कैंसल नहीं होगा। भले ही मुझे अकेले ही क्यों ना निकलना पड़े। मुझे भारत भ्रमण पर खतरा मंडराता साफ़ नज़र आ रहा है़े। चंडीगढ़ फिर अमृतसर होते हुए हिमाचल की वादियों में गुम हो जाऊँगा। छोटे से कमरे में जगह जगह बैग और सूटकेस पैक कर के रख दिए हैं। इन्हें एक एक करके ठिकाने लगाना है। मैं एक बैग कापी किताब से भरा एकदम तैयार रखा है। चूंकि इसमें कॉपी किताब है इसलिए इसे नोएडा में …