खूबसूरत चाय के बागान

केरेल | भारत | मुन्नार

अलविदा कोच्चि

जैसा की कल अन्नू जी ने वादा किया है आज हमें अगली मंज़िल की ओर जाने का वैसा उन्होंने ने निभाया भी। मेरी योजना भोर में निकलने की थी पर अन्नू जी ने ऐसा होने नहीं दिया।

फरमान जारी कर दिया की आठ बजे से पहले नहीं निकल सकते। अपने कार्यालय जाते हुए हमें मंजिल तक छोड़ देंगे जहाँ से मुन्नार के लिए आसानी से साधन मिल सकेगा।

स्नान कर तैयारी करने लगा निकलने की। बस्ता तैयार किया। सुनिश्चित किया कोई सामान यहाँ छूटने ना पाए। वैसे यहाँ कुछ भी छूटा तो उसके मिलने का मौका ज्यादा ही है। नाश्ता कर मैं साथी घुमक्कड़ और अन्नू जी निकल पड़े अपनी अपनी मंजिल की ओर।

आखिरकार चार रातें और तीन दिन कोच्चि में बिताने के बाद अब यहाँ से अलविदा लेने का समय आ चुका है। मैं घर से निकल चुका हूँ मुन्नार के लिए।

अन्नू जी हमें खुद अपने चार पहिया वाहन से छोड़ने बस अड्डे तक आए हुए हैं। पर यहाँ मुन्नार जाने के लिए किसी बस का अता पता ही नहीं है।

जब पता चला बस उपलब्ध है तो अन्नू जी गाड़ी घुमा कर अड्डे के दूसरी ओर आ गए ताकि हमें बैग उठाने में असुविधा ना हो।

नौसेना वर्दी में होने के बावजूद वहां खड़ा एक निजी संस्था का सिपाही अड्डे के दूसरी तरफ गाड़ी लेने पर चिल्लाने लगा। यह काफी अपमानजनक लगा मुझे जो देश की सेवा में दिन रात नहीं देखते आप उनसे भी अच्छे से पेश नहीं आ रहे।

उसने ऐसा शायद इसलिए कि क्योंकि हम उत्तर भारतीय हैं? फिर अन्नू जी ने बड़ी सहजता से उनकी बात को माना और वाहन बाहर की ओर ले आए।

उनका चेहरा बयां कर रहा है कि उन्हें भी उसका यह बर्ताव कुछ अच्छा नहीं लगा जिस अंदाज में उस चौकीदार ने बात की। मैं और अजय अपना बैग गाड़ी से निकाल कर अन्नू जी से अलविदा ले कर एक किनारे आ गए।

कोच्चि से मुन्नार

पूछताछ काउंटर के पास बैग रख खड़ा हो गया। यहाँ से कुछ ही क्षणों में पता लग जाएगा इनमे से कौन सी बस मुन्नार को जाएगी? अंदर बैठे भाईसाहब बताने लगे की बारह नंबर की बस नौ बजे निकलेगी।

सामने खड़ी एक कतार में कई बसों में से मैं बारह नंबर की बस में विराजमान हो चला। टिकट कटा और कुछ सवारियों के चढ़ने के बाद बस निकल पड़ी लंबे सफर पर।

व्यक्तिगत तौर पर मुझे लंबे सफर पसंद हैं। सुकून भरे और इत्मीनान वाले होते हैं। पर जगह जगह बस रुकते हुए सवारियां भर रही है।

वैसे तो केरल में घूमने को कई सारे खूबसूरत पहाड़ी इलाके है। इन्ही में से एक है मुन्नार जहाँ पूरे भारतवर्ष से पर्यटक खींचे चले आते हैं।

मैंने कहीं पढ़ा है कि मुन्नार एक मलयालम शब्द है जिसका अर्थ होता है तीन नदियों का संगम यहाँ आपको तीन नदियां मधुरपुजहा, नल्‍लाथन्‍नी और कुंडाली एक ही स्थान पर मिलते हुए दिखाई देगी।

जैसे उत्तर भारत में पंजाब जहाँ पांच नदियों का संगम होता है। ब्रिटिशकाल में प्रशासन का आश्रय हुआ करता था मुन्नार। बड़े बड़े अफसर अपने परिवार के साथ यहाँ महीनों गुजर दिया करते थे।

मुन्नार को वर्ष 2017 में एक मैग्‍जीन ने ‘बेस्‍ट प्‍लेस फॉर रोमांस’ के खिताब से नवाजा गया था। जिंदगी की भागदौड़ और प्रदूषण से दूर यह जगह लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है।

यहाँ घूमने लायक काफी जगह हैं, कुछ मुन्नार के आसपास है जैसे एर्नाकुलम राष्ट्रीय उद्यान। जो मुन्नार से 15 किलोमीटर दूर है। इस पार्क का निर्माण नीलगिरी बकरों की रक्षा करने के लिए किया गया था।

यह उद्यान प्राकृतिक सुंदरता के लिए मशहूर है। यहाँ नीलगिरी बकरों को देखा जा सकता है। साथ ही यहाँ ट्रैकिंग की भी सुविधा उपलब्ध है।

राष्ट्रीय पार्क के नजदीक दक्षिण भारत की सबसे ऊंची चोटी अनामुडी पहाड़ी को देखा जा सकता है। सरथ ने जाते जाते बताया था मट्टुपेट्टी झील और बांध के बारे में जहाँ से चाय के बागानों का मनमोहक दृश्य नजर आता है।

पर्यटक नौका विहार का भी आनंद लेते हैं। यह क्षेत्र ना सिर्फ अपने पहाड़ियों बल्कि अपने चाय के बागानों के लिए भी बहुचर्चित है। इस पहाड़ी इलाके की पहचान है यहाँ फैली चाय की खेती।

हरियाली के बीच बस गुजर रही है। पहाड़ों में प्रवेश करते ही मौसम में भी अचानक से परिवर्तन देखने को मिल रहा है। जहाँ अभी तक तपिश झेलनी पड़ रही थी अब वहीं हल्का ठंडक का एहसास हो रहा है।

मोड़ आया जो इद्दुकी गांव की ओर जा रहा है। पर हमे तो सीधा जाना है जो मुन्नार के लिए है। बस भी मुड़ने के बजाए सीधे चलती गई।

चेयप्परा झरना

कुछ ही देर में नेरियामंगलम पुल के समीप बस आ खड़ी हुई। सामने से आ रहे वाहनों की प्रतीक्षा में खड़ी रही। वाहनों के निकल जाने के बाद इस पुल पर चल पड़ी।

इस पुल को उच्च श्रेणी का प्रवेश द्वार कहा गया है जो सन् 1935 में बनकर तैयार हुआ था। दुपहिया वाहन एक साथ आसानी से निकल सकते हैं मगर बड़े वाहनों को इंतजार करना होता है।

रास्ते में झरना भी देखने को मिला जिसे चेयप्परा नाम से जाना जाता है। ज्यादा बड़ा नही। अगर अपने वाहन से आ रहे हैं तो थोड़ा समय देना बनता है।

बस है जो जाहिर है अपने पड़ाव पर रुकते हुए आगे बढ़ रही है। आदिमली पहुंच चुकी है। पर यहाँ ऐसी रुकी हुई है की चलने का नाम नहीं ले रही।

हालांकि अब मुन्नार ज्यादा दूर नहीं है। करीब आधा घंटा बीत जाने के बाद वापस सफर शुरू हो चला है।

ढाई बजे तक बस मुन्नार पहुंच गई। कुल साढ़े पांच घंटे में मैं मुन्नार आ गया। उतरकर गूगल नक्शे में आज के सामुदायिक मित्र के बताए हुए मार्ग को देखने लगा।

आज में फ़्लटर्बी छात्रावास में रुकूंगा। ये छात्रावास मुख्य सड़क से नीचे जाकर जो पहाड़ी के बीचों बीच बसा है। नीचे चलता की उससे पहले एक बड़ी बस ऊपर की ओर आती दिख रही है।

सड़क की ऊंचाई और चौड़ाई देख कर तो नहीं लग रहा की ये चढ़ पाएगी। पर चालक और परिचालक की सूझ बूझ से बस ऊपर आ गई। छोड़ कर गई है तो धुएं का गुब्बार। दुकानों में भी धुआं भर गया।

नीचे उतरने का रास्ता इतना जटिल है कि थोड़ी सी जल्दी दिखाई नहीं की सबसे नीचे, और नीचे पहुंचते ही सीधे भगवान को प्यारे होने में देर नहीं लगेगी। बहुत अधिक सकरा।

ऊपर से भारी बैग के साथ बहुत ही आहिस्ते आहिस्ते उतरना होगा। घने पहाड़ी में छात्रावास की इमारत का पता ही नहीं चल पा रहा है।

आज की शाम की व्यवस्था

शिउजी रफी जो छात्रावास के संचालक है उनसे फोन करके अपने आगमन की सूचना दी। अपने कक्ष से बाहर निकल कर दूर से हाथ हिलाते हुए दिखे और फोन के जरिए रास्ता बता रहे हैं।

कहीं ढलान तो कहीं उचाई। उनके छात्रावास तक जाने का रास्ता इतना जटिल होगा ये ज्ञात नहीं था। कई दफा अबतक गिरते हुए भी बचा हूँ।

नीचे से ऊपर आ रही और ऊपर से नीचे जा रही गाड़ियों को जगह देने के चक्कर में झाड़ी में ही घुस चुका हूँ। ऊपर से डीजल की ये गंध सांस नहीं लेने दे रही।

दाहिने मुड़ते हुए नीचे उतरने लगा। पत्थर की सीढ़ियां चढ़ते हुए आहिस्ता आहिस्ता आ पहुंचा छात्रावास। घड़ी में समय देखा तो तीन बज रहा है।

शिऊजी ने स्वागत किया। हमें कुछ देर बाहर ही इंतजार करने को कहा ताकि हमारा बिस्तर साफ सुथरा कर सकें। बाहर सोफे पर बैग रखे हुए हैं और मैं यहाँ पहाड़ियों का नजारा देख रहा हूँ।

मेरी तरह एक बुजुर्ग जोड़ा भी मुन्नार की वादियों का आनंद लेने आए हैं। इन्होंने ठीक बगल का कमरा ले रखा है। शायद कहीं घूमने जाएंगे।

बहुत ठंडा मौसम है। एक अलग ही दुनिया में आ गया हूँ। जहाँ कल तक धूप का शिकार हो रहा था आज पूरा उलट। कमरे की साफ सफाई होते ही हमें भीतर बुला लिया गया।

कमरे में बिछे दो बिस्तर में से एक एक हमें दे दिया गया। शिउजी के छात्रावास में खाने की भी व्यवस्था है। अलग से रसोई है। और ये जनाब भी खाना खाने ही बैठे हैं।

खाने का दाम बता कर हमे खाना खाने का न्योता दिया। विशेष खाना बना है आज। कुछ अलग से रोटियां सेंकी गई। भर पेट खाना खाने के बाद मन बना रहा हूँ मुख्य बाजार तक घूम आऊं।

चर्चिल पुल मुन्नर बाजार में

मुन्नार में सैर

कुछ देर रुकने और दिन का भोज करने के बाद निकल गया मुख्य बाजार की ओर। सड़क मार्ग से वापस वहीं आ पहुंचा जहाँ बस से उतरा था।

मुख्य बाजार जाने के लिए बस में विराजमान हो गया। मुन्‍नार के पर्यटन स्‍थलों की सैर बहुत सुखद अनुभव प्रदान करने वाली है विशेषकर यहाँ के अच्‍छे और सुखदायक मौसम के कारण। इतना शांति प्रिय है जिसकी प्रशंसा करते मैं थक नहीं रहा।

जगह जगह चाय के बागान और पर्यटकों के लिए दार्शनिक स्थल। बाजार पहुंच कर जैसे बाजार में ही खो गया हूँ। ऐसा लग रह है मानो मैं बादलों के ऊपर सैर कर रहा हूँ।

बाजार पहुंचकर इत्मीनान से एक कप चाय पीने बैठ गया। यहाँ पर्यटक से ज्यादा दुकानें दिख रही हैं। जिनमे फिलहाल तो भीड़ कम ही है।

चाय के बाद बाजार के कुछ हिस्से घूमने निकल पड़ा। पुल पार कर के ऊपर के हिस्से में आ पहुंचा जहाँ से पूरा मुन्नार देखा जा सकता है।

तय हुआ की वापसी में बस से ना जा कर लिफ्ट लेते हुए मौसम का आनंद लेते हुए जाऊंगा। बाजार से निकलने के बाद इसी पर अमल करने के लिए खड़ा हो गया।

कुछ दूर से पहला वाहन मिला जो जहाँ तक छोड़ देंगे वहां तक बेहतर। मौसम देख कर तो यही अंदाजा लगाया जा सकता है की यहाँ कभी भी बारिश हो जाती होगी।

रफ़ी का बटरफ्लाई हॉस्टल

जितने भी दर्शक स्थल दिखे वहां भारी संख्या में पर्यटक भी दिखे। तो फिर बाजार में पर्यटक कहाँ होंगे। स्थल पर रुक कर पहाड़ पर जमे बादलों का आनंद ले रहे हैं।

छोटी बड़ी टूरिस्ट गाडियां और निजी बस भी बहुत देखने में आ रही हैं। पर जो सबसे खराब बात लगी वो है पहाड़ों पर मची गंदगी।

यात्री आते हैं और यहाँ कचरा फैला कर निकल जाते हैं। ये भी नहीं सोचते वो आखिर कर क्या रहे हैं। ये ध्यान देने योग्य है।

कोच्ची से आँचल से मुन्नर तक का कुल सफर 183किमी

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