केवलादेव पक्षी विहार

भरतपुर | भारत | राजस्थान

वृन्दावन से भरतपुर

भरतपुर के सामुदायिक मित्र राज से कई महीनो से संपर्क में हूँ। शायद जनवरी की शुरुआत से। इस दौरे पर भी जब से निकला hu लगातार उनके संपर्क में हूँ।

कल रात में उन्ही से संपर्क के बाद ये तय हुआ है की आज सुबह तड़के नौ बजे के पहले तो हर हाल में पहुँच जाऊंगा। क्योंकि आज उनकी परीक्षा भी नहीं है और वो भी साथ में कुछ समय व्यतीत कर पाएंगे जो और भी अच्छा रहेगा।

सुबह छह बजे घर से निकल जाऊंगा यही सोच कर सोया था। पर निकलते हुए समय साढ़े छह से भी ज्यादा हो चला। ज्यादा देर नहीं पर।

भूख को शांत करने के लिए चाय की दुकान पर आ गया। खाने को तो नहीं है कहीं भी कुछ चाय ही सही कुछ। चाय की नुक्कड़ पर भी बंदरों का धावा है।

जैसे ही उनको दिखाई पड़ता की मेरे सामने बैठा ग्राहक मोबाइल चला रहा है या मोबाइल हाथ में है। इनमे से कोई ना कोई उसके पीछे या आसपास मंडराने लगता।

कब मोबाइल ले कर भागें और कब इनको फ्रूटी दी जाए उपहार में या वसूली में। चाय बना रहे भैय्या भी डंडा ले कर इनको भगा रहे हैं।

दस मिनट में निकल पड़ा अट्टल्ला। ठीक उसी रास्ते से गुजर रहा हूँ जिस पर कल बंदर ने धावा बोल कर मेरा चश्मा निकाल लिया था। अट्टल्ला से छटीकरा के लिए सीधी ऑटो में बैठ कर निकल पड़ा।

कल बरसाना के लिए भले ही पचास किमी दूर ऑटो से चला गया था पर आज भरतपुर के लिए लिफ्ट लेते हुए ही जाना चाह रहा हूँ जो छप्पन किमी दूर है।

गूगल नक्शे पर पाया की भरतपुर के लिए ऊपर हाईवे से वाहन मिलेगा। छटीकरा से विपरीत दिशा में पैदल चलते हुए हाईवे पर जाने का रास्ता का खोजने लगा।

प्यास के कारण नजदीक के पेट्रोल पंप के पास आया की यहाँ पेट्रोल भरवा कर आ रहे एक सज्जन ने बताया की शुद्ध पानी यहाँ नहीं मिलेगा। देवी जी ने अपनी छोटी बोतल में रखा पानी उठा कर मुझे दे दिया जो मुझे गंगाजल लग रहा है।

पानी ले कर हाईवे सड़क पर आ खड़ा हुआ। पर अभी जहाँ खड़ा हूँ यहाँ कोई भी वाहन रुकने को तैयार नहीं। खड़ा भी चढ़ाई पर हूँ जहाँ वाहन हुंकार भरते हैं। भला कौन यहाँ रुकेगा।

विपरीत दिशा में ऐसी जगह आ खड़ा हुआ जहाँ वाहन के रुकने की संभावना ज्यादा है। अभी भी कोई ट्रक रुकने को तैयार नहीं। रुकी तो एक सरकारी बस जो भरतपुर तो नहीं जा रही। बाएं लेते हुए वृंदावन को निकल गई बस।

दूसरा वाहन रुका जो एक लारी है। भरतपुर तो नहीं पर नरौली तक छोड़ने का आश्वाशन दिया जहाँ से भरतपुर के लिए बस मिल जाएगी। दस मिनट के भीतर वाहन मिल गया। ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ा।

वृन्दावन से नरोली जाते हुए

नरौली पहुँचकर सड़क पार कर भरतपुर को जाने वाली सड़क पर वाहन का इंतजार करने लगा। इस मार्ग पर ना वाहन रुक रहे हैं ना लारी वाले।

चार पहिया वाहनों से भी उम्मीद है पर कोई प्रतिक्रिया नहीं मिल रही। सलाह देने वाले बहुत रुक रहे हैं जिनके अनुसार मुझे बस से या फिर टैक्सी से निकल जाना चाहिए।

एक जनाब तो इस हद तक बताने लगे की इस रास्ते पर लूट मार बहुत है। इनके अनुसार ऐसे भरतपुर पहुँचना खतरे से खाली नहीं है।

सड़क पर आ रहे ट्रक को हाथ दे कर रोकने की कोशिश कर रहा हूँ अगर रुकता है तो ठीक वरना अब बस से निकल जाना उचित रहेगा।

संयोग से ट्रक रुका और मालूम पड़ा ये भरतपुर जा रहे हैं। जब तक बैठ कर निकलता यहाँ जाम लगने की नौबत आ गई है। इधर निरंतर राज का कॉल आ रहा है।

भरतपुर

सफर शुरू हो चला है। गूगल नक्शे के मुताबिक मैं घंटे भर में पहुँच जाऊंगा। शुरुआत का सफर तो मक्खन जैसी सड़कों पर गुजर रहा है। पर आगे का सफर बहुत जटिल है।

गड्ढों और टूटी फूटी सड़क के बीच से गुजर रहा हूँ। उसमे भी ट्रक की सवारी। जो इन गड्ढों पर तेज तो बिल्कुल भी नहीं चल सकता। गड्ढे के पास आते ही चालक ट्रक की गति धीमी कर देते हैं।

पहुँचना नौ बजे था पर भरतपुर पहुँच रहा हूँ दस बजे। चालक से अलविदा लेते हुए भरतपुर बस अड्डे निकल पड़ा। समय से ऑटो भी मिल गया है।

राज को सूचित कर दिया तो पता लगा की वो एक दूसरे सामुदायिक मित्र के साथ लेने आ रहे हैं। इधर मेरा ऑटो से उतरना हुआ उधर सड़क के उस पार दूसरे सामुदायिक मित्र दिख रहे हैं जो मेरी ओर हाथ हिला कर इशारा कर रहे।

सड़क पार कर दोनो स्कूटी से आ गए। बैग सहित निकल पड़ा दूसरे सामुदायिक मित्र क्षितिज के साथ। ये महोदय पेशे से ग्राफिक डिजाइनर है पर इनकी तस्वीरबाजी में बहुत अत्यधिक है।

पांच मिनट के ऊबड़ खाबड़ रास्ते से गुजरते हुए घर आ गया। राज और क्षितिज दोनो ही मेरा इंतजार कर रहे थे पक्षी विहार चलने का।

घर पर बैग रख कुछ देर सुस्ताया। इधर सभी लोग निकलने की तैयारी में जुट गए। क्षितिज अपना भारी भरकम कैमरा निकालने लगा। उधर नाश्ते में राज ने अचार पराठे बनवा लिए।

खा पी कर पूरी तैयारी के साथ साइकिल से हम सब निकल पड़े। पक्षी विहार में या तो पैदल सफर करना होगा या फिर साइकिल या रिक्शा से।

मथुरा से भरतपुर तक जाते हुए मिली ख़राब सड़क

केवलादेव पक्षी विहार

बेहतर है घर से ही साइकिल से निकला जाए। पक्षी विहार भी निकट है। पांच मिनट में हम पक्षी विहार पहुँच गए। यहाँ टिकट घर से टिकट प्राप्त कर बारह बजे तक भीतर निकल आया।

तेज धूप के कारण तबियत कुछ ठीक नही लग रही। शायद आचार खाने के कारण भी पेट खराब हो चला है। फिर भी भीतर चल कर हम सैर सपाटा करने लगे।

बाएं मुड़ कर एक आश्रम में आ पहुँचा। राज ने बताया यहाँ एक बाबा रहते हैं जिनके पास सभी जानवर आते हैं। वानर, हिरण, कछुआ, सांप हर जीव जंतु।

यहाँ पर आने के बाद तबियत कुछ ज्यादा ही बिगड़ने लगी। राज को सूचित किया तो वो अपनी साइकिल उठा कर चल पड़ा मुख्य फाटक की ओर। जहाँ उसने अपने छोटे भाई से दवा मंगाई है।

इधर राज निकला और मैं बेंच पर आराम करने लगा। खबर मिली की बाकी सभी पक्षी विहार की मुख्य सड़क पर आ जाएं तो बेहतर रहेगा।

मुख्य सड़क पर पहुँच कर दवा खाई। पिछले टोल के बाद अब यहाँ टोल पड़ रहा है जो प्रमुख है। यहाँ भी टिकट दिखा कर प्रवेश कर गए मुख्य पक्षी विहार में।

जहाँ अनेक प्रकार के पक्षी देखने को मिलेंगे। दवा खाने के बाद अब कुछ बेहतर महसूस कर रहा हूँ। कई दिनों से लगातार घुमक्कड़ी के कारण भी ऐसा हुआ है।

केवलादेव पक्षी विहार केवलादेव मंदिर के नाम पर पड़ा जो महादेव का मंदिर है। केवलादेव भरतपुर का सर्वाधिक लोकप्रिय पर्यटक स्थल है जैसा की मैं इस भरी धूप में देख ही पा रहा हूँ।

राज ने बताया की इस पार्क का निर्माण सूरजमल ने ढाई सौ साल पहले करवाया था। 1964 तक राजा इस उद्यान में बतखों का शिकार करने आया करते थे।

कम से कम पचास किस्म की मछलियां, सात प्रकार की कछुआ प्रजाति पाई जाती हैं। पक्षी विहार है जिस कारण है वो है यहाँ पर पाई जाने वाली 350 विभिन्न प्रजातियां।

बीच में सड़क और दोनो ओर पानी से भरे तालाब। पेड़ की छांव से ढकी हुई सड़क देखे वर्षों बीत गए। कभी ऐसा दृश्य घर के पास हुआ करता जिसे सड़क निर्माण के बहाने पेड़ों को काट कर फेंक दिया गया।

यहाँ पक्षी साइबेरिया, न्यूजीलैंड, यूरोप से विस्थापित हो कर हैं। ठंड में ही आते हैं जिसका कारण है उन क्षेत्रों में पड़ने वाली ठंड। यहाँ रिक्शा चालको को काफी विस्तृत जानकारी है।

तालाबों में लगे पेड़ पर पक्षियों को बैठा देखा जा सकता है। सरकार की तरफ से भी तालाब को भरे रखने में कोई कसर नहीं है। इसलिए पाइप के माध्यम से यहाँ लगातार पानी आपूर्ति हो रही है।

वानर और राष्ट्रीय पक्षी मोर आसानी से देखे जा सकते हैं। यह मेरा पहला अनुभव है किसी राष्ट्रीय उद्यान में। क्षितिज अपने कैमरे से कार्य में जुट चुके हैं।

उन्हे अलग अलग पक्षियों का भी काफी ज्ञान है। कौन सा पक्षी कहाँ से आया है और क्या नाम है! राज के साथ मैं निकल पड़ा पक्षी विहार के अंतिम छोर पर।

सैर सपाटा

अंतिम छोर पर सीमा है जिसके पास बना है दो मंजिला स्टैंड जिस पर चढ़ कर पूरा पक्षी विहार देखा जा सकता है। एक किनारे साइकिल खड़ी कर आ गया ऊपर।

यहाँ से जितनी दूर तक दिख रहा है हर जगह पानी भरा है। अगर गलती से भी कोई फंस जाए तो उसके बचने के लक्षण कम ही होंगे।

राष्ट्रीय उद्यान तो बहुत ही उत्कृष्ट है पर धूप से हाल बेहाल है। स्टैंड से उतरकर उद्यान में पड़ी बेंच पर आ कर लेट गया। लग रहा है बस घर भाग जाऊं और छांव में आराम करूं।

केवलादेव महादेव मंदिर

पास से किसी विचित्र प्राणी की आवाज सुनने को मिल रही है जिसे शिकायत है लोगों के मंदिर ना आने की। उठकर इधर ही आ पहुँचा। पूछने पर मालूम पड़ा की लोग यहाँ उद्यान तक तो आते हैं पर केवलादेव मंदिर नहीं।

यहाँ महादेव का शिवलिंग है जो स्वत ही उत्पन्न हुआ था। पर्यटक यहाँ तक आते हैं और बाहर से ही प्रणाम कर के चले जाते हैं।

मंदिर के बाहर एक तस्वीरबाज खड़ा है। जो उल्लू की तस्वीर लेने के की उल्लू का स्थान पूछ रहा है। मालूम पड़ा की इसी पेड़ पर उल्लू रहता है और इस समय भी होगा।

विश्राम

क्षितिज और मैं कैमरा निकाल कर तस्वीर लेने लगे। कई तस्वीरों के बाद कुछ एक दो तस्वीर साफ आई। क्षितिज के साथ कुछ गुर भी सिख रहा हूँ और अपना अनुभव भी सांझा कर रहा हूँ जिससे कुछ मदद भी मिल रही है।

यहाँ कुछ वक्त बिताने के बाद निकल पड़ा उद्यान के दाहिने ओर। तस्वीरबाज़ क्षितिज यहीं पर रुक कर तस्वीर निकाल रहे हैं। मैं वीरान पड़े रास्तों से गुजर रहा हूँ।

काफी आगे कुछ दूसरे अंत छोर पर आने पर पाता हूँ मरे हुए कछुओं का शरीर का ढांचा। मरे हुए पक्षी। एक साथ इतने जीव को एक ही जगह मरा देख कुछ संशय पैदा कर रहा है मन में।

कछुए का मूंह उसके कवच से बाहर निकला है। दूसरे कछुआ अपने कवच से गायब है। यानी वो कीड़े मकोड़े या किसी अन्य जीव के द्वारा खब चुका है।

पर ये चीज शंका पैदा कर रही है मन में। आखिर ऐसा क्यों? राज ने बताया जब वो पिछली दफा यहाँ आया था तब उसे कुछ पैसे पड़े मिले थे!

कड़ी धूप में निकल कर उस स्थान पर आ गया जहाँ क्षितिज तस्वीरबाजी कर रहे हैं। यहाँ पर अद्भुत पक्षी नजर आ रहे हैं। दवा खाने के बाद भी तबियत सही नहीं लग रही।

राज ने बताया की परिसर में ही पास में कैंटीन है। जहाँ मैं आराम कर सकता हूँ और खाना भी खाया जा सकता है। साइकिल के कर यहीं आ गया।

एक किनारे लगाई। नलके से बोतल में पानी भरा और दूर पड़ी बेंच पर आ कर लेट गया। पहले बेंच फिर घास पर बैठकर जूते खोल कर सो गया।

नींद खुली तो लगा पेट साफ होना चाहिए। जिसकी व्यवस्था है यहाँ। पेट साफ होने के बाद काफी राहत मिल रही है। अभी तक लग रहा था घर निकल जाना चाहिए।

सोच ही रहा था की जब पक्षी विहार आया हूँ तो बीच से छोड़कर क्यों जाऊं! पर अब जब तबियत पूर्णतः ठीक लग रही है तो शाम तक यहीं रुकूंगा।

आश्रम की ओर रवाना

घड़ी में चार बजने वाले हैं। खान पान के बाद उद्यान के ही अलग अलग हिस्सों में मुझे राज ले जा रहा है। पेड़ों पर बैठे पक्षियों की तादाद भी बढ़ गई है।

एक एक कर इसी कोशिश में हूँ की हर कोण से अच्छी तस्वीर आ जाए। ऐसे ही एक कच्चे रास्ते पर राज ले कर आ गया जहाँ कोई नहीं।

हर ओर की भांति यहाँ भी एक तरफ पानी से भरा तालाब है। दूर सड़क पर निकल राज को कैमरा पकड़ा कर कुछ तस्वीरें निकलवाई।

केवलादेव में सैर पर निकलने के बाद

साइकिल के साथ तस्वीरें अच्छी आई हैं। दूर तालाब में जिसमे पानी कम है उसमे नील गाय के साथ सांड भी देखे जा सकते हैं। यहाँ बिलकुल भी इंच भर का प्रदूषण नहीं है।

शहर में तो सांस लेना भी मुश्किल हो जाता है अब। किसी काल में प्रदूषण से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं होता था। पंछी पक्षियों का दल आराम से देख पा रहा हूँ जो अब शहरों से लुप्त है।

शाम के वक्त पंछियों की संख्या बढ़ गई है और साथ ही पर्यटकों की भी। अधिकांश पर्यटक रिक्शे में सवार हो कर आ रहे हैं। रिक्शे वाले ही पर्यटकों के मार्गदर्शक हैं।

कई तस्वीरबाज भी अलग अलग स्थानों पर नजर आ रहे हैं। सभी इस पर्यावरण का आनंद उठा रहे हैं। दुर्लभ ही ऐसे हैं जो यहाँ तक पैदल यात्रा कर के आ रहे हैं।

तय हुआ की अब उस आश्रम में चला जाएगा जहाँ सुबह बाबा नहीं मिले थे। मार्ग में लोमड़ी भी देखने को मिल रही है। कटा हुआ वानर भी। जिसका मूह फटा हुआ है। मालूम पड़ रहा है झगड़ कर आया है।

टोल से आगे निकल कर हम आश्रम आ पहुँचे। यहाँ बाबा जी दिखे जो कछुए को खाना खिला रहे हैं। यहाँ हिरण भी आते हैं पर बाबा ने बताया की उसने संतान को जन्म दिया है जिसके कारण वो अभी नदारद है।

नमूने के तौर पर बाबा ने बगीचे में बैठे सभी बंदर को खाने पर बुलाया। प्यार भरी आवाज सुन कर सभी बंदर उनकी ओर खींचे चले आए।

यहाँ रात में अजगर भी आता है और टहल कर निकल जाता है। एक साथ इतने सारे बंदरों को खाता देख आश्चर्य की बात है। हालांकि कुछ उपद्रवी लड़ भी रहे है पर अधिकांश शांत हैं।

आश्रम में सैकड़ों वानर एक साथ खाना खाते हुए
वृंदावन से भरतपुर 75किमी

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