केदारनाथ से बद्रीनाथ तक का सफर

उत्तराखंड | बद्रीनाथ | भारत

भागदौड़

कल दिनभर की माथापच्ची के बाद भी कुछ खास हांथ नहीं लगा। बस लगा है तो एक चल चित्रण। जिसको देख ये सांत्वना मिल रही है की जूते कैसे चोरी हुए थे।

बद्रीनाथ जाने के लिए बस की टिकट के लिए काफी मारामारी रही। जिसके चलते साथी घुमक्कड़ को काफी भाग दौड़ करनी पड़ी। साथी घुमक्कड़ की सजगता और सक्रियता के चलते काफी जल्दी टिकट मिल गया। इस भागदौड़ में साथी घुमक्कड़ गुजरात से कुछ नए मित्र भी बना लिए थे।

कल कपड़ा धुलाई के बाद काफी बेहतर महसूस हो रहा है। सुबह नित्य क्रिया के बाद तंबू बांधा और बैग पैक करके सोनप्रयाग चौराहे पर आ पहुंचा हांथ में टिकट लिए।

जहां मेरी मुलाकात गजेंद्र और हंसमुख से हुई। बस को निकलने में अभी कुछ वक्त लगेगा शायद क्योंकि कुछ सवारियां अभी पहुंची नहीं हैं। जिनका इंतजार हो रहा है।

ये इंतजार लंबा खिंच गया मगर सवारी का कोई अता पता नहीं। आखिरकार बस को उनके बिना ही निकलना पड़ रहा है। शायद सवारी सोती रही गई होगी या उनकी योजना ही बदल गई होगी बद्रीनाथ जाने की।

भोलेनाथ का जयकारा लगाते हुए चल पड़े अपने रास्ते। सोनप्रयाग की व्यस्त सड़को के बीच बस निकल रही है। यहां रात के अंधेरे में आते समय कुछ भी पता नहीं चल पा रहा था। वहीं जाते समय सब कुछ अच्छे से दिखाई पड़ रहा है।

अलकनंदा नदी के किनारे गाड़ी पार्क करने का एक विशालकाय टावर बनाया गया है। जगह और सुविधा को मद्देनजर रखते हुए अच्छा कदम है।

छोटी सी सड़क पर भीषण जाम तब भी लगा था और आज भी लगा है। बस यहां से निकल ही रही थी की बात उठी चंद्रशिला और चंद्रताल की।

जहां धरती का सबसे ऊंचाई पर कोई शिव मंदिर है मौजूद है। हालांकि कैलाश से उपर नहीं जहां स्वयं भगवान का वास है। इस जाम वाली जगह से निकलने में ही काफी मशक्कत करनी पड़ी।

बस खराब

कुछ किमी का सफर तय ही हुआ था की फाटा नाम की जगह पर टायर के फटने की आवाज आई। हड़बड़ी में बस रुकी। कंडक्टर ने उतर कर देखा तो पता लगा बस का पिछला टायर पंचर होने की बात कही। ये पहली बार नहीं हुआ है की बस खराब हुई हो।

चंडीगढ़ से जब से सफर शुरू किया है तब से ही कुछ ऐसा सिलसिला बरकरार है। चाहें फिर वो मनाली जाते समय हो या फिर शिमला। पहाड़ों में शायद बस का खराब होने का सिलसिला आम है।

कंडक्टर और ड्राइवर ने एक घंटे का समय दे कर हमे मानो खुला छोड़ दिया है। शुक्र है पास में ही एक छोटी दुकान है। जहां मेरी ही तरह सब सवारियां चाय के मजे लेने में जुट गई हैं।

चाय बिस्कुट भी हो गया पर गाड़ी न ठीक हुई। चाय का स्वाद कुछ अच्छा नहीं लगा। चाय पर इस छोटी सी चर्चा में आगे की यात्रा योजनाओं की बात होने लगी।

सड़क के दूसरी तरफ एक खंडहर मंदिर है। जिसमे कुछ सवारियां जाती दिख रही हैं।

मौके का फायदा उठा कर मैं, साथी घुमक्कड़ और वो दो गुजराती बंधु भी साथ में आ गए। कुछ वक्त बिता ही है की बस का हॉर्न बज पड़ा। आखिरकार पैंतालीस मिनट बाद टायर बदला जा सका है।

साथी घुमक्कड़ ने कल सबसे पहले टिकट बुक करा लिया था जिसके कारण हमारी सीट सबसे आगे है। और उन दोनो गुजरात से आए हुए नए सखाओ की भी।

दौड़ते हुए बस की तरफ आया और अपनी सीट पर विराज गया। कड़ी धूप में बस का आगे बढ़ने का सिलसिला शुरू हुआ। अनेक मोड़ से मुड़ते हुए चोपता, रुद्रप्रयाग तक आने में ज्यादा समय नहीं लगा।

अच्छी बात ये है की सोनप्रयाग तक आते आते जितनी बस और जीप बदलीं थी इस बार ऐसा कुछ नहीं है। जिसमे समय काफी जाया हुआ था।

रुद्रप्रयाग से कर्णप्रयाग तक का सफर शहर के बीच से होते हुए है। जहां हर तरफ भीड़ ही भीड़ दिखाई दे रही है। शहर के बाहर आते ही सिर्फ जंगल और पहाड़ों के घुमावदार रास्ते। जिन पर चढ़ते हुए उसे पार कर के दूसरे पहाड़ पर जाना होगा।

पर पहाड़ पर चढ़ जाने के बाद जब नीचे की ओर देखो तो लगता है की हेलीकॉप्टर होता तो घंटों का सफर मिंटो में पूरा हो जाता।

इसी कारण पहाड़ों पर सफर बहुत लंबा हो जाता है अक्सर। नंदप्रयाग तक आते आते ड्राइवर साहब को याद आया की सवारियां भूखी होंगी।

 

उनकी कृपा से आखिरकार सफर कुछ देर के लिए थमा और आखिरकार सब सवारियां किसी एक ढाबे पर अपना अपना इंतजाम देखने लगीं।

इस भीषण धूप में मैने चाय की बजाय कुछ ठंडा लेना ज्यादा बेहतर लगा और साथ ही ब्रेड पकोड़ा भी। तकरीबन आधे घंटे के इस ठहराव में कुछ लोग हल्के होने निकल पड़े। इसमें ड्राइवर और कंडक्टर भी सम्मिलित हैं।

हॉर्न बजा कर सवारियों को अपनी तरफ बुलाना मानो चलन में है। जिसे सुन सब दौड़े चले आते हैं। ठीक वैसा यहां भी हो रहा है।

भुगतान कर सब भागते हुए बस की ओर दौड़ पड़े। तपती गर्मी में तपती बस की खुली खिड़कियों से हवा का सहारा है। बस में कुछ विद्वान लोग भी हैं जो अपने ज्ञान की वर्षा कर सबका मन हर रहे हैं।

बस ने मारी टक्कर

बातों में सब जमकर मशगूल थे कि तभी बस टकरा गई किसी छोटी गाड़ी से। कुछ गुस्साए लोग छोटी गाड़ी से निकले जिन्हे देख लग रहा है की जम कर उधम काटने की फिराक में हैं।

ड्राइवर को बस से उतारा और उससे पहले वो कुछ बोलता की उसके गाल पर दो थप्पड़ जड़ दिए। इधर बस से कुछ चौंडे लोग भी मामले को सुलझाने के लिए उतरे। उनमें से एक गुजराती भाई भी हैं।

बस से नीचे उतर कर पीछे खड़े हो कर एक टूक देख ही रहा हूँ मैं। अन्य लोगों ने हक्षत्शेप कर मामले को रफा दफा करने का प्रयास किया मगर छोटी गाड़ी वाला मामले को तूल देने पर अड़ता दिख रहा है। किनारे खड़े गजेंद्र भाई ने ये सब देखा और बातचीत कर मामले को सुलझाया।

यहां बात सिर्फ ड्राइवर की नही बल्कि उसके साथ चल रही बस की सवारियों की भी है। जिनको समय से पहुंचाने का लक्ष्य भी है। बस दोबारा चलने के बाद अब इसी पर चर्चा होने लगी।

शायद अगर कुछ सवारियां न उतरती तो ड्राइवर का बुरा हाल होना तय था। जिस अंदाज में वो छोटी गाड़ी वाला अक्रमक था। हालांकि उसकी गाड़ी का पिछला हिस्सा टूट कर सड़क पर गिर गया था।

मगर इसमें बस चालक की नाम मात्र की गलती भी नहीं थी। अगर चोटी गाड़ी ओवरटेक ना करती तो शायद ये स्तिथि पैदा ही न होती।

शाम होते होते मौसम धूप से बारिश में तब्दील हो गया। झमाझम बारिश खिड़कियों से होते हुए अंदर तक आ रही है। सफर अब रोमांच में तब्दील हो चला है। कुछ देर में सूरज भी डाल जाएगा।

बारिश में अलकनंदा और भी तेज हो गईं। जब बिजली कड़कती तो पहाड़ों के बीच बह रही सिर्फ नदी के अलावा कुछ ना दिखता।

बस का माहौल भी कुछ बदल गया। बात जब बद्रीनाथ जाने की है तो उसका इतिहास की न हो तो व्यर्थ है। बस में बैठे कुछ विद्वानों की ज्ञानचक्षु खुल गए।

शुरुआत में तो आठ दस लोग उतरे थे। पर ज्ञान के अभाव के कारण अंत होते होते महज दो बचे। मैं इन सब बातों को अच्छे से सुन रहा था। ताकि यह महत्वपूर्ण जानकारी कंठस्थ हो जाए।

सड़क शुरुआत में तो अच्छी भली थी, मगर आगे बढ़ते बढ़ते हालत खस्ता हो चली थी। चमोली पहुंचते पहुंचते गुरुद्वारा श्री हेमकुंड साहिब को पर कर गए।

पर ड्राइवर साहब यहां बस रोकने के बिलकुल का कोई इरादा नहीं जान पड़ा। सफर अब सिर्फ कुछ किमी का शेष है। पर लंबा है।

महाभरत का इतिहास

इसी बीच मुझे शांतनु से ले कर अभिमान्युं तक के बारे में विस्तृत जानकारी बस में बैठे विद्वानों से मिल रही है।

बाकी लोग अपनी अपनी कुर्सी छोड़ कर बहुत ध्यान से ये सब सुन रहे हैं। रास्ते में केदारनाथ के जैसी बनावट का मंदिर भी देखने को मिला था। कहां ये याद नहीं।

देर रात हम बद्रीनाथ पहुंच गए जहां पहले तो तंबू गाड़ने पर विचा किया पर गुजराती भाइयों की दरख्वास्त पर साथ ही रुकने का फैसला लिया।

सोनप्रयाग से उखीमठ से से रुद्रप्रयाग से कर्णप्रयाग से गोपेश्वर से जोशीमठ से बद्रीनाथ तक का कुल सफर 280km

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