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केदारनाथ में चुकानी पड़ती है कीमत

केदारनाथ में रहें सावधान

साधना

रात के बारह बज रहे हैं। घूम फिर के आया अब सोच रहा हूँ जैसा पंडित जी ने सुझाया वैसा ही के लिया जाए। दर्शन तो संभव नहीं।

जूते उतार कर आ गया कपाट के सामने अध्यात्म करने। यहाँ एक माता जी पहले से ही अपने बीमार बेटे को लिए बैठी हैं। जो मंदिर के कपाट खुलने का इंतजार कर रही हैं।

कपाट तो चार बजे से पहले खुलने से रहे। सो मैं भी इनकी तरह बैठ कर ध्यान लगा के देखूं। क्या पता खुद को हवा में महसूस करूं।

जाली के अंदर आकर बैठ गया। अजय मेरी ओर मुख करके बैठा है। भगवान मेरे मुख पर थोड़ी हैं। इसलिए उसे टांकते हुए कपाट की तरफ बैठने को कहा।

मंदिर की दीवार पर बहुत पुरानी मूर्तियां बनी हुई हैं। जो दीवार में चिन्हित हैं। दशकों पुरानी ये मूर्तियां कुछ संदेश देती नजर आ रही हैं।

गणेश और पार्वती। आंख बंद की और ध्यान करने लगा। आंख बंद करने के बाद दस मिनट के लिए आंख भी लग गई। फिर से ध्यान करने की कोशिश करने लगा।

जैसा ब्राम्हण देव बोले थे ऐसा कुछ भी आभास होता नजर नहीं आ रहा है।

जूते गायब

सो उठा और चल पड़ा। बेंच के पास जूते उतारे हैं सो वहीं आ गया।

जूते कहीं भी नजर नहीं आ रहे। जूते हैं ही नहीं कहीं भी। मुझे अंदाज़ा हो चुका है कि केदारनाथ के द्वार से जूते चोरी हो गए हैं। वो भी दो जोड़ी ट्रेक्किंग जूते।

जाली से बाहर निकलते हुए अजय को बताया ही कि उसके होश फाख्ता हो गए। उसको यकीन ही नहीं हो रहा है कि ऐसा हो चुका है।

पर मैं हैरान नहीं हूँ। इसलिए भी नहीं हूँ क्यूंकि जिस हिसाब से जूता या सामान जनता के भरोसे डाल दिया करता था उसका ऐसा नतीजा तो होना ही था। सो आज वही हुआ।

पर ये नहीं समझ पा रहा ही आखिर इस आधे घंटे में दो जोड़ी जूते गए तो गए कहाँ! सावल है खड़ा होता है। अब जब जूते नहीं मिल रहे हैं तो क्या किया जाए।

बाहर पड़े चप्पलों के ढेर में से एक पैर में चप्पल पहनी और दूसरे पैर में कोई दूसरी चप्पल। इस बेजोड़ सांठगांठ से चलने में दिक्कत हो रही है पर जब तक जूते नहीं मिल जाते ऐसा ही करना पड़ेगा।

जिसके मिलने की उम्मीद कम है।

मैं मंदिर का चक्कर लगाते हुए मंदिर के पिछले हिस्से से गुजर रहा हूँ। कई पंडे या तो जा चुके हैं या फिर यहीं सोते मिले। ये इसी तरह रात भर यूं ही जागते रहेंगे?

विधि विधान से किए दर्शन

विशेष पूजा वाले द्वार पर भीड़ ना के बराबर है। बाहर खड़े पुलिस के नौजवान को सारी घटना सुनाई। और उनसे आग्रह किया कि परिसर में लगे कैमरे से हमें जूते चोरी होने की घटना दिखाएं।

इस पर उन्होंने सुबह चार बजे आने को कहा। चार बजने में तो अभी तीन घंटे हैं। तब तक इसी पुलिस वाले ने विशेष पूजा द्वार से हमें अन्दर जा कर दर्शन करने को कहा।

अन्दर बैठे पुलिस वाले ने भी जाने की अनुमति दे दी। अन्दर आया तो देख रहा हूँ मंदिर की दीवारों पर अलग अलग देवी देवताओं की मूर्तियां स्थापित हैं।

सभी देवी देवताओं को नमस्कार करते हुए अन्दर आया। अन्दर देख रहा हूँ कि विशेष पूजा अभी भी चल रही है। वो भी बड़े इत्मीनान से।

अजय अपने साथ गंगोत्री से गंगा जल साथ ने ले कर आया है। जिसे यहाँ केदार पर चढ़ाया जाता है। जब वो पिपिया खोलने लगा तो बोतल में मैं भी हाँथ लगा रहा हूँ।

पंडित जी बाकायदा विधि विधान से हमारी भी पूजा करवा रहे हैं। शिवलिंग के बजाय यहाँ पत्थर की एक बड़ी शीला है। जिस पर हमसे बारी बारी से घी लगवाया।

पूजा समापन के बाद गर्भ गृह से बाहर आ कर मंदिर परिसर के अंदर ही कपाट के पास बैठ गया। अकारण ही चेहरे पर मुस्कुराहट आ रही है।

सोच रहा हूँ अगर जूते चोरी ना होते तो क्या इतनी देर तक और इतने विधि विधान से पूजा कर पाता। अभी सुबह के चार बजते ही कपाट खुल जाएंगे और जाहिर है हजारों की तादाद में गेट के उस पार लोग खड़े होंगे।

लगभग पैतालीस मिनट समय बिताने के बाद लग रहा है कि एक बार फिर से गर्भ गृह में जा कर दर्शन करूं। और फिर से यही करने निकल पड़ा।

मंदिर के बीच में रॉड लगी है जो आने और जाने वालों को अलग अलग बांटती है। एक अंतिम बार दर्शन किए। दीवार पर गड़े सभी देवी देवताओं के पैर छुए और बाहर की ओर चल पड़ा।

जूते चोरी होने और दर्शन के बाद मुँह लटकाए खड़े लेखक और उनके साथी

मंदिर के बाहर अघोरी

बाहर कुछ लोग अभी भी टेहल रहे हैं। पंडे अपने अलाव जला कर नंगे बदन बैठे हुए हैं। ऐसे ही एक पंडे के पास पहुंच गया आग तापने।

पंडे बेहद ही चालक और दिमागी है यहाँ और शकल से खतरनाक भी। ऐसा लगता है मानो अपने चेहरे से ही तंत्र मंत्र करके सम्मोहित कर लेंगे।

मगर ये पंडा बाकियों से नरम और रहम दिल का मालूम पड़ रहा है। कुछ आसपास खड़े लोग इसके पास इसी के अलाव से आग ताप रहे हैं और ये मना भी नहीं कर रहा।

मुझे जूते मिलने की उम्मीद तो ना के बराबर है पर जूते कैसे चोरी हुए वो तो देख सकता हूँ केमरे की मदद से। जो मंदिर परिसर में लगे हुए हैं।

यही बात अजय के दिमाग में भी चल रही है। इधर पंडे को अपनी जूते चोरी होने वाली समस्या बताई। पर उनके सुनने के लिहाज से उन्हें ये आम लगी।

रात कहाँ बीतेगी इसका कोई अंदाज़ा नहीं लग पा रहा। आधे घंटे की सिकाई लेने के बाद पंडे ने सबको किनारे करना चालू किया।

ना मिला कहीं सोने का ठिकाना

नींद जोरों की लगी है। बस लग रहा है कहीं सोने का ठीकाना मिल जाए। पंडे के किनारे करने के बाद लगा बेंच पर ही सो जाऊं।

पर कमबख्त ठंड इतनी कड़ाके की पड़ रही है कि सुबह तक मेरे ऊपर बर्फ जमी मिलेगी। बड़ी सी पीली इमारत की बंद पड़ी दुकान की बेंच पर कुछ देर पहले कोई नहीं सो रहा था।

क्यों ना यहीं चल कर व्यवस्था देखी जाए। अभी तक तो खाली ही पड़ा था। पास आया तो देखा लकड़ी के इस तख्त पर कोई साधु महाराज सो रहे हैं।

अभी कुछ देर पहले तक ये खाली पड़ा था। केदारनाथ की ओर आते वक्त कुछ दुकानें हैं। जिनमे से एक मकान मलबे में धंसा हुआ है।

यहाँ आ कर देखा तो ऐसा खंडहर पड़ा हुआ है कि सालों से किसी ने दरवाज़ा नहीं खोला होगा। सामने चमचमाती दुकान की रोशनी मुझे खींच लाई इस दुकानदार के पास।

पास आकर पूछा कि “भैया क्या सोने की व्यवस्था हो पाएगी”

इस पर तर्रा कर बोले “यहाँ कोई व्यवस्था नहीं हो पाएगी और ना ही पर्याप्त जगह है। भाग जाओ यहाँ से।”

मानवता तो मानो है ही नहीं केदारनाथ में। इसीलिए भगवान ने अपना लोटा लुढ़काया था। जिसका नतीजा इं दुष्टों के साथ साथ मासूमों को भी भुगतना पड़ा था।

टहलते टहलते केदारनाथ की सीढ़ियों से नीचे उतरने लगा। जहाँ तक रोशनी है वहाँ तक आ गया। इसके आगे अंधेरा है तो वापस मंदिर की और लौटने लगा।

अब एक ओर जहाँ जूते चोरी होने का गम है तो वहीं दूसरी ओर आंखो में भयानक नींद। सो इसलिए भी नहीं रहा हूँ क्यूंकि पुलिसवाले ने बोला है कि चार बजे ही कुछ हो सकता है।

चार बजने का इंतज़ार

अब चार बजने में महज घंटा भर बाकी है तो क्या ही सोया जाए एक घंटे के लिए। सोने के लिए रात के इस अंधेरे में गली कूंचों से होते हुए आया एक घर में।

वापस से उसी टीन के पास आ गया जहाँ पर एक शक्श ने कमरा पूछा था। यहाँ तो लोग ऐसे घोड़ा बेंच के सो रहे हैं जैसे सोने ही आए हों।

खर्राटा प्रतियोगिता चल रही है। सोने का तो मेरा भी बहुत मन है पर जगह कहीं भी नहीं है। और जहाँ जगह है वहाँ गीला पड़ा है।

टीन से बाहर निकल कर आगे बढ़ रहा हूँ। जहाँ अभी भी मलबा देखा जा सकता है। और बड़े बड़े पत्थर भी। जगह ढूंढते ढूंढते। यहाँ किसी एक घर का दरवाजा खोला तो वो पूरी तरह से खुलता ही गया।

अन्दर आ कर देखता हूँ कि लोगों का हुजूम लेटा हुआ है बेसुध। जिसे खबर ही नहीं है कौन आया है कौन गया। मन तो कर रहा है खाली जगह पर सो जाऊं।

पर जितने आश्चर्य ये मुझे देख कर होंगे उतना ही मैं भी। इससे बेहतर है बाहर निकल चलूं। सो बैग लेके बाहर ही आ गया। सुबह के साढ़े तीन बज रहे हैं मंदिर के सामने भक्तों की कतार लगनी भी चालू हो गई है।

क्यूंकि ठीक चार बजे मंदिर के कपाट भक्तों के लिए खोल दिए जाएंगे दिन के बारह बजे तक ताकि भक्त आराम से दर्शन कर सकें।

और ठीक चार बजे वीडियो कंट्रोल रूम में हमें जूते चोरी होने की जानकारी के लिए भी बुलाया गया है। सो भरे जाड़े में बिना पलके झपके इसी आस में बैठा हूँ।

हैंडपंप के पास नजर पड़ी तो वहाँ एक जनाब नहाते हुए दिखाई पड़े। इतनी भीषण ठंड में इनको नहाता देख आश्चर्य की बात है।

कतार लंबी होती ही चली जा रही है। जितनी जल्दी कतार में लग कर दर्शन के लिए जाएं उतना सुगम। उतने ही आराम से दर्शन जो जाएंगे।

टालू रवैय्या

चार बजते ही मैं पुलिस वाले के पास आया। पर ये जनाब बोलने लगे कि “अभी तो कंट्रोल रूम खुला भी नहीं है, और ना ही कोई आसपास मौजूद है वहाँ तुम छह बजे आना।”

उनका संदेसा ले कर मैं वापस आ बैठा बेंच पर। छह बजे ही आना था तो रात में सो लेता कहीं भी। आसपास कुछ दुकानें खुलने की आवाज आ रही है।

पंडे भी कुछ कम हो गए हैं। रात में इनकी तादाद ज्यादा थी। बीच बीच में आग भी सेक ले रहा हूँ ताकि ज़िंदा बना रहूँ।

मंदिर में दर्शन के लिए लगी लाइन अब टीन की छांव तक जा पहुंची है। जैसे जैसे समय बड़ेगा ये कतार और विकराल रूप धारण कर लेगी।

मंदिर परिसर में पड़ी बेंच पर सोते लेखक

कतार को संभालने के लिए सुरक्षाकर्मी भी बखूबी जद्दोजहद करते नजर आ रहे हैं फिर चाहें वो महिला हो या पुरुष। कोई बीच मे घुस रहा है तो लाठी भांजने में भी देर नहीं कर रहे हैं।

और उसे उठा कर पीछे की ओर धकेल रहे हैं। जो बेंच मंदिर के कपाट के पास पड़ी है उसकी ऐसी की तैसी हो चुकी है। एक ओर झुक कर टूट सी गई है।

छह बजने का ही इंतजार था और छह बजते ही पुलिस वाले के पास आया। फिर से उन्होंने वही राग अलापा। और बोलने लगी चाभी इस लाउडस्पीकर वाले कमरे में है जिसके खुलने का इंतजार करना पड़ेगा।

और अब समय दे दिया आठ बजे का। मतलब अभी दो घंटे और इंतजार करना पड़ेगा! हर बार टरकाते हुए ही नजर आ रहे हैं। यही बात रात में बता देते तो ठीक से सो तो लेता कहीं जगह ढूंढ कर।

एक तो नींद ऊपर से इनका काम टालने वाला रुख। इसी ढीले शाशन प्रबंधन से जनता दुखी है। अब तक अच्छी खासी भीड़ हो चुकी है।

कंट्रोल रूम का तो पता नहीं पर अन्दर की ओर जाती हुई गली में कोने में पड़ती हुई दुकान जरूर खुल गई है। कुछ नहीं तो सुबह की चाय ही सही।

चाय गरम

हल्की फुल्की भीड़ और सर्द हवाओं के बीच चाय का ग्लास थामा और पहला घूंट उतारा। कुछ बेहतर पर बहुत ही कम मात्रा में ये चाय राहत दे रही है।

इस जरा सी चाय के दाम जरा से नहीं हैं। मन तो है एक कप और पीने का मगर इतनी ऊंचाई पर इतने दाम में दो तीन कप चाय मिल जाएगी शहर में।

केदारनाथ मंदिर में दर्शन के लिए भीड़ काफी हो चुकी है। एक लाइन में बहुतेरे पंडे आ कर बैठ गए हैं। और सभी ने अपनी दुकान सड़क पर बिछा ली है।

जो कोई भी भक्त मंदिर से दर्शन करके निकलता उसी को ये पंडे पकड़ लेते। सुबह के सात बजे इस कदर भीड़ है तो ना जाने दिन में क्या हाल होता होगा।

फिलहाल तो मुझे आठ बजने का इंतजार है। मंदिर के पीछे की बर्फीली पहाड़ियां बहुत ही सुन्दर नजर आस रही हैं। पैरों में जूते होते तो चोराबाड़ी झील भी जाता।

सुबह से यहाँ का मौसम बिगड़ा हुआ है। कभी यहाँ बारिश होने लगती कभी मौसम साफ हो जाता। सर्दी इतनी बढ़ गई है कि हमें जैकेट के ऊपर रेनकोट पहनना पड़ रहा है।

ठंड इस कदर है की ये मोटी जैकेट भी इसके सामने विफल होती नजर आ रही है।

इधर मंदिर से बाहर निकल कर लोग नंदी महाराज के कान में कुछ फुस फुसा रहे हैं। लोग सिक्के भी चिपकने में तुले हुए हैं।

मंदिर से ताज़ा तरीन आरती की थाली बाहर लेकर नवयुवक ब्राहमण देव पधार चुके हैं। लोगों में खासा उत्साह है। भीड़ आरती लेने को उतारू है।

और ये ब्राह्मण देव आरती की थाल ले कर निकल गए टीन की तरफ जहाँ हजारों की तादाद में भीड़ है।

केदार घाटी में बदलता मौसम

मंदिर की सीढ़ियों पर नजर पड़ी तो बादलों का बहुत बड़ा गुब्बार आते हुए दिखाई दे रहा है। अभी तक जहाँ अच्छी खासी धूप थी।

अब वहीं अंधेरा होता नजर आ रहा है। गुब्बार को आता देख अचानक से घोषणा होने लगी और चेतावनी जारी कर दी गई इस बादलों के गुब्बार के विषय में।

केदार घाटी में बिगड़ा मौसम

इसे सुन जानता सचेत हो गई है। सबने अपने बदन पर रेनकोट टांग लिया है। घने बादल ऐसे आ रहे हैं मानो अपने साथ ले जाने को तैयार हों।

बादलों के आते ही केदार घाटी में अंधकार छा गया है। हल्की फुल्की बूंदाबांदी और पांच मिनट के अंधेरे के बाद बादल गायब। भीड़ अपने अपने काम में वापस मगन हो गई।

पिट्ठू दल भारी मात्रा में सीढ़ियों के समीप खड़े नजर आ रहे हैं। सवारियों के इंतजार में। यहाँ इन्हें सवारियों का इंतजार है और मुझे आठ बजने का।

आठ बजते ही वापस उसी इमारत के पास आया जहाँ से घोषणा हुई थी। यहाँ आ कर पता चला कि कंट्रोल रूम की चाभी ही नहीं है इनके पास।

सो सिवाय तमाशा देखने के कोई विकल्प नहीं बचा रहा था। फिलहाल तो इन पुलिस वालों ने हमारा तमाशा बना दिया है। मंदिर के निकास गेट पर खड़े एक मोटे पुलिस वाले के पास आया।

इन महाशय को देख कर ही लग रहा है गड़बड़ है। इन्होंने हमारी व्यथा सुनने के बाद छूटते ही कहा “अरे रोजाना ही किसी ना किसी के जूते चोरी होते हैं, तुम भी किसी के पहन लो।”

जब उन्हें जूते की कीमत बताई और समझाई तब शायद कहीं उन्हें समझ आईं की किस जूते की बात कर रहे हैं हम। अन्यथा कोई मामूली जूते होते तो मैं भी सो जाता कहीं ना कहीं और सोनप्रयाग के लिए निकल भी लेता।

तारीख पे तारीख

अब कुछ देर और इंतजार करने और नौ बजे आने को कहा। अब दशा और दिशा दोनों ही खराब हो रही है। वापस आ कर मंदिर के पास पड़ी बेंच पर बैठ गया।

एक सज्जन हाँथ में लोटा लिए मेरे पास खाली पड़ी जगह पर आ कर बैठ गए। सोनप्रयाग से केदारनाथ के अपने सफर और घटनाक्रम के बारे में जिक्र करने लगे।

इनका हाल भी कुछ हमारी तरह ही रहा। जब सोनप्रयाग में कमरा मिलना मुश्किल हो गया। कान तो तब खड़े हो गए जब इन्होंने बताया कि एक रात का ₹11000 का कमरा लिया।

मेरी तो नींद ही उड़ गई। अजी जनाब जब आप इतने ही रहीसजादे हैं तो उड़नतस्तरी से आना चाहिए था। केदारनाथ घाटी तक ₹25000 खर्च कर डाले।

जाने पैसा खर्च करते हुए आए हैं या बांटते हुए। हाँथ में लोटा लिए बैठे अपने परिवार का इंतजार कर रहे हैं। ताकि वो भी जल चढ़ा कर बाहर निकल आएं तो यहाँ से रवाना हों।

थोड़ी ही देर में मौसम अचानक से बदल गया। आसमान से बादल हट कर खिलखिलाती धूप निकल आई। बस इसी धूप का इंतजार था।

धूप निकलते ही बदन से रेनकोट और जैकेट सहित टोपा भी उतारना पड़ेगा। अब गर्मी का एहसास हो रहा है। अपने परिवार के आते ही ₹11000 वाले अंकल अलविदा लेके निकल लिए अपने रास्ते।

शायद अब वापस सोनप्रयाग के लिए प्रस्थान करेंगे।

गगन वापसी

इधर इतने में गगन आ गया। जो कल शाम को हमें रास्ते में मिला था। गगन के आते ही उसने सारा हाल चाल पूछा।

बेहोशी की हालत में तस्वीर खींचते हुए लेखक

तोते की तरह एक स्वर में उसे सारा किस्सा बयां किया। जिसे सुन वह दंग रह गया। उसने अपना जुगाड टेंट में देख लिया था। गगन बताने लगा कि वो लाइन में ही लगा था हमें देख वो दौड़ा चला आया मिलने।

आंखो मे नींद भरी है। कभी बेंच पर सर रख के सो रहा हूँ तो कभी खुद की गोद पर। पता नहीं बिना नींद के क्या होगा। और ये कंट्रोल रूम वाली कार्यवाही कब बढ़ेगी।

इतने में गगन कैमरा ले कर कुछ तस्वीरें निकालने लगा। मेरा हाल इतना बुरा है कि ठीक से फोटो भी नहीं ले पा रहा हूँ। होश ही नहीं है कैमरा कैसे पकड़ना है।

और ध्यान ही नहीं लग रहा है फोटो खींचने में। गगन को मना करने में जरा भी नहीं हिच्किचाया और वापस आ बैठा बेंच पर।

हाँथ पैर में कंपकपी सी होने लगी है। शायद नींद ना लेने की वजह से भी ऐसा हो सकता है। कुछ देर गगन रुका और मंदिर के दर्शन के लिए प्रसाद लेने निकल गया।

चढ़ावा ले कर फटाफट लाइन में भी लग गया। वापस उसी लाइन में लग गया जिसे बीच मे छोड़ कर आया था। इधर मैं भी अपना कंट्रोल रूम की कारवाही देखूं।

दुकान सजाए बैठे पण्डे

मंदिर परिसर के बाहर पंडे एक कतार में बैठे हुए हैं। सुबह एक नया पंडा दिखा जो रातभर नदारद रहा। शायद अपनी नींद पूरी कर रहा होगा।

ये अपने आप में ही बहुत चकड लग रहा है। कोई और पंडा ना तो इसकी जगह पर बैठ रहा है और ना ही उसके पास भटकने की जुर्रत।

एकदम सजी धजी मुद्रा में ये बाबा तभी फोटो खींची रहा है जब कोई उसके लोटे में लक्ष्मी को भुगतान कर रहा है। अन्यथा मैंने उसको आलतू फालतू लोगों को भागते भी देखा है।

आखिरकार कब खुलेगा। दस बजने को आए हैं और कंट्रोल रूम मे अभी तक ताला पड़ा हुआ है। मंदिर के स्पेशल दर्शन के लिए जहाँ से रसीद बनती है और घोषणा वहाँ भी ताला पड़ गया है।

गगन के पीछे दुकान सजाए बैठे पण्डे

एक पुलिसकर्मि ने बताया कि जबतक दूसरे कर्मचारी बेस कैंप से नहीं आयेंगे तब तक कंट्रोल रूम नहीं खुल सकता। क्यूंकि चाभी उन्हीं के पास रहती है।

अब तक तो उन्हे आ जाना चाहिए था या फिर कोई उन्हें बुलाने जाए। अब ये पुलिसकर्मी तो जाने से रहे तो बेहतर होगा मैं ही इस फटेहाल में पहुंच जाऊं।

बेस कैंप की ओर प्रस्थान

आखिर जूते चोरी होने की रिकॉर्डिंग भी तो मुझे ही देखनी है। रिकॉर्डिंग देखने के बाद कुछ तस्सली मिलेगी। सो चल पड़ा अजय के साथ बेस कैंप की तरफ।

जो यहाँ से लगभग दो किमी दूर है। बैग उठाया और नंगे पैर ही निकल पड़ा। मंदिर की सीढ़ियों से उतरते वक्त चौतरफा दुकानें खुल चुकी हैं।

और भारी भरकम भीड़ है। जो कतार टीन की छांव तक थी वो अब पीछे से होते हुए यहाँ तक आ पहुंची है। तकरीबन एक किमी लंबी कतार।

जिन्होंने सुबह दर्शन कर लिए थे वो ऐसी कतार से बच गए। नंगे पैर चलने से ये बड़े बड़े पत्थर के ऊपर चलना दूभर हो गया है। फिर भी पीठ पर बैठ और हाँथ में कैमरा लिए चले जा रहा हूँ।

बेस कैंप तो नहीं पर दूर से सामने की ओर आते हुए हेलीकॉप्टर जरूर देखे जा सकते हैं। जब ऊपर था तो यही हेलीकॉप्टर नीचे दिखाई से रहे थे अब यही आमने सामने।

बादलों के होने के कारण ये छुप भी जा रहे हैं।

हेलीकॉप्टर सेवा

जैसे ही बेस कैंप पहुंचा वहाँ पाया कि हेलीकॉप्टर सर्विस जोरों पर चालू है। हेलीपैड के पास किसी को भटकने कि भी अनुमति नहीं है।

खासतौर पर तब जब हेलीकॉप्टर नीचे उतर रहा हो। जैसे ही हेलीकॉप्टर नीचे उतरता दिखाई पड़ा रहा है। प्रतीक्षा कर रही सवारी भागते हुए हेलीकॉप्टर के पास पहुंच रही है।

और उस हेलीकॉप्टर से आने वाली सवारी बाहर निकल रही है। ऐसे ही पवन हंस के ये हेलीकॉप्टर इन दुर्गम पहाड़ियों में अपनी सेवा दे रहे हैं।

ये सरकारी विभाग के हेलीकॉप्टर हैं जो त्रासदी में वायुसेना के विमान के साथ दिनभर जुटे रहे थे। हालांकि जब मौसम खराब होता है तो ये हेलीकॉप्टर उड़ाने नहीं भरती हैं।

उत्तम हेलीकाप्टर सेवा

हेलीकॉप्टर के पंखों से आने वाली हवा इतनी तेज़ है की मुझ जैसा कोई बलवान व्यक्ति तो टिक ही नहीं सकता। कुछ देर खड़े होने के बाद थाने की तरफ चल पड़ा।

थाने में चोर पुलिस

बेस कैंप में सैकड़ों पुलिस के कैंप भी हैं। कंट्रोल रूम के लिए बात करने को लेकर एक कैंप में आ घुसा। यहाँ आया ही कि हमें नंगे पैर देख कर हवलदार सन्न रह गए।

इस समय वो किसी अपराधी से मुखातिब हो रहे हैं और अपने बड़े साहब के सामने पेश करने के लिए उसे सवाल समझाने में लगे हुए हैं।

उनके साहब अपने कैंप से बाहर निकले और कुर्सी पर बैठ उस चोर कि बात सुनी। पहली ही बार में वो अपनी बात से मुकर गया। दोनों हवलदार मारते हुए उसे वापस ले गए।

हमसे रुखसत होने की बारी आई तो सारा घटनाक्रम उन्हे सुना डाला। जब उन्हें पता चला कोई मामूली जूते नहीं थे तब थोड़ा गंभीर हुए मुद्दे को लेके।

और हमें चौकी प्रभारी के पास जाने को कहा जो एलआईयू के कर्मचारी हैं। दो चार कैंप आगे निकल कर यहाँ आया तो मालूम पड़ा अभी किसी दूसरे केस में व्यस्त हैं इसलिए थोड़ा सब्र करना पड़ेगा।

और आधे घंटे की मोहलत देते हुए बाहर इंतजार करने को कहा। यमनोत्री की तरह यहाँ भी महिला पुरुष सबके लिए एक ही तरह की व्यवस्था कर रखी है। तब तक बालकनी जैसी बनी मिट्टी की छत पर हमारे लिए कुर्सी का इंतजाम करवाया गया।

पहाड़ी अपनी रंगत अलग ही छाप छोड़ रही है। जिस पर खूब खेती हो रखी है। इससे पता चलता है कि यहाँ किस कदर आबादी है।

एक पुलिकर्मी अपनी ड्यूटी पूरी करने के बाद पास पड़ी कुर्सी पर आ धमके और जलते हुए अलाव में हाँथ सेकने लगे। इन पुलिस वालों का ओहदा भी देश के जवानों से कम नहीं जो धूप, बारिश, मिट्टी हर तरह के मौसम में डटे रहते हैं।

थाना प्रभारी का मिला साथ

आधा घंटा बीत जाने के बाद हमें अन्दर बुलाया गया। बंकर जैसा बना ये टीन का कमरे में चारो ओर कागज ही कागज बिखरे पड़े हैं।

जब इं महाशय ने आने का कारण पूछा तो एक बार फिर से मैं तोते की तरह कहानी दोहराने लगा और फुटेज देखने की गुज़ारिश की।

और ये भी बताया कि सुबह चार बजे का समय देते देते वक्त हो चला है सुबह के ग्यारह बजे का। हमें नंगे पैर देख उनको मामला गंभीर लगा।

और उन्होंने ने कंट्रोल रूम की चाभी उठा कर साथ चलने का मन बना लिया। रात से लेकर अब तक में अभी कुछ उम्मीद जगी है।

की शायद कुछ उपाय निकल आए। या हमारा भला हो जाए। सो उन्होंने अपनी जैकेट डाली कील पर लटक रही चाभी को जेब में डाला और कुंडा डाल कर चल पड़े हमारे संग।

उसी इकलौते रास्ते से जहाँ से यात्रियों का आना जाना बरकरार है। हेलीकॉप्टर की सर्विस अपना काम कर रही है और जनता अपना।

फाटा से पुलिसकर्मी और यहाँ से भी निरंतर मात्रा ने में नीचे भेजे जाते हैं। पिट्ठू, पालकी और घुड़सवारों को पार करते हुए पथरीले रास्तों से ऊपर की ओर बढ़ रहा हूँ।

दर्शन के लिए सब कतार इतनी लंबी हो गई है जिसका मुझे अंदाज़ा भी ना था। अब तो देख कर ऐसा लग रहा है जो सबसे पीछे लगा हुआ है उसका नंबर चार पांच बजे के पहले नहीं आने वाला।

बेहद ही फुर्ती और जज्बे के साथ ये महाशय मन ही मन उम्मीद भी जगा रहे हैं। क्या पता जूते मिल भी जाएं फुटेज देखने के बाद। फिलहाल तो इनकी बातों और रवैय्ये से ऐसा ही लग रहा है।

मंदिर परिसर के पिछले भाग का नज़ारा

आखिरकार रिकॉर्डिंग देखने का मिला अवसर

मंदिर की सीढ़ियों से होते हुए आ पहुंचे आखिरकार कंट्रोल रूम। जिसका ताला खोलने के लिए चाभी लगाई तो वो पहली बार में तो खुला ही नहीं।

जवान को लगा कहीं वो ग़लत चाभी तो नहीं ले आया। इसी के चलते उसने बोल भी दिया कि यदि ऐसा हुआ तो वो दुबारा ऊपर भी नहीं अयगा।

किस्मत से दूसरी चाभी से जल्द ही ताला खुल गया। कुछ पुलिसवालों को ले कर हम सभी अन्दर हुए और छोटे से कमरे को बंद कर लिया गया ताकि और कोई दूसरा अपनी सिफारिश लेके ना घुस आए।

कमरा बहुत ही छोटा है। और इस छोटे से कमरे में कंप्यूटर स्क्रीन सहित दो चार इलेक्ट्रॉनिक डब्बे और रखे हैं। अभी जो कुछ भी मंदिर के बाहर हो रहा है वो सब हम देख सकते हैं।

कैमरा संचालक ने घटना का समय पूछा और कैमरे के डब्बे में सेटिंग कर के उसे रिवाइंड करने लगा। अभी सुबह के ग्यारह बजे से वापस रात के बारह बजे।

इसे रिवाइंड करने में ही दस मिनट बैठे बैठे बीत गए। बारह से साढ़े बारह के बीच की घटना को देखा जाने लगा। कैमरे में साफ दिख रहा है कि मैं मंदिर के कपाट के समक्ष बैठ ध्यान लगा रहा हूँ।

फुटेज चालू

बीस मिनट तो कुछ भी नहीं हुआ। पर बारह बज कर बीस मिनट पर एक आदमी बेंच के पास आ कर बैठ गया। और पांच छह मिनट बिताने के बाद बेंच के नीचे से हाँथ डाल कर जूते शॉल में छुपा कर ले जाने लगा।

ये तो एक जोड़ी जूता गया वो भी दोनों का एक एक दाहिने पैर का। पर अभी भी दो जूते हैं जो कि दोनों जनो के बाएं पैर के हैं। वो ऐसे के ऐसे ही रखे हैं।

कैमरे की रिकॉर्डिंग को और आगे बढ़ाया गया तो देखा इस बार फिर से वही चोर मंदिर के पीछे से घूम कर आया और दूसरे बेंच के नीचे से हाँथ डाल कर ले गया।

मंदिर के ऊपर लगे इस कैमरे से थोड़ा ठीक से नहीं दिखाई पड़ रहा है। तभी कमरे में बैठे एक पुलिसकर्मी के मूह से निकल पड़ा “अरे ये तो वही है!”

और इतना कह कर चुप है गया। थोड़ी चर्चा हुई और तीनों पुलिसकर्मी गुट बना कर उस चोर के विषय में चर्चा करने लगे। इनकी चर्चा से ऐसा लग रहा है कि जैसे ये चोर को भली भांति जानते हों ये।

चोर बेहद ही शातिर दिमाग का मालूम पड़ रहा है। बाकायदा ऊपर से नीचे तक खुद को ना सिर्फ ढके हुए है बल्कि काला चश्मा भी लगाए है

चोर कैमरे में लंगड़ाते हुए दिखाई पड़ रहा है। और उसके जाते ही दस मिनट बाद मैं मंदिर से बाहर निकल कर जूते ढूंढ रहा हूँ। कैमरे से एक बात तो साफ हो गई की जूता चुराई दो बार में अंजाम दी गई है।

शायद एक ही पैर के जूते एक साथ रखने से चोर का भी कुछ विशेष फायदा नहीं हुआ इसलिए दूसरे पैर के दोनों जूतों को लेने वो दोबारा आया।

पहली बार में तो एकदम ठीक से चल कर जाता हुआ दिखाई पड़ा पर दूसरी बार में लंगड़ाते हुए। मंदिर के बाहर की पूरी फुटेज सीढ़ियों के ऊपर लगे कैमरे से देखने को मिलेगी।

जिसका संचालन सोनप्रयाग से किया जाता है। ये तो साफ है कि इस चोर को पुलिस वाले भी जानते हैं तभी उनमें से एक के मूह से ऐसा कबूलनामा हुआ।

चोर की खोज

आधे घंटे के फुटेज देखने के बाद कमरे से हम सब बाहर निकले और पुलिस वालों ने उल्टा हमें काम सौंप दिया चोर को ढूंढने का और खुद भी तलाश में मंदिर के कैंपस तक आ गए।

लआईयू, खुफिया पुलिस, वर्दी वाली पुलिस सब अपना अपना सुझाव देने लगे हैं। कोई कह रहा है दुकान के पास बैठ कर नजर रखो कभी ना कभी तो आयेगा ही।

केदारनाथ मंदिर परिसर के बाहर भक्त

तो किसी का मानना है कि यहाँ टेहलो क्या पता नजर के सामने पड़ने से पहचान में आ जाए। पर मेरी समझ में ये नहीं आ रहा कि जब वो रात भर जाग कर चोरी करने में व्यस्त रहा होगा तो दिन में क्या खाक नजर आयेगा।

लेकिन फिर भी इन सब की सलाह मानते हुए केदार के कैंपस में टेहल कर देखने लगा। बढ़ते बढ़ते मंदिर परिसर में खड़ी कतार के पास आ पहुंचा।

जहाँ मिले वो हरयाणवी सज्जन जिनके साथ गुप्तकाशी से सोनप्रयाग तक सफर तय किया था। हाल चाल पूछे तो ठीक नहीं मिले।

कल शाम को बिछड़े दद्दू और एक और साथी अभी तक ना मिल सके। उदासीन चेहरे के साथ मंदिर की कतार में खड़े हो कर दर्शन करने बढ़ रहे हैं।

थोड़ा पीछे ही खड़ा गगन हाँथ में फूल की टोकरी और प्रसाद लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहा है। एक बार फिर से उसे कैमरे में दिखा सारा किस्सा बताया।

कैमरे में देखने के बाद तसल्ली तो काफी मिली है। पर मानो शिव जी हंस रहे हों और बोल रहे हैं “जूते तो नहीं मिलेंगे। ये जूते मेरे द्वार पर छोड़ कर जाओ।”

फिर भी दूर दराज तक जूते ढूढने निकल गया। ढूढते हुए घूम फिर कर वापस आ गया मंदिर परिसर में और थक कर धूप में बेंच पर बैठ गया।

इतने में गगन आया और पास बैठ गया। कैमरे से फोटो खींचने लगा। गगन के लाख बोलने के बाद मैं उसकी तस्वीर लेने लगा। पर दिमाग इस कदर थक चुका है कि ठीक से कैमरा भी नहीं पकड़ा जा रहा।

इतना ही बुरा अजय का भी हाल है। कुछ देर की मुलाकात के बाद गगन ने निकलने की इजाज़त मांगी, की उनके साथ आया दूसरा परिवार उनके इंतजार में होगा।

दूसरी तरकीब

गगन के जाते ही हम उस जगह आ कर बैठ गए जहाँ एक पीली इमारत का गलियारा है जिसके पास चाय की दुकान है। कुछ पुलिसकर्मी हमारे समीप आए और हालचाल लेने लगे।

पर जूतों की अभी तक कोई खबर नहीं। दिलासा दिया और ऊपर वाले माले पर पहुंच गए। अंदर ही अंदर उम्मीद की किरण जाग उठी कि शायद ऊपर से ये जब नीचे आएं तो कुछ जानकारी मिल जाए!

तकरीबन आधे घंटे चली बैठक का हल कुछ नहीं निकला। जब पुलिसकर्मी नीचे आए तो एक ही जवाब था उनकी जबान पर अपने काम से ऊपर किसी से मिलने गए थे।

जब अपने काम से गए थे तो हमें ऊपर जाने से क्यों रोका। आंखे पलके बिछाए बैठी हुई हैं। पर वो लंगड़ा आदमी कहीं भी ना दिखा।

क्या पता कैमरे से बचने के लिए लंगड़ा रहा हो कि उसे कोई पहचान ना सके। पर अभी तक तो कोई भी लंगड़ा नहीं दिखा। दूर कोई नजर आया पर वो ना था जो सोचा।

शायद दिमाग भी खुद से कल्पना करने लगा है अब कि बस कहीं वैसा दिखने वाला शख्स मिल जाए। दिन के एक बज रहे हैं भूख भी लगने लगी है अब

निर्माण केंद्र पर पूछताछ

पर शुक्ला जी(पुलिसकर्मी) ने कहा कि पीछे की ओर चल कर कुछ पता करते हैं। क्या मालूम कोई सुराग हाँथ लग जाए। इनका कहना भी सही है।

इसी विचार के साथ हम बचा कुचा सामान उठा कर निकल पड़े। तोंद निकाले शुक्ला जी हाँथ में लाठी लिए मंदिर परिसर को पार करते हुए पीछे के रास्ते हमें ले आए।

ये पिछले हिस्से में तो तो भारी भरकम काम लगा हुआ है निर्माण का। जिसे देख यही लग रहा है कुछ बड़ा निर्माण हो रहा है इस बड़े से मैदान के ऊपर।

तकरीबन आधा किमी पैदल चलने के बाद बड़ी सी कुठरिया से एक आदमी साहब साहब करते निकला और शुक्ला जी के यहाँ तक आने का कारण पूछने लगा।

तब जा कर शुक्ला जी ने सारा विवरण दिया और उसी लंगड़े चोर के बारे में पूछताछ करने लगे। उसका पूरा हुलिया भी बताया, पर ये मजदूर कुछ भी ने बूझ सका।

कुछ और बातचीत करने लगे शुक्ला जी और हमें वापस जाने को बोलने लगे। वो मजदूर जैसे दिखने वाले शक्श से काफी देर बातें हुई होंगी।

आधा किमी पैदल चल कर मुड कर देखा तो हाँथ में लाठी लिए शुक्ला जी भी मंदिर की तरफ ही आ रहे थे।

केदारनाथ मंदिर का निकास द्वार

अप्रिय घटना

भूख जोरों की लगी है। नींद अलग, अब तो नींद आ भी नहीं रही है। मंदिर की ओर मुड़ना ही हुआ है कि एक अप्रिय घटना सामने हुई।

अचानक से एक महिला चक्कर खा कर गिर पड़ी। उसे मेडिकल देने के लिए बेस कैंप भेजने की बात छिड़ी। इतने में ही पुलिस, आर्मी और भी अन्य विभाग के कर्मी दौड़ते हुए आ पहुंचे।

सीढ़ी के पास से पालकी वाले को बुलाया गया। बड़ी मुश्किल से साथ इस महिला को पिट्ठू में बिठाया गया और पिट्ठू वाले को सख्त निर्देश देते हुए इन्हे बेस कैंप तक छोड़ने को बोला गया।

तभी कहीं से पता चला कि मंदिर के दाहिने हिस्से के पिछवाड़े में भंडारे का आयोजन चल रहा है जिसे चखा जा सकता है।

पहले पेट पूजा फिर काम दूजा। पर उससे भी पहले पेट की सफाई। थोड़ा नीचे उतर कर ही सौंचालय की भी व्यवस्था है। ना सोने के कारण शरीर का नियम भी बिगड़ गया है।

इन बायो टॉयलेट में नित्य क्रिया के बाद नहाने की हिम्मत ना हुई।

भंडारा खाने का सौभाग्य

हाँथ और पेट की सफाई के बाद खाने के भंडारे की ओर अग्रसर हुए कदम।

यहाँ पिछले पंद्रह दिनों से एक ही संस्था भोजन उपलब्ध करा रही है। और यहाँ कोई ना कोई अता रहता है। आम जनता के अलावा पुलिसकर्मी भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं।

बड़े बड़े भगौने में खिचड़ी पड़ोसी रखी है। जिसे भक्त बड़े चाव से गृहण भी कर रहे हैं। मेज़ के ऊपर रखी थाली को उठा कर मैं भी अपनी बारी का इंतजार करने लगा।

पुलिसकर्मियों के लिए स्पेशल अड्डा है। सिर्फ उन्हें है दुकान के भीतर जा कर खाने दिया जा रहा है। बाकी सारी जनता बाहर खड़े हो के खाने का स्वाद ले रही है।

खाना परोसा बेहद ही कम मात्रा में जा रहा है। ऐसा शायद इसलिए भी खाना बर्बाद ना हो। जैसे कुछ लोग शुरुआत में थाली भर के तो ले लेंगे पर फिर बाद में वही खाना नाली में।

जिसे देख कर बहुत कस्ट पहुंचता है। यहाँ खाना ख़त्म हो जाने के बाद लोग अपने अपने बर्तन स्वयं ही धो रहे हैं। खाना खतम हो जाने के बाद औरों की तरह मैं भी अपनी थाली स्वयं धोने लगा।

धो कर वापस भंडारे पर सौंप दी। आज रात से ले कर जो अबतक एकमात्र सही काम हुआ है वो है खाना। अन्यथा उस वारदात के बाद से तो कुछ होश ही नहीं है।

आंखो मे पानी डाल डाल कर जगा हूँ आज। ये दिन आजीवन याद रहने वाला है। हालांकि खाना खाने के बाद अलग ऊर्जा का स्त्रोत हुआ है शरीर में।

नयी योजना पे चर्चा

लेकिन एक दफा फिर चोर को ढूढने की प्रक्रिया शुरू हो गई। भंडारे से निकल कर कंट्रोल रूम के सामने से गुजरते हुए मंदिर परिसर में आ पहुंचा।

भक्तों का तांता देखने को मिला, कुछ जत्थे का जत्था भी देखने को मिला

फिर शुक्ला जी को ही पकड़ा और थोड़ा जोर देते हुए उनसे चोर को ढूढने की कवायद की। आधे घंटे का वक्त मांगा और निकल गए।

मैं एक दफा फिर से उसी गुफा नुमा इमारत के गलियारे में आ पहुंचा। जहाँ से छिप कर चोर को भीड़ में ढूढने की कोशिश करने लगा।

काफी देर बीत जाने के बाद एक लंगड़ाता हुआ आदमी दिखा। उसी लिबास में जिस लिबास में चोर था, पर कद थोड़ा छोटा था। पूरी तरह से देखने के बाद वो आदमी ना नजर आया।

पर मन ही मन ये बात घर करने लगी ये यही वो आदमी है पर उसका कद बार बार धोखा दे रहा है। कुछ ही देर में वो आदमी भी ओझल हो गया।

साढ़े तीन बजे तक शुक्ला जी और एक सब इंस्पेक्टर आ गए चोर को ढूंढने के वास्ते। मैं शुक्ला जी, सब इंस्पेक्टर और अजय निकल पड़े केदारनाथ के गांव में उस शातिर चोर को ढूढने।

जब उनको इस आदमी के बारे में बताया तो उनकी एक ही प्रतिक्रिया आई “तुम्हे उस आदमी को लपकना चाहिए था।” पर उसका कद वो था ही नहीं जो रात में चोर का था। हो सकता है पालकी वाला हो!

अधूरी उम्मीद की किरण

इसी आस में कि ये पुलिस वाले कुछ सहायता कर सकें। मंदिर की सीढ़ियां उतरते हुए एक कबाड़ जैसी दिखने वाली दुकान की बगल वाली गली में मुड गया। पुलिस अपने अंदाजे के साथ हमें लेके आगे बढ़ रही थी।

बहुत ही उत्साह के साथ भी और उनके एक कथन ने मुझमें में उत्साह भर दिया। पर मानो बाबा केारनाथ बोल रहे हों जूते तो नहीं ही मिलेंगे।

मोबाइल में तो उस शक्श का वीडियो तो था ही। इसी वीडियो के सहारे ही उस नकाबपोश शक्श को ढूढने की चुनौती भी। पुलिसकर्मी ने अपना कार्य शुरू कर दिया है।

वही रात की कहानी बयां करके मोबाइल में उस शक्श का वीडियो दिखा कर पूछताछ की प्रक्रिया शुरू हुई। पर शुरुआती दौर में या तो कोई पहचान ही ना सका या आगे जाने का इशारा कर दिया।

कुछ तो ये दो पुलिसकर्मी भी अपने अंदाज़ और तजुर्बे की ताक पर चल रहे हैं, की शायद कुछ हाँथ लगे। इसी तरह घूमते हुए अन्दर गली में एक रेस्त्रां में आ पहुंचा।

यहाँ भी यही दोहराया और इत्तेफाक कि बात है कि इस दुकानदार ने कुछ पहचान लिया। उसने पता तक बता दिया। दूसरे पुलिसवाले ने उसके नौकर को उस गेस्ट हाउस में भेजा जहाँ वो शक्श काम करता है।

बातें चलने लगीं धंधे पानी की। और पुलिसकर्मी मशगूल हो गए धुआं उड़ाने में। हमें उन्होंने बाहर आने को कहा दिया। अब कुछ उम्मीद तो जगी है कि वो शक्श मिल जाए तो शायद जूते भी मिल जाएंगे।

पर थोड़ी ही देर में दुकान का नौकर आया और बताया की सो लड़का अभी तो नहीं है गेस्ट हाउस में। अब पुलिसकर्मी हमारा मुख ताकने लगे।

ऐसे भाव से जैसे उनसे इतना ही प्रयास हो सकता है। बोल भी पड़े हमने अपनी तरफ से पूरा ज़ोर लगाया पर वो ना निकला जिसपे शक है।

चप्पा चप्पा छानने निकला

निराशा से भरे चेहरे देखने के बाद पुलिसकर्मियों ने यह तय किया की तलाश जारी रखी जाएगी। और मंदिर के दाहिने हिस्से में सब इंस्पेक्टर के साथ अजय और शुक्ला जी के साथ मुझे लटका दिया मंदिर के बाएं हिस्से में जाने को।

तफ्तीश और तलाश करने को कि क्या पता मिल है जाए। सो अलग अलग मोबाइल में एक ही वीडियो के सहारे निकल पड़े खोजबीन करने।

केदारनाथ घाटी में बसा गांव

शुक्ला जी अपने तोंद के साथ गांव की शुरुआत से शुरू करने जा इरादा दिखाया। और इसी कबाड़ख़ाने वाली गली से बाहर निकलने के बाद लंबा रास्ता तय करते हुए आ गया शुरुआती सीढ़ियों के समीप।

गांव में दाखिल होने से पहले दिखी कतार जो अब काफी कम दिख रही है। अन्यथा यही कतार दिन में बेस कैंप तक पहुंच गई थी।

अमूमन घाटी में बना ये गांव भी आम गांव की तरह ही है। कोई खास अंतर नहीं दिखाई पड़ रहा। रास्ते के बीचों बीच बहती नाली और उसके ऊपर विभाजित मार्ग ये दर्शा रहा है कि किसे किस तरफ चलना है।

शुक्ला जी अपने लाठी के साथ शुरू हुए तफ्तीश करना। शुरुआती एक दो दुकानों में पूछा पर कोई पता ना चला। यही क्रम आगे बढ़ा और बढ़ता ही गया।

हर दुकान ने शुक्ला जी अपनी तोंद और लाठी ले कर जैसे ही पहुंचते सामने वाला जी हुजूरी में जवाबदेह हो जाता। कभी कोई चाय की दुकान कभी कबाड़ तो कभी परचून।

हर बार सवाल एक ही होता और उसका जवाब भी “पता नहीं”। आशा की कोई किरण नजर नहीं आ रही है। शुक्ला जी अब समय बिताते हुए नजर आ रहे हैं।

कभी कोई चाय वाला आओ भगत करने लगता तो कभी कोई साहब साहब करते हुए कहानी लेके जी हुजूरी। ये सब देख नींद से भरी आंखे और दर्द करने लगीं।

आज के दिन का सबसे बड़ा नकारात्मक प्रभाव ना सोने का साफ चेहरे पर दिख रहा है और उसका असर शरीर पर। गांव का अंत होते होते शुक्ला जी मिल गए कोई नेता।

जिनसे बातों में मशगूल हो गए और मुझे मंदिर परिसर की ओर जाने का इशारा किया। मंदिर परिसर कुछ ही मीटर की दूरी पर है।

सबकी अपनी राय

मंदिर परिसर में पहुंचना हुआ और इधर खुफिया पुलिस ने चोर का पता पूछा। जिसका कोई अता पता नहीं है। इन्हीं अफसर में से एक ने आज रात रुकने की हिदायत दी।

ज़ोर दे कर बोलने लगे कि आज की रात उस चोर का इंतजार करो और रंगे हाँथो पकड़ना उसे। पर जब वो शातिर चोर कैमरे से बचने के लिए पूरा शरीर ढक के आया था तो ज़रूरी नहीं है आज भी आए और वो भी उसी लिबास में।

एक बात तो माननी पड़ेगी वो ये को चोर चप्पे चप्पे से वाकिफ है और हो सकता है यहीं का निवासी हो। पर ना तो शुक्ला जी और ना ही वो सब इंस्पेक्टर ये बात मानने को तैयार की किसी गांव वाले की हरकत हो सकती है।

सिरे से नकारते हुए उन्होंने जोर दिया उन लोगों पर जो दूसरे इलाकों से यहाँ व्यापार करने आते हैं। इतनी ही देर में मंदिर की सीढ़ियों से अजय को चढ़ते देखा।

उसके हाव भाव देख कर अंदाज़ा लगाया जा सकता है की चोर का कुछ अता पता ना चला। निराश होकर हम आ गए अनाउंसमेंट वाले परिसर के पास।

सोनप्रयाग वापसी का विचार

दूसरे पुलिस वालों ने राय सलाह दी कि एफआईआर तो दर्ज करवा ही दो। मेरा अब वापस से सोनप्रयाग जाने का मन कर रहा है।

और आज की रात उतरने का सोच रहा हूँ। अंधेरे में घाटी से उतरना खतरनाक हो सकता है पर यहाँ से निकलना बहुत जरूरी हो गया है।

यहाँ रुकने का कोई फायदा नजर नहीं आता दिख रहा है। रुका भी तो नींद इस कदर हावी है कि सो ही जाऊंगा। अगर साथ ने स्लीपिंग बैग होता तो शायद भले ही एक बार सोचता।

पर रुक कर फिर कल रात वाली हालत हो जाएगी। और क्या पता दो रारों से नहीं सोया हूँ तो चोर को पकड़ने के चक्कर में और ज्यादा नुकसान ना करा दूं।

तभी एकाएक अनाउंसमेंट परिसर से घोषणा की मंदिर के बाहर बेंच पर एक महिला का कैमरे छूट गया है। ये घाटी भक्तों से ज्यादा चोरों कि मालूम पड़ रही है।

केदार घाटी को नमन

कैमरे की खोज बीन हुई पर वो कैमरा नहीं मिला। तभी एक पुलिस वाले के हाँथ में एक कैमरा लगा। दिखाया गया तो उसी महिला का निकला।

वापस से अपना कैमरा पा कर इस लड़की की खुशी का ठीकाना नहीं है। इसका तो कैमरा मिल गया पर ऐसी चोरी चकारी और सामान छूटने की कहानी अक्सर होती होगी।

बेस कैंप में एफआईआर दर्ज

शाम के छह बज रहे हैं हमने शुक्ला जी से इजाजत ली और चल पड़े बेस कैंप। जहाँ एफआईआर दर्ज होगी। मैंने चप्पल पहन रखी हैं। अजय ने पहनी हुई चप्पल भी उतार दी।

भीड़ कम हो गई है। शाम के छह बजने को आए हैं। बेहतर यही रहेगा की जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी केदार घाटी से निकल लिया जाए।

अब तक तो हेलीकॉप्टर भी शांत हो गए हैं। दिन के ढलते ही हेलीकॉप्टर सेवा भी बंद हो जाती है। रास्ते से आने वाली और जाने वाली दोनों ही भीड़ ठंडी पड़ गई है।

अंधेरा होने को है। तकरीबन एक किमी पैदल यात्रा के बाद आ पहुंचा मैं पुलिस कैंप। जहाँ जनता के नाम पर इक्का दुक्का लोग ही नजर आ रहे हैं।

और उनसे ज्यादा पुलिसवाले। एफआईआर दर्ज कराने के लिए इंतजार करना होगा। जो पुलिसकर्मी एफआईआर दर्ज कर रहे हैं उनके पास अभी एक लोग और दर्ज करवा रहे हैं।

और भी होती है घटनाए

सूरज ढलने को है इसलिए पहाड़ी के पीछे का नजारा बहुत ही उत्तम है। हमें फ़ौरन अन्दर बुलाया गया। सामने वही अधिकारी बैठे मिले जिन्होंने सुबह कंट्रोल रूम में रिकॉर्डिंग दिखलाई थी।

इससे पहले मैं कुछ बोलता ये महाशय सनाने लगे अपने दिंभरवकी दास्तां।

“यहाँ चोरी चकारी कोई नई बात नहीं है। बताते हैं कि कल शाम को केदारनाथ मंदिर के सामने से एक जोड़ी जूते चोरी हो गए जिसकी कीमत एक लाख रही होगी। हालांकि वो विदेशी था इसलिए भी उसे ज्यादा गम नहीं था पर सामान तो सामान होता है।”

इतना बताया ही था उन्होंने की मैं अपने चोरी हुए सामान की तुलना करने लगा जिसकी कीमत ना के ही बराबर रही होगी इन जूतों के सामने।

“अभी जो दो लोग यहाँ से गए हैं उनका मोबाइल चोरी हो गया। पानी पीने के बहाने मोबाइल पत्त्थर पर रखा और उतनी देर में कोई खेल गया।”

भला ऐसे लावारिस मोबाइल कौन छोड़ता है वो भी इतनी भीड़ भाड़ वाली जगह में। कोई ऐसा ठोस नियम या कैमरों की संख्या और मुस्तैद पुलिस लगानी चाहिए ताकि लोगों को बेहतर सुरक्षा का एहसास हो सके।

मैं ये विचार कर रहा था कि प्रतीक जी बोल पड़े “केदारनाथ में हजारों की संख्या में लोगों का आना जाना होता है। मुठ्ठी भर पुलिस वाले क्या क्या करेंगे”

इसका कोई तो हल होगा। एफआईआर दर्ज कराने के लिए एक कागज कलम लिया नाम पता पूछा और खुद ही लिखने लगे। हस्ताक्षर और एफआईआर दर्ज।

ऐसी हजारों एफआईआर पड़ी रहती होंगी रददी में जिस पर कोई कार्यवाही नहीं होती। एक बार आदमी यहाँ से चला जायगा तो इस कागज का भी कोई मोल नहीं।

केदार बाबा को अलविदा

समय तेज़ी से बीत रहा है। और हमें जल्द ही निकलना होगा यहाँ से। ये संभव नहीं होगा कि नंगे पैर नीचे तक का सफर तय कर लिया जाए।

इसलिए अजय को चप्पल पहनाने के लिए मैं लेके निकल पड़ा वापस मंदिर की तरफ। पहले तो अजय राजी नहीं हुआ पर जब हमने और प्रतीक जी ने पथरीले रास्तों के बारे में चेताया तब थोड़ी समझ आईं।

वापस मंदिर की सीढ़ियां चढ़ते हुए आ गया उसी चप्पल के ढेर के पास। वहाँ से अजय ने अलग अलग चप्पल पैर में पहनी और तैयार हो गए निकलने के लिए।

केदार बाबा से अलविदा लेते लेखक

वापस से हाँथ जोड़ कर बाबा केदार को नमन किया और चल पड़ा। मंदिर में दर्शन के लिए कतार ना के बराबर है।

पीठ पर छोटा बैग और पैरों में अलग अलग चप्पल पहन कर सोनप्रयाग तक के सफर के लिए चल पड़ा। कितना मुश्किल होगा अंधेरे में गौरीकुंड पहुंचना ये तो कुछ देर में पता चल जाएगा।

शाम के सात बीस हो रहे हैं। अगर रफ्तार पकड़ कर नीचे की और निकला जाए तो शायद रात के दस बजे तक तो पहुंचना हो ही जाएगा।

शुरू हुई उतरने की यात्रा

बेस कैंप से गुजरते हुए सफर की शुरुआत की। मैं अकेला नहीं हूँ जो गौरीकुंड की ओर जा रहा हूँ। मेरे साथ और भी यात्री हैं जो यहाँ से प्रस्थान कर रहे हैं।

पर तादाद ज्यादा नहीं है। गिने चुने लोग ही हैं। अभी अंधेरा नहीं हुआ है तो यही कोशिश है कि जितनी जल्दी उजाले में जितना रास्ता तय कर लूं।

फिर अंधेरे में क्या ही होगा किसी पता। इन यात्रियों मे रहीस तो एक भी नहीं दिख रहा है। अधिकतर लोग गांव के निवासी ही दिख रहे हैं जो मजबूत कद काठी के होते हैं और किसी भी विषम परिस्थिति को झेलने की अपार शक्ति होती है इनमे।

ये मदद के लिए भी तत्पर रहते हैं अगर आप मुसीबत में हो तो बजाय शहर के आदमी से जिसके पास समस्या सुनने का भी समय नहीं।

रात के आठ बज रहे हैं और तेज़ तेज़ चल कर जितना हो सका उतना रास्ता तय कर लिया है। मगर ये नहीं पता चल पा रहा है कि कहाँ तक पहुंच गया हूँ।

अब अंधेरा भी होने लगा है। और अंधेरा होने के साथ साथ मुश्किलें और भी बढ़ जाएंगी। साथ में और भी लोग चल रहे हैं तो ढांढस बंधी हुई है।

और जानवरों के हमले का खतरा भी कम ही है। रात में किसी पहाड़ी पर चढ़ना और उतारना कितना घातक है ये आज समझ आ रहा है।

पत्थर फिसलन भरे हैं इसलिए सावधानी से चलना पड़ेगा। एक दो जगह तो मैं खुद फिसलने से बचा हूँ। ऊपर से पैरों में चप्पल होना ना होना सब बराबर ही है।

तलवे में ऐसे पत्थर गड़ रहे हैं जिसका जवाब नहीं। ऊपर से दो दिन कि थकान और पिछली रात की नींद मेरे ऊपर हावी हो रही है।

जी तो चाह रहा है कहीं रुक कर सो जाऊं पर ऐसा करना खुद को संकट में डालने के सामान हो जाएगा। मेरी कोशिश यहीं है कि जितनी जल्दी हो सके बस पहुंच जाऊं इन सभी समस्याओं से पार पा कर।

हरी भरी घाटियों से अलविदा लेने की बारी

मंदाकिनी नदी का साथ

समांतर बेह रही मंदाकिनी नदी के शोर के सिवाय कुछ भी नहीं सुनाई पड़ रहा। ये नदी ही है जो मेरे साथ साथ नीचे जा रही है और प्रेरणा का स्त्रोत भी।

पत्थरीले रास्ते पर चलते चलते तलवे बुरी तरह जख्मी हो गए हैं। पैरों में इस कदर दर्द हो रहा है जैसा पहले कभी ना हुआ। ऐसा महसूस है रहा है कि तलवे बेहद ठोस हो चुके हैं।

दर्द, नींद, थकान और निराश भाव के साथ वापस जा रहा हूँ। मैं हैरान हूँ उन प्राणियों का क्या हश्र हुआ होगा जब घाटी में प्रलय आईं होगी।

ये मेरी कल्पना से भी परे होगा। उन दिनों तो यहाँ फसें लोग तीन तीन दिन बिना सोए और खाए पिए रहे थे और ठंड में ठिठुरे थे सो अलग। प्रलय के एक साल बाद भी उत्तराखंड के पहाड़ों में लाशों का मिलने का सिलसिला जारी रहा।

कुछ को तो जंगली जानवर खा गए होंगे कुछ यहीं रह कर पागल हो गए। केदारनाथ में जाओगे तो कुछ कीमत तो चुका कर आना ही पड़ेगा।

इस घाटी में व्यवस्था बत्तर स्तिथि में है ना सिर्फ इंसानों की बल्कि घोड़ों और खच्चरों की भी। इनसे गधे की तरफ काम करवाया जाता है।

बेहाल जानवर

जिसके कारण इन थके जानवरों पर बैठे लोग हादसों का शिकार हो जाते है। अक्सर यहाँ घोड़े खाई में गिर जाते है, कभी कभार सवारी सहित।

मंदाकिनी नदी को पार करने की बारी आ गई। इसका मतलब मैं रामबाड़ा आ गया हूँ। पर उस रास्ते पर नहीं हूँ जिससे ऊपर गया था।

शायद ये लंबा वाला रास्ता है। शरीर में थकान इस कदर है की बस कुछ देर के लिए बैठने को मिल जाए बहुत है। मंदाकिनी पार करने से पहले पड़ी बेंच पर आ कर बैठ गया।

सामने दुकान खुली है जिसमे हलचल है। रास्ते भर एक भी दुकान खुली नहीं मिली। सब अपनी दुकान बंद करके उसी के अंदर ही सो जाते हैं।

बेंच पर बैठा ही हूँ और धीरे से लेट गया। कुछ देर में किसी ने मेरा नाम पुकारा और मैं वापस जाग गया। वो आवाज़ सामने पड़ी बेंच पर से आईं। अजय की आवाज़।

ये सफ़र है कठिन मगर

अचानक निद्रा टूटी और देखा कि मेरे हाँथ से मेरा बैग भी छूटा हुआ है। कहीं कोई ये बैग ले के चला जाता तो जाते जाते एक और नुकसान करा लेता।

समय देखा तो साढ़े दस बज रहे हैं। आधे घंटे सो लिया और लगा कि पिछले पांच मिनट से ही यहाँ पर हूँ। युद्ध जैसे हालत हो गए हैं।

जैसे एक योद्धा बिना खाए पिए सोए मैदान पर दुश्मन से लड़ता रहता है ठीक उसी प्रकार मैं भी परिस्थितियों से लड़ कर कैसे भी करके सोनप्रयाग तक पहुंचने की कवायद में हूँ।

वापस से बैग उठा कर आंखों में नींद लिए निकल पड़ा। दिमाग में ये चिपका लिया है कि जितनी जल्दी हो सके उतना जल्दी पहुंचना है।

रास्ते में पता ही नहीं चला कि कब ये डेढ़ किमी लंबा रास्ता पकड़ कर आ गया। शायद अंधेरे में कुछ ना दिखने के कारण ऐसा हुआ।

भीमबली को पार करते हुए आगे बढ़ रहा हूँ। थोड़ी रोशनी होने के कारण रास्ता कुछ जाना पहचाना नजर आ रहा है। वही ढाबा जिसमे आधे घंटे का समी बिताया था बंद पड़ा है।

टीन शेड हर जगह मिल जाएंगी। जिसके नीचे लोग सुस्ताते हुए दिख रहे हैं। शुक्र है चंद लोग हैं जो होने जरूरी भी हैं। क्यूंकि रात में क्या दुर्घटना हो जाए और कब किसकी जरूरत पड़ जाए कुछ कहा नहीं जा सकता।

रात में पहाड़ों में चुनौतियाँ

पहाड़ है तो लाजमी है पत्थर गिरते रहते होंगे, जंगली जानवरों की उपस्थिति भी होगी। अब कहीं नहीं रुकना है बस चलते जाना है।

चप्पल छोटी होने के कारण मेरे पैर की उंगलियां कट भी रही हैं और पीछे का तलवा पत्थरों पर टकरा रहा है। जिस कारण और दर्द का एहसास हो रहा है।

अब कुछ कुछ जगह पक्का रास्ता भी मिलने लगा है जो सुविधाजनक है। पर जैसे ही दोबारा पत्थरों पर चलना पड़ रहा है दर्द वापस उभर आता है।

रफ्तार में होने के कारण ऐसे ही एक पत्थर पर ठोकर खा कर गिर पड़ा। हाँथ के बल गिरने से बैग बचा और बैग के अंदर रखे कैमरे भी।

बैग खुला और सामान गिरा। जल्दी पहुचनें के चक्कर में क्या नहीं हो रहा है। पीछे से आ रहे दो लोगों ने हमें उठाया। बिखरे सामान को मैंने उठाया समेटा और बैग में डाल कर वापस चल पड़ा।

ऐसा लग रहा है मानो अचेत मुद्रा में ये सफर तय किया हो हमने या बस करवा दिया गया है। शायद नीचे उतर आने ने ही भलाई थी।

काफी रास्ता तो तय कर लिया है। बैग में झांका तो सिर पर लगाने वाली एक टॉर्च मिल गई। आदमी दो हैं पर टॉर्च एक ही है पर कोई बात नहीं काम चल जाएगा।

अच्छी बात ये रही कि गिरने के बाद कोई सामान खाई में नहीं गिरा।

बेबस जानवर

घनघोर अंधेरे में चल रहा हूँ की जमीन पर पड़े किसी जीव से टकरा कर एक बार फिर गिरने की स्तिथि उत्पन्न हुई।

पर इस बार खुद को संभाला। मुड कर देखा और ठीक से देखने पार कोई जीव नजर आया। टॉर्च की रोशनी पड़ी तो देखा एक घोड़ा गिरा पड़ा मिला।

जिससे उठा भी नहीं जा रहा है। शायद जिसकी चर्चा मैं कर रहा था वो सत्य निकली। और जीता जागता उदाहरण मेरे सामने है। इस थके हुए घोड़े की हालत इतनी बुरी है जैसे लग रहा है कुछ ही घंटों का मेहमान है।

शायद थकान और पानी की कमी से ये यहाँ गिर गया हो वरना घोड़ों से अधिक ऊर्जावान और कोई जीव नहीं है धरती पर। मैंने बैग से बोतल निकाली जिसमे मेरे पीने लायक ही पानी बचा है।

बोतल खोली और उसके खुले हुए मूह पर पानी डालने लगा। जैसे उसके मूह के अंदर पानी की बूंदे जा रही हैं वैसे वैसे वो चेतना में आ रहा है।

शायद पानी की कमी और थकान दोनों का मिश्रण ही रहा है इसलिए गिरा पड़ा है। देखते ही देखते पानी की बोतल खाली हो गई।

अब ये घोड़ा पहले से कुछ बेहतर स्तिथि में लग रहा है। हाँथ फहराया और चल पड़ा गौरीकुंड के रास्ते। मुझे खुशी है कि घोड़ा इस स्तिथि में तो आ ही गया है की वह उठकर वापस जा सके।

इंसान हो या जानवर आराम की जरूरत सबको पड़ती है। कुछ आगे बढ़ता हूँ और तबेले कि तरफ़ आ रहा हूँ। अब गौरीकुंड दूर नहीं।

रास्ते में एक ओर घोड़ा पड़ा दिखा। इन जानवरों पर यहाँ ज़ुल्म ढाया जाता है। जो हालात इनकी कर रखी है वो बहुत ही दया के पात्र है।

इनका बाकायदा भरण पोषण होना चाहिए और आराम देना चाहिए ताकि घोड़े भी किसी का शिकार ना हों और ना ही इनकी सवारी।

गौरीकुंड

अब लग रहा है ज्यादा दूरी नहीं रह गई है बाहर निकलने की। तबेला आए गया है मतलब ज्यादा से ज्यादा एक किमी की दूरी।

खुशी का ठीकाना नहीं और नींद अभी भी हावी है। ट्रेक का रास्ता जैसे ही खत्म हुआ और मैं बाहर निकला सामने दिख रही गौरीकुंड की पहाड़ी को देख ऐसा लगा जैसे घर वापसी हुई हो।

मगर सफर अभी यहीं खत्म नहीं हुआ है। अभी यहाँ से सोनप्रयाग तक का छह किमी का सफर तय करना बाकी है। जीप से चार किमी का सफर तय हो जाएगा बाकी का रास्ता पैदल।

रात्रि के पौने बारह बज रहे हैं। किस्मत से जीप यहीं मिल गई। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि लोग अभी भी उतर कर नीचे आ रहे हैं।

त्रासदी कि वो रातों को आज अनुभव किया है मैंने। जब बिना सोए केदारनाथ जा कर वापस भी आ गया। किसी कड़वे अनुभव से कम ना रहा मेरा अनुभव।

जीप देखते ही देखते भर गई और अब मैं पूरी तरह से अजय पर निर्भर हो गया। रोना भी आ रहा है और नींद भी। बस किसी तरह बिस्तर मिल जाए और मैं सो जाऊं।

इससे पहले अमानती घर से बैग निकलवाने पड़ेंगे। फिलहाल तो पहले पहुंच ही जाऊं। जीप में ऐसी नींद आ रही है जिसका जवाब नहीं।

पलक झपकते ही पहुंच भी गया। शायद मैंरे ऊपर सापेक्षता का सिद्धांत(थेओरी ऑफ रिलेटीविटी) पूरा पूरा लागू जो रहा है इस समय।

किराया थमाया और अब गौरीकुंड की बंद पड़ी बाज़ार से हो कर गुजरने की बारी आ गई है। जैसे जैसे पास पहुंच रहा हूँ वैसे वैसे सोने की इच्छा और प्रबल होती जा रही है।

इस कम हलचल वाली बंद पड़ी मार्केट में बार बार रास्ता भटक रहा हूँ। जिस कारण हर बार मुझे रास्ता पूछना पड़ रहा है। और हर बार कोई ना कोई बता भी देता।

आखिरकार लगा घर वापसी

थके हारे आंखो मे नींद भरे पहुंच गया नदिवके ऊपर पुल को पार करते हुए सोनप्रयाग। सड़क पर लगी दुकानों पर अब ताला पड़ चुका है।

कुछ ने तिरपाल से ढक कर अपने आप को इन्हीं दुकानों में कैद कर लिया है। मुझे पहले तो उस इमारत तक पहुंचना है जहाँ पर मेरा बैग जमा है।

बैग उठा कर उसी जगह टेंट लगाना है जहाँ दो रात पहले लगाया था। जेब से पर्ची निकाल कर आ पहुंचा इमारत के सामने। वापस आने के बाद खुद को ठगा सा महसूस कर रहा हूँ।

जाते समय तो बहुत अच्छा था आते समय ऐसा लग रहा है लुट के आया हूँ। इमारत में दाखिल हो कर चौथे माले पर पहुंच गया। आधी रात में यहाँ दुकान खुलवाई और पर्ची दिखा कर बैग सौंपने की गुज़ारिश करने लगा।

पर्ची हाँथ में आते ही हमें एक कमरे की तरफ ले आए। जहाँ अपना बग पहचानने को कहा। पास ही पड़े दो बड़े बैग नजर आ गए जो कि हमारे हैं।

अब बस बैग लेके तंबू वाली जगह पर जाने की देर है। पर यहाँ अजय ने खाना खाने की इच्छा जाहिर की। इस पर थोड़ी बहस हो रही है।

नींद से आंखे भरी हैं और इस आदमी को खाने की पड़ी है। खैर खाना खाने के लिए उसी ढाबे पर आ गए जिसका संचालन परिवार के द्वारा किया जाता है।

यहाँ अच्छा खाने के साथ अच्छा बर्ताव भी किया जाता है। और दुकानों की तरह सिर्फ पैसा नहीं दिखता। सिर एक ही थाली मंगाई गई वो भी अजय के लिए।

मेरे ऊपर नींद इस कदर हावी है जैसे कोई भूत। जैसे जैसे समय बीत रहा है बैठे बैठे होश आ रहा है। कुछ ही देर में अजय ने खाना निपटा लिया और भुगतान कर के हम निकल पड़े तंबू वाली जगह पर।

रात्रि के साढ़े बारह बज रहे हैं। तर्क अनुसार देखा जाए तो परसों और कल दो दिन और एक रात तक लगातार जगा ही हूँ। तंबू लगाने की बाद अब चैन से सोऊंगा।

केदार घाटी जहाँ है दिव्य शक्तियों का वास

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नमस्ते, मैं ऐश्वर्य तिवारी हूं। ये उन दिनों की बात है जब मैं अपने जुनून का पालन करने के लिए अपने कॉर्पोरेट जीवन को पीछे छोड़ दिया।भारत को जानने के मेरे अंदर हमेशा एक जिज्ञासा थी क्योंकि इस देश में हर कुछ मील के बाद विविधता, विभिन्न संस्कृति है। हर दिन मेरे लिए एक नए शहर में एक नई प्राणी के साथ एक नया दिन है। मैं एक घुमक्कड़ हूं जो के विभिन्न हिस्सों में घूमना पसंद करता है और जल्द ही भारत से बाहर हो सकता है।

3 Comments

  1. Digvijay says:

    भाई ब्लॉग तगड़ा लिखा। मजा आ गया पढ़ के और बुरा लगा तुम्हारी हालत पे उस दिन।

  2. Ajay Dixit says:

    Badiyah Likha h khoob, Achha lekhan h, Bhagwan p dhyan do, Joote aate jate rhenge

  3. Ajay Dixit says:

    Well written 👍🏻👍🏻

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