छोटे करईकुडी में अनेक विरासत

करईकुडी | तमिलनाडु | भारत दर्शन

तैयारी नए सफर की

कल रात का मदुरई से करईकुड़ी तक के सफर में ज्यादा थक गया हूँ बजाय त्रिचिपल्ली से मदुरई आने में। अगर अन्नामलाई मुझे पहले इक्कतला कर देते तो मैं पहले इन्ही के पास आ जाता बाद में मदुर्वी जाता। इस तरह आराम से दिन में मीनाक्षी अम्मन के दर्शन हो पाते।

रात में यहीं अपनी चटाई बिछाकर मैं सोया था। अपनी चटाई पर अन्नामलाई। सुबह उठकर पाया की अन्नामली नदारद है। बाहर कहीं से उनकी आवाज सुनाई पड़ी। निकल कर देखा तो वो अपने मित्रो से बतियाने में मशगूल थे।

अन्नामलाई ने जल्दी तैयार होने के संकेत दिए और फिर अपने कस्बा घुमाने का इशारा भी किया। इसी दिशा में मैं स्नान ध्यान कर खड़ा हो गया साथ ही साथी घुम्मकड़ भी।

मैं यहाँ करईकुड़ी नामक इस गांव में ठहरा में हूँ जो मदुरई से 88 किमी और त्रिचिपल्ली से 90 किमी दूर स्तिथ हूँ।

घर के सामने एक बड़ा तालाब है जो स्वच्छ भी है। गांव वाकई इतना प्यारा बसेरा है जिसकी जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है।

सोच रहा हूँ कि शाम तक गांव घूमने के बाद वापस मदुरई निकल कर वहाँ एक बार फिर मीनाक्षी मंदिर होते हुए रामेश्वरम निकल जाऊंगा।

लेकिन अक्सर सामुदायिक मित्र के पास उनके मेहमानों के लिए उससे भी अच्छा विकल्प मौजूद रहता है। ऐसा ही कुछ अन्नामलाई के दिमाग में भी चल रहा है।

तैयार हो कर उनके चार पहिया वाहन में बैठ कर हम सब निकल पड़े शहर की ओर। धूल धक्कड़ भरे रास्तों में हाईवे पर आ गया।

जिस मार्ग हम निकल रहे हैं वह बहुत ही दुर्गम और धूल मिट्टी लैस है। एक हाईवे जिसका कार्य प्रगति पर चल रहा है अपितु यहाँ काम करने वाले भी नजर नहीं आ रहे।

केले के पत्ते पर खाना खजाना

अन्नामलाई ने कार में बैठे बैठे अनुमान लगा किया की शायद वाहन की कोई टायर पंचर हो गया है। कुछ और आगे गाड़ी बढ़ाते हुए सड़क किनारे गैराज पर ला कर खड़ी कर दी।

यहाँ क्रॉसिंग पार करने के कुछ ही आगे चल कर दुपहिया वाहन बिगड़ता हुआ मालूम पड़ रहा है। कुछ दूर आगे चलने पर पता चला इस चार पहिया वाहन का एक टायर पंचर है।

खुस्किस्मती की बात यह है कि पास में ही पंचर वाले की दुकान है।
आधा घंटा लग गया भरी धूप में वाहन ठीक होने में। टायर निकाला गया पंचर बनाया गया और इधर बाहर खड़े ये सब देखते रहे।

ठीक होने के बाद अन्नामलाई हमे ले आए पास के ढाबे में। सुबह के नाश्ते पर एक दक्षिणी ढाबे में। यहाँ शुद्ध केले के पत्ते सजे हुए हैं। एक सीट पर कब्ज़ाते हुए सुबह का नाश्ता मंगाया। नाश्ते में इडली।

इडली बहुत ही स्वादिष्ट तो है ही साथ ही उसकी चटनी इतनी लजीज है की कोई भी उंगलियां चाटता रह जाए। केले के पत्ते पर खाने का अलग ही आनंद है। पर्यावरण और स्वास्थ्य दोनों लिहाज से स्वस्थ और उच्याताम है।

नाश्ता कर गांव के रास्ते अन्नामलाई मुझे करैकुडी के सबसे प्रसिद्ध मंदिर करपका विनायक मंदिर जो तिरुप्पथूर में स्थित है कि ओर ले जा रहे हैं।

जहाँ अब तक खस्ता सड़क देखने को मिली वहीं बहुत ही सुंदर चित्रण देखने को मिल रहा है।

विरला विनायक मंदिर

घड़ी में बारह बज रहे हैं और मैं मंदिर की चौखट पर गाड़ी से उतर रहा हूँ। पर जनता जनार्दन कम ही दिख रही है। करपका विनायक मंदिर नाम बताया इस मंदिर का अन्नामलाई ने।

मंदिर में प्रवेश करने के पहले अन्नामलाई ने गणेश जी को चढ़ने वाला प्रसाद लिया। मंदिर के भीतर एक हांथी खड़ा है। जिसे कैद कर के रखा गया है।

चढ़ावा लिए खड़े लेखक

पुराने इस मंदिर में चढ़ावा लेकर हम सभी कतार में खड़े हो गए। कुछ ही समय में दिन कि आरती होनी है जिसके लिए पास में बैठे शेहनाई और तबला वादक तैयार बैठे हैं। जो लगातार मधुर संगीत उत्पन्न कर रहे हैं।

अन्नामलाई इस मंदिर की खासियत बताने लगे की यह एकमात्र ऐसा मंदिर है जिसमें भगवान गणेश की 6 फुट लंबी चट्टान की मूर्ति है। गणेश जी की सूंड दाईं ओर है जिसकी वजह से यहाँ उन्हें वैलपूरी पिल्लईर भी कहा जाता है।

अन्य धार्मिक स्थलों में देवताओं की मूर्तियों का मुख पूर्व या पश्चिम की ओर होता है लेकिन यहाँ पर देवताओं की मूर्तियों का मुख उत्तरी दिशा की ओर है।

आमतौर पर गणेश जी के हर स्‍वरूप में उनके चार या अनके भुजाएं होती हैं किंतु इस मंदिर में स्‍थापित मूर्ति में गणेश जी की सिर्फ दो ही भुजाएं हैं।

करपका विनायक मंदिर को पिल्लरेपट्टी पिलर मंदिर के रूप में भी जाना जाता है। इस मंदिर में एक गुफा है जिसे एक ही पत्‍थर को काटकर बनाया गया है।

इस मंदिर के साथ-साथ ये गुफा भी भगवान गणेश को समर्पित है। गुफा के मंदिर में कई पत्‍थरों को काटकर भगवान शिव की मूर्ति बनाई गई है साथ ही यहाँ कई अन्‍य देवी-देवताओं की मूर्तियां भी स्‍थापित हैं।

मंदिर में पत्थरों पर पाए गए ग्रंथों के अनुसार इस मंदिर को 1091 से 1238 के बीच में निर्मित करवाया गया था। माना जाता है कि गणेश भगवान की मूर्ति पर की गई नक्‍काशी चौथी शताब्दी के आसपास की गई थी।

मंदिर का ध्यान चेट्टियार समुदाय द्वारा रखा जाता है और यह इस समुदाय के नौ सबसे महत्वपूर्ण मंदिरों में से एक है।

अन्य देवी देवताए और त्योहार मंदिर में अन्य तीर्थस्थान भगवान शिव, देवी कात्‍यायनी, नागलिंगम और पसुपथिस्‍वरार को समर्पित है।

गणेश जी का उत्तर की ओर मुख करना और दाईं तरफ सूंड का होना काफी शुभ माना जाता है। यह समृद्धि, धन और ज्ञान का कारक है।

कतार में खड़े खड़े ये सब उन्होंने हमें बताया। आरती में विलीन हो चले सब। संगीत देने वाले और ही गजब का संगीत देने लगे। आरती होने के बाद धीरे धीरे सब आगे बढ़ कर दर्शन कर दाहिनी ओर से बाहर निकल आए।

अन्नामलाई के द्वारा जबरदस्त आवभगत

निकलते हुए सीधा मंदिर के बाहर। मंदिर की आरती और दर्शन के पश्चात बाहर दुकान से खरीद कर अन्नामलाई ने मुझे उपहार स्वरूप गणेश जी की मूर्ति भेंट की।

मंदिर के बाहर ही स्वादिष्ट नारियल पानी का ठेला लगा है। जिसे देख कर अन्नामलाई अपने आप को रोक नहीं पा रहे। अन्नामलाई ने बताया की जो नारियल गांव में मिलता है वो शहर के नारियल से कई गुना बेहतर होता है।

नारियल बेचने वाले दद्दू नारियल तो ऐसे काट रहे हैं जैसे किसी की मुंडी उनके हाथ में आ गई हो और वो उसे बक्शेगे नहीं। नारियल वाकई में बहुत ही स्वादिष्ट है। एक तो पानी बहुत ज्यादा मलाई कम ऊपर से गुणवत्ता का तो क्या ही कहना।

नारियल पानी से कुछ हद्द तक थकान भी उतार गई और प्यास भी बुझ गई। तमिलनाडु की धूप झेल पाना उत्तर भारतीयों के बस की नहीं है। पर अभी अक्टूबर का महीना है तो गर्मी उस कदर नहीं है जिस कदर होती है।

कुछ ही देर में मैं घर की ओर निकल आया। घर पर सारे उपकरण और यंत्र चार्जिंग पर लगा दिए। इधर अन्नामलाई को सामुदायिक चलाने का तरीका भी सिखाने लगा। उनके मन में जो भ्रम हैं उसे भी दूर किए।

तनिक देर विश्राम के बाद अन्नामलाई मुझे चाय पर चर्चा के लिए शहर की विश्वविद्यालय के पास ले आए जो सरकार द्वारा संचालित है।

यहाँ हर एक गतिविधि का आयोजन सरकार के दिशा निर्देशों के अधीन है। पास में ही तमिल के बहुचर्चित डॉ वालाल अल्गप्पा संग्रहालय है। अन्नामलाई का मन है हम यहाँ भी चलें। संग्रहालय के पास में बने मैदान में बच्चे खेलते नज़र आ रहे है।

घूम फिर कर मैदान की तरफ आया तो पाया संग्रहालय का पिछले हिस्सा जो की सोंच के लिए उपयोग में है।अक्सर हम अपने शहर की सर्वोच्च चीज मेहमानो को दिखाने की कोशिश करते हैं। सो अन्नामलाई भी कर रहे हैं।

डॉ वालाल अल्गप्पा संग्रहालय

संग्रहालय में भीतर अल्गप्पा से जुड़ी उनकी रोचक बातें हैं उनकी संजीवनी है उनके द्वारा दिया गया दान का विवरण तक का हिसाब है।

इन्होंने बहुत कुछ देश के लिए लिया है। जो मैं यहाँ देख पा रहा हूँ। बकायदा राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित हुए हैं। उनके सम्मान के रखे हुए अवार्ड प्रेरित करते हैं ऐसा ही जीवन जीने को जो देश को समर्पित किया जा सके।

यहाँ से निकलते हुए शाम हो चली है। अन्ना अब हमें पास के किसी रेस्त्रां में ले आए हैं रात्रि भोज के लिए।

योजना के अनुसार आज रात्रि में रामेश्वरम के लिए निकलना है। ट्रेन पौने एक बजे की है उसको विलंब होते होते सुबह के चार बज गए। रात भर सोने जागने का सिलसिला चलता रहा।

मुझे स्टेशन तक सुबह सुबह छोड़ने अन्नामलाई आए, यह उनका घुमक्कड़ों के लिए बढ़ाप्पन है। कुछ ही देर में ट्रेन के सामान डिब्बे में सवार होकर रामेश्वरम लिए रवाना हो गया।

कराईकुडी में कुल तय किया 60किमी सफर

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