अनोखा, कल्पा, स्टोरीज ऑफ इंडिया, हिमाचल प्रदेश
comments 5

कल्पा का सुसाइड पॉइंट जहाँ लोग जाते है मौत को गले लगाने!

बदली योजना

सुबह जल्दी उठने कि बजाए आंख बहुत देर से खुली। जैसा रात में हाँथ में बैग फसा कर सोया था सुबह खुद को वैसा ही पाया। बेंच पर नींद भी सही आ गई। उसके ऊपर स्लीपिंग बैग गद्दे का कम कर गया।

रात में कमरे का दरवाजा उड़का लिया था ताकि कोई अन्दर ना आ पाए। कमरे में तीन बेंच पड़ी सो तीन आदमी। नींद खुलने पर देखा कि सामने वाली एक बेंच खाली पड़ी है।

बस अड्डे पर हलचल भी हल्की फुल्की दिख रही है। यात्रियों का आना जाना बरकरार है। कुछ अपना झोला झंडा लेे कर बाहर ही बैठे हैं। कमरे में वो ही आ रहे हैं जिनको अपना फोन चार्ज करना है।

मोबाइल तो मेरा भी चार्ज नहीं है। सारे मोबाइल और पावर बैंक चार्जिंग पर लगा कर मैं और अजय बारी बारी से तैयार होने लगे। बस अड्डे पर ही बने दुसलखाने में।

जब तक मैं तैयार हुआ तब तक बस अड्डे की भीड़ भी कम हो गई। योजना यही है कि काजा के लिए निकला जाए फिर पूरा स्पीति घूमा जाए और वापसी में कल्पा।

कमरे के बाहर बने पूछताछ काउंटर जो कि आधा खुला आधा बंद नजर आ रहा है। यहाँ पहुंचा तो देखा अन्दर अंधेरे में बैठी महिला सवाल लेने के लिए आतुर हैं।

पूछताछ में पता चला कि काजा जाने के लिए आखिरी बस सुबह पांच बजे ही निकल चुकी है। अब अगली बस कल सुबह मिलेगी।

कल्पा का बनाया मन

निकलना तो मुझे भी काजा ही था पर शोक व्यक्त करने वाली कोई बात नहीं है। काजा नहीं तो कल्पा ही सही। मालूम पड़ा कल्पा जाने के लिए नौ बजे एक बस है।

कल्पा भी घूमना ही है तो क्यों ना वहाँ चला जाए। इसे ध्यान में रखते हुए बैग पैक कर और क्लॉकरूम में जमा कराने की इच्छा जहीर हुई।

रात गुजरी जिस कमरे में वो कमरा भी खाली कर दिया। इस छोटे से बस अड्डे में खिचड़ी जैसा मामला है सारा। आजू बाजू ही सब कुछ है।

मैं अमानती घर की खोज में निकला पर पूरे बस अड्डे में कहीं भी अमानती घर का बोर्ड नजर नहीं आ रहा है। बाहर सजी दुकान में पूछा तो मालूम पड़ा अमानती घर अन्दर बनी कैंटीन के भी अंदर है।

कल्पा में चींटी की तरह दूर से दिखती बस का नज़ारा

एक पल के लिए मैं सोच में पड़ गया कि कहीं मैं ही तो गलत जगह नहीं आ गया! कैंटीन से घुस कर 2*2 के अमानती घर में पहुंचा तो ना अन्दर कोई है ना बाहर।

टेहेल्ते हुए एक अंकल आए, हालचाल लिया और वही निकले जमाकर्ता। उन्हीं के पास बैग जमा करा दिया। पर अहम जानकारी देते हुए शाम के पांच से पहले आने को कहा।

ये भी सूचित किया की वो उपलब्ध नहीं होंगे उनकी जगह दूसरा आदमी होगा। ये समस्या नहीं है लेकिन ये समस्या तब बन सकती है अगर यात्री पर्ची खो दे और दूसरा आदमी सामान देने से मना कर दे। तो क्या होगा वो तो पता नहीं!

बैग तो सकुशल जमा हो गया। बगल की रसोई में बन रहे गरमा गर्म पराठे की खुशबू अपनी ओर खींच रहे हैं। चाहूँ तो लगे हाँथ नाश्ता भी कर लूं लेकिन समय नहीं है पर्याप्त।

छूटने से बची बस

कुछ ही देर में बस निकालनी है कल्पा के लिए ।

रात में जिस पहाड़ी को देख कर सूर्य की किरणों के साथ कल्पना कर रहा था वो अब साक्षात हो रहा है। इतना अद्भुत नज़ारा जिससे नज़रे हटाने को जी नहीं चाह रहा।

पहाड़ की तरफ देखते देखते कल्पा जाने वाली बस में चढ़ा। बस काफी खाली है इसलिए ज्यादा कोई परेशानी नहीं होगी। बस चलने में अभी कुछ चंद मिनट बाकी हैं। इसलिए मैं रोड तक आ निकला टेहलने।

मेरा पहुंचना ही हुआ और बस निकाल पड़ी। मुझे हिमाचल में खुद के लिए बस रुकने कि उम्मीद ना के बराबर रहती है। लेकिन अंत में रुक जाती है वैसे ये भी रूकी।

बस में चढ़ा और सबसे पीछे वाली सीट मिली बैठने को। मुझे लग रहा है कल्पा पहुंचने में एक दो घंटे का समय तो लग ही जाएगा। मेरे बगल में बैठी एक महिला जो पेशे से अध्यापिका लग रही हैं उनसे जिज्ञासावश कल्पा पहुंचने तक का समय पूछा।

उन्होंने ना सिर्फ समय, बल्कि वहाँ क्या घूमने लायक जगह हैं उनका विवरण भी अच्छे से दिया। कल्पा के ठीक सामने कैलाश किन्नौर पर्वत है जिसका भक्तगण हर सावन में चक्कर लगाते हैं।

इनके मुताबिक ये किन्नौर पर्वत पर चढ़ाई कर चुकी हैं और आने वाले अगस्त के महीने में ऐसा तीबारा अपने पति के साथ दोहराना चाहेंगी।

भारत में बहुत कम महिलाएं इन चीज़ों में दिलचस्पी रखती हैं, और मझे ये मोहतरमा उन कुछ चुनिंदा महिलाओं की श्रेणी में खुद को का कर खड़ा कर दिया है।

चढ़ाई की बात बताते वक्त उनके चेहरे की चमक इस बात की पुष्टि कर रही है। उन्होंने ज़ोर दे कर सुसाइड प्वाइंट पर जाने को कहा। कल्पा एक काफी बड़ी पहाड़ी है जहाँ सुसाइड प्वाइंट( आत्महत्या की जगह) काफी विख्यात है।

देवी जी तो मेरे उतरने से पहले उतर गईं लेकिन मैंने उनके द्वारा दिए गए मशवरे को जरूर मना और कंडक्टर जी को इसी जगह पर उतारने का आग्रह किया।

कल्पा का सुसाइड पॉइंट

कल्पा से रोघी गांव जाते हुए

कुछ ही देर में सुसाइड प्वाइंट आ पहुंचा। बस कुछ इस कदर रूकी की दरवाज़ा खोलते ही पैर रखने के लिए ज़मीन नहीं बल्कि खाई। नजर आईं। पहले कदम पर मौत। वो तो गनीमत रही दरवाजे पर ज़ोर नहीं दिया शायद लटका हुआ मिलता।

कंडक्टर साहब पहले तो हसे फिर चालक बाबू से बस पीछे करवाई। मैं सुसाइड प्वाइंट देखने आया हूँ लेकिन जिस जगह बस खड़ी है उसे देखते हुए यही लगता है ड्राइवर साहब असली अनुभव देना चाहते हैं।

बस रूकी और मैं कूद पडा ठीक उसी जगह जहाँ हजारों लोग जान देने आते हैं। ठंड मजे की है। सामने पहाड़ों पर जमी बर्फ इस बात का प्रमाण है। पत्थर के ऊपर से जितनी नीचे नजर जा सकती है मैने डाली।

इतनी गहराई की यदि आदमी नीचे ठीक से झांक भर ले तो सदमे से मर जाएगा। नीचे सैकड़ों मीटर दौड़ती फर्राटा गाड़ी भी चीटी की चाल चलती दिख रही है। तकरीबन ७००-८०० मीटर। इतनी ऊंचाई से कोई कूदेगा तो मौत तो निश्चित है ना भैया!

तभी इस स्थान को इस संज्ञा से नवाजा गया है। इस प्वाइंट से ठीक पचास मीटर नीचे नुकीले पेड़ो पर फंसे कपड़े और दुप्पटे इस बात का चीख चीख कर प्रमाण दे रहे हैं। की लोग वाकई आते हैं मरने।

यहाँ रह कर उलूल-जुलूल हरकत जान पर भारी पड़ सकती है। फोटो खीचाने के लिए तो जगह बहुत शानदार है। अगर थोड़े सही एंगल से खींची जाए तो।

मैंने अजय को कैमरा पकड़ाया और दूर से दो चार फोटो निकालने को भेज दिया।

इस सन्नाटे के बीच मुझे अधितर पल यही लगा कि जब ये इतना मशहूर है तो इतना सन्नाटा क्यों है भाई! यहाँ की लाल पहाड़ियां और पत्थर मंगल ग्रह पर होने का एहसास कराती हैं।

उपर से इनकी बनावट जिसे जितना देखो उतना कम। प्वाइंट के ऊपर खड़े होकर तो नीचे झांकने उचित नहीं है। इसलिए मैं लेट गया और प्वाइंट के नीचे के इलाके को झाकनें लगा।

इतनी घोर गहराई जिसमे एक छोटा सा पत्थर फेकने पर दस सेकंड बाद आवाज़ आती है। उसमे इंसान कूदेगा तो सिर्फ चीखें सुनाई देगी। सुसाइड प्वाइंट पर बने बड़े से पत्थर पर आशिकों ने अपनी अपनी आशिकी उकेरी है।

गुड्डन ने दुलारी के लिए ममता ने अखिलेश, सोनिया ने नरेंद्र के लिए। इस तरह से मरने से पहले कुछ कहानियां पीछे छोड़ गए हैं। किसी ने कूदने से पहले का समय लिखा है। अजीबो गरीब ऑफर लिख कर कूद गए। पूरी की पूरी सूची जारी है मरने वालों की।

भरे सन्नाटे में टूरिस्ट गाडियां कल्पा से भी आगे निकल रही हैं। इस घाटी में कई गांव हैं जिनमें से एक है रोघी। रोघी गांव अपने सेब कि खेती के लिए काफी जाना माना है।

रोघी गाँव को रवाना 

काफी समय सुसाइड प्वाइंट पर व्यतीत करने के बाद। मैं पैदल रोघी गांव के लिए निकल पड़ा। सुसाइड प्वाइंट से रोघी गाँव तकरीबन दो किमी तो है ही। ये पक्की सड़क ज्यादा दूर तक नहीं बनी है।

कुछ दूरी चलने के बाद कच्चा रास्ता चालू हो गया। जब भी कोई गाड़ी गुजरती धूल का गुब्बार उड़ता। सुबह का वक़्त है शायद इसलिए रोड पर सन्नाटा पसरा है।

सिर्फ मैं और कल्पा से रोघी के लिए गुजर रही गाडियां और ये कड़ाके कि ठंड। रात में तो और बुरा हाल होता होगा। पर यहाँ के लोगों को आदत हो गई होगी इस मौसम की।

पहाड़ के जिस रास्ते पर हूँ वहाँ से नीचे खाई में जाने का पैदल सकरा रास्ता है। जिससे देखने पर तो यही लगता है कि आराम से नीचे जाया जा सकता है।

मेरे आधे किमी सफ़र तय करने के बाद में देखता हूँ कि सुसाइड प्वाइंट पर कुछ पांच नव युवक मौज मस्ती में उस खूनी चट्टान से पैर लटका कर बेखौफ बैठ गए। ऐसे जैसे घर पर पड़ा सोफ़ा।

ये बेहद ही खतरनाक है और ऐसे करने की इजाज़त ना सरकार देगी ना ही यहाँ की आम जनता। ऐसे ही मौज मस्ती में हादसा हो जाता है और घरवालों के पास अफसोस करने के अलावा कुछ नहीं रह जाता।

सुसाइड पॉइंट पर खतरा मोड़ लेते नव युवक।

फिलहाल तो स्थानीय लोग ना के बराबर दिख रहे हैं। दिखेंगे भी कैसे अभी गांव की सरहद शुरू ही कहाँ हुई है। धूप तेज जरूर है लेकिन ठंड चरम पर है इसलिए अभी तक जैकेट ओढ़े, अलग करने की जरूरत नहीं पड़ी।

मौसम के तेवर सख्त हैं। सुन्दर नज़ारा तो पहाड़ियों का है जो शांत चित खड़े बर्फ की चादर ओढ़े सो रहे हैं। अबतक आधा किमी चल चुका हूँ, और पहाड़ियों से नीचे जाने का रास्ता भी देख पा रहा हूँ लेकिन ये कितना नीचे जाएगा ये तो जा कर ही पता चल सकेगा।

ऐसा कोई इरादा नहीं है मेरा। एक किमी के बाद फिर से पक्की सड़क मिल गई। एक तरफ पहाड़ तो दूसरी तरफ पेड़। सड़क पर धूप नाम मात्र की ही पड़ रही है। दूर से ही सेब के बगीचे दिखाई देने लगे।

चलते चलते थकान कम है पर पीठ में दर्द जरूर उठ रहा है लेकिन बगीचे देख सारा दर्द निकल गया। बीच बीच में हाथ हिलाते हुए लिफ्ट मांग लेता हूँ वो अलग बात है इनमे से सभी टूरिस्ट गाडियां है।

जो कभी नहीं रुकती। मेरे बाएं तरफ कुछ शरारती बच्चे उद्धम काट रहे हैं। ये कौन से स्कूल जाते होंगे? जाते भी हैं या नहीं यही सवाल बार बार दिमाग में घूम रहा है।

सौ उनमें से एक लड़के को पास बुला के पूछा। इतमीनान से वो कभी सिर हिलाता तो कभी हूँ हां करता, मगर बोलता नहीं। मुझे लगा शायद गूंगा होगा।

बस की समय सारिणी पूछी तब तोते की तरह मूह खुला। थोड़ा और नीचे झांका तो वहाँ एक स्कूल दिख रहा है। जिसका संचालन स्थानीय लोग ही अध्यापक बन जरूरत मंदो को पढ़ाते हैं।

ये बेहद ही नेक काम है बिना निस्वार्थ किए जाने वाला। बच्चे जोर जोर से वन्दे मातरम गीत गा रहे हैं जिसकी गूंज साफ सुनाई पड़ रही है।

वापस जाने की लिए तो एक बस मेरे सामने से निकल रही है, अगली देर शाम को निकलेगी। देर शाम से पहुंचने का मतलब है देरी। जो मैं होने नहीं देना चा रहा।

सेब की खेती के लिए मशहूर रोघी

पहाड़ों से बेहता पानी जिसके ऊपर से छप छप करते हुए हम निकले। मौके का फायदा उठा गाड़ियों के ड्राइवर गाड़ी धोने में लगे हुए हैं। आखिरकार मैं रोघी पहुंच ही गया।

लोग घरों के बाहर खाली बैठे यात्रियों को संगदिग्घ नजरो से ऐसे देख रहे है मानो घर में चोर घुस आया हो। चौराहा तक आने के बाद चार भाग में रास्ता विभाजित हो रहा है, ऊपर-नीचे आगे-पीछे।

चौराहा पार करके और आगे निकला। मिनटों चलने के बाद थकान और प्यास तो जोरों कि लगी है। बाईं तरफ दिख रही दुकान की तरफ मुड़ा और यहाँ मौजूद मोहतरमा की दुकान में कुछ बिस्कुट और कोल्ड ड्रिंक लेे लिए।

उन्होंने अलमारी से कोल्ड ड्रिंक की बोतल उठाई और काउंटर पर रख दिया। अलमारी की रखी हुई ठंडी कहाँ होती है! हमारे यहाँ तो नहीं होती।

मैंने उनसे एक ठंडी बोतल फ्रिज से निकाल कर देने का आग्रह किया। वो बोली आप बोतल उठाएं तो सही। बोतल हाथ में ली लेकिन मेरी सोच के उल्टा ये बोतल एकदम चिल्ड।

जैसे फ्रिज से निकाल कर रखी हो। लेकिन यहाँ का वायुमंडलीय तापमान ही इतना है कि किसी तरह की फ्रिज की जरूरत ही नहीं। ये अनोखा अनुभव रहा और हमेशा याद भी रहेगा।

पास में बन रहे नए मकान कि छत पर आ गया। हालांकि यहाँ कुछ मजदूर हैं पर उन्होंने कोई आपत्ती नहीं जताई। खाते पीते कुछ वक़्त गुजरा।

इस मकान से सामने की पहाड़ी का बेहतरीन नज़ारा देखा जा सकता है। सेब के बगीचों में छोटे छोटे सेब पैदा हो रहे हैं। घोर सर्दी में ये खाने लायक हो जाएंगे। किनारे बैठे भाईसाहब सेब से संबंधित सब बताने लगे।

रोघी गांव मकान से सामने की पहाड़ी का बेहतरीन नज़ारा।

लेकिन यहाँ के नागरिकों को यहाँ का सेब नसीब नहीं होता। ये सारे सेब विदेश में भेज दिए जाते हैं, और भारत में भी इनको नहीं बेंचा जाता। ये इन भाईसाहब के जरिए अनोखी बात जानने को मिली।

भाईसाहब के भी खेत हैं और बड़ी सी बगिया भी।

रेकोंग पियो वापसी

आस पास का नज़ारा देखने के बाद उसी रास्ते पैदल निकल पड़ा। अब वापसी के समय ना तो कोई बस जा रही है ना टूरिस्ट गाड़ी। और शाम तक भी नहीं रुक सकता बस के इंतजार में।

फिलहाल तो लिफ्ट की कोई गुंजाइश नहीं दिख रही। जहाँ पहाड़ से बेहते पानी में अभी तक गाड़ी धुल रही थी वहाँ अभी भी धुलाई चालू है। शरारती बच्चा वहीं का वहीं बैठा है।

घने जंगल के बीच से गुजरते हुए काफी आगे निकल गया। जब यहाँ इंसानी डेरा नहीं होता होगा तब यही पहाड़ घोर जंगलों में शांत एकचित अपनी ही दुनिया में मग्न रहा करते होंगे। हम आए पहाड़ खोदा निकाला अपने उपयोग पदार्थ बिजली आदि।

कच्ची सड़क का निर्माण कार्य जारी है। तकरिबन आधा किमी चलने के बाद देखा एक किनारे सड़क बनाने का सामान और एक बड़ा सा ट्रैक्टर। जिसके पास एक मासूम परिवार हमें गुजरते हुए देख रहा है। उनके दो प्यारे प्यारे बच्चो के साथ खेलने लगा मैं।

साथ में वहीं धूल में जमा ट्रैक्टर भी खड़ा है जिसके चालक इन बच्चो के बाप है। हमने उनसे कुछ दूरी तक छोड़ने का आग्रह किया और वो साहब मान गए। पीछे पीछे दो यात्री और पैदल सफर तय कर रहे हैं उनको भी गाड़ी में बैठाल कर ट्रैक्टर स्टार्ट कर चल पड़े।

ट्रैक्टर जैसे ही उछल कर चला एक समय के लिए लगा अब सीधा नीचे जाएगा, लेकिन ड्राइवर ने अच्छा काबू किया।

एक तो ट्रैक्टर जिसमे आज से पहले कभी मैंने सवारी नहीं की वो भी इन दुर्गम पहाड़ियों में। ट्रैक्टर के धक धक कर के चलने से दिल तेज़ी से धक धक हो रहा है।

ट्रेक्टर में रोमांचकारी सफर।

दूसरी बात ये कि मैं ट्रैक्टर में खाई की तरफ के हिस्से में बैठा हूँ इसलिए आंखो के सामने मौत का मंज़र घूम रहा है। जैसे गर्मी में लू के थपेड़े पड़ते है ठीक वैसे ही ट्रैक्टर में बैठ कर चलने पर ठंड के थपेड़े पड़ रहे हैं। सरकारी ट्रैक्टर से हमें कल्पा तक छोड़ने की मेहरबानी करी।

आगे ना जाने का कारण भी बताने लगे। वो ये कि अगर उनके अधिकारियों ने देख लिया कि से सरकारी गाड़ी लेे कर घूमने निकले है तो उन्हें बड़ी डांट पड़ेगी। जो मैं नहीं चाहूँगा। चालक अगर और आगे जाते तो शायद धरे जायेंगे।

उनकी सेवा भाव देख मैंने उन्हें कुछ रुपए थमा दिया। वो अपना ट्रैक्टर घूमा कर निकालने लगे। मैं आश्चर्य हूँ कि इतनी कम जगह में कैसे वो ट्रैक्टर को घूमा कर वापस चल पड़े।

इतनी सरलता से मानो कुछ नया ना हो उसमे। ना खाई में गिरने का डर ना पहाड़ से टकराने का। खैर आगे का सफर तय करने के लिए मैं पैदल ही निकल पड़ा। हम समतर जगह पर रहने वाले लोग ऐसा करने की कल्पना भी नहीं कर सकते।

ट्रैक्टर चालक तकरीबन आधा किमी पहले ही निकल गए हैं। कुछ दूर चलने पर पानी का छोटा झरना आया।

इधर मैंने ऊपर नजर दाली तो ऐसा कही कोई प्वाइंट नहीं दिखा जहाँ से पानी निकल रहा हो। हमेशा से ये जिज्ञासा रही है कि उस जगह को देखूं जहाँ से पानी निकलता है। जैसे गंगोत्री का गौमुख। जहाँ से गंगा मैया निकलती हैं।

कुछ देर यहीं आराम करने का विचार आया। सो जूते मोजे उतार कर बैठ गया हल्के से झरने के पास। कुछ वक़्त छपा छप में निकल गया।

ठीक कुछ दूरी पर सड़क निर्माण कार्य जारी है। जिसपे मशीनें लगी हुई हैं। कई बार पहाड़ पर सड़क बनाने के लिए इनपे डायनामाइट से विस्फोट किस जाता है। जिसके कारण ये पहाड़ कमजोर हो कर गिरते है और घटनाएं अंजाम होती हैं।

सड़क निर्माण कार्य चलने के कारण रोलर के उस तरफ गाडियां एक लाइन से खड़ी हैं और जो हाल उधर है वो हाल इधर भी हो रहा है।

काम रुका तब जा वाहन उधर से इधर आए। पैदल यात्रियों के लिए भी जगह है निकलने की।

तीन इसराइली

इस सड़क से आधा किमी ही चला की लिफ्ट मांगने पर एक ओमनी रूकी। देखा तो उसमें तीन विदेशी बैठे मिले उनमें से एक गाड़ी चला रहा है। दो आगे एक पीछे।

इन विदेशी लडकों ने बाकायदा गाड़ी रोकी भी और बैठाया भी। बातचीत के दरमियान पता चला कि ये इजरायल से हैं लेकिन ये वापस कल्पा की तरफ जा रहे हैं।

ये तीनों इस बात से अनजान अनजान की आगे सुसाइड प्वाइंट जैसा भी कुछ है।, मैंने इनको वहाँ चलने का सुझाव दिया। वरना ये आगे मोड़ से ही गाड़ी मोड़ने वाले थे।

सुसाइड प्वाइंट तकरीबन एक किमी दूर है यहाँ से। लेकिन ये सफ़र भी कुछ मिनटों में तय हो गया। जब हम सब पहुंचे तो ये तीनों इसराइली खुशी से पागल हो गए। जैसे बिल्ली को दूध मिल गया हो।

दोबारा आने में वो मज़ा नहीं आ रहा है। इतनी जल्दी वापसी अच्छी नहीं। ये भी अं बालकों की तरह इतनी खतरनाक जगह पर पैर लटका कर बैठ गए।

पहाड़ पर जारी सड़क निर्माण कार्य

मगर इनमें से तीसरा वाले ने ऐसा नहीं किया। वो समझदार निकला मेरी तरह। कुछ आधा घंटा और रुका होऊंगा इन तीनों के साथ। जब तीनों इस्राइलियों का मन भर गया तब हम निकले रेंकोंग पियो के रास्ते।

मुझे लगा गाड़ी मोड़ कर वापस जाएंगे। पर इनको कहीं आगे से भी रास्ता पता है सो, कल्पा पार करने के बाद गाड़ी पहाड़ी रास्ते के बजाए गांव में घुसा दी। पहले तो कन्फ्यूजिया गए लेकिन बाद में सही रास्ता पकड़ हम पहुंचे बस अड्डे।

रास्ते में धकापेल स्टाइल में गाड़ी चलाने के कारण एक बच्चा से टकराते हुए गाड़ी निकली। शुक्र है किसी को चोट नहीं आई।

अगले कुछ दिनों में ये इसराइली लड़के शायद हमें काजा में फिर मिलेंगे अपने और मित्रों के साथ। इसी वादे के साथ हमने एक दूसरे से अलविदा लिया।

बस अड्डे से इन्होंने कुछ समान लिया और निकल पड़े अपने रास्ते। एक बजे तक मैं बस अड्डे पर आ धमका हूँ। अमानती घर तो शाम के पांच बजे तक खुला रहेगा तो अभी से बैग वापस लेने का कोई मतलब ही नहीं।

पेट में कूदते चूहे

भूख भी अच्छी खासी लग आई है और समय भी पर्याप्त है। बस अड्डे के बाहर निकल कर कोई अच्छा सा रेस्तरां ढूंढने निकल पड़ा।

जहाँ कल रात्रि भोजन किया था वहाँ भी अच्छा खाना मिलता है क्यों ना वहाँ चला जाए। चर्चा चल ही रही थी कि देवी जी मिल गईं जो सुबह यात्रा के दौरान बस में मिली बगल वाली सीट पर बैठी थीं।

उन्होंने मुझे एक नजर में पहचान लिया। फिर से जब मैंने उनकी राय जाननी चाही रेस्तरां के बारे में तब वो हम अपने संचालित रेस्तरां में आमंत्रित किया।

नीचे गलियों से होते हुए उनके होटल आ पहुंचा। यहाँ जोरदार मेहमान नवाजी के बीच स्वागत किया और भोजन कराया। मैं ये सोच ही रहा था कि एक अनजान शहर में इतनी आओ भगत।

शहरों में तो मर भी रहा हो तो पानी भी नहीं पूछते कि कविता जी ने इसी मुद्दे पर यही बात कह डाली। जिससे मैं पूरी तरह सहमत हूँ।

काफी बड़े इस होटल को संचालित करने के अलावा वो एक अध्यापिका भी हैं। दिन के भोजन में एक दम घर के जैसा स्वाद आया।

कविता जी और उनके स्टाफ से अलविदा ले कर कुछ देर आस पास की जगह का मुआयना किया। तीन बजे तक वापस मैं बस अड्डे पहुंचा।

एक रात की और बात है, इसलिए जैसे कल की रात बस अड्डे में गुजर दी वैसे ही एक और रात सही। यही सोच कर किसी होटल में कोई कमरा नहीं लिया।

अब ना तो कहीं जाना है ना किसी अन्य तरह का कोई काम इसलिए समय रहते अमानती घर से बैग निकलवा लिया। खाली पड़े कमरे में अपना सामान बिखेर वहाँ सारी यंत्र चार्जिंग पर लगा दिए।

यहाँ पहाड़ी क्षेत्र का आदमी बहुत ही सज्जन और ईमानदार है। उधर शहरों में ठीक इसका उलट। बस अड्डे पर भी दिन में सन्नाटा पसरा हुआ है।

कुछ एक कार्यालय खुले हैं बाकी में तो स्थाई रूप से सालों से ताला जड़ा हुआ है। इन तालों पर पड़ी जंग इस बात का प्रमाण है।

अभी तक तो सब सही जा रहा है। आज बसों की भी आवा कहीं नहीं दिखी ज्यादा। दिन के दो बजे के बाद यहाँ काम काफी कम हो जाता है। जिसके चलते सब अपने घरों में कैद हो जाते हैं।

बस अड्डे पर किया कब्जा

कुछ ही घंटो में अंधेरा छाने लगा। यहाँ बस अड्डे पर एकदम सन्नाटा छा गया। सब अपने अपने घर को निकल गए। सारे स्टाफ रूम में अब तक ताला पड़ चुका है।

इधर कैंटीन के बाहर लगी दुकान अभी भी खुली है जो शायद कुछ ही देर में बंद हो जाए। अगर मुझे कल सुबह की बस पकड़नी है तो जल्दी उठना होगा। और जल्दी उठने के लिए जल्दी सोना बहुत जरूरी है।

बस अड्डे के सामने का नज़ारा

इसी को मद्देनजर रखते हुए रात्रि भोजन भी जल्दी कर लिया जाए तो अति उत्तम। अभी सात बज रहे हैं और ये एकदम उपयुक्त समय है निकलने का।

बात छिड़ी है सामान को साथ में लेकर भोजन के लिए निकला जाए या फिर बैग का क्या किया जाए? या एक काम ये हो सकता है वो ये को बारी बारी से भोजन करने जाया जाए। पर उसमे बहुत समय नष्ट हो जाएगा।

कुछ तरकीब नहीं सूझ रही है। पर एक काम किया जा सकता है। वो ये कि बैग को इसी कमरे में रख कर खाने पर निकल जाऊं! चोरी होने का कोई खतरा नहीं है। दरवाज़ा भी लोहलाट है और खिड़कियों की जाली भी मजबूत है।

आम जनता देखेगी भी तो यही लगेगा बाकी कमरों कि तरह इसमें भी ताला लगा है। बैग को अलग अलग बेंच रख कर दरवाज़े को घसीट कर बंद करना पड़ा। लगता है सालों से दरवाज़ा नहीं बंद हुआ है।

बैग से ताला निकाला और लगा दिया बाहर से। अब लग रहा है कोई दिक्कत नहीं है। बाकी कमरों कि तरह ये भी बंद।

बस अड्डे के बाहर निकला तो यहाँ भी सन्नाटा पसरा है। किनारे लगी पान की गुमटी भी बंद हो चुकी है। लेकिन आसपास ढाबे जरूर खुले होंगे।

विश्व कप मैच के दरमियान खाना

कल रात जहाँ खाना खाया था वहाँ जाने का मन नहीं है। मगर यहाँ गुमटी के सामने ऊपर जाती हुई सीढ़ी के पास एक ढाबा चमचमा रहा है। आज यहीं ट्राई करता हूँ खाना।

अलग अलग होटल में खाने में अलग अलग स्वाद बना रहता है। क्या पता कल से बेहतर खाना मिल जाए! सीढ़ियां चढ़ कर ढाबे में पहुंचा तो देखा यहाँ गजब की भीड़ है।

फिर भी खाना तो खाना ही है ना। इतनी ऊपर जो चल कर आया हूँ। और वापस नीचे खाली पेट नहीं जाऊंगा। ढाबे में अभी बैठने तक की जगह नहीं है।

अन्दर दाहिने तरफ पड़ी बेंच पर से कुछ लोग खा कर उठे। जहाँ मैं बैठा और साथ में कई और भी लोग। दाहिने तरफ लगा है टीवी। खाने का आर्डर लेने एक साहब आ गए और मैंने एक फुल थाली बोल दी।

हालांकि खाना आने में अभी वक़्त है। तो भाई साहब मेज़ साफ करके थालियां रख रहे हैं। सामने लगे टीवी से अच्छा मनोरंजन हो रहा है लोगों का। सभी लोग क्रिकेट विश्व कप के मैच का मजा ले रहे हैं।

इधर खाना परसा भी जाने लगा पर कुछ लोगों की मुंडी टीवी पर ही गड़ी हैं। दाल सब्जी भी आ गई और अब रोटी भी। खाना शुरू हुआ और मैच की दूसरी पारी भी।

कुछ लोग मैच में इतना घुस चुके हैं कि वो मूह की जगह नाक से खाना खाने लगे। तो कोई दाल की बजाए पानी में रोटी डुबा रहा है।

फटाफट खाना पीना निपटा कर पेमेंट किया और चल पड़ा अपने स्थान बस अड्डे पर। सीढ़ी से उतर कर बस अड्डे के पास बने डाक घर को देख तो होश ही उड़ गए।

ऐसा बना है मानो कोई फॉर्महाउस। क्या गजब का रखरखाव। कुछ देर इसी के आसपास टेहलने लगा। हमारे शहर में तो इतने बेहतरीन डाक इमारत ना होगी।

भोजन और टहलने के बाद जब वापस आया मैं तब सब सकुशल पाया। ठीक वैसा का वैसा जैसा छोड़ कर गया था। ताला खोला और घुस गया अन्दर।

फिलहाल घड़ी में दस बज रहे हैं। एकदम उपयुक्त समय है सोने का। दरवाज़ा उधकाया और बंद करने लगा।

कुण्डी लगाने के प्रयास में जब अन्दर से कुंडी नहीं लग रही। तब पास में पड़े लकड़ी के लट्ठे को दरवाज़े पर डाल कर दरवाज़ा जाम कर दिया।

तीन बेंच में से एक एक बेंच पकड़ ली और बीच के बेंच पर बैग और चार्जिंग का सारा सामान लगा दिया। और सुबह का अलार्म भी ताकि आज की तरह कल काजा को जाने वाली बस ना छूटे।

सुसाइड पॉइंट कल्पा

5 Comments

  1. Shubham Tripathi says:

    Bhai ye pic sbse best lgti

  2. Raviraj says:

    Jump ki baat krta h ,Main to tak se maut ke mooh me haath daal ke aaya hu.

  3. Anjali says:

    Khub likhe rho tm, good going

  4. Kuldip Kumar says:

    Sach a amazing pic

  5. क्या बात, बहुत खूब लिखा है जनाब।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *