कैलाश के सबसे निकट केदारनाथ

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खुसुर फुसुर

मेरे तंबू के पास कुछ सुगबुगाहट हो रही है। कोई तो आदमी खड़ा हो कर तंबू के बारे में बात किए जा रहा है। इन्हीं जनाब की आवाज़ सुन कर मेरी निद्रा भंग हुई।

साथ ही आसपास में कुछ और लड़कों की भी आवाज़ आ रही है। ये कहाँ से आ रही है इसकी गणित समझ नहीं आ रही। टेंट के बाहर निकला तो जाना की एक सज्जन किसी महिला के साथ टेंट के विषय में ही बात किए जा रहे हैं।

और बगल में जिन लड़कों की आवाज़ आ रही है वो एक बड़े से टेंट से आ रही है।

अंकल जी अपने परिवार के साथ पीछे बनी मार्केट की बंद पड़ी दुकान में रुके थे। उन्होंने बताया उनको मेरा ये छोटा सा टेंट बहुत पसंद आ रहा है।

उनका बस चले तो यही ले जाएं। बातचीत में पता चला कि अंकल नोएडा के एमिटी कॉलेज में प्रोफेसर हैं। और सोनप्रयाग अपने परिवारजनों के साथ आए हुए हैं।

अभी तक चढ़ाई करने वाले थे लेकिन अब उनकी हिम्मत जवाब दे गई है जाने क्यों! मौका देख वो जिस दुकान में रुके हुए हैं उसने चार्जिंग प्लग भी है।

सोचा उनकी इजाजत हो तो मैं अपने इलेक्ट्रॉनिक उपकरण चार्ज कर लूं। अन्यथा ये सब बंद डिब्बे जैसे है जाएंगे सफर में।

उनके हां बोलते ही मैंने अपना एक्सटेंशन बोर्ड निकाला और एक एक कर उसमे चार्जर, मोबाइल, पॉवर बैंक खोंस दिए।

ये देख कर उनकी आंखे और चमक गईं। और अगली यात्रा पर वो ये भी साथ लेके जाएंगे ऐसे संकेत मिल रहे हैं।

बगल वाले तंबू से लड़का निकला। और उसके इतने बड़े टेंट का दाम पूछने पर उसने उतनी ही कीमत बताई जितनी मेरे टेंट की हैं।

मैं दाम सुन के चौंक गया। वही चीज़ मेरे पास दो लोगों वाली और वही उसके पास आठ लोगों वाली। तब जा कर उसने कबूला है टेंट दुबई से मंगवाया है इस कारण सस्ता मिल गया।

तैयारी

साथी घुमक्कड़ भी टेंट से बाहर निकल आया और कुल्ला मंजन करने के लिए व्यवस्था देखने निकल पड़ा। मैं तब तक अन्दर बिखरा हुआ सामान समेटने में व्यस्त हो गया।

फटाफट तैयार हो कर यात्रा पर निकल जाना है। अभी नाश्ता करना है, पंजीकरण कार्ड बनवाना है और भी बहुत कुछ सब दिमाग में लिख लिया।

ऐसा नहीं है कि सभी दुकानें खाली पड़ी है। कुछ तो गोदाम की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। कुछ में सुरक्षाकर्मी रह रहे हैं। और वहाँ तक किसी को जाने की इजाज़त नहीं है।

इमारत के दाहिना पिछला हिस्से में घूमते हुए आया तो यहाँ गंदगी के अलावा कुछ ना दिखाई पड़ा। सामने खड़े ट्रैक्टर से शायद इसीलिए रास्ता ब्लॉक करके रखा हुआ है।

साथी घुमक्कड़ के आने के बाद मैं चल पड़ा नित्य क्रिया के लिए। पतली गलियों से होते हुए पहुंचा मेन रोड पर जहाँ से पुलिस चौकी से दाहिने हाँथ पर भारी मात्र में जल का प्रबंध है।

यूं कह लें कि दुसालखाना है जहाँ पर सब अपनी अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। व्यवस्था पूरी टाइट है। महिलाओं की अलग पुरुषों की अलग।

कमी किसी प्रकार की नहीं दिख रही है। भक्तों की भारी भीड़ को मद्देनजर रखते हुए ऐसी उच्च कोटि का प्रबंध किया गया है। पर फिर भी कुछ सज्जन लोग अपने बच्चों को बाहर ही ज़मीन गीली पीली करवाते दिख रहे हैं।

सुलभ

मेरे पहुचनें तक काफी मात्रा में भीड़ कम हो गई है। जिस वजह से आराम से सब कुछ हो पा रहा है। रोज़मर्रा के काम के बाद आ गया टेंट में वापस।

दुकान में लगा मोबाइल और अन्य उपकरण भी काफी हद तक चार्ज हो चुके हैं। अंकल ने बताया वो तो नहीं बल्कि उनके परिवार से दो पुत्रियां केदारनाथ जाएंगी।

अचानक से हुए इस ह्रदय परिवर्तन का श्रेय भी उन्होंने टेंट को से डाला। फटाफट कपड़े बदल कर रेडी है चुका हूँ। सारा सामान समेट कर बैग में भरने लगा।

जैसे ही टेंट फोल्ड करके तहाने लगा तो अंकल जी भी आ गए इस विधि को सीखने और बड़े ही ताजुब के साथ हर मौके पर प्रश्न करने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं।

दोनों बड़े बैग तैयार हैं उधर अंकल जी के घर की दो बेटियां भी निकलने को तैयार हैं। इतना बड़ा बैग केदारनाथ तक ले जाना तो संभव नहीं है।

सोच रहा हूँ इन्हीं में से किसी दुकान में रखवा दूं। अनलोड हो रहे ट्रक के पास खड़े एक दुकान के मलिक से बात करने लगा। पर उन्होंने बैग रखवाने की कोई गारंटी नहीं ली।

पर उपाय जरूर सूझा दिया। बताने लगे कि सोनप्रयाग मार्केट में अनेकों अमानती घर हैं जो बैग रखवा लेते हैं। उन्हीं में से किसी एक अमानती घर में पता करके रखवा सकते हैं।

सुझाव तो बढ़िया है। प्रोफेसर साहब से भी अलविदा ले कर हम निकल पड़े केदार के मार्ग पर।

अमानती घर की खोज

मार्केट आया तो काफी भीड़ का सामना करना पड़ रहा है।

भीड़ से इतर आगे टैक्सी स्टैंड पर आफत मची दिख रही है। कल जिस होटल में खाया था वहाँ पर सज्जन लोग दिख रहे हैं। सुबह के नाश्ते के लिए पूछा पर वो तो पहले ही खत्म हो चुका है।

नाश्ता ना सही अमानती घर का ही पता मालूम पड़ जाए तो बेहतर रहेगा। आसमान की तरफ इशारा करते हुए उन्होंने दूसरी मंज़िल पर जाने का संकेत दिया।

और आश्वाशन दिया कि वहाँ बैग रखवा लिया जाएगा। बैग लेके पहुंचा। मगर गोदाम जैसे दिखने वाले इस घर में बैग रखने की जगह ही नहीं है।

जमाकर्ता ने साफ शब्दों में इनकार कर दिया। इन भाईसाहब ने और ऊपर जाने की सलाह दी। और ऊपर करते करते ये लोग धरती लोक के बाहर ही ना भेज दें।

तीसरे माले पर आया जहाँ सुस्ताते हुए एक युवक नजर आया। जब अमानती घर के बारे में पूछा तो मुंडी हिलाते हुए हामी भारी।

और बैग लेके पीछे आने का इशारा किया। बैग लेके और ऊपर चल पड़ा। जनाब लेके आए हमें एक तिजोरी जैसे दिखने वाले कमरे में जहाँ थोक के भाव बैग ही बैग पड़े हुए हैं।

मैंने भी अपना बैग इसी ताजोरी में रखवा दिया और सुनिश्चित ही गया बैग को लेके। पर्ची कतई और निकल आया बाहर।

बैग जमा होने के बाद अब पंजीकरण कराना जरूरी है जिसके बिना जाने को नहीं मिलेगा। ये पंजीकरण इस लिए होता है ताकि पता चल सके हर साल कितने यात्री यहाँ आए हैं।

एटीएम करो

केदारनाथ त्रासदी के बाद से ये नियम बनाया गया है। पंजीकरण कराने से पहले जरूरी है पैसा। जेब पूरी तरह खाली हो चुकी है। बिना पैसे के काम नहीं चलेगा।

एटीएम के लिए गली गली भटकना पड़ा फोटो श्रेय बिस्वज्योति भौमिक

आसपास बनी दुकानों में पता किया तो मालूम पड़ा कि एटीएम के लिए पीछे गली में जाना पड़ेगा जो ऊपर जीना चढ़ कर है। जीना चढ़ कर पहुंचा एसबीआई के एटीएम के सामने।

बाहर बैठे गार्ड ने टोकते हुए कहा कि दो में से एक एटीएम खराब है। खैर ये तो हर एटीएम बोर्ड की कहानी है। एक चलता है पांच खराब पड़े होते हैं।

मतलब भर के पैसे निकल आए हैं। पैसे लेके सोनप्रयाग की मार्केट से होते हुए आ गया पुलिस चौकी के बगल में बने पंजीकरण घर।

जहाँ लाइन तो लगी है मगर छोटी। फटाफट लोगों का पंजीकरण हो रहा है। मैं भी इसी कतार में शामिल हो गया। दो चार लोगों के बाद मेरा नंबर आया।

एक फोटो और आधार कार्ड ही पर्याप्त है यहाँ पंजीकरण के लिए। एक के बाद एक तेज़ रफ्तार से लोगों के पंजीकरण हो रहे हैं और हाथों हाँथ कार्ड भी मिल रहा है।

कार्ड लेने के बाद चलने की बारी आई। पर आपसी सहमति में विचार ये बना की नाश्ता पानी करके है चला जाएगा। फिलहाल साढ़े दस हो रहा है। जो बिल्कुल सटीक समय है निकलने का।

नाश्ता पानी और कतार

सामने ही दिख रहे रेस्त्रां में आ पहुंचा सुबह के नाश्ते के लिए। दो पराठा और चाय काफी होगा।

बहुत ज्यादा भी खा लिया तो चला नहीं जाएगा। यहाँ ज़रा जरा से कमरों में बने होटल वाले काफी सेवा से लगे रहते हैं। पर अधिकतर अपनी जेब देखते है।

अगर आपके पास पैसा है तो स्वागत है वरना ॐ नम शिवाय। पराठा तो आ गया पर चाय पता नहीं कहाँ रह गई। दूसरी तीसरी बार बोलना पड़ रहा है तब जा कर चाय प्रस्तुत हुई है।

नजर पड़ी तो वो दुकान पर मिले अंकल ही भी अपने परिवार के साथ आ धमके हैं इसी रेस्त्रां में। लगता है काफी जाना माना रेस्त्रां है। वैसे खाना तो सही ही था।

अगर आपको घोडा या खच्चर चाहिए तो उसकी लिए भी पंजीकरण कराना होगा।

नाश्ता करके अब पूरी तरह से खुद को तैयार करके निकलने का समय हो चला हैं ग्यारह बज रहे हैं और सड़क किनारे लगी बाज़ार से होते हुए आ खड़ा हुआ लाइन में।

यहाँ पता चला कि पुल पार करने के बाद गौरीकुंड तक गाड़ी से जाया है सकता है और फिर वहाँ से केदारनाथ के लिए पैदल यात्रा आरंभ होगी।

पुल के दोनों ओर काफी भीड़ लगी हुई है। जिसे नियंत्रित करने के लिए दोनों ओर पुलिस खड़ी नजर आ रही है। एक बार में एक ही तरफ के लोगों को भेजा जा रहा है।

ऐसा शायद इसलिए भी क्योंकि यह पुल काफी पुराना होगा। मैं लाइन में खड़ा हो कर अपनी बारी का इंतजार कर रहा हूँ। कुछ गाड़ियों को आगे भेजा जा रहा है।

बड़ी भारी लाइन लग गई है। भीड़ को धीरे धीरे आगे बढ़ाया जा रहा है। सबके पंजीकरण चेक किए जा रहे हैं। जिनके पास नहीं है उनको बताया जा रहा है पंजीकरण करा कर ही आगे जाने दिया जाएगा।

मेरा नंबर आते आते पुल खोला गया। पुल पर हरी झंडी मिलते ही गाडियां दौड़ पड़ी सामने की ओर, मानो भगदड़ मच गई हो। पैदल यात्री किनारे और गाडियां सड़क पर।

पुल के इस पार जीप का तांता लगा हुआ है। मैं बैठ गया ऐसी ही एक जीप में जो मुझे गौरीकुंड उतारेगी। जीप के भरने का इंतजार है।

पलक झपकते ही जीप भी भर गई। पहाड़ों के रास्ते से गुजर रही है। शानदार बात ये देखने को मिली कि सड़क मक्खन जैसी बनी हुई है।

समय काफी हो चला है इस वजह से भी भीड़ कम दिखाई पड़ रही है। अन्यथा सुबह के समय यहाँ बहुत भीड़ होती होगी।

गौरीकुंड से यात्रा आरम्भ

शानदार चार किमी के इस सफर में मज़ा आ गया। पहाड़ों के रास्ते से होते हुए आ पहुंची। पैसे दिए और चल पड़ा। जहाँ पर जीप ने उतारा है वहाँ से ही ट्रेक्किंग शुरू होती है।

यहाँ की मार्केट बहुत ही प्रसिद्ध है। हर प्रकार का सामान यहाँ मिल जाएगा।

घाटी का ऐसा शानदार नज़ारा। पत्थर को समतल करके ये मार्ग पैदल चलने लायक बनाया गया है। जो काफी चौंडा हैं। अभी फिलहाल गर्मी है लेकिन मैंने ऊपर जाने के लिए साथ में रेनकोट, जैकेट, टोपा साथ में ले लिया है।

पुराने जमाने में वो आदमी ही चार धाम यात्रा पर निकलता था जो अपने सभी काम से मुक्त हो गया हो। यही वजह है कि पुराने जमाने में कई लोग वापस ही भी लौटते थे केदारनाथ जाने के बाद।

या तो वो रास्ता भटक जाते थे जिसके बाद भूख प्यास से मौत हो जाती थी या फिर जंगली जानवर उन्हे चबा खाते थे। और जो लौटकर भी आते थे उनको महीनों का समय लग जाता था।

इसी वजह से लौट के आने वालों को गांव वाले घेर कर सारा किस्सा सुना करते थे। आज तो लोग धर्म की भावना से कम पिकनिक मनाने की भावना से ज्यादा आता है।

ऐसा बताया जाता है कि रास्ते में बहुत पानी बरसता है। और जैसे जैसे ऊपर पहुंचते जाएंगे हवा पतली होती जाएगी जिस कारण ठंड बढ़ जाती है।

तबेले के रास्ते से जाने की ठानी जो मुझे शॉर्टकट लग रहा है। और बाकी लोग दिए हुए रास्ते से जा रहे हैं।

सीढ़ी चढ के इस रास्ते पर आया जो त्याग हुआ लग रहा है। और बेहद गंदा पर फिर भी छोटा लगने के कारण इसी से चलने की ठानी।

जैसे जैसे आगे बढ़ रहा हूँ वैसे वैसे अस्तबल की संख्या बढ़ती दिखाई पड़ रही है। ऐसा लग रहा है गुप्त स्थान पर आ गया हूँ। लोगों के घर यहाँ बने हुए हैं। घोड़ों का रखरखाव है।

पर रोकने टोकने वाला कोई नहीं है। आधा रास्ता चलते चलते मैं खुद को भटका हुआ महसूस कर रहा हूँ। अब वो समांतर जाता हुआ रास्ता भी दिखना बंद हो गया है।

और लोग भी। तबेले कि गंदगी में खुद को घिरा पा कर आखिरकार बाहर निकलने का रास्ता एक शक्श से पूछा।

दाएं बाएं गलियों से गुजरने का इशारा किया और फिर कुल्ला करने लगे। समझ में तो कुछ ना आया पर बाहर जाने का संकेत जरूर मिल गया।

कुछ एक दो गलियां पार करके फिर से रास्ता पूछने पर कुल मिला कर बाहर सा पहुंचा। करीब करीब उस रास्ते पर आ गया जहाँ और भी यात्री दिखे।

यात्रा का शुभारंभ

शायद काफी सही शॉर्ट कट था। इतनी ऊपर पहुंचा भले ही भटकना पड़ा। अब इन घुमावदार रास्तों से होते हुए हमें पहुंचना है।

अनहोनी भरी शुरुआत

भीड़ कम दिखाई पड़ रही है। रास्ते में खालीपन नजर आ रहा है। दो चार घुमावदार रास्तों से होता हुआ ऊपर आया तो एक आदमी की चीख सुनाई पड़ी।

उसके आसपास दो चार लोग इक्कठा हो गए हैं। पास आया तो देखा वो शक्स अपने पैर पकड़ कर तो रहा है। उमर की क्या ही बात करूं।

हमु उम्र का ये नौजवान पीड़ा में है। पास खड़ी महिला ने पूरी घटना का जिक्र करते हुए बताया कि ये जनाब केदारनाथ की ओर इस घोड़े पर बैठ कर जा रहे थे।

घोड़ा पत्थर पर फिसला और गिर गया जिस वजह से ये भी गिर पड़े। जिसके कारण इनका दाहिना पैर टूट गया है। अब इनको इसी घोड़े पर नीचे ले जाया रहा है।

इस दर्दनाक घटना का पूरा बखान सुन मेरी रूह कांप गई। सोचा नहीं था सफ़र की शुरुआत में अपशगुन सुनने को मिलेंगे। दर्द से कराह रहा ये नौजवान। जिसकी चीख मुझे डरा रही है।

घोड़ा बिल्कुल सही सलामत है मगर ये नौजवान बहुत ज्यादा जख्मी हो चुका है। घोड़ा घूमा घोड़े वाला इन महाशय को नीचे की और लिए जाने लगा।

उनके साथी भी इस नौजवान के साथ नीचे जा रहा है। ऐसी आत्मा को झकझोर देने वाली घटना से रूबरू होने के बाद मैं और भी सतर्क हो कर चलने लगा।

बड़े बड़े पत्थरों पर चलना कठिन तो है और फिसलन भरा भी। चप्पल या साधारण जूते पहन कर चलने लायक तो नहीं है ये रास्ता।

अब और अधिक सावधानी के साथ चल रहा हूँ। ठंड का तो नामों निशान नहीं है। इस समय धूप बहुत तेज़ है। जिस कारण बदन से लिपटी जैकेट भी भारी लग रही है।

दूरियां

रास्ते में सभी सुविधाएं

रास्ते में जगह जगह नींबू पानी के ठेले लगे हुए देखे जा सकते हैं। अचंभे वाली बात ये है कि बच्चे नौजवानों से अधिक मात्रा मे बूढ़े बुज़ुर्ग हैं इस मार्ग पर।

जिनकी जेब भरी हुई है वो तो पिट्ठू, घोड़ा/खच्चर या पालकी से जा रहे हैं। जो सक्षम नहीं हैं वो ग्यारह नंबर की बस से। ग्यारह नंबर की बस सबके पास होती है पर हर कोई इसकी सवारी नहीं करना चाहता।

अधिकतर बूढ़े बुज़ुर्ग गांव श्रेत्र के निवासी लग रहे हैं। जिनको देख देख मैं प्रेरित हो रहा हूँ जल्दी जल्दी आगे बढ़ने के लिए। कुछ जगह रास्ता बना हुआ है कुछ जगह मिट्टी पलीद है।

रास्ते में शॉर्ट कट के चक्कर में हरी भरी पहाड़ी में एक परिवार चढ़ने की कोशिश करने लगा।

मैं सकुशल ऊपर आ गया हूँ इसी रास्ते। मगर ये लोग फंसते हुए नजर आ रहे हैं। मेरे से आगे खड़ा एक लड़का दौड़ कर गया इनको अपना हाँथ देने।

अन्यथा शायद ये फिसल कर नीचे भी जा सकते थे। इंसान से ज्यादा यहाँ पर खच्चरों और घोड़ों की हालत खराब दिख रही है। जो थके हैं बावजूद उनको चढ़ाया जा रहा है।

जो कारण बनते हैं हादसों का। जैसे सफर के शुरुआत में देखने को मिला था।

किसी को कितनी भी तकलीफ ही रही हो पर चेहरे पर सबके एक प्रस्सनता है। क्यूंकि वो उस मुकाम तक पहुंचने का प्रयास कर रहे हैं सभी कठिनाइयों को पार करते हुए।

रामबाड़ा से पहले

अधिकतर लोग लाठी का सराहा लेके ही आगे बढ़ रहे हैं। सबसे अच्छी बात जो हमें लग रही है वो ये की जगह जगह काफी सुविधाएं मुहैया कराई गई हैं।

जैसे उपचार के लिए, सौंचालाय, पानी। और हर कुछ किमी के मोड़ पर कोई ना कोई छोटा बड़ा मंदिर जरूर मिल रहा है देखने को।

ऊपर आते आते टंकी खाली करने का समय हो चला है। सो कर भी रहा हूँ।

पहाड़ की हरियाली बढ़ती जा रही है जैसे जैसे मैं ऊपर चढ़ रहा हूँ। ठंडी ठंडी हवा महसूस कर पा रहा हूँ। आसमान फिलहाल तो साफ दिख रहा है। पर ये कभी भी बिगड़ सकता है।

यात्रा शुरू किए हुए हमें दो घंटा हो चुका है। कुछ एक किमी दूर रामबाड़ा पड़ेगा। जो किसी जमाने में एक शहर हुआ करता था। त्रासदी के बाद ये पूरा बाज़ार ही उजाड़ गया है।

पत्थर वाला रास्ता नीचे कुछ हिस्सों में मिला था। काफी जगह सीमेंट वाला सपाट रास्ता है। जिस पर चलने पर कोई दिक्कत भरा नहीं है।

हां दौड़ने के लायक नहीं है। क्यूंकि दौड़ने पर इन्हीं सीढ़ियों की बनावट रुकावट का कारण बन रही हैं। कुछ आगे चल कर रास्ता बटा हुआ नजर आ रहा है।

एक रामबाड़ा की तरफ दूसरा भीमबली जो कि नया रास्ता बना है।

जन सैलाब का उत्साह देखने लायक है। एक रुकता है तो दूसरा चल पड़ रहा है। भारी मात्रा में ये भीड़ भी मुझे निरंतर आगे बढ़ने को प्रेरित कर रही है।

पिछले दस वर्षो में यहाँ लोगों की 140% वृद्धि हुई है। इलाके में इतनी भारी तादाद से घाटी पर दबाव बढ़ जाता है। देवभूमि उत्तराखंड की एक सीमा है जिसके आगे झेल पाना उसके बर्दाश्त के बाहर है। जो आज यही हो रहा है।

ठहराव

लगातार चलने के बाद कुछ समय सस्ता लूं तो और बेहतर होगा। मेरा मनना है कि जितने कम से कम समय में ऊपर पहुंच जाऊं उतना उत्तम

वैसे तो लोगों को ऊपर पहुचनें में दस घंटे का समय लगता है। पर जिस गती से हम चल रहे हैं उससे यही मालूम पड़ता है कि छह से साढ़े छह घंटे में पहुंच जाऊंगा।

बड़े एक ढाबे में आ रुका। यहाँ इस कदर भीड़ है जिसका कोई हिसाब नहीं। लगातार चाय का भगौना खौल रहा है और चाय छन रही है।

मेरा चेहरा पसीने से लथपथ और लाल। हो चला है। यहाँ कुछ देर की सुस्ताहट के बाद ही आगे बढ़ने की शक्ति आयगी।

कई लोग ऊपर से उतर कर भी आए हैं। बहुत से लोग परिवार के साथ हैं। ऐसे ही एक परिवार मेरे बगल मे बैठ कर आगे की योजना बना रहा है।

दिखने में तो अमीर पर स्वभाव से सरल मालूम पड़ रहे हैं। ये भी रास्ते भर मुझे दिखते आए हैं, जिन्होंने पैदल ही इस सफर को तय करने का फैसला लिया है।

और वो दोनों लड़कियां भी जो साथ ने निकली थी सोनप्रयाग से पर हाल फिलहाल में कहीं नजर नहीं आईं। गरमा गरम चाय सुबह के बाद अब कुछ जा रहा है पेट में।

तकरीबन आधे घंटे गुजर जाने के बाद, चाय का भुगतान किया और चल पड़ा। रास्तों में नदी किनारे त्रासिदी द्वारा छोड़े गए सबूत अभी भी देखे जा सकते हैं।

केदारनाथ त्रासदी के अवशेष

बड़े बड़े पुल ऐसे ही समूचे नदी के ऊपर पड़े हुए हैं। कुदरत के कहर के सामने कोई नहीं टिक सकता। हर बार कुदरत हमें ये याद दिला देती है।

पहाड़ों में जिस हिसाब के घरों का निर्माण आज के समय है रहा है वो बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं है। इसी वजह से पहाड़ों में गुजर बसर करना एक खतरा है।

केदारनाथ में घर, रेस्त्रां, धर्मशाला, रेस्ट हाउस के अलावा होटलों का भी निर्माण कर लिया था। नया आदमी उतना समझदार नहीं है जितना पुराना आदमी हुआ करता था।

जिन्होंने अपने घर ऊपर की ढलान पर बनाए थे। जो काफी ऊपर होते थे नदी से। फिर चाहे उन्हे नदी से पानी लाने के लिए कितनी भी मेहनत करनी पड़े लेकिन उनका मनना था कि ऊंचाई ही सुरक्षित है।

रामबाड़ा

रामबाड़ा को पार करते हुए उस स्थान पर आ गया जहाँ कभी यहाँ बीस हजार की आबादी रहा करती थी। यहाँ वो दोनों बालिकाएं भी मिलीं जो सोनप्रयाग से साथ में निकली थी।

हालांकि ये नौ बजे ही निकल पड़ी थी और मुझे निकलते हुए ग्यारह बज गया था सोनप्रयाग से। मंदाकिनी की तेज़ धारा को देखा जा सकता है।

जो पत्थरों पर पड़कर अपना विकराल रूप दिखा रही है। रामबाड़ा किसी जमाने में समूचा शहर हुआ करता था। जो अब नहीं है। हजारों की तादाद में लोग यहाँ फंसे थे और उससे भी कहीं ज्यादा मरे थे।

मंदाकिनी नदी के पास लेखक

त्रासदी के दौरान यहाँ पर 16 जून को ही पुल टूट गया था जिसके बाद अब दो नए पुल का निर्माण किया गया है। यहाँ अब तो कोई कस्बा या शहर नहीं है बल्कि यात्रियों का हुजूम है।

जो यहाँ मंदाकिनी के पास खड़ा निहार रहा है। जैसे जैसे आगे की ओर बढ़ रहा हूँ उन भयानक दिनों की तस्वीर भी साफ होती दिख रही है।

हालांकि काफी मात्रा में मलबा हटाया जा चुका है। कुछ एक तस्वीरें यहाँ खिचवा रहा हूँ। इतना अच्छा यहाँ समा बांधा हुआ है कि आगे जाने की इच्छा ही नहीं प्रकट है रही।

त्रासदी के बाद तो ना जाने कितनी लाशे इस घाटी में ही दफन हो चुकी होंगी। कुछ को जंगली जानवर खा गए होंगे। कुछ पागल हो गए। जितने आदमी उतनी कहानियां।

सोनप्रयाग के साथी प्रतिभा और आकांशा

जटिल चढ़ाई प्रारम्भ

रामबाड़ा से अब निकल कर चल पड़ा हूँ लिंचोली। अभी दिन के ढाई बज रहे हैं। यही रफ्तार रही तो छह बजे तक तो निश्चित ही पहुंच जाऊंगा।

अब धीरे धीरे खड़ी चढ़ाई प्रारंभ हो रही है। और रास्ता जो अभी तक सरल था चलने में वो भी कठिन हो रहा है। हवा भी पतली हो रही है।

कुल मिला कर अब जटिलताएं बढ़ती जा रही हैं। धूप का अब कोई नामो निशान नहीं है। बादलों से आसमान घिर चुका है। बारिश के आसार लग रहे हैं।

जो कि यहाँ होती रहती है। जमी हुई बर्फ दिखने को मिल रही है। बेहते झरने घाटी को सुंदर बना रहे हैं। अब रास्ते में पानी पड़ा हुआ भी मिलने लगा है।

खड़ी चढ़ाई के बीच पहाड़ों की गहराई को नापा जा सकता है। इन बादलों के नीचे एक अलग ही दुनिया बसी है। लंबे लंबे रास्तों के बीच आदमी छोटे शॉर्ट कट ढूंढ ही ले रहा है।

लींचोली तक पहुंचते पहुंचते बड़ी मार्केट नजर आ रही है। बेहतर रहेगा कुछ देर सस्ता लूं। आगे क्या पता मौका मिले या ना मिले।

लूट

सोच रहा हूँ कॉफी ग्रहण कर लूं और पानी की बोतल साथ ले ली जाए। दाम पूछे जो कि आसमान छू रहे हैं। एक कप कॉफी की कीमत ₹30 वो भी नाम मात्र की।

पानी की भरी बोतल चालीस। दाम तो ऐसे लगा रखे है जैसे पानी नहीं पेट्रोल बेंच रहे हों। यही हाल नीचे भी है। पर वहाँ इतनी मेहंगाई नहीं है।

मेहंगाई कहूँ या लूट समझ नहीं आ रहा है। शायद इसी लूट के कारण 2013 में भगवान ने अपना लोटा गिराया था।

तकरीबन आधे घंटे सुस्ताने के बाद पुनः यात्रा आरंभ की। चढ़ते चढ़ते ऐसा लगने लगा है मानो फेफड़े बाहर निकल आएंगे और दिल मूह में।

दुर्लभ संयोग

साथ में चल रहे नौजवान। सामने से आ रहे शक्स पर नजर पड़ी जो कि जाना पहचाना लगा। ध्यान से देखा तो ये वही निकले जो यमनोत्री के तप कुंड में तैरते मिले थे।

ये तो दर्शन करके वापस जाते दिखाई पड़ रहे हैं। महाशय को रोक कर मुलाकात करी और अपने आने जाने का भी लिखा जोखा दिया।

बताने लगे अब ज्यादा रास्ता नहीं है आराम से पहुंचा जा सकता है। हमें रास्ते में मिला एक नवयुवक जो हम उम्र ही नज़र आ रहा है। सिर पर चोटी हाँथ रुद्राक्ष की माला।

बातचीत के दौरान पाया कि जनाब चंडीगढ़ से केदारनाथ आए हुए हैं और किसी दूसरे परिवार के साथ। पर वो परिवार पीछे छूट गया है और ये जनाब आगे निकल आए हैं।

बारिश से सामना

कुछ और आगे बढ़ता की मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। मैं भाग कर एक दुकान की शरण में आया। मेरी तरह अन्य यात्री भी यही कर रहे हैं।

बारिश के समय रास्ते पर चलने में और भी खतरा है। फिसलन के कारण आदमी गिर भी सकता है। जब मैं बारिश में बाहर नहीं निकलना चाह रहा तब उन दिनों क्या ही दुर्दशा हुई होगी।

बारिश के बाद का नज़ारा

दुकान में चाय बना रहे सज्जन बताते हैं प्रलय के बाद उनके परिवार के 48 लोग मर गए सिर्फ वही बचे हुए हैं। “उस दिन चारो ओर सिर्फ पानी ही नहीं उसकी दुर्गन्ध से भी लोग बेहोश हुए जा रहे थे।”

ये कैसे बच गए इस सवाल का जवाब देते हुए बताने लगे कि वो अपने परिवार सहित पहाड़ों की चोटी पर जाने लगे थे पर हर कोई नहीं पहुंच पाया था। कुछ लोग बीच पहाड़ी से ही गिर गए थे।

इसी भट्टी में आग की तपिश से खुद को गरम बनाए रखने की कोशिश कर रहा हूँ। लगभग आधे घंटे की बारिश के बाद दोबारा सफर शुरू किया।

काफी वक्त चलने के बाद लगा अब हम तीनो चाय पर थोड़ी चर्चा कर लेते हैं। इसी के चलते हम आ गए कुछ दूरी पर बनी दुकान में।

छूटा मोबाइल

जहाँ तीन कप चाय ऑर्डर दी। साथ ही हमने अपना रेनकोट निकाल लिया ताकि बारिश से खुद को बचाया जा सके। गगन के पास रेनकोट नहीं है।

पर चिंता की कोई बात नहीं है। यहाँ दुकानों पर रेनकोट भी मिल जाता है। सो चाय पर चर्चा के बाद चलने से पहले रेनकोट भी ले लिया।

भुगतान के समय घपला है गया। दुकानदार की ऐसी बुद्धि फिरी की वह घनचक्कर हो गया कि पैसे कब लिए उसने। इधर हमें भी कुछ ठीक से याद नहीं।

शायद ज्यादा लूट मचाने का भगवान ने दिया भी। रेनकोट लेना हुआ और बारिश फिर चालू हो गई। इधर मैंने अपनी जेब में हाँथ मारा तो पाया मोबाइल नदारद था।

वापस भागते हुए ढाबे पर आया तो देखा मेज़ पर ही मेरा मोबाइल रखा मिला।

बगल मे बैठी महिला ने बताया की उसने मुझे बुलाने की कोशिश भी की पर उनकी आवाज़ मेरे कानो तक पड़ी ही नहीं। और मैं दुकान से निकल गया।

हिमनाद

अभी तक बर्फ पर अभी हिमनाद देखने को मिल रहे हैं। इन हिमनाद पर चलकर ही रास्ता पार करना पड़ेगा। एक भूल चूक और सीधा पहाड़ी से नीचे।

क्यूंकि गर्मी के महीने में ये गल भी रही हैं जिसके कारण इससे लगातार पानी बहता रहता है। शाम का समय हो चला है। और मैं भी केदारनाथ बेस कैंप के नजदीक पहुंच रहा हूँ।

केदार के रस्ते हिमनद

यहाँ से नज़ारा बेहद कमाल का है। लंबा रास्ता भी है और छोटा भी। जो चुस्त दुरुस्त हैं वो छोटे रास्ते से आगे बढ़ रहे हैं। अब बर्फ से ढकी पहाड़ियां भी देखी जा सकती हैं।

जो बहुत ही सुन्दर हैं। इनपर जब सुबह धूप की पहली किरण पड़ती होगी तो सोने जैसी चमकती होंगी ये पहाड़ियां। पिट्ठू दल की दात देनी होगी।

वो भी उसी गति से फुर्ती के साथ चढ़ते है जैसे हम। वो भी वज़न के साथ। जिसमे गलती की कोई गुंजाइश नहीं होती। कुछ देर के लिए यहीं पर रुक गया।

यहाँ पर बैग से कैमरा निकाल भरसक फोटो खींची। और तकरीबन आधे घंटे का समय देना तो बनता है सो दे रहा हूँ।

सुन्दर दृश्य को कैमरे में कैद करवाते लेखक
लेखक के साथी साथी घुमक्कड़ और गगन
चढ़ाई चढ़ते लेखक

पुराना रास्ता

बेस कैंप तक आते आते रास्ता बेहतर होता दिखा। और पास में ही अस्तबल और पिट्ठू दल भी दिखाई पड़ रहा है। जो शायद इसी जगह डेरा जमाते हों रात में।

सामने पहाड़ी पर पुराना रास्ता भी दिख रहा है जो अब बर्बाद हो चुका है। इसी कारण नए रास्ते का निर्माण किया गया है। वैज्ञानिक हिमालय को बहुत नाज़ुक पहाड़ मानते है जो अभी भी विकसित हो रहे हैं।

हिमालय की नाज़ुक घाटियों में भूस्खलन कोई अनोखी बात नहीं है। जमीन के भीतर मौजूद ढेर सारे पानी से पहाड़ियों कि कुछ ढलाने गीली रहती हैं जिससे चट्टाने कमजोर हो जाती हैं और उनके लुढकने का भी खतरा रहता है।

जैसे आगे बढ़ रहा हूँ मंदिर का झंडा और फिर धीरे धीरे मंदिर भी दिखाई पड़ने लगा है। ऐसा लग रहा है स्वर्ग में आ गया हूँ।

मंदिर के आसपास की रोशनी से मंदिर दूर से ही जगमगा रहा है। जितना पास जा रहा हूँ उत्साह उतना ही बढ़ता है रहा है। गगन ने हमसे अलविदा लिया और वो अपने साथियों के पास चला गया जो अभी फिर से मिल गए हैं।

शाम के सात बज रहे हैं और सोच रहा हूँ मंदिर के दर्शन भी कर लूं। बेस कैंप के आगे काफी भारी मात्रा में तंबू गड़े हुए पाए। दाम पता किया तो एक आदमी का ₹300 मालूम पड़ा।

ठंड बहुत बढ़ गई है और रुकने का कोई उपाय नजर नहीं आ रहा है। किसी ने बताया कि आगे होटल या गेस्ट हाउस मिल जाएगा।

इसी उम्मीद के साथ मंदिर की ओर बढ़ने लगा। पाया कि जो हरयाणवी बालक साथ में आए थे वो बेंच पर बैठे मिले।

बातें और मुलाकात के दौरान पता चला कि उनके दो साथी बीच रास्ते में ही छूट गए हैं जिनका वो इंतजार कर रहे हैं। सोनप्रयाग में हमसे परे इनको रहने की जगह मिल गई थी।

सोनप्रयाग में सिर के ऊपर छत मिलना काफी बड़ी बात है। अन्यथा लोग गौरीकुंड भाग जाते है होटल लेने के लिए।

इन महाशय को यहाँ भी कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही। पर उससे पहले चुनौती है इनको अपने साथी को ढूंढने की। दो यहाँ हैं दो लापता हैं।

उन्होंने हमारे मोबाइल से भी कॉल करने की कोशिश की पर इनके मित्रो को फोन लगा ही नहीं। लंबी तीर्थ यात्रा के दौरान ऐसा अक्सर देखने को मिलता है।

जैसे मैं और साथी घुमक्कड़ शिवखोड़ी में बिछड़े गए थे। पर वैष्णो देवी में भी ऐसे बहुत से किस्से सुनने को मिले हैं।

रहने की व्यवस्था तो मंदिर में भी देख लूंगा। उधर ऊपर से आकांक्षा को आते देखा जिसने बताया कि मंदिर खुला हुआ है और वो दोनों अभी ही दर्शन करके आ रही हैं।

बर्बाद पड़ा पुराना रास्ता

 

पापी पेट का सवाल

आठ बजने को आए हैं अब तक तो मंदिर बंद हो जाता होगा। इसी विचार के चलते सोचा पहले पापी पेट के लिए व्यवस्था देखी जाए।

फिर सोने का इंतजाम भी देखा जाएगा। बेंच के पास से ही घूम फिर कर वापस टेंट की दिशा में आया। अबतक ठंड बहुत बढ़ चुकी है।

टेंट के पास लोगों ने अला जला लिए हैं। मैं संशय में हूँ टेंट लिया जाए या नहीं। या कुछ वक्त मंदिर के इर्द गिर्द गुज़रा जाए।

फिलहाल तो पेट मे चूहे दौड़ रहे हैं और हरयाणवी बालकों ने बताया था कि टेंट के पास कहीं भोजन मिल रहा है। सो वही ढूंढते हुए आया।

पूछने पर मालूम पड़ा कि मंदिर की दिशा में बाएं हाँथ पर भोजन का वितरण हो रहा है। ठीक से देखा तो वाकई ऐसा हो रहा है।

भूख अब सेहेन नहीं हो रही। शायद इसी कारण भी ठंड बहुत लग रही है। आ गया बैग सहित भोजन टेंट के नीचे। मालूम पड़ा कि ₹१०० थाली पड़ रही है।

दोनों ने एक एक थाली के लिए कूपन ले लिया। पहले तो एक ही थाली लेने के विचार में था। पर जब बताया की सीमित भोजन ही मुहैया कराया जाएगा तो दोनों लेने का फैसला हुआ।

लग गया कूपन लेके कतार में। उधर साथी घुमक्कड़ को बैग पकड़ा कर सीट बचा कर रखने को छोड़ आया हूँ।

घनघोर ठंड के बीच थाली ली जिसमे दाल रोटी चावल सब्जी है। स्वाद घर जैसा तो नहीं है पर पापी पेट के लिए यही सही।

खाना इतना अच्छा नहीं पर मैंने पूरा खाया। कई लोगों ने खाना फेंका भी है जो बहुत ही गलत है।

अब जा के कुछ राहत मिली है। पास में जल रही अंगीठी में किसी ने प्लास्टिक डाल दिया है जिस कारण दुर्गन्ध हो उठा है वातावरण।

इनके प्लास्टिक डालने के कारण मुझे जाना पड़ रहा है मंदिर की ओर। घाटी की तरफ घनघोर अंधेरा है। सिर्फ मंदिर के मार्ग पर रोशनी दिखाई पड़ रही है।

मंदिर की ओर प्रस्थान

पहली दफा मंदिर की सीढ़ियां चढ़ रहा हूँ। अगल बगल बनी दुकानों में बत्ती अभी भी टिमटिमा रही है। कुछ बंद हो चुकीं हैं। ये पहली बार मैं मंदिर की तरफ बढ़ रहा हूँ।

रात के समय काफी सन्नाटा हो चुका है। भीड़ नाम मात्र जी है। जिनके लिए नींद जरूरी नहीं है सिर्फ वही यहाँ दिखाई पड़ रहे हैं।

हालांकि फूल, प्रसाद की दुकानें अभी भी खुली हुई हैं। रेस्ट हाउस और गेस्ट हाउस भी। ऐस ही एक गेस्ट हाउस में पता किया तो मालूम पड़ा कमरा एक भी खाली नहीं है।

और तो और लोग जमीन पर सोने का पैसा दे रहे हैं। ये महाशय ने इशारा करके दिखाने भी लगे। कोई आश्चर्य की बात नहीं है। जिस हिसाब की भीड़ है उसके हिसाब से कुछ भी संभव है।

मंदिर की सीढ़ियां चढ़ते ही पहले झंडा फिर मंदिर दिखने लगा। जहाँ भजन हो रहे हैं। चारो ओर रोशनी और मंदिर की छत को झालर से सजाया गया है।

चमचमाते मंदिर के सामने खड़े भक्त हाँथ जोड़ के खड़े हुए हैं। रात के दस बज रहे हैं और मंदिर में एंट्री समाप्त है गई है। मंदिर के बाहर कई पंडे दिखाई पड़ रहे हैं जो अपनी दुकान चला रहे हैं।

अजीब चोगा पहने ये लोग बहुत ही खतरनाक जान पड़ रहे हैं। मंदिर के दर्शन ना सही मंदिर के इर्द गिर्द ही घूम लेता हूँ। मंदिर का चक्कर लगाने पर भी ये पंडे चारो ओर से मंदिर की दीवार के पास बैठे दिख रहे हैं।

भयानक डरावने दिखने वाले इनमे से एक ने मुझे अपने पास बुलाया। डर के कारण इनसे दूर भागते हुए उस चट्टान के पास आ गया जिसने मंदिर को बचाया था।

ये चट्टान को पूरी तरह से अब पूजा जाता है। टीका और धूपबत्ती सब आ पास है। आखिरकार ये पत्थर ही था जिसने पूरे मंदिर बचाया।

विशेष पूजा

घूम रहा हूँ कि देखने को मिलता है मंदिर के पीछे वाले गेट में एक लाइन लगी है। देख कर तो यही लग रहा है कि मंदिर के दर्शन के लिए है।

सो मैं भी एक टेंट के नीचे जूते उतार कर आ खड़ा हुआ इस लाइन में। लाइन में लगे एक सज्जन अपना दुखड़ा बयां करने लगे।

ना इन जनाब ने दिनभर कुछ खाया ना अभी खाया और बस दर्शन करने आ गए हैं। और कल सुबह भाग जाएंगे। कहीं से पता चला कि ये लाइन स्पेशल पूजा वालों के लिए लगी है।

पर मैं फिर भी इस लाइन से नहीं हटा। इसी उम्मीद में कि रात के ग्यारह बजे ही सही दर्शन तो होंगे। मेरे पीछे खड़े एक सज्जन भी इसी आशा के साथ खड़े हैं।

कुछ साल पहले आ चुके हैं और आज फिर आए हैं। बोलने लगे सरकार से पंगे लेने की उनकी आदत पुरानी है। वो किसी ना किसी बात के लिए कोर्ट में आरटीआई दाखिल करते रहते हैं।

यहाँ की व्यवस्था से बिल्कुल भी प्रसन्न नहीं दिखाई पड़े। अपना इतिहास उजागर करते हुए बताया कि यहाँ से दिल्ली जाने के बाद यहाँ की लचर व्यवस्था के बारे में भी एक आरटीआई दाखिल करेंगे।

बाते चल ही रही हैं। मेरे आगे खड़ा एक परिवार हेलीकॉप्टर से आया है। जो सीधा हेलीकॉप्टर से उतरने के बाद दर्शन के लिए आ गए हैं।

अपना छोटा बच्चा और सूटकेस हाँथ में लिए उन जनाब को दिलासा दे रहे हैं कि ये इनके साथ चल सकते हैं स्पेशल दर्शन के लिए।

लाइन आगे बढ़ी जब मेरी बारी आई तो मेरे साथ पीछे खड़े आरटीआई वाले सज्जन को भी लाइन से अलग कर दिया गया। बोलने लगे या तो अलग से रसीद कटाओ या कल सुबह आओ।

अब भगवान के दर्शन के लिए अलग से रसीद की क्या जरूरत भला। जूते पहने और घूमने लगा मंदिर के कैंपस में। आरटीआई वाले अंकल ने विदा किया और कल सुबह की लाइन में लगने के संकेत दिए।

अब रात के साढ़े ग्यारह बजे कहीं कोई ठिकाना नहीं मिल रहा। सीढ़ियां उतर कर एक खुली दुकान में जगह की विनती की। पर उन्होंने मेरी विनती ठुकरा दी।

बिल्कुल भी मानवता नहीं देखने को मिली कहीं भी यहाँ। कमाओ खाओ और जाओ वाला हिसाब।

मंदिर के बाहर जल रहे दिए के आसपास लोग जमा हैं। चप्पलों का ढेर लगा हुआ है। जिसे देख कर लग रहा है जैसे यहाँ भगदड़ मची हो। कुछ आगे टीन का एक बड़ा सा तैखाना जैसा बना है।

जहाँ काफी अंधेरा है। पहुंच कर देखता हूँ तो पाता हूँ कि यहाँ आदमी ही आदमी सो रहा है। चारो तरफ इंसान। कोई खर्राटे ले रहा है कोई नींद बातें कर रहा है।

कुछ आगे पत्थरों का ढेर पड़ा हुआ है। जो त्रासदी की कहानी बयां कर रही है। कुछ ऐसी ही दशा जीना चढ़ते वक्त एक घर की है।

जो पथरों और मलबे के नीचे दबा हुआ है। ना जाने कितनी लाशे तो मलबे में ही धंसी रह गई होंगी।

केदारनाथ त्रासदी

मंदिर का चक्कर लगाने के बाद आ खड़ा हुआ मंदिर के सामने जहाँ एक पंडित जी ज्ञान देते हुए नजर आए। पास पहुंचा तो सुना कि कैसे आपदा ने विनाशलीला दिखाई थी।

भक्त और टूरिस्ट इस बात से अनभिज्ञ थे कि राज्य में तेज़ी से बढ़ता विकास ही उनके लिए आफत साबित होगा। सन् 2013 में और वर्षो के मुकाबले अधिक भीड़ थी।

शायद किसी को भी इस बात को अंदाज़ा नहीं था कि इस बार ये मौसम उनके लिए मौत का सबब बन जाएगा।

लगातार बारिश के कारण पहाड़ियां पूरी तरह धस कर गिर गईं थीं। गौरीकुंड से केदारनाथ के 14 किमी रास्ते का काफी बड़ा हिस्सा बह कर गिर गया है।

बादल चोराबारी झील के ऊपर इसलिए जमा हुए क्यूंकि वे सकरी जगह पर आ कर अटक गए। पहाड़ों के आगे जाने के लिए बादलों को जगह ही ना मिली।

जिस कारण बादल वहाँ इक्कठा होते चले गए और बरस गए। क्यूंकि बादल अक्सर ढलान वाली जगह पर ही बरसते हैं। इसी वजह से हिमालय में ये घटना आम बात है, शहरों में नहीं।

कम समय में ना सिर्फ बहुत सारा बल्कि बहुत तेज़ी से भी पानी बरसता है

मंदाकिनी, अलकनंदा, भागीरथी और गंगा जबरदस्त उफान पर थीं।

15 जून से घाटी में निरंतर पानी बरस रहा था। पर 16 जून की शाम को बादल फटने जैसे घटना से हादसों का वो सिलसिला शुरू होने वाला था जिससे सब अनजान थे। ये था कुदरती आफत।

बादल फटने के झटके को लोगों ने भूकंप समझा। उसी के दस पंद्रह मिनट बाद सैलाब आ गया था।

सरस्वती और मन्दाकिनी दोनों नदियों में ज्यादातर पानी बर्फ के पिघलने और बारिश से आता है। सरस्वती नदी पर आमतौर पार जलस्तर बहुत कम रहता है।

ये नदी चोराबारी के आसपास के हिमनाद (ग्लेशियर) से निकलती है। लेकिन 16 जून को लगातार जारी बारिश से इन नदियों में ऐसा उफान आ गया जैसा पहले कभी किसी ने नहीं देखा था।

शाम को जिस तरह बादल फटता है उससे पहाड़ों पर भूस्खलन शुरू हो गया। जो मलबा पानी के साथ मिलकर मंदिर के पीछे वाले हिस्से की ओर बढ़ने लगा।

केदारनाथ में उत्तरी छोर पर उफान आ गया जिसने रामबाण और गौरीकुंड को जाने वाले रास्ते के बीच आने वाली हर चीज़ को तबाह कर दिया।

इसी मलबे के चलते मंदाकिनी और सरस्वती के संगम पर अवरोध खड़ा कर दिया था। जिससे सरस्वती एक पुराने रास्ते की ओर मुड़ गई।

केदारनाथ शहर बिल्कुल अलग थलग हो गया था। चारो ओर सिर्फ पानी से घिरा हुआ। जानलेवा पानी बह रहा था।

चोराबारी झील में बर्फ से पिघला हुआ पानी और बारिश का पानी जमा होता है। झील में बहुत थोड़ा सा पानी था। पर 16 को हुई बारिश के कारण इसका जलस्तर बहुत बढ़ गया।

17 की सुबह चोराबारी का तटबंध टूट गया। इस टूटी हुई जगह से पानी तेज़ी से निकल कर चट्टानों से टकराया जो सीधा मंदिर के रास्ते में गिरा।

ये रफ्तार 40 किमी प्रतघंटा के हिसाब से थी। जो आमतौर पर सड़क पर गाड़ियों कि होती है। ये आम बाढ़ से दस गुना तेज थी। इसके साथ आए पत्थरों ने केदारनाथ को बर्बाद कर दिया।

यही मुख्य उफान था जो केदारनाथ से टकराया और भारी तबाही मचाई। मतलब कुल मिला कर पिछले 2-3 दिनों से तबाही का सिलसिला चला आ रहा था। ये बाढ़ पांच मिनट से ज्यादा कि थी ही नहीं।

मंदिर बचे रहने का रहस्य

मंदिर बचे रहने का रहस्य सदियों पुराना है।

कैसे बचा मंदिर?

उस जमाने में मंदिर बनाने वालो ने ऐसी जगह चुनी जो चट्टानों की आड़ में हो। मंदिर की इमारत इस तरह बनी हुई है कि इसमें झटकों को झेलने कि बखूबी क्षमता है। जिसे आज के आर्किटेक्चर इस्तेमाल में ला रहे हैं।

यही कारण रहा है कि मंदिर चोराबारी झील फटने का दबाव झेल ले गया और उसका पानी के साथ आने वाला मलबा भी। और वहीं दूसरी ओर आज की सदी की निर्मित इमारतें मलबे के साथ ही बह गईं।

प्रकृति की ये विनाशलीला चार जिलों में भारी तबाही कर गई थी चामोली, पित्थोर्गढ़, रुद्रप्रयाग और उत्तरकाशी में फैली हुई थी।

केदारनाथ घाटी के नीचे बहुत ही नाज़ुक जगह पर है। इस घाटी के ऊपर तीन चार नदियां निकलती हैं जो शहर के नीचे आपस में मिलते हैं इसलिए भी केदारनाथ बहुत आसानी से इनके चपेट में आ गया।

केदारनाथ की असली कहानी तो आज इन चश्मदीद के मूह से सुनने को मिली है। वरना न्यूज चैनल वाले तो जाने क्या क्या बता गए हैं?

पंडित जी बताते हैं कि ये नंदी बाबा भी असली हैं। क्यूंकि 19वी शताब्दी में अंग्रेज़ो ने यहाँ किसी बैल को रात में नाचते देखते थे।

जिसके बाद उन्होंने नंदी के ऊपर गोली चलाई जिस कारण वो निशान आज भी उनके शरीर पर चिन्हित है। उस निशान की तरफ इशारा करते हुए दिखाने लगे।

रात्रि के बारह बज रहे हैं। पंडित जी ने आग्रह किया कि मंदिर के कपाट के सामने कुछ समय व्यतीत करने से आप खुद को हवा में पाएंगे।

नंदी वाली बात में कितना वज़न है ये तो नहीं पता। पर सोच रहा हूँ मंदिर के सामने बैठ कर खुद को हवा में महसूस करके देखूं कैसा लगता है!

ऐसा अनुभव तो हर कोई लेना चाहेगा। वो भी इतनी पवन जगह पर। सोने के लिए ठिकाना तो कहीं मिल ना रहा, सोच रहा हूं यही करके देखूं।

क्या पता आधे घंटे में ज्ञान की प्राप्ति हो जाए!

सोनप्रयाग से गौरीकुंड से केदारनाथ 28km

केदारनाथ कैसे पहुंचे?

दिल्ली से उत्तरकाशी हवाईजहाज
दिल्ली से ऋषिकेश बस
ऋषिकेश/उत्तरकाशी से रुद्रप्रयाग बस या जीप
रुद्रप्रयाग से गुप्तकाशी जीप/बस
गुप्तकाशी से सोनप्रयाग जीप/बस
सोनप्रयाग से गौरीकुंड जीप ₹20
गौरीकुंड से केदारनाथ पैदल यात्रा, पिट्ठू, घोड़ा
फटा से केदारनाथ बेस कैंप हेलीकॉप्टर ₹6990 किराया

घोड़ा/खच्चर 2500 एक तरफ का
पिट्ठू ₹6000 दोनों तरफ वजन के हिसाब से
पालकी ₹8000-12000 वज़न के हिसाब से

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12 Comments

  1. Ek do jagah hindi me thoda typing error ho gyi h, But koi nhi accha lag rha h padhne me. All the best for future endeavours.

  2. इतना गहराई से लिखा गया ये व्याख्यान मानो 12 जून 2019 को मुझमे दोबारा जीवंत कर दिया हो , पढ़ते समय यही लगा मानो हम वही हों 🤗इस ब्लॉग को अंत तक पढ़ते पढ़ते लगा की हाँ 2013 की त्रास्दी सच में बहुत बढ़ी थी खैर जो भी हुआ वो भी ईश्वर की मर्ज़ी रही होगी ।
    यहाँ जाना एक ख्बाव से कम नही❤️ सच में महसूस होता है कि हम शिव की शरण में आ गए हों ।
    लेखक के शब्दों को अनुभव किया है मैंने🤗🙌 बम भोले❤️🙏

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