जंगल के मध्य में मल्लिकार्जुन

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मरकापुर रोड स्टेशन

ये मान के चल रहा था कि ट्रेन देरी से पहुंचेगी। लेकिन तीन घंटा की देरी होगी ये नहीं पता था। रात्रि के तीन बजे नींद खुली तो देखा मारकापुर पहुंचने का समय तीन के बजाए सुबह के छह बजे हो गया है।

भारतीय रेलवे पर पूरा भरोसा है। जितना बताया है उससे पहले तो नहीं पहुंचनी चाहिए। निश्चिंत होकर छह बजे का अलार्म लगा कर फिर से सो गया।

सुबह ट्रेन ठीक छह बजे पहुंची और मैं अभी भी से ही रहा हूँ। किसी ने बताया इस स्टेशन पर से दो मिनट से ज्यादा के लिए ट्रेन नहीं रुकती।

यह सुनना ही था की मैं फटाफट अपना सामान समेटने लगा। बैग उठाया और कूद पडा ट्रेन से। हालत ये हैं की मेरे पैरों में ना तो जूते हैं।

स्लीपिंग बैग और अन्य सामान जो बैग के बाहर है वो मैं हाथ में लिए खड़ा हूँ। मेरे उतरते ही ट्रेन चल पड़ी। गनीमत है कोई सामान नहीं छूटा। पर इस अवस्था में पा कर खुद को ठगा महसूस कर रहा हूँ।

सामान ताहा के बैग में भरने लगा। स्टेशन पर पहले से ही सन्नाटा पसरा है। ट्रेन के आ जाने के बाद भी कोई खास फर्क नहीं पड़ा।

पेट में बड़ी जोर का दबाव बन रहा है। बैग उठा कर बाहर की ओर जाने लगा। परिसर पर ही मुझे एक स्नानघर दिखाई पड़ा। बाहर बैठे बूढ़े सेठ यहाँ का रखरखाव करते हैं।

पर झगड़ालू जान पड़ते हैं। नित्य क्रिया के बाद भुगतान करने के बाद भी वसूली पर अमादा हैं। जाने क्या चाहते हैं। अगर कोई दोबारा कुल्ला करने भी पहुंच जाए तो शायद ये उसका भी पैसा ना बक्शें।

अर्ध तैयार हो कर स्टेशन से बाहर निकल आया। परिसर के बाहर सिर्फ रेलवे कॉलोनी दिखाई पास रही हैं। थोड़ा और आगे बढ़ने पर चाय पकौड़ी का ठेला दिख रहा है।

ठेले पर चाय बना रहे सज्जन से श्रीशैलम जाने का मार्ग और साधन पूछने पर पता चला रेल की पटरी पार करके, सीढ़ी के रास्ते ऊपर बने पुल पर पहुंचने पर मरकापुरबस स्टैंड के लिए बस मिलेगी।

इतनी देर में ताजी चाय बनकर तैयार हो गई। चाय की चुस्की के बाद मैं इन्हीं के बताए रास्ते पर चल पड़ा गूगल नक्शे की सहायता से।

रेल पटरी पार करते हुए आगे बने पुल पर से ऊपर की ओर चढ़ने लगा। बैग किनारे रख कर इंतजार करने लगा मरकापुर बस स्टैंड जाने वाली बस का।

बस का तो कोई अभी अता पता नहीं। पर सड़क पार करके इस तरफ से जंगल से गुजरती पटरियों का नजारा ही अलग है। ऊपर से सूर्योदय के समय तो सोने पर सुहागा।

नजर पड़ी दाईं ओर से बस आती हुई तब वापस भाग कर अपने बैग की तरफ आने लगा। पर ये बस तो सरसराते हुए निकल गई। पास में खड़े जनाब ने संतवाना देते हुए कहा दूसरी आएगी वो ही जाएगी बस अड्डा।

कुछ ही पल बीते होंगे की दूसरी बस आ धमकी। बैग सहित लद कर निकल पड़ा। कंडक्टर की सीट के ठीक पीछे अपनी सीट जमा ली।

पल के पीछे भारतीय रेलवे का अद्भुत दृश्य

बस अड्डे पर नाश्ता

बस में तेलुगु गाने बज रहे हैं जो मुझे बिल्कुल पल्ले नहीं पड़ रहे। कंडक्टर से टिकट कटवा कर बस अड्डे पर पहुंचने का इंतजार करने लगा।

मरकपुर बहुत ही छोटा शहर मालूम पड़ता है। ना ज्यादा भीड़ भाड़ ना वाहन। करीब आधे घंटे में मरकापुर बस स्टैंड आ गया।

टूटी हुई सीट पर बैग रख कर श्रीसैलम जाने के लिए पूछताछ करने निकल पड़ा। पूछताछ काउंटर पर पता चला कि कुछ ही देर में ज्योतिर्लिंग के लिए बस नौ नंबर पर आयगी।

बस का इंतजार करते करते भूख चिंघाडे मारने लगी। बस अड्डे पर ही दुकान है पकवान की। बाहर मेनू भी लगा है लेकिन अंगड़ बांगड़ लिखे होने के कारण मुझे ना पकवान का नाम पता चल रहा है और ना ही मूल्य।

मोबाइल निकाला और गूगल अनुवाद की सहायता से तेलुगु भाषा में लिखे पकवान और उसके दाम हिंदी में जानना चाहा। पहले तो जाल तंत्र ने धोखा दिया पर अंततः पता चल पाया की चीज ज्यादा महंगी नहीं हैं।

ये इसलिए भी जरूरी है ताकि अनभिज्ञ समझ कर मन माना पैसा ना वसूलें। जो भूतकाल में अजनबियों के साथ होता आया है। चाहें फिर वो भारत का कोई भी कोना क्यों ना हो।

निकल आया दुकान के भीतर और डोसा मंगा कर इंतजार करने लगा। साथी घुमक्कड़ ने इडली। कोने में लगे दूरदर्शन में भी तेलेगु भाषी कार्यक्रम प्रसारित हो रहा है।

मेज साफ करने के बाद भोजन आया तो जैसे मैं उस पर टूट पड़ा। पर ज्यादा देर नहीं। इतना तीखा डोसा की बिना पानी पिए काम ही नहीं बन रहा। शायद यहाँ दक्षिण में शक्कर से दुश्मनी है।

भोजन के बाद बर्तन खुद सफाई वाली जगह तक पहुंचने का नियम है यहाँ। भुगतान के समय दुकान के मालिक ने वही दाम बताए जो गूगल अनुवाद में दर्शा रहे हैं। इसे ईमानदारी कहूँ या जागरूकता पता नहीं।

भारी भरकम बैग ले कर बाहर निकल आया टूटी हुई बेंच पर बस की प्रतीक्षा में। करीब आधे घंटे प्रतीक्षा के बाद बस का आगमन हुआ।

कठोर सफर

बस अड्डे पर बस के आते ही लोग झोला झंडा उठा कर ऐसे टूट पड़े मानो उनको बैठने का स्थान ही नहीं मिलेगा। एक एक कर सवारियों को कंडक्टर ने आराम से चढ़ाया।

जब खड़ी हुई सभी सवारियां बैठ गईं फिर भी बस काफी देर खाली ही रही। सवारियों के इंतजार में अब बस रूठी खड़ी है। आधे घंटे बीत जाने के बाद सारी सीटें भर जाने के बाद निकल पड़ी श्रीशैलम ज्योतिर्लिंग।

शहर से बाहर इतना बड़ा वाहन छोटी सड़कों पर निकलने में कठिनाई तो देगा ही। पुल पार करने के बाद असली जंगली रास्ता शुरू हुआ है।

मरकापुर के बाहर बस जिस रास्ते निकल रही है वो ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो मैं यूरोप के किसी शहर में चल रहा हूँ। बस जंगल के बीच से गुजरती हुई निकल रही है। यहाँ जंगली जानवरों का खतरा भी कम नहीं होगा।

साथ में बैठे यात्रियों ने बताया कि यहाँ अक्सर बाघ, भेड़िए आदि जंगली जानवर अक्सर देखे जाते हैं। जानवरों की सुरक्षा को मद्देनजर रखते हुए संध्या के बाद दुपहिया वाहनों का आवागमन वर्जित है।

चारों ओर हरियाली ही हरियाली है। यह अमोल दृश्य अत्यंत ही मनमोहक है। शाम के छह बजे से ले कर सुबह छह बजे तक यह मार्ग नागरिकों के लिए बंद कर दिया जाता है।

कुल तीन चार घंटे के भीतर बारह बजे तक बस श्रीशैलम आ धमकी। एक एक कर सब उतरने लगे। बस से उतरते ही ऐसा लगा ही नहीं ज्योतिर्लिंग दर्शन की ये जगह है। इतना एकांत।

श्रीसैलम में ऐसे ही रहती है शांति

इतनी खाली जगह। शायद इसी क्षेत्र ने इंसान है बाकी जमीन पूरी जंगल। जैसे और ज्योतिर्लिंग में अच्छी खासी भीड़ होती है वैसी भीड़ यहाँ नजर नहीं आ रही है

शायद इसलिए क्यों कि यहाँ तक पहुंचना इतना आसान भी नहीं है। बस में बैठे यात्री साथी आश्रय ढूंढने लगे। ये महाशय मान के चल रहे हैं की इनके साथ मिल कर कही कमरा ले लिया जाए ताकि ये अपना पैसा बचा सकें।

आश्रय की तलाश में इधर उधर भटकने लगा। एक स्थान पर आ कर खड़ा हो गया। कहीं से घूम फिर कर आए यात्री साथी ने बताया की ब्राम्हण समाज में चल कर रहा जाए तो बेहतर होगा।

चौराहे के किनारे थोड़ा अन्दर एक ब्राह्मण समाज भवन है। मैं चल पड़ा यहाँ पूछताछ करने। बड़ा बैग बाहर ठाकुर जी के पास रखकर।

काउंटर पर महज दो कर्मचारी बैठे हुए हैं। पूछने पर पता चला कि यह सेवा भारतवर्ष से आए हुए समस्त ब्राह्मणों के लिए है। अन्य जाती समुदाय वर्जित हैं। साथ में चल रहे मानस भी ब्राह्मण हैं।

मैं अंदर जा कर कमरा देखने लगा। पहले तो मुझे लगा मुफ्त सुविधा दी जा रही है। पर मालूम पड़ा पैसे के हिसाब से कमरे हैं। कमरों की चाबियां सामने दीवार पर लटकी हैं।

साथी यात्री साथ में रुकने का आवेदन करने लगे जिससे उनके पैसे कम लगेंगे। बात उनकी वाजिब है लेकिन कोई भी कैसे किसी अजनबी के साथ ठहर सकता है।

व्यवस्था तो अच्छी है मगर बाहर खड़ा मेरा साथी घुमक्कड़ ठाकुर है, वरना बात बन जाती। वैसे भी मैं इन महाशय के साथ रुकूंगा तो साथी घुमक्कड़ अकेला रह जाएगा। उनको नमस्कार करके निकल आया बाहर।

इन गलियों में भीड़ से ज्यादा मुझे दुकानें नजर आ रहीं हैं। इन्ही दुकान वालों से पूछ पूछ कर बैग के काउंटर की ओर निकल पड़ा। रास्ते में अधिकांश औरतें सिर मुंडाए घूम रही हैं।

दक्षिण भारत में ये काफी पुरानी परंपरा है। कोई भी प्रार्थना स्वीकार होने पर सिर के बाल दान कर देना। हालांकि यहाँ पर कोई भी दुकान वाला जोर जबरदस्ती नहीं कर रहा अपनी दुकान में आने को।

पहुंच गया जमा केंद्र में। यहाँ भरी संख्या में बैग जमा पड़े हैं। खाली रैक तलाश कर मैने अपना बड़ा बैग रखने लगा। उसमे से जरूरी सामान निकल कर छोटे बैग में डाल लिया।

बैग काउंटर, मोबाइल कैमरा काउंटर भक्तजनों के लिए निकट ही बनाया गया है। मुख्य रोड से थोड़ा आगे चलकर ही स्नानघर दिखा था। अब वहीं पहुंच कर शुद्ध हो कर ही ज्योतिर्लिंग के दर्शन करूंगा।

शुद्धिकरण

मुख्य सड़क पर आ जाने के बाद स्नान घर की ओर आ गया। यहाँ पाया की स्नानघर संचालित करने वाले बिहारी हैं। बाते इतनी हो गईं की ये हुआ की हम पड़ोसी राज्य से हैं तो पचास प्रतिशत छूट दी जाएगी।

स्नानघर बहुत स्वच्छ और आलादर्ज का है। आधे घंटे के भीतर स्नान करके भुगतान करने काउंटर पर आ गया। पर बिहारी बाबू को इतनी सहानभूति हो गई की पैसा ही माफ कर दिया। हुई कपड़े का क्या कर इसलिए इसे यहीं फैला दिए। वापसी में ले जाऊंगा।

चल पड़ा मंदिर की ओर। काउंटर पर आ कर बाकी का सामान भी बैग में घुसेड़ दिया। बाहर निकल कर मंदिर की तरफ बढ़ा।

मंदिर में लगी कतार में जाता इससे पहले बाहर खड़े सुरक्षा कर्मी ने यंत्र और साथी घुमक्कड़ की हाफ पैंट के लिए टोंक दिया।

मुझे लगा बैद्यनाथ धाम की तरह यहाँ भी यंत्र ले जाने देंगे लेकिन ऐसा नहीं होता दिख रहा है। उल्टे पांव वापस दूसरे छोटे काउंटर पर आ कर दोनो मोबाइल जमा करे।

काउंटर पर उत्तर भारत से आए जन मानुष भी दिखे। पर दक्षिण की जनता यहाँ ज्यादा है। साथी ने पूरी पेंट पहनी कर अपनी टांगे ढकी। रसीद कटा कर मंदिर की ओर निकल आया। इस बार बिना किसी रोक टोक के भीतर आ गया।

इससे पहले कि कपाट बंद हों, दो बजे तक दर्शन हेतु कतार में खड़ा हो गया। भीतर एक बहुत बड़ा कक्ष पांच भागों में बटा है।

मनोरंजन के लिए टेलीविजन और भूंखो के लिए भोजन की भी व्यवस्था है। एक के बाद एक पर करते हुए मैं पांचवे कक्ष तक आ पहुंचा। हर कक्ष जाली में बंद है। सिर्फ आर पार देखा जा सकता है।

पर समय काफी बीत रहा है। भक्तों की हालत को देखते हुए उन्हें पानी और खिचड़ी खिलाई जा रही है। ताकि कोई भूख के कारण चक्कर खा कर ना गिरे।

देखते ही देखते कुछ लोग एक के बाद एक दो दोने खा गए। आधे घंटे इंतजार के बाद ताला खुला और सभी भक्तजन को मौका मिला श्रीशैलम ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने का। मंदिर मानो जान पड़ता है जैसे पहाड़ की गोद में बसा हो।

कतार आगे बढ़ी और सब महादेव का जयकारा लगाते हुए पहुंचे कपाट। बहुत ही इतमीनान से दर्शन करने को मिला लेकिन दूर से ही।

बैद्यनाथ धाम की तरह यहाँ कोई पास भी नहीं भटक सकता है। दूर से ही दर्शन करा कर विदा कर रहे हैं।

किले में तब्दील मंदिर

मल्लिकार्जुन बनने की कहानी

कहा जाता है की जब गणेश और कार्तिकेय में लड़ाई हो गई थी की किसकी शादी पहले होगी। हालांकि कार्तिकेय का मानना था उनकी पहले क्योंकि वो बड़े हैं। गणेश अपना विवाह कराने को जिद्द पर अड़े थे।

तब शिव पार्वती ने एक शर्त रखी की दोनो पुत्रों में से जो पहले धरती का चक्कर लगा कर आएगा उसकी पहले। कार्तिकेय ये सुनते ही निकल गए अपने वाहन के ऊपर सवार हो कर। गणेश के लिए यह काम बहुत ही कठिन था।

गणेश ने अपने माता पिता कोएक स्थान पर बैठा कर ही संसार मान कर सात चक्कर लगाए। शिव पार्वती ये देख। अति प्रसन्न हुए और उनकी शादी कर दी रिद्धि सिद्धि से। जब तक कार्तिकेय वापस आए तब तक गणेश के दो पुत्र भी हो चुके थे।

ये देख कार्तिकेय गुस्सा हो गए और इस पर्वत पर आ गए। पुत्र मोह में शिव पार्वती ने देवताओं को कार्तिकेय को मानने भेजा। पर वो नहीं माने। तब शिव पार्वती स्वयं आए। निर्मोही हो चुके कार्तिकेय को जब पता चला तो वो पलायन कर गए।

तब से अब तक शिव अर्जुन और पार्वती मल्लिका रूप धारण करके इस पर्वत पर विराजमान हैं।

वापसी

मंदिर में बाकी देवी देवताओं के दर्शन करके मैं बाहर निकल आया। इसके पिछले हिस्से से मैदान बहुत ही बड़ा दिखाई पड़ता है।

मोबाइल काउंटर से जमा सामान वापस लेकर पीछे निकल आया। कुछ तस्वीरें निकलवाई। मंदिर को किले की तरह चक चौबंद कर रखा गया है।

कुछ देर यहीं पर विश्राम करने लगा। जहाँ बाहर भी एक दो मंदिर हैं। यहाँ शादी के कार्यक्रम या देवी पूजन हो रहा है। जैसे अभी अभी एक नवविवाहित जोड़ा मंदिर से बाहर निकला है।

मंदिर के आसपास सुरक्षा भी कड़ी है। जगह जगह नाके बंदी है। पर भक्तों के लिए बैठने की भी उचित व्यवस्था है। बड़े काउंटर में आ गया । यहाँ बैग ऊंचाई पर रखे हुए हैं। जहाँ तक साथी नहीं पहुंच पाएगा। मुझे ही उचक कर नीचे लाना पड़ा।

दोनो काउंटर से सारा समान उठा कर चल पड़ा चौराहे की ओर वापस मारकर के लिए। वापसी में यही दुकानें अच्छी लग रही हैं। चौराहे पर पहुंचने के बाद स्नानघर की ओर चल पड़ा। जहाँ कपड़े डाल गया था सूखने के लिए। सूखे तो थोड़े बाकी अर्ध गीले ज़मीन पर गिर गए।

भूख भी जोरों पर है। बेहतर है कुछ खा लिया जाए। चौराहे के पास कोने पर रेस्तरां में पेट पूजा करने आ गया। तीखी नूडल्स मंगवा ली।

रेस्तरां के मालिक के माध्यम से पता चला की शाम के चार बजे के बाद कोई भी बस उपलब्ध नहीं होगी। भोज के बाद भुगतान कर निकल पड़ा बस अड्डे सही जानकारी प्राप्त करने।

चार भी बजने को हैं। बैग ले कर करीब आधा किमी चलने के बाद यहाँ आ कर पता चला बस कुछ ही पल में निकलने वाली है। चार बजे की बस से निकल पड़ा मरकापुर रोड। वापसी में बस पूरी बिना भरे ही चालक निकल पड़ा।

इतना साफ सुथरा वातावरण, हवा, धरती और आवाजाही का मार्ग शायद ही कहीं देखने को मिले। मानव जनजाति जहाँ जहाँ वहन नहीं करती वहां प्राकृति खुशहाल है।

डेढ़ घंटे चलने के बाद बस एक ढाबे पर रूकी। बस से उतरकर खाने पीने नीचे आ गया। पर ढाबा इतना खाली हो चुका है कि यहाँ खाने पीने कि सामग्री समाप्त हो चुकी है।

ऐसा अक्सर हुआ है जब बस चलने वाली हो और कोई सवारी नदारद हो। मजेदार बात ये है कि वो सवारी कोई और नहीं मैं ही होता हूँ। इस बार भी ऐसा ही हुआ। चाय की चुस्की के साथ पराठे खाते हुए देरी हुई। दौड़ते भागते बस पकड़ी, और वो आखिरी सवारी मैं ही हूँ।

मरकापुर में मिला मित्र

सूरज ढलने से पहले मैं मरकापुर बस अड्डे आ गया। बस से उतरने के बाद ऑटो से निकल पड़ा रेलवे स्टेशन के लिए।

घनघोर अंधेरे में ऑटो से उतर कर धीमे क़दमों से स्टेशन कि ओर बढ़ा। शाम के सात बज रहे हैं और ट्रेन है रात के दो बजे, मालूम नहीं इतना लंबा समय कैसे गुजरेगा।

रेलवे कॉलोनी के पास एक अनजान सज्जन मिले। बातों बातों में पता चला रेलवे में नया कर्यभाल संभालने के लिए मरकापुर में पटके गए हैं।

राजस्थान से संदीप जी ने हमारे लिए भोजन तैयार किया। हमें उन्होंने खाने पर आमंत्रित किया। भोजन के बाद अपने बारे में और खुलकर बताने लगे।

मारकपुर में मिले नए मित्र संदीप

इतना वक़्त बीत चला अंदाज़ा ही नहीं लगा। बारह बज चुके हैं और मुझे लगता है अब प्रस्थान करना चाहिए और संदीप जी को भी आराम का भरपूर वक़्त मिलना चाहिए।

कॉलोनी से सामने दिख रहे स्टेशन पर वो हमें छोड़ने आए। यहाँ समस्या आने लगी टिकट बुकिंग की। दाएं बाएं आगे पीछे होते होते कॉलोनी के कक्ष में जाकर ट्री किया तब कहीं जाकर बुक हुआ।

संदीप से अलविदा लिया और इंतजार करने लगा ट्रेन का जो दो बजे के बजाए अाई ढाई बजे। निकल पड़ा अपने नए सफर की ओर तड़ीपत्री।

हैदराबाद से श्रीसैलम तक का कुल सफर 663किमी

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