जम्मू से कश्मीर जाने की जिद्द

जम्मू | जम्मू कश्मीर | भारत

कटरा से जम्मू आगमन

डोलती हुई बस से रात्रि के तीन बजे तक कटरा से जम्मू आ पहुंचा। बस में कब झपकी लग गई पता ही नहीं चला।

दुविधा ये है कि मुझे जाना है कश्मीर। लेकिन वहाँ बदहाली के कारण सब अचानक बंद पड़ गया।

ज़ाकिर मूसा के मारे जाने के बाद पूरा जम्मू कश्मीर प्रभावित हो गया है। ऐसा ये पहली बार नहीं हुआ है। घरों में टीवी के सामने बैठ कर हम अक्सर ऐसी खबरे सुनते आ रहे हैं।

“कश्मीर में बिगड़े हालत लोग घरों में कैद होने को मजबूर।”
“आतंकी हमले में कश्मीर में कर्फ्यू। घुसबैठिए चार घंटे में किया ढेर।”

शिवखोड़ी से लौटने के बाद मुझे ऐसी किसी खबर की कोई उम्मीद नहीं थी। मैं कल रात स्तब्ध भी था और हैरान भी।

आखिर ये क्या हुआ। समझ भी नहीं आ रहा था क्या करना सही रहेगा। आनन फानन में लिया जम्मू आने का फैसला ही मुझे सही लगा।

देर रात जब बस पहुंची तब कंडक्टर ने जोरदार आवाज लगाते हुए सोते हुए सभी यात्रियों को उठाया। सोते हुए यात्रियों में से एक मैं भी हूँ।

आंख खुली तो देखा ‌तेज़ रफ़्तार में दौड़ती बस अब कुछ धीमी पड़ गईं है। बस ड्राइवर ने जम्मू के रेलवे स्टेशन लाकर पटक दिया।

कुछ एक सवारियां रास्ते भर उतरती गईं। बाकी बची सवारियां यहाँ उतर रही हैं।

सोने की व्यवस्था

मैं आधी नींद में अपना झोला झंडा लेकर बस से उतरने लगा। उधर बस निकल पड़ी आराम करने के वास्ते। इधर मुझे अपनी व्यवस्था देखनी है।

रात के तीन बजे यहाँ होटल तो दूर चाय की टपरी भी नहीं खुली है। हल्की फुल्की ठंड सो अलग। बैग लेके स्टेशन में ही दाखिल हो गया। भयंकर नींद के चलते स्टेशन में ही सोना ठीक समझा।

स्टेशन में घुसा तो देखा हर तरफ कोई ना कोई बिछौना बिछाए लेटा हुआ है। मैं डोरमेट्री देखने के लिए बंद पड़ी एलिवेटर से स्टेशन के ऊपर वाले हिस्से में आ गया।

पर यहाँ आया तो सब बंद पड़ा है। घूम कर पूरे माले का चक्कर लगाया।

अंधेरे में सब बंद ही नजर आ रहा है। पर मन की संतुष्टी के लिए एक बार और चक्कर लगाया। अंधेरे में आहिस्ता आहिस्ता चलते हुए सीढ़ी के ठीक उल्टे हाथ पर आ खड़ा हुआ।

अंधेरे कमरे में जाली के उस तरफ सो रहे सज्जन ने स्वतः ही पूछा। क्या चाहिए?

मैंने डोरमेट्री बेड खाली होने की बात पूछी। तो एक पल के लिए ठहरे फिर बोल पड़े
“एक भी बेड खाली नहीं है। लोग महीने महीने भर पहले बुक करा लेते हैं और तुम को अभी चाहिए।”

निरशाभाव से मैं वापस नीचे उतर आया। और जगह तलाशने लगा। रात के अंधेरे में ज्यादा कुछ नहीं समझ आ रहा है।

फिर भी सीढ़ियों पिछले हिस्से में दो आदमियों के लेटने लायक पर्याप्त जगह दिखी। यहीं लेटे एक आदमी को थोड़ा सरका दिया।

जो अनावश्यक अपनी चादर के बाहर फैला था। बैग से अपनी मैट निकाल कर बिछाई और एक दूसरे की तरफ पैर करके लेट गए। बैग को दो प्राणियों के बीच में फंसा कर सो गया।

आपको लंबी यात्राओं में इन विषम परिस्थितियों में रहने की आदत डालनी होगी।

निद्रा भंग

सुबह जब नींद खुली तो स्टेशन पर कुछ हलचल देखने को मिली। जहाँ रात में आराम से अन्दर घुसने को मिल गया था। अब वहीं तगड़ी जांच हो रही है।

फर्श पर लगभग सभी सोए हुए उठ कर जा चुके हैं सिवाय मेरे। पीठ का दर्द और हल्का बुखार।

रात में यही सोच कर स्टेशन पर रुक गया था कि सुबह उठ कर कश्मीर निकल जाऊंगा। पहले तैयार होने साथी घुमक्कड़ निकल पड़ा। तब तक मैं अपना बोरिया बिस्तर समेटने लगा।

फिर मैं तैयार होकर आ गया। सारा सामान बांध कर स्टेशन के बाहर निकल आया। इसी आस में की अब कश्मीर जाना है।

कश्मीर जाना किसे नहीं पसंद। पर वहाँ के हालात इजाजत नहीं देते हमें आने को। आज इसी प्रयास और कयास के साथ निकल पड़ा हूँ नए सफर की ओर।

शायद अब तक बंद रास्ते और गाडियां अब आम जनता के लिए चालू हो गई होंगी।

कश्मीर जाने की तैयारी

स्टेशन के बाहर बस चालक से पूछने पर पता चला कि रजिंदर बाज़ार रोड के पास स्तिथ बस अड्डे से पहलगाम के लिए निकला जा सकता है।

जम्मू के राजिंदर बाज़ार में काजू किशमिश की बड़ी मार्केट है।

पहलगाम के लिए निकलने से पहले सोचा झोली में कुछ काजू बादाम किशमिश इसी बाज़ार से ले लिए जाएं। स्टेशन के बाहर लोकल बस में लद कर निकल पड़ा।

बस इतनी छोटी की मेरा सिर दो दफा बस की छत से टकराया।

छोटी सी बस में यात्री आते जाते रहे। अधिकतर के हांथो में उर्दू अखबार देखा। उर्दू अखबार बहुत ज़माने बाद देखने को मिला है।

यही विशेषता है भारत की तरह तरह की भाषाएं।

राजिंदर बाज़ार

कुछ ही देर में राजिंदर बाज़ार पहुंचना हुआ।

बस से उतरते वक्त कंडक्टर ने राजिंदर बाज़ार का बखूबी पूरा रास्ता भी नपवा दिया। सड़क के इस तरफ बस अड्डा और उस तरफ राजिंदर बाज़ार।

लगभग एक किमी चलने के बाद राजिंदर बाज़ार में दाखिल हुआ। यहाँ चेहेल पहल तो अच्छी मालूम पड़ती है। कई अपनी दुकान सजाए बैठे हैं। इस इंतजार में जब ग्राहक दस्तक देगा।

बाज़ार में मेरा स्वागत करने एक कालीन बेचने वाले भैया ने किया। मधुर दबी आवाज़ में कालीन खरीदने की गुहार लगाई। अब मैं भला ये कालीन ले कर जाऊंगा कहाँ। कश्मीर?

कालीन के नाम पर मेरी मैट तो है ही हर जगह बिछाने के लिए।

ड्राई फ्रूट्स खरीदने की बारी

काजू बादाम वाले अलग अपनी दुकान में आने का अनुरोध कर रहे हैं। उन्हीं में से एक की पुकार सुन उनकी ड्राई फ्रूट्स से सुसज्जित दुकान में कदम रखा।

तमाम तरह के अखरोट और किशमिश दिखाई। जिन्हें कश्मीर से यहाँ लाया गया है।

वो अखरोट उठाते और हाथ से तोड़ के दिखाने लगे कितना मुलायम और ताज़ा है। बिल्कुल मुलायम सिंह की तरह।

इसी तरह से कई प्रकार के वो दिखाने लगे। आखिर में आधा किलो किशमिश और एक किलो अखरोट पैक करा लिए।

और अधिक बोझा उठाने कि हिम्मत नहीं है। इसलिए अभी के लिए इतना पर्याप्त है।

हिसाब किताब करने के बाद आगे बढ़ गया। भैया जी आज सुबह हुई बोनी से काफी प्रसन्न नजर आ रहे हैं। और हम भी।

तबियत हुई नासाज़

तेज़ धूप में तबीयत नासाज लग रही है। इतनी की मुझे दवाखाने का पता पूछने की जरूरत पड़ गई। इधर पता पूछ रहा हूँ तो एक दुकानदार को लगा ग्राहक आया।

बड़ी मुश्किल से उसे समझाया मुझे दुआ की नहीं दवा की जरूरत है।

तब जाकर कहीं उसने मुझे इशारे में मेडिकल स्टोर दिखाया। बाज़ार खतम होते ही दाहिने हांथ पर सामने मेडिकल स्टोर दिखा।

वहाँ बैठे डॉ और आगे दवाखाना। तबीयत इतनी भी खराब नहीं है कि डॉ को दिखाया जाए।

इसलिए फोन पर ही अपने डॉ मित्र दवाइयां लिखवा ली और वही दिखा दवाखाने से लेली। हालांकि उनमें से एक दवा नहीं मिली।

उसके बदले जनाब ने सेम फॉर्मूला बोल कर दूसरी पकड़ा दी। हमने बिना कुछ कहे उसे रख ली। उसमे से एक एक गोली पानी के साथ निगल ली।

ड्राई फ्रूट्स और दवा लेने के बाद अब बारी है कश्मीर निकलने की। सोच कर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इतना प्यारा राज्य। मानो स्वयं जन्नत धरती पर आ गया हो।

ऐसा मैंने पुरानी फिल्मों और फोटो में देखा है। आंखो देखा हाल जानने की बारी तो अब आई है।

जम्मू बस अड्डा

जम्मू बस डिपो पूछताछ केंद्र।

बाज़ार से पैदल ही निकल पड़ा बस अड्डे। पूछताछ करने पर बस अड्डे की दूरी का अंदाज़ा हो गया। दुकान वाले भैया मुसकियाए तो हम भी मुस्करा दिए। हांथ हिलाते हुए बढ़ गया मैं आगे।

बाज़ार और फिर सड़क पार करते हुए मैं आखिरकार पहुंचा बस अड्डे। यहाँ नज़ारा ही अलग है।

डीपो में बहुत ही अफरा तफरी का माहौल बना हुआ है। सब कश्मीर के किसी ना किसी इलाके में जाने के लिए भागदौड़ हल्ला गुल्ला करते दिख रहे हैं।

पूछताछ

मैं कश्मीर जाने की मंशा से पूछताछ करते शेड के अंदर आ गया। यहाँ हर कोने पर कोई ना कोई परिवार खड़ा है। नज़ारा तो किसी फिल्मी सीन जैसा लग रहा है। सब मुझे ऐसे देख रहे हैं मानो कोई उम्मीद जगाने आया हूँ।

खंबे दर खंबे पार करते हुए आगे बढ़ता गया। इधर बसें तैयार खड़ी हैं कश्मीर निकालने को। उधर यात्री मालूम नहीं किस इंतजार में खड़े हैं।

हालत देख कुछ अंदेशा सा तो हो रहा है। कंधो से वजनी बैग नीचे उतर कर रखा। और साथी घुमक्कड़ को भेज दिया पता लगाने को की आखिर माजरा क्या है।

बेंच पर रखे बैग के बगल में बैठे चचा जेब से पुड़िया निकाल मसलने लगे। जिस सलीके से पुड़िया खोल के रौबीले अंदाज़ में हंथेली पर मसाला बिखेरा उससे कहा जा सकता है यूपी के भैया हैं।

जैसे घरेलू महिलाएं गेंहू को फर्श पर। धो पोछ के सुखाती हैं। वैसे इन्होंने मसाला। मसाले में चुना मिला के दांतों के पिछले हिस्से में दबाया। और पूछ पड़े कहाँ को जाओगे।

कश्मीर बोल कर मैंने नज़रे फेर लीं। मगर चचा जानकारी से परिपूर्ण हैं। बोले कश्मीर जाना तो मुश्किल मालूम पड़ता है इन हालातों में।

कश्मीर जाने की जद्दोजहद

उधर साथी घुमक्कड़ भी दौड़ते भागते जानकारी जुटा कर आया। मालूम पड़ा कश्मीर के हालत अभी भी सामान्य नहीं हुए हैं। कश्मीर के लिए गाडियां जाएंगी तो मगर कोई निश्चित समय नहीं है।

कोई बोल रहा है एक घंटे कोई दो। अलग अलग कथन संशय में डाल रहे हैं।

इसी बीच एक सज्जन अपने झोले के साथ आए और कश्मीर किसी भी हालत में पहुंचने की बात कही।

पेशे से खुद को इलेक्ट्रीशियन बताया। उन्होंने और बेहतर स्तिथि में वर्णन किया। उनकी बातो से लगा थोड़े और पड़ताल की जरूरत है जिसके बाद ही अंतिम निर्णय लेना उचित होगा।

कुछ दूरी पर बने सरकारी टिकट काउंटर की ओर रुख किया। यहाँ पूछताछ करी लेकिन संतुष्टि भरा जवाब नहीं मिला।

अहम जानकारी

मगर एक चीज मालूम पड़ गई वो ये कि किसी भी प्राइवेट गाड़ी से कश्मीर के लिए रवाना होना ठीक नहीं है।

ऐसा इसलिए भी क्योंकि वो पैसे तो ज्यादा लेंगे ही लेकिन किसी घटना के घटित होने पर कोई जिम्मेदारी नहीं लेंगे। ऐसी स्तिथि में वो सवारी को कहीं भी उतार के निकल लेंगे। या फिर वापस भेज दिए जाएं।

दूसरी ओर सरकारी बस सवारियों की पूरी जिम्मेदारी लेते हुए उन्हें उनकी मंज़िल तक छोड़ के आएगी। चांहे रास्ते में कितनी भी मुश्किलें क्यों ना हो।

ऐसी जानकारी उस इलेक्ट्रीशियन ने दी जिनका लगभग हर रोज़ आना जाना लगा रहता है।

ऐसे हालातों में ये साधारण सी बात है जम्मू कश्मीरियों के लिए।

इधर लाइन से खड़ी बसों में सवारियां भी लदी हैं। इस आस में की आज की शाम कश्मीर में होगी। खिड़की के बाहर टुकटुकी बांधे ड्राइवर और कंडक्टर की आस में बैठी हैं।

प्राइवेट बस भर तो रही हैं लेकिन कब निकलेंगी किसी को खबर नहीं।

उधर कंडक्टर कश्मीर की सवारियां भरने में तुला है। जिसे खुद नहीं पता बस कब चलेगी। सरकारी विभाग ने हांथ खड़े कर लिए हैं और आज के दिन तो साफ इनकार कर दिया जाने को।

इसी उधेड़बुन में तीन घंटे बस अड्डे पर बीत गए। लेकिन मसला हल नहीं हुआ। जाने के लक्षण नजर नहीं आ रहे हैं।

जम्मू तवी रेलवे स्टेशन वापसी

मुझे स्टेशन वापस लौटना ज्यादा बेहतर लगा। लौटने से पहले उन इलेक्ट्रीशियन वाले भैया का नंबर लेे लिया। यदि जाने का माहौल बना तो इन्हीं महाशय को कॉल करके पूछ लिया जाएगा।

रेलवे स्टेशन तो मानो अंतिम सहारा बन गया है। पहलगाम जाने का हौसला अभी भी बरकरार है। पुल के पास से ही स्टेशन के लिए उसी छोटी बस में बैठ गया।

बमुश्किल दस मिनट में राजिंदर बाज़ार से रेलवे स्टेशन पहुंच गया। पहुंच कर ऐसा लगा वापस क्यों चला आया उसी जगह जहाँ से उम्मीद लेकर चला था।

स्टेशन पर अपने उसी अड्डे पर वापस आ खड़ा हुआ जहाँ रात गुजारी थी। बैठ कर अब यही मंथन करने पर मजबूर हूँ आखिर जाऊं तो जाऊं कहाँ।

मंथन

कई प्रश्न एक एक कर मन में एकाएक उठ रहे हैं। जाना संभव हो पाएगा कश्मीर या नहीं? अगर कश्मीर नहीं तो फिर कहाँ?

फिलहाल तो साथी घुमक्कड़ निकल गया दिन का भोजन के लिए।

उतनी देर में मैं जम्मू से और विकल्प देखने लगा। तबीयत नासाज है इसलिए खाना खाने की बजाए फल खाना बेहतर रहेगा।

धर्मकोट में हुई गलती का खामियाजा अभी तक साथ है।

साथी घुमक्कड़ के आने के बाद इस भरी धूप में मैं निकला पेट पूजा के लिए। साथी घुमक्कड़ के द्वारा बताई हुई रेस्तरां में जाने के बजाए मैंने फल लेना बेहतर समझा।

एक किलो सेब लेके मैं वापस चल पड़ा स्टेशन। यही मंथन चल रहा है कि हर हाल में कश्मीर के लिए निकलना है। लेकिन कब?

उधर बस अड्डे पर जिस इलेक्ट्रीशियन का नंबर लिया था। उससे भी हालत का जायजा लेना है।

पहलगाम जाने की जिद्द

किसी भी हालत में आज पहलगाम निकलना है। इसी को मद्देनजर रखते हुए मैंने अपना बैग को हल्का करने का सोचा। पहले ये मंत्रना बनी की ऑफिस के कर्मचारी के यहाँ ही सामान रख दिया जाएगा।

जब उसे फोन करके पूछा तो पता चला कि उसे जम्मू आने में एक दो दिन का वक्त लगेगा। विचार ये उठा कि बैग से अनावश्यक सामान निकाल कर। उसे एक झोले में भर कर स्टेशन के अमानती घर में जमा करवा दिया जाए।

घुमक्कड़ी के दौरान जैसे जैसे दिन बीत रहे हैं वैसे वैसे ये भी समझ आने लगा है।

जीन्स शर्ट और कुछ अन्य वस्तुएं जिनका उपयोग अभी तक नहीं हुआ है तो आने वाले दिनों में क्या ही होगा।

एक एक करके दोनों बड़े बैग से इतना सामान निकल आया कि उसे रखने के लिए झोला की जरुरत आन पड़ी।

स्टेशन परिसर में काफी दुकानें मौजूद हैं। उन्हीं में से एक में स्टेशनरी की दुकान में पता किया। खुस्किस्मती से उनके पास छोटा बैग मिला।

मजबूरी का नाम गांधी। बैग खरीदने गया तो उसे दुकानदार ने तिगुने दाम में बैंचा। लेना भी पड़ा इसके अलावा कोई विकल्प नहीं है।

बैग लेके आया। बैग में एक एक करके इतने कपड़े भर गए की खरीदा हुआ बैग भी ऊपर तक भर चुका है।

उसको किसी तरह एडजस्ट कर के उसमे जगह बनाई। और कपड़े और कुछ किताबें ठूंसी। इधर बस अड्डे पर इलेक्ट्रीशियन भाईसाहब का भी फोन नहीं लग रहा। इस बारे में उन्होंने पहले ही चेता दिया था।

मौज मस्ती कर मूड हल्का करते हुए

सामान की छटनी

जब बैग पूरी तरह तैयार हो गया तब इसे अमानती घर में जमा करने निकल पड़ा। शाम का वक़्त हो चला है। बैग जमा करके पहलगाम निकलने की योजना है।

सारा सामान समेट कर बैग लेे बढ़ चला अमानती घर की ओर। यहाँ लोगों का आवागमन लगा हुआ है। कोई बैग जमा कराने को आया। कोई वापस लेके जा रहा।

मुझे तो कुछ दिनों की बुकिंग करानी है। खुला झोला जैसे ही जमा करने के इरादे से काउंटर पर रखा। तैसे ही जमाकर्ता ने खुला झोला लेने से इंकार कर दिया।

जैसे तैसे उसे ढका और जमा करने के उद्देश्य से पर्ची कटाई। इस बार शकुशल बैग जमा तो हो गया लेकिन अपने जोखिम पर। हालांकि जमाकर्ता का ये भी कहना है कि बिना रसीद के वापस नहीं मिल सकेगा बैग।

और साथी घुमक्कड़ का मित्र अभी जम्मू में नहीं जिसे बैग उठना है। झोला जमा करने के बाद वजनी बैग और भी हल्का हो गया है। इससे बाकी के दिनों में बड़ी आराम रहेगी।

जम्मू से कश्मीर निकलने की तैयारी

पांच बज चुके हैं और मन में अभी भी आस है पहलगाम जाने की। यही आस मुझे स्टेशन के बाहर घसीट लाई।

बाहर आ कर सबसे पहले तो बस अड्डे का हाल जानने की कोशिश की। और लगा दिय फोन इलेक्ट्रीशियन वाले भैया को।

मेहरबानी की इस बार फोन मिल गया। लपक कर भैया ने फोन उठाया। मैंने परिचय देते हुए अपना नाम और काम भी।

जो भी उन्होंने बताया वो आश्चर्य कर देने लायक है। सुबह से वो जहाँ के तहाँ बैठे हैं। लेकिन कश्मीर के लिए कोई भी गाड़ी रवाना नहीं हुई।

उनके साथ साथ बाकी यात्रियों का भी हाल बेहाल है। भैया जी तो प्राइवेट गाड़ी से निकलने की फिराक में हैं। एक बात तो तय है जम्मू से कश्मीर के बीच मार्ग ने फसना मतलब अपने आप को मुसीबत में डालने जैसा होगा।

स्टेशन परिसर के गेट के बाहर निकल ही रहा हूँ कि एक परिवार आते हुए दिखा। जिनको देख कर ही मालूम पड़ रहा था लंबी यात्रा करके आए हैं।

अहम जानकारी

मुखातिब हुआ तो कुछ अहम जानकारी हांथ लगी। अपने आप को राजस्थानी मजदूर परिवार बताते हुए अपनी यात्रा का विवरण दिया।

उन्होंने अपनी दर्द भरी दास्तां बयां की जिसे सुन के है आत्मा सिहर उठती है।

उनकी बेगम बोली वो लद्दाख से सीधे जम्मू को आए। प्रति व्यक्ति उनसे ₹2000 वसूले गए।

जिसके बावजूद जिस तरह से वो जीप और ट्रक में छुपते छुपाते आएं हैं। उनकी कहानी सुन वहाँ बने भय के माहौल को भांपा का सकता है।

इन राजस्थानी मोहतरमा ने इन कठिन परिस्थितियों में मुझे भी ना जाने की सलाह दी। क्योंकि जाना अपने को खतरे में डालने के समान है।

इनसे मिली महत्वपूर्ण जानकारी से निर्णय लेने में काफी आसानी होगी। इसलिए अब मेरा प्लान चंडीगढ़ होते हुए मनाली जाने का बनने लगा।

आखिरकार खत्म हुआ इंतजार।

त्यागना पड़ा कश्मीर का विचार

आखिरकार इन हालातों में कश्मीर जाने का विचार त्यागना पड़ा। तो अब मनाली जाने के लिए नया रास्ता खोजना पड़ेगा।

गूगल नक्शे पर देखा तो पता चला चंडीगढ़ होते हुए ही मनाली जाने का रास्ता है।

ये तो और भी बढ़िया है। चंडीगढ़ में तो को बैग पकड़ा कर मनाली के लिए निकल जाऊंगा।

साधन देखा तो बस या ट्रेन दोनों के ही विकल्प हैं। यदि ट्रेन में सीट उपलब्ध हुई तो क्या ही बात है।

खोजबीन चालू हुई। आईआरसीटीसी की वेबसाइट पर देखा तो जम्मू से चंडीगढ़ जाने वाली ट्रेन में सीट ही नहीं उपलब्ध है।

अब या तो बस से जाना बेहतर रहेगा या फिर दूसरा रास्ता खोजुं। ट्रेन बुकिंग वेबसाइट पर दोबारा जांचा। और इस बार जम्मू से अंबाला को चंडीगढ़ के नजदीक ही है।

देखा तो उसमें दो सीट उपलब्ध दिखा रहा है। मैंने बिना किसी देरी के झटपट रात के दस बजे की ट्रेन की दो टिकट बुक कर दी।

रात्रि की ट्रेन होने से काफी समय मिल गया। लेकिन करने को ज्यादा कुछ नहीं है।

रात का समय भी हो चला है और भोजन का समय भी। साथी घुमक्कड़ ने दिन में जहाँ से भर पेट खाना खाया था। उसी रेस्तरां में चलने को कहा।

जम्मू तवी रेलवे स्टेशन

जम्मू का बाजार

मैंने बैग उठाया और चल पड़ा जम्मू की गलियों में। चलते चलते बाज़ार में आ पहुंचा। आगे नजर पड़ी तो देखा लाइन से दो तीन रेस्तरां हैं।

इधर शाल की बड़ी बड़ी आलीशान दुकानें हैं। मन तो कर रहा है एक दो खरीद लूं। मगर घर की ओर जाने में समय है।

दिख रहे तीनों रेस्तरां में मैंने बीच वाले रेस्तरां में में जाने को चुना। जिसमे भीड़ कम और बाकियों से बेहतर।

एक कमरे जितना बड़ा रेस्तरां में बैग रखने की ही जगह देखता रह गया। जैसे तैसे एक किनारे बैग लगाया और खाना ऑर्डर किया।

इधर बोलना हुआ उधर खाना हाज़िर। दाल चावल सब्ज़ी रोटी। मगर वो स्वाद नहीं जिसकी उम्मीद थी। छोटे से रसोड़े में पूछा जाए कौन था। तो जवाब थोड़ा लम्बा हो सकता है।

गुत्थम गुत्थी

खैर खाना पीना किया ही था कि बाज़ार में मार पीट चालू हो गई। किस बात पर ये तो पता नहीं। पर नशे में धुत्त एक अधेड़ उम्र के अंकल ने देखते ही देखते रसीद दिए दो चार।

गाल का हाल लाल करके छोड़ा है। जबतक वो होश में आता कि आखिर हुआ क्या उसके साथ। दो चार लोगों ने और लपेट दिया उसे।

आखिरकार उसे मैदान छोड़ के भागना पड़ा। इधर होटल में भी कुछ कस्टमर भड़क गए। होटल की ढीली ढाली सर्विस के चलते। क्रोध में भड़क पड़े मलिक पे।

मुझे लगा अब मलिक के पिटने की बारी है। जो रसोड़े में है। लेकिन मामला तुरंत सलटा लिया गया। मैंने भुगतान किया और निकल आया बाहर।

इधर बड़ी सी शाल की दुकान में नज़रे मानो थम सी गईं हों। खरीदने तो नहीं है लेकिन फिर भी दुकान पर दस्तक दे ही दी। एक से एक आलीशान शाल।

कश्मीर को भुला नया सफर

कुछ एक शाल देखने के बाद चल पड़ा स्टेशन की ओर। जहाँ से आज रात अंबाला निकल जाऊंगा, फिर चंडीगढ़।

बैग लादे लादे जम्मू रेलवे स्टेशन पर पहुंचा। जहाँ जांच केंद्र में जांच कराने के बाद। प्लेटफार्म नंबर पांच पर जा पहुंचा।

यहाँ ट्रेन पहले से ही खड़ी है। जो अभी काफी खाली है। और मैं एक असमंजस स्तिथि से निकल कर निकल पड़ा हिमाचल की वादियों में।

कटरा से जम्मू तवी से जम्मू बस स्टॉप की कुल यात्रा 75km

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *