लीला जगन्नाथ पुरी मंदिर की

उड़ीसा | चारधाम | धार्मिक स्थल | पुरी | भारत

कोणार्क से जगन्नाथ पुरी

कोणार्क पुरी से मात्र 36 किमी दूरी पर है जगन्नाथ मंदिर। यात्रा समुद्र के किनारे से शुरू हुई। कोणार्क के तट पर कुछ पल बिता कर चल पड़ा।

गाड़ी चालू कर निकल पड़ा। सड़क समुद्र के समांतर है। अब समुद्र से क्या प्रतियोगिता करना।

एक झटके में सारा नशा उतार सकती है समुद्र की लहरें। वाहन की रफ्तार औसत है। समुद्र के किनारे सड़क पर इस तरह से सफर करना भी लाजवाब और रोचक है।

रास्ते भर कई जगहों पर जल भराव देखने को मिल रहा है। ऐसा वैसा जलभराव भी नहीं। दलदल रूपी जलभराव।

जिसमे कदम रखने पर ही आदमी का दिल दहल उठे। हालत देख कर तो यही लग रहा है जैसे कुछ दिन पहले चक्रवाती तूफान आया हो।

पेड़ भी उजड़े हुए पानी में इधर उधर पड़े हैं। सूख कर कांटा हो गए हैं।

धीरे धीरे समुद्र के किनारे से होते हुए शहर की ओर दाखिल होने लगा।

जगन्नाथ पुरी की तंग गलियों से मंदिर तक पहुंचना आसान नहीं लग रहा। कभी इस गली कभी उस गली।

चौंडी सड़क पकड़ते हुए उस सड़क पर निकल आया जहाँ से रथयात्रा निकलती है।

हर साल दूरदर्शन पर रथ यात्रा जरूर देखता था। आश्चर्य करता था की ये है क्या।

जब समझ और ज्ञान आया तब मजा भी आने लगा और आने की इच्छा भी जागृत होने लगी। यही इच्छा शक्ति आज यहाँ खींच लाई।

एक घंटे के भीतर कोणार्क से पुरी आ गया।

तूफ़ान और बारिश के कारण हुई तबाही

करे तो करे क्या बोले तो बोले क्या

हिन्दू धर्म में इस पवित्र स्थान का सर्वोच्च माना जाता है। मंदिर के प्रांगण में फोन, कैमरा आदि सब वर्जित है।

मंदिर के सामने खड़ा ये सोच रहा हूँ की अब करू तो क्या करूं। आगे खड़ी तमाम गाड़ियों को देख कर गाड़ी यहीं पर लगाने का विचार बना।

गाड़ी यहीं लगा कर बैग से सामान निकालने लगा जो जमा करना है।

साथी घुमक्कड़ अपनी काली टी शर्ट उतार कर सफेद वस्त्र धारण करके चोगा पंडित बन कर तैयार हो गया है।

थोड़ा आश्चर्यचकित हूँ पर स्तब्ध नहीं। ये वस्त्र इस शख्स ने मंदिर में ही पहनने के लिए ही खरीदे हैं।

मंदिर की तरफ चल पड़ा। पहले तो खयाल आया की गाड़ी की डिक्की में ही ये सामान रख दूं। पर डिक्की की हालत खस्ता है।

अच्छी भी होती तो भी इतना कीमती सामान रखना मूर्खता ही होती। ना जाने कौन कब तड़ रहा हो जो डिक्की तोड़ कर लाखों का सामान पार कर दे।

सारा सामान के कर आगे बढ़ने लगा। चोगा पंडित भी साथ में ही हैं। कुछ तलाशता की मंदिर के सामने बनी दुकानों से आवाज पुकार आने लगी।

बैग, कैमरा, मोबाइल रखवाने की। दो चार दुकानों के बीच एक दुकान में सारा सामान जमा कराने लगा। जो एक निजी काउंटर है। सरकारी का कोई अता पता नहीं।

काउंटर पर बैठे भाईसाहब ने बताया की अंदर एक सुई तक ले जाने की अनुमति नहीं है। सुरक्षा कारणों को मद्देनजर रखते हुए ये कदम उठाए गए हैं।

शायद अपने भ्रमण के दौरान पहले ऐसे किसी मंदिर में प्रवेश कर रहा हूँ।

बाहर से कुछ ऐसा दिखा जगन्नाथ पुरी मंदिर

जगन्नाथ मंदिर का प्रवेश द्वार

दो बैग, दो मोबाइल दो कैमरे और पानी की बोतल जमा करवा कर सामने बने जांच केंद्र की ओर आ गया।

जांच से गुजरने के बाद मंदिर में दाखिला मिला।

नाम मात्र की भीड़ देखने को मिल रही है।

लेकिन पर्व के दौरान रथ यात्रा में आठ लेन वाली इन सड़कों में पैर रखने तक की जगह नहीं होती। रथ यात्रा तो बचपन में दूरदर्शन पर देखा करता था।

मैं और साथी घुमक्कड़ आगे पीछे ही कतार में लगे हैं। प्रवेश द्वार तक आते आते साथी घुमक्कड़ नज़रों से ओझल हो गया।

चिंता का विषय नहीं है। आगे कहीं ना कहीं मिल ही जाएगा नहीं तो निजी काउंटर जिंदाबाद।

मंदिरों में अक्सर लोग एक दूसरे से बिछड़ जाते हैं। वैष्णो देवी मंदिर में भी ऐसे कई किस्से होते है। 

केदारनाथ में तो एक दल के दो लोग गायब हो गए थे।

सीढी चढ़ कर मैं ऊपर निकल आया। मुख्य मंदिर के मार्ग से अनजान, प्रांगण के बाईं ओर निकल आया।

यहाँ लोग पानी की टोंटी के सहारे अपनी प्यास बुझा रहे हैं। कई पंडित इधर उधर अकारण ही घूमते नजर आ रहे हैं।

ठीक से देखा तो मालूम पड़ा कि यह तो मंदिर का पिछला हिस्सा है। यहाँ से निकल कर मुख्य द्वार की तरफ जाने के लिए आगे बढ़ा ही की एक पंडित जी ने आ कर घेर लिया।

कारण मंदिर के पूजा अर्चना हेतु ये यजमान पूरी पूजा करवाएंगे।

मेरी उनसे बात करने में तनिक भी रुचि नहीं है। क्योंकि मुझे ज्ञात है कि यह मंदिर में पूजा और पैसे के आलावा और कोई बात नहीं करेंगे।

आगे बढ़ कर नलके से जल ग्रहण के लिए आ गया। वापस निकलने लगा तो इस बार दूसरे पंडित ने घेर लिया।

ये पंडित घेरते तो ऐसे हैं जैसे भक्तों से कबड्डी खेल रहे हों। ना खुद हटेंगे ना आपको कहीं जाने देंगे।

ये पंडित महराज पूजा अर्चना के लिए पूछने आये हैं। मुझसे इसी का लोभ देकर मंदिर में पूजा करने के बहाने ले जाने लगे।

मूर्ती स्थापना की असली वजह

इससे पहले कि यह महाशय और कुछ बोलते मैंने स्वयं उनसे मंदिर के कथा और इतिहास जानने की इच्छा जाहिर की।

पास बैठाल कर मंदिर से जुडी कथा का बखान करने लगे।

भगवान विष्णु जब चारों धामों पर बसे अपने धामों की यात्रा पर जाते हैं तो हिमालय की ऊंची चोटियों पर बने अपने धाम बद्रीनाथ में स्नान करते हैं।

गुजरात के द्वारिका में वस्त्र पहनते हैं। पुरी में भोजन करते हैं और रामेश्‍वरम में विश्राम करते हैं। द्वापर के बाद भगवान कृष्ण पुरी में निवास करने लगे और बन गए जग के नाथ अर्थात जगन्नाथ।

पुरी का जगन्नाथ धाम चार धामों में से एक है। यहाँ भगवान जगन्नाथ बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विराजते हैं। 

एक रात भगवान विष्णु ने राजा इंद्रदयुम्न को सपने में दर्शन हेतु नीलांचल पर्वत की गुफा से मूर्ति मंदिर में स्थापित करने का आदेश दिया।

राजा ने अपने सेवकों को नीलांचल पर्वत की खोज में भेजा।

उसमें से एक था ब्राह्मण विद्यापति। विद्यापति ने सुन रखा था कि सबर कबीले के लोग कृष्ण की पूजा करते हैं और उन्होंने अपने देवता की इस मूर्ति को नीलांचल पर्वत की गुफा में छुपा रखा है।

वह यह भी जानता था कि सबर कबीले का मुखिया विश्ववसु कृष्ण का भक्त है और उसी ने मूर्ति को गुफा में छुपा रखा है।

विद्यापति ने विश्‍ववसु की पुत्री से विवाह कर लिया और छल से मूर्ति चुराकर राजा को दे दी। विश्ववसु बहुत दुखी हो गया।

अपने भक्त के दुख से भगवान भी दुखी हो गए। भगवान गुफा में लौट गए, लेकिन साथ ही राज इंद्रदयुम्न से वादा किया कि वो एक दिन उनके पास जरूर लौटेंगे जब राजा उनके लिए विशाल मंदिर बनवा दे।

मंदिर बनवाने के बाद राजा ने भगवान विष्णु से मंदिर में विराजमान होने के लिए याचना की। भगवान ने स्वप्न दिया कि द्वारका से आ रहे समुद्र में तैरते पेड़ के टुकड़े से उनकी मूर्ति स्थापित करने का संकेत दिया।

लकड़ी तैरते हुए तट तक आई लेकिन उसे भारी-भरकम लठ्ठे को विश्ववसु के सिवा मंदिर तक कोई ना ला सका।

मूर्ति गढ़ने के लिए भी कोई लठ्ठे पर छेनी तक ना गड़ सका तब भगवान विश्‍वकर्मा बूढ़े व्यक्ति का रूप धारण कर आए और राजा से मूर्ति बनाने की विनती की।

यह शर्त भी रखी कि वह यह मूर्ति 21 दिन में बनाएंगे वो भी बंद कमरे में अकेले। कोई उनको बनाते हुए नहीं देख सकता। उनकी शर्त मान ली गई।

लोगों को आरी, छैनी, हथौड़ी की आवाजें आती रहीं। राजा इंद्रदयुम्न की रानी गुंडिचा अपने को रोक नहीं पाई। वह दरवाजे के पास गई तो उसे कोई आवाज सुनाई नहीं दी।

वह घबरा गई। उसे लगा बूढ़ा कारीगर मर गया है। उसने राजा को इसकी सूचना दी।

सभी शर्तों और चेतावनियों को दरकिनार करते हुए राजा ने कमरा खुलवाया तो पाया कि बूढ़ा व्यक्ति गायब था और तीन अधूरी मूर्ति बनी हैं।

कृष्ण और बलराम के छोटे-छोटे हाथ बने थे, लेकिन उनकी टांगें नहीं थीं, जबकि सुभद्रा के हाथ-पांव बनाए ही नहीं गए थे।

राजा ने इसे भगवान की इच्छा मानकर इन्हीं अधूरी मूर्तियों को स्थापित कर दिया। तब से लेकर आज तक तीनों भाई बहन इसी रूप में विद्यमान हैं।

मंदिर में स्थापित जगन्नाथ, बलराम, सुभद्रा

जगन्नाथ बलराम सुभद्रा के दर्शन

मंदिर के बनने की कहानी बहुत कम लोगों को ही पता है। रोचक बात ये है की इन मूर्तियों की पूजा नहीं होती।

पंडित जी ने बहुत बारीकी से कम समय में ज्यादा ज्ञान दे दिया। अच्छा लगा ये सब जानकर। आज से पहले मैं इससे अनभिज्ञ था।

पंडित जी से अलविदा लिया और चल पड़ा प्रांगण में दर्शन के लिए।

मुख्य द्वार के सामने सीढ़ियों से गुजरते हुए दाईं ओर से प्रवेश करने लगा।

मंदिर में भीड़ बहुत ही कम है। मैं हल्की फुल्की भीड़ के बीच चलने लगा अंदर।

शंखनाद और जयकारे के बीच मुड़ते हुए मंदिर के गर्भ गृह के सामने आ गया।

क्या भव्य नजारा है। जगन्नाथ, बलदेव, सुभद्रा दिख नहीं रहे फिर भी। अब आगे बढ़ने पर कुछ कुछ झलक दिखी है।

हर कोई उनकी एक झलक पाने को को बेताब है। इसमें मैं भी शामिल हूँ।

भीड़ अब करीब आ गई है। लोग एक दूसरे से सट कर चल रहे हैं। धक्का मुक्की लाजमी है।

हांथ ऊपर उठाई लोग टकटकी बांधे जगन्नाथ को देख रहे हैं। मैं दोनो हांथ जोड़े बेसुध हो कर बस एक झलक के लिए तरस रहा हूँ।

आगे सरकते सरकते मैं आ गया भगवान की मूर्ति के सामने। यहाँ पंडित जी बहुत व्यस्त हैं फूल माला पहनाने और प्रशाद चढ़ाने में।

काफी देर तक तो मैं निहारता रहा और खड़ा हो गया पांव जमा कर। भीड़ के दबाव और पंडित जी के खिसकाव से मैं आगे बढ़ाया गया।

बाहर निकल कर आया उसी जगह जहाँ मुख्य द्वार से आ गया था। बाहर खड़े पंडित जी से प्रशाद ग्रहण किया और चल पड़ा।

यहाँ छोटे छोटे मंदिर भी हैं। जो अन्य देवी देवताओं के हैं। शिव का अलग, पार्वती का अलग।

जगन्नाथ मंदिर में   प्रसाद

जगन्नाथ मंदिर में कोई भी व्यक्ति भोजन कीए बिना नहीं जाता। इसलिए भी मैं भोजन करने वाले मार्ग और जगह दोनो को तलाशने लगा।

एक बार इतमीनान से दर्शन हो जाएं फिर चाहें जो करो सब अच्छा लगता है।

प्रांगण के पास कमरे के बाहर खड़े दो सज्जनों से भोजन के लिए आंगन पूछने पर मालूम की खुली छत के नीचे रसोई है।

बताया जाता है यहाँ की रसोई में प्रसाद पकाने के लिए सात बर्तन एक-दूसरे पर रखे जाते हैं।

सब कुछ लकड़ी पर ही पकाया जाता है। इस प्रक्रिया में शीर्ष बर्तन में सामग्री पहले पकती है।

फिर नीचे की तरफ एक के बाद एक पकती जाती है। अर्थात सबसे ऊपर रखे बर्तन का खाना पहले पक जाता है।

इस बाज़ार में सब सेठ जैसे दिखने वाले अपनी अपनी दुकान सजाए बैठे हुए हैं। 

जिस सोच से यहाँ दाखिल हुआ था वो तो कहीं भी नहीं है।

मुझे लगा था की यहाँ प्रसाद मिलेगा, लेकिन प्रसाद खरीदना पड़ेगा यह नहीं पता।

साथी घुमक्कड़ अभी साथ में नहीं है और जहाँ तक मेरी नजर पड़ रही है वो कहीं नहीं दिख रहा है।

सोच रहा हूँ खाना साथ में ही खाऊं। अपना अंगौछा उठा कर मंदिर के छज्जे कि तरफ निकल आया।

थकान से चूर शरीर अब टूट चुका है। सीमेंट की छतरी की छांव में लोग बैठे सुस्ता रहे हैं। या तो बाते कर रहे हैं।

मन कर रहा है इसी छांव में कुछ देर के लिए लेट जाऊं। जगह बनाई, अंगौछा बिछाया और लेट कर थकान दूर करने लगा।

बिना मोबाइल, कैमरे की चिंता में कुछ पल के ले बेसुध सो गया। कब झपकी लग गई पता ही नहीं चला।

जगन्नाथ मंदिर में भोजन

नींद इतनी तगड़ी थी की किसी के स्पर्श से मेरी आंखे खुली। दिल की धड़कन बहुत तेज हैं। बहुत जोर जोर से दिल धड़क रहा है।

उठने के बाद इस बार और जोरों कि भूख लगी है।

बाज़ार की दिशा में भी बढ़ा तो साथी घुमक्कड़ दिखा। 

जिस दुकान पर सबसे पहले दाम पूछे थे उसके बगल वाली दुकान से एक छोटी से हांडी खरीदी। हंडियां और भी कई हैं। छोटी, बहुत बड़ी और बड़ी भी।

दिखने में जरा सी लग रही है लेकिन इसमें दो लोग के लिए पर्याप्त भोजन है। अगर इसमें पेट नहीं भरा तो दूसरी हांडी ले लूंगा।

हांडी ले कर अंदर बनी शाला में आ गया। जहाँ पहले से ही काफी लोग भोजन कर रहे हैं।

अब संख्या काफी कम हो रही है धीरे धीरे। बाजार से भी लोग बुरिया बिस्तर समेट कर जा रहे हैं।

बगल में बैठी बूढ़ी काकी मेरी हांडी से भोजन मांगने लगी। उनकी इच्छा को पूर्ण करते हुए मैने हांडी में बचा हुआ खाना उनकी तरफ बढ़ा दिया।

कोई हांथ फैलाए और हमसे दिया ना जाए ऐसा हो नहीं सकता।

पर माजी का इतने से भी पेट नहीं भरा। जो अब मेरी थाली में ही हिस्सा मांगने आ गईं।

थाली का खाना दे भी दूं तो कैसे भूवनेश्वर पहुंचूंगा जब शरीर में ऊर्जा ही नहीं रहेगी।

पत्तल ला कर बाहर कूड़ेदान में फेंक दिया। इधर छज्जे पर पानी पीने के लिए कतार में लग गया।

मंदिर के बाहर से दर्शन करते लेखक

मंदिर की चोटी पर उल्टा चढ़ता आदमी

भोजन करने के बाद पांच बजने का इंतजार करने लगा। क्यों कि ऐसा मैंने सुना है कि पांच बजे एक आदमी मंदिर के ऊपर उल्टा चढ़ कर झंडा फहराता है।

आगे बढ़ता की याद आया कुछ छूट गया है। अंगौछा। याद आया कहाँ रह गया।

उसी सीमेंट की छतरी के नीचे। वापस आया तो देखा एक सज्जन पसाड कर लेते हैं।

मांगने पर आना कानी करने लगे। पर आखिर में ले कर ही निकला।

बहुत उपयोगी है ये अंगौछा।

उल्टा चढ़ने वाला दृश्य देखने के लिए प्रांगण में भीड़ जमा हो गई है। किसी के पास भी मोबाइल नहीं है इसलिए बेहतर लग रहा है।

वरना हर एक हांथ उठा होता वीडियो बनाने के लिए ना की जयकारे के लिए।

लोग जमीन पर पलथी मार कर बैठे हैं। सीढी पर घात लगाए। पटिया पर पैर जमाए खड़े टकटकी बांधे हैं।

यह अद्भुत दृश्य देखने के लिए लोगों का जमावड़ा बढ़ता ही जा रहा है। 

जिन भाईसाहब को चढ़ना है वो सारे झंडे का पुलिंदा बना रहे हैं।

चड़ने वाले मानस को सब अपना अपना झंडा दे रहे हैं। ताकि जब ये महाशय जाए तो इसे फेहरा सकें।

भीड़ अब इस कदर हो गई है जैसे किसी स्टेडियम में मिल्खा सिंह की दौड़ होनी हो।

आधे घंटे की तैयारी के बाद सभी झंडे एकत्रित करके वो युवक निकाल पड़ा। 

एक बात जो मैं बहुत देर से गौर कर रहा था वो ये की इन भाईसाहब का पेट तनिक भी नहीं निकला है।

कूदते फांदते एक मंदिर से दूसरे मंदिर फिर कुछ क्षण के लिए तो वो रुका।

लेकिन उसके बाद जो उसने किया उसे देख लोगों की आंखे फटी कि फटी रह गईं।

उसने मंदिर की चोटी पर उल्टा चढ़ना प्रारंभ कर दिया है।

इधर एक और युवक झंडे ले कर निकल पड़ा। ये दूसरे वाले भाईसाहब भी उसी अंदाज में ऊपर चढ़ रहे हैं जैसे पहले वाले चढ़े।

अब कुल दो युवक एक के बाद एक उल्टा चढ़ चुके हैं।

दांतो तले उंगली दबा ली जब लोगो ने इस पंडित को इतनी ऊंचाई पर उल्टा चड़ते हुए देखा। अद्भुत नजारा है। दोनो बारी बारी से छोटी पर लगे झंडे बदल रहे हैं।

लोग यहीं पैर जमा कर बैठ गए हैं। निकलने की भी जगह नहीं है। अगर एक बार जगह छोड़ दी तो वापस इस पर कोई और कब्जा कर लेगा।

सीढी के बगल में बनी पटिया के ऊपर बैठ कर ये सब देख रहा हूँ। अब जो जो सुना था जगन्नाथ मंदिर के बारे में वो सब देख लिया है। रसोई से ले कर झंडा बदली।

समुद्र की लहरों का आनंद

भुवनेश्वर वापसी की तैयारी

ये कृत्य देखने के बाद बाहर निकलने लगा। समय हो रहा है और रात होने से पहले पहुंच भी जाना है।

आज के आज ही प्रशांत जी का वाहन भी वापस करना है।

कहा तो यह भी जाता है कि इस मंदिर के गुंबद के ऊपर पक्षी नहीं उड़ते जैसा कि अन्य मंदिरों में अक्सर देखा जाता है। 

भारतीयों के अलावा विदेशियों का प्रवेश इस मंदिर में पूर्णतः वर्जित है।

पताका फहरता देख मैं वापस बाहर आ गया। मंदिर से निकल कर सीधा निजी काउंटर पर आ गया।

मोबाइल, घड़ी, बैग वापस लिए। भुगतान किया और चल पड़ा कुछ तस्वीरें लेने।

खुद की मंदिर के साथ। और सर्द मंदिर की भी। ये अच्छा है की मंदिर में मोबाइल कैमरे का के जाना वर्जित है।

आज लोगों को बिना मोबाइल के धैर्यपूर्वक सब कुछ देखते हुए अच्छा लग रहा था।

पार्किंग में आ कर वापस से मैंने शर्ट पहन ली। गाड़ी निकाली और गलियों से गुजरते हुए निकल आया समुंदर किनारे।

भीड़ के चलते कहीं जगह ही नहीं मिल रही की गाड़ी लगा सकूं।

इस वक्त सुमंदर किनारे इतनी भीड़ और सड़क पर इतना जाम।  वाहन खड़ा करने तक की जगह नहीं दिख रही।

बड़ी मुश्किल से एक अर्द्ध निर्मित इमारत के नीचे जगह पा कर वहीं वाहन खड़ा कर आया।

कुछ वक़्त समुद्र के किनारे गुजरा। सुमद्र के पास समय व्यतीत करने का अपना अलग ही आनंद है।

जो ध्वनि समुद्र की लहरों से उत्पन्न होती हैं वो किसी संगीत से कम नहीं। अबतक घोर अंधेरा हो चुका है।

जगह जगह चाट, पानी पूरी, भेल पूरी के ठेले नजर आ रहे हैं। आधा घंटा बिताने के बाद मैं वाहन लेके निकल पड़ा भुभनेश्वर की ओर।

भुवनेश्वर से कोणार्क से पूरी 210km

लीला जगन्नाथ पुरी मंदिर की

हवा के विपरीत लहराता ध्वज :  जगन्नाथ मंदिर के ऊपर स्थापित लाल ध्वज सदैव हवा के विपरीत दिशा में लहराता है। ऐसा किस कारण होता है यह तो वैज्ञानिक ही बता सकते हैं यह आश्चर्यजनक  है। 

प्रतिदिन सायंकाल ध्वज को मानव द्वारा उल्टा चढ़कर बदला जाता है।

गुंबद की छाया नहीं बनती : मंदिर के पास खड़े रहकर इसका गुंबद देख पाना असंभव है। मुख्य गुंबद की छाया दिन के किसी भी समय अदृश्य ही रहती है।

पुरी के मंदिर का यह भव्य रूप 7वीं सदी में निर्मित किया गया। 

चमत्कारिक सुदर्शन चक्र : पुरी में किसी भी स्थान से आप मंदिर के शीर्ष पर लगे सुदर्शन चक्र को देखेंगे तो वह आपको सदैव अपने सामने ही लगा दिखेगा।

इसे नीलचक्र भी कहते हैं। यह अष्टधातु से निर्मित है और अति पावन और पवित्र माना जाता है।

हवा की दिशा : सामान्य दिनों के समय हवा समुद्र से जमीन की तरफ आती है और शाम के दौरान इसके विपरीत, लेकिन पुरी में इसका उल्टा होता है।

अधिकतर समुद्री तटों पर आमतौर पर हवा समुद्र से जमीन की ओर आती है, लेकिन यहां हवा जमीन से समुद्र की ओर जाती है।

गुंबद के ऊपर नहीं उड़ते पक्षी : मंदिर के ऊपर गुंबद के आसपास अब तक कोई पक्षी उड़ता हुआ नहीं देखा गया। इसके ऊपर से विमान नहीं उड़ाया जा सकता।

मंदिर के शिखर के पास पक्षी उड़ते नजर नहीं आते, जबकि देखा गया है कि भारत के अधिकतर मंदिरों के गुंबदों पर पक्षी बैठ जाते हैं या आसपास उड़ते हुए नजर आते हैं।

दुनिया का सबसे बड़ा रसोईघर : 500 रसोइए 300 सहयोगियों के साथ बनाते हैं भगवान जगन्नाथजी का प्रसाद। लगभग 20 लाख भक्त कर सकते हैं यहां भोजन।

कहा जाता है कि मंदिर में प्रसाद कुछ हजार लोगों के लिए ही क्यों न बनाया गया हो लेकिन इससे लाखों लोगों का पेट भर सकता है।

मंदिर के अंदर पकाने के लिए भोजन की मात्रा पूरे वर्ष के लिए रहती है। 

मंदिर की रसोई में प्रसाद पकाने के लिए 7 बर्तन एक-दूसरे पर रखे जाते हैं और सब कुछ लकड़ी पर ही पकाया जाता है। इस प्रक्रिया में शीर्ष बर्तन में सामग्री पहले पकती है फिर क्रमश: नीचे की तरफ एक के बाद एक पकती जाती है अर्थात सबसे ऊपर रखे बर्तन का खाना पहले पक जाता है। 

समुद्र की ध्वनि : मंदिर के सिंहद्वार में पहला कदम प्रवेश करने पर ही (मंदिर के अंदर से) आप सागर द्वारा निर्मित किसी भी ध्वनि को नहीं सुन सकते। आप (मंदिर के बाहर से) एक ही कदम को पार करें, तब आप इसे सुन सकते हैं। इसे शाम को स्पष्ट रूप से अनुभव किया जा सकता है।

इसी तरह मंदिर के बाहर स्वर्ग द्वार है, जहां पर मोक्ष प्राप्ति के लिए शव जलाए जाते हैं लेकिन जब आप मंदिर से बाहर निकलेंगे तभी आपको लाशों के जलने की गंध महसूस होगी।

रूप बदलती मूर्ति : यहां श्रीकृष्ण को जगन्नाथ कहते हैं। जगन्नाथ के साथ उनके भाई बलभद्र (बलराम) और बहन सुभद्रा विराजमान हैं। तीनों की ये मूर्तियां काष्ठ की बनी हुई हैं।

यहां प्रत्येक 12 साल में एक बार होता है प्रतिमा का नव कलेवर। मूर्तियां नई जरूर बनाई जाती हैं लेकिन आकार और रूप वही रहता है। कहा जाता है कि उन मूर्तियों की पूजा नहीं होती, केवल दर्शनार्थ रखी गई हैं।

विश्‍व की सबसे बड़ी रथयात्रा : आषाढ़ माह में भगवान रथ पर सवार होकर अपनी मौसी रानी गुंडिचा के घर जाते हैं।

यह रथयात्रा 5 किलो‍मीटर में फैले पुरुषोत्तम क्षेत्र में ही होती है। रानी गुंडिचा भगवान जगन्नाथ के परम भक्त राजा इंद्रदयुम्न की पत्नी थी इसीलिए रानी को भगवान जगन्नाथ की मौसी कहा जाता है।

हनुमानजी करते हैं जगन्नाथ की समुद्र से रक्षा : माना जाता है कि 3 बार समुद्र ने जगन्नाथजी के मंदिर को तोड़ दिया था। कहते हैं कि महाप्रभु जगन्नाथ ने वीर मारुति (हनुमानजी) को यहां समुद्र को नियंत्रित करने हेतु नियुक्त किया था, परंतु जब-तब हनुमान भी जगन्नाथ-बलभद्र एवं सुभद्रा के दर्शनों का लोभ संवरण नहीं कर पाते थे।

वे प्रभु के दर्शन के लिए नगर में प्रवेश कर जाते थे, ऐसे में समुद्र भी उनके पीछे नगर में प्रवेश कर जाता था। केसरीनंदन हनुमानजी की इस आदत से परेशान होकर जगन्नाथ महाप्रभु ने हनुमानजी को यहां स्वर्ण बेड़ी से आबद्ध कर दिया। यहां जगन्नाथपुरी में ही सागर तट पर बेदी हनुमान का प्राचीन एवं प्रसिद्ध मंदिर है। भक्त लोग बेड़ी में जगड़े हनुमानजी के दर्शन करने के लिए आते हैं। 

इस मंदिर में गैर-भारतीय धर्म के लोगों का प्रवेश प्रतिबंधित है। माना जाता है कि ये प्रतिबंध कई विदेशियों द्वारा मंदिर और निकटवर्ती क्षेत्रों में घुसपैठ और हमलों के कारण लगाए गए हैं। पूर्व में मंदिर को क्षति पहुंचाने के प्रयास किए जाते रहे हैं।

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *