हैदराबाद की पहचान चारमीनार

आंध्रप्रदेश व तेलंगाना | भारत | हैदराबाद

संग्रहालय से चारमीनार

संग्रहालय से पैदल ही निकल पड़ा चारमीनार के लिए। ज्यादा नहीं बस कुछ एक किमी ही दूर है चारमीनार। भीड़ जमकर है। बाजार में पैदल चलना भी आफत है।

कुछ आधे घंटे के भीतर मैं चारमीनार के बाहरी मीनार वाले हिस्से में आ गया। यहाँ छोटी मीनार है जो चारमीनार को छुपा कर रखे हुए है।

पुलिस ने पहले से ही नाके बंदी कर के रखी हुई है। सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम। इतनी भीड़ के बीच बाज़ार में वाहनों का प्रवेश वर्जित है। ऐसे ही एक लड़का अपना दुपहिया वाहन ले कर घुसा ही है की पुलिस ने उसे धर दबोचा।

वैसे देख कर ही मालूम पड़ रहा है की ये बाज़ार महिलाओं के पहनावे के लिए प्रसिद्ध है। कुछ देर पहले हुई वर्षा के निशान हर जगह देखे जा सकते हैं। जगह जगह पानी और कीचड़।

छोटीमीनार को दाखिल हो करके अंदर आ गया। अंदर और भी गजब की भीड़। पैर रखना मुश्किल लग रहा है।

चारमिनार बाजार

शाकाहारी बिरयानी

भूख जोरो की लगी है। इससे पहले कि मैं चक्कर कहा कर गिरूं कुछ खा लेना बेहतर होगा। मीनार के बाहर खाली जगह पड़ी है। यहाँ भी लोग अपना अपना व्यवसाय लगाए बैठे हैं।

मीनार के सामने दिख रही कई दुकान में शाकाहारी बिरयानी उपलब्ध है। जैसा विष्णु ने बताया था वैसे ही यहाँ पर कुछ दुकान में अच्छी बिरयानी मिलती है।

भूख जोरों पर है इसलिए नजर में जो दुकान आई उसी में दनदनाते हुए आ गया। यहाँ से भी मीनार के दीदार मुश्किल हैं। इतनी सारी दुकान और उनकी छत के कारण कुछ भी देख पाना नामुमकिन है।

बैग किनारे रखा और ऑर्डर देते ही कुछ देर में बिरयानी मेज पर प्रस्तुत हो गई। जिस शाही शाकाहारी बिरयानी के बारे विष्णु ने बताया वैसा कुछ तनिक भी स्वाद ना आया। फटाफट खा पी कर निकल पड़ा सैर सपाटे के लिए।

कोई अपनी दुकान कार में लगाए हुए है तो कोई कंधे पर टांगे हुए चल रहा है। दुकान में भुगतान करके बाहर निकल आया।

चार सौ वर्ष पूर्व चारमीनार

मीनार की मरम्मत का कार्य जारी है। मई में 400 साल पुरानी मीनार का एक हिस्सा गिर गया था। जिसकी मरम्मत कुछ दिन पहले ही की गई थी।

बाहर निकलने पर नजर पड़ी एक छोटे बच्चे पर जो भीख मांगते हुए मेरे पास आया। भारत में बच्चों का इस तरह से भीख मांगता देख दुख पहुंचाता है। मैंने उसे अपना कैमरा थमा कर फोटो खीचने को कहा। एक फोटो उस बच्ची के साथ भी ली।

बच्चे के हाथ में कैमरा पकड़े लेखक

लगभग 50 मीटर ऊंची ये मीनार मस्जिद के तौर पर बनाई गई थी। कहा जाता है मोहम्मद कुली कुतुब शाही ने इसका निर्माण कराया था जो 1591 में पूरा हुआ था।

कहा जाता है गोलकोंडा से मछलीपट्टनम व्यापार को आसान करने के लिए इसका निर्माण कराया गया था। ऐसा भी कहा जाता है की प्लेग बीमारी पर जीत के बाद इसका निर्माण हुआ था।

मीनार के इर्द गिर्द घूमने लगा। भीतर और ऊपर जाने का टिकट है। जिसका उचित मूल्य है। पर मैं ना गया। मीनार के बाहर बैग की बहुत बड़ी दुकान है।

सुबह सालारजंग और अब मीनार के दीदार के बाद थकान महसूस होने लगी है। वापस जाने को जी चाह रहा है। सूरज भी ढलने को है। इधर पास की मस्जिद से अजान की आवाजें आ रही हैं। जो मेरे किसी काम की नहीं।

छोटी मीनार से बाहर निकलने के बाद तय किया की कन्हैया जी के कार्यालय से बैग उठा कर निकल पडूंगा दूसरे घुमक्कड़ी समुदाय के मित्र के घर।

मोबाइल पर किराए का दुपहिया वाहन खोजने लगा। जो जितनी मुश्किल से आरक्षित हुआ उतना ही विलंब से भी पधारा। चालक के कुछ मिनट बाद आते ही निकल गया काशीगंज के लिए निकल गया।

नए मित्र के घर नया ठिकाना

सूरज ढलने के बाद वापस कन्हैया जी के कार्यालय आया उनसे अलविदा लेने। कन्हैया अंकल के साथ बिताया यह वक़्त बेशकीमती रहा।

जीवन अगर कन्हैया जी से दोबारा मिलने का अवसर दे तो मैं यह अवसर गवाना नहीं चाहूंगा। उस इमारत में आ गया जहाँ कल की रात व्यतीत की थी।

यहाँ पहुंचने के बाद भीतर कमरे से बैग निकलवा कर बाहर रखे। सामुदायिक मित्र जया प्रकाश के आमंत्रण पर कचिगुडा जाने के लिए वाहन का आरक्षण करने लगा।

कुछ आधे घंटे के भीतर ऑटो वाला इस व्यस्त और तंग गलियों में आ धमका। इस इमारत से विष्णु और उनके सहयोगी से अलविदा ले कर भरी भरकम बैग लेके सीढ़ी उतरकर ऑटो में लद गया।

रात काफी हो चुकी है। इस कारण अंधेरे में जया का घर ढूंढना थोड़ा मुश्किल हो रहा है। हल्की बूंदबांदी के बीच में वसावी कॉलोनी के पास आ गया।

उनके मुताबिक उनका अपार्टमेंट मंदिर के ठीक पीछे है। मैं उनकी बताई हुई जगह वासवानी कॉलोनी पर खड़ा हो गया। अचानक दक्षिण भारतीय हीरो की तरह एंट्री लेते हुए मुझे वो सामने से आते हुए दिखाई दिए।

कन्हैया जी के साथ लेखक

वासवानी कॉलोनी

मुलाकात हुई और हम उनके फ्लैट में जाने से पहले कॉपी में अपना नाम दर्ज कराया। जय प्रकाश ने बताया की वो हाल फिलहाल ही दूसरे भवन में गृह प्रवेश किया है।

हमें घर में दाखिल करवा कर पुराने घर से सामान लेने चले गए। उससे पहले उन्होंने हमें घर के नियम कायदे समझाए। समय और मौका का फायदा उठाते हुए मैं सोच रहा हूं की कपड़े धो डालूं।

बैग से सारे गंदे कपड़े निकाले और एक एक कर बाथरूम में रख लिए धोने के लिए। जया के वापस आते ही हम तीनों रात का भोजन लेने के लिए पास की ही दुकान में गए।

बाहर काफी अंधेरा और हवा हल्की बनी हुई है। चौराहे पर पहुंच कर एक कोने पर एक दुकान दिख रही है। यहाँ से जय प्रकाश जी ने उत्तर भारतीय भोजन पैक करने का ऑर्डर दिया।

आसपास लगभग सभी दुकानें बंद हो चली हैं। घर आ कर स्वादिष्ट भोजन का लुत्फ उठाया। भोजन खतम करने के बाद इत्मीनान से बैठे। जया ने अपने विदेशी यात्राओं के वीडियो क्लिप्स, तस्वीरें दिखाने लगे।

काबिले तारीफ है उनका संग्रह। यूट्यूब पर वह अपना चैनल शुरू करना चाहते हैं। वीडियो बनाने के नए गुर भी सीखना चाहते हैं साथ ही वीडियो बनाते समय की झिंझक भी दूर करना उनका लक्ष्य है।

कपड़े धोने के बाद उन्हें बाहर की रेलिंग और कुछ कमरे की रस्सी में फैला दिए है जो पंखे की हवा लगने से काफी सूख जाएंगे।

कोशिश यही आज जितना हो सके ज्यादा से ज्यादा आराम करना बेहतर रहेगा। कल श्रीसाएलाम ज्योतिर्लिंग के लिए भी समय से रवाना होना है।

अगली सुबह

अगली मंज़िल एक पावन स्थान है: मर्कापुर ज्योतिर्लिंग। मरकपुर जाने के लिए सुबह से तैयारियां चल रही हैं। लेकिन जय प्रकाश जी की इच्छा हैं कि मैं उनके साथ एक दिन और बिताऊ।

सच कहूं तो मेरी भी अंदर से यही इच्छा हो रही है। क्यों कि पिछले कुछ दिनों से दौड़ भाग ज्यादा हो गई है। विश्राम करने का समय ही नहीं मिला। शरीर थक के चूर चूर हो चुका है।

काचीगुड़ा हैदराबाद के बाहरी इलाके में स्तिथ है। यहाँ आबादी तो कम है ही साथ ही बहुत शांत वातावरण भी है। जो हैदराबाद के प्रमुख इलाकों में देखने को नहीं मिला।

हैदराबाद में एक साल के भीतर ही मेट्रो सुचारू रूप से चालू हो गई थी। इतनी तेज़ी यहाँ कार्य हुआ जिसका कोई मोल नहीं है।

जया जी ने रामोजी फिल्म सिटी जाने का सुझाव दिया। पर समय के अभाव के कारण वहाँ ना जा सका।

मैं इस बात से बेखबर था कि भारत का दूसरा सबसे बड़ा किला हैदराबाद में स्थित है जिसमें पूरा शहर बसता था।

चारमीनार हैदराबाद की पहचान जरूर है लेकिन अब यहाँ आईटी सेक्टर आने से नौकरियां और भी बढ़ गईं हैं साथ ही जनसंख्या भी।

लोग भागदौड़ और भड़भड में ज्यादा दिखते हैं सुकून में कम। मेरे काफी मित्र हैं जो यहाँ रहते हैं और काफी सालों से यहीं बस गए है। भाग दौड़ भरे इस जीवन में शायद ये हैदराबाद की दुनिया से बाहर आ पाते होंगे?

जय प्रकाश और साथी घुमक्कड के साथ लेखक

मरकापुर के लिए ट्रेन दिन के ढाई बजे की है। समय को देखते हुए सोचा क्यों ना बाल ही कटवा लूं। घर से निकल कर बाजार आया तो पाया की किसी भी नाई कि दुकान नहीं खुली है।

मैं और अजय पास की टपरी पर चाय की चुस्की लेने लगे। जब तक चाय गले के नीचे ना उतार जाए तबतक दिन की शुरुआत ही नहीं होती।

मन बनने लगा पेट पूजा भी कर लिया जाए। इडली डोसा कुछ दिनों से और अगले कुछ दिनों के लिए पसंदीदा भोजन बन गया है। यह पूर्णतः सच है। पास की दुकान में नाश्ता कर के मैं वापस आ गया।

घर वापस आ कर सारा इधर उधर बिखरा सामान समेटने लगा। रात को धूले कुछ कपड़े अभी तक नहीं सूखे हैं। लेकिन फिर भी बैग में ठूस दिए।

मरकापुर के लिए दिन में ढाई बजे ट्रेन है, जिसके लिए मैं समय रहते निकल गया। जया जी साथ में ही निकले और दिन का भोजन करने हम एक रेस्तरां में आए।

मैंने सुबह नाश्ता थोड़ा वजन दार के लिया था इसलिए भूख जैसे मार गई है। जया और अजय ने लपक कर खाना शुरू किया।

लगा अब ट्रैन छूट गयी

अजय की खाना खाने की धीमी गति देख कर मुझे ये लग रहा है कि ट्रेन पकड़ने का इस आदमी का विचार है या नहीं? भोजन करके जया प्रकाश जी से अलविदा लिया और पास की मेट्रो सेवा से निकल पड़ा नामपल्ली रेलवे स्टेशन। कुछ दूर तक मेट्रो खींच कर लाई। यहाँ से नामपल्ली अभी भी काफी दूर है।

अजय ने न्यूनतम किराए पर किराए का वाहन आरक्षित किया और निकल गया। पर मेरे मोबाइल ने अधिकतम किराए पर ही बुक हो रहा है। यह समस्या बार बार हो रही है।

फोन करके अजय को बताया और उसे निर्देशित किया अपने ही मोबाइल से मेरे लिए रेंटल वाहन बुक करने का। रेलवे की ऐप पर सोलह रेलवे स्टेशन दिखा रहे हैं।

जिनमे से किसी एक से मरकापुर के लिए ट्रेन रवाना होनी है। शहर में नया और ऊपर से तमाम सारे रेलवे स्टेशन होने के कारण दिमाग चकराने लगा है।

नाश्ते में इडली सांभरदुपहिया वाहन आया और उसमे बैठ कर निकल लिया। लेकिन समय की मार मुझे तब पड़ी जब ड्राइवर साहब ने मुझसे ये प्रश्न किया कौन से रेलवे स्टेशन उतरना है। लड़खड़ाती हुई आवाज़ में मैंने नामपल्ली बोला जिसपर संशय बना है अभी भी।

चालक साहब से दरखावस्त की अगर जल्दी पहुंचा देंगे तो बड़ी मेहरबानी होगी। चालक ने अपनी गाड़ी की गति तेज की और नामपल्ली पहुंचा लेकिन ड्राइवर ने परिसर में गाड़ी ले जाने से इंकार कर दिया।

पूछने पर बताया पुलिस कर्मी उन्हें इस बात की इजाज़त नहीं देते। ट्रेन के निकलने का समय हो चला है। चालक को भुगतान करके प्लेटफार्म नंबर पांच की तरफ भागा।

अगर आज ट्रेन नहीं मिलती है तो अजय का सारा खाना निकाल देना है मुझे। मैं प्लेटफार्म संख्या पांच पर पहुंचा। यहाँ एक खाली गाड़ी खड़ी मिली।

ऐप से ट्रेन संख्या मिलाने पर वही निकली, लेकिन इतनी खाली क्यों? ट्रेन के भीतर चढ़ कर अपनी निर्धारित सीट पर बैठ गया। हाथ में अखबार लिए सामने बैठे महाशय बोले ये तो शुरुआत है।

आगे आने वाले स्टेशन पर भरती जाएगी। ये सिर्फ अखबार ही पकड़े हैं। ध्यान दाएं बाएं है। खाली ट्रेन देख कर एक सीट सहित पूरा का पूरा वो कक्ष ही घेर लिया। बैग से गीले कपड़े निकाल कर सूखने को डाल दिए। गरम चाय की चुस्की ली और तब तक ट्रेन रवाना हो चली। अलविदा हैदराबाद!

तीन चार स्टेशन निकल गए पब्लिक चढ़ती रही लेकिन कोई भी सूखते हुए कपड़े देख कर इधर नहीं आ रहा है। कुछ और स्टेशन के बाद जब भीड़ और बढ़ गई तब सामान समेट कर ऊपर की एक एक सीट पकड़ ली और लेट गया।

मरकापुर रोड जो रात के तीन बजे पहुंचाने का दावा कर तो रही है, लेकिन क्या यह सही समय पर पहुंचा पाएगी?

बाजार से मेट्रो मुसी नगर से नामपल्ली 35किमी

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *