ऐसा राज्य जहाँ होता है हॉर्न से सम्मान

ऐजवाल | भारत | मिजोरम

दामचारा बाज़ार

कल रात सब इंस्पेक्टर देब बर्मा की मदद से मैं दामचरा पहुंचा। रात में थोड़ी मशक्कत करनी पड़ी गेस्ट हाउस में कमरा लेने में लेकिन उसके बाद सब संतुलित था।

दो बेड वाला कमरा मिल गया था। एक बेड पर मैं और दूसरे पर साथी घुमक्कड़ पसड़ कर सोया। आज सुबह जल्दी उठ कर हमें दामचरा बाजार से ऐजवाल को जाने वाली सुमो पकड़नी है।

साथी घुमक्कड़ समय पर उठ कर सारी जानकारी मालूमात करने के लिए बाजार निकल पड़ा मुझसे ये वादा ले कर की मैं समय रहते तैयार हो जाऊं। उसके कमरे से बाहर निकलते ही मैं फिर से से गया।

दिमाग में ये भी चल रहा है की निकलना भी है इसलिए नींद भी टूटी फूटी आ रही है। कुछ देर बाद साथी घुमक्कड़ सारी जानकारी इक्कठा कर के आ गया।

मुझे सोता पा कर थोड़ा भड़का पर अब नींद उड़ चुकी है। अब वाकई समय कम है और निकलना भी समय रहते है। मनीपुर, मिजोरम ऐसे राज्य हैं जहाँ दाखिल होते वक्त आधिकारिक परमिशन की जरूरत पड़ती है।

इसी परमिशन(ILP) को लेने और गाड़ी की बुकिंग के चलते कुछ जरूरी काग़ज़ लेने साथी घुमक्कड़ को वापस आना पड़ा। इस बार उसके निकलते ही मैं तैयार होने लगा। पंद्रह मिनट ही बीते हैं।

नित्य क्रिया के बाद स्नान करने जा ही रहा था की कुछ ही देर में दरवाजा खटका। खोला तो साथी घुमक्कड़ का आगमन हुआ और हमारा गेस्ट हाउस खाली करना।

साथी घुमक्कड़ ने वापस आने के बाद बाजार की जो कहानियां सुनाई हैं वो थोड़ी भयभीत करने वाली हैं। जैसे बाजार में सूखी मछलियां बिक रही हैं जिसकी गंध उसके नाक में भर गई है।

इस पुराने गेस्ट हाउस को खाली करने के बाद निकल चला दामचरा बाजार की ओर पापड़ बनी मछलियों की गंध सूंघने। हालांकि अपने आप को पूरी बचाने की कोशिश रहेगी पर पता नहीं कब तक।

सांसे रोक रोक कर पहले से ही खुद को तैयार कर लिया है। कुछ आधा किमी चलने के बाद अचानक ऐसी गंध आई जिससे बचने के सारे विकल्प धराशाई हो गए।

कुछ सूंघना पड़ा। ये महक इतनी सड़ी और बुरी है की इससे दूर भागने का मन कर रहा है। तेज कदमों के साथ पुल पार करते हुए बाजार से निकला।

भागते भागते आ पहुंचा यहाँ जहाँ सुमो खड़ी हैं। त्रिपुरा मिजोरम की सीमा एक पुल के द्वारा दर्शाई गई है। पुल को पार करते ही त्रिपुरा से मिजोरम।

दामचारा गेस्ट हाउस है

इनर लाइन पास

चाय की दुकान पर मैं सुमो वाले का इंतजार करने लगा। मेरी तरह और भी सवारियां कर रही हैं। यही सुमो चालक का आदेश है जिसका पालन हो रहा है।

दुकान पर चाय के खौलते हुए भगौने ने लालच दिया जिसमे मैं दूं गया। आखिरकार एक एक प्याली चाय के बाद साथी घुमक्कड़ पुलिस स्टेशन निकल गया परमिशन लेने।

वहाँ पर तो मुझे भी जाना होगा। क्योंकि व्यक्ति विशेष का प्रस्तुत होना अनिवार्य है। इस बार जब से घर से निकला हूँ तभी से मेरे पास सिर्फ डब्बे वाला फोन। स्टेशन के संचालक के बुलावे पर ही मैं यहाँ से निकलूंगा वो भी जब साथी घुमक्कड़ कॉल करके मुझे बुलाएगा।

तब तक बैग और सुमो दोनो की निगरानी यहीं रह कर करूंगा। सवारियों में साथ में हैं एकमात्र हिंदी भाषी वाले बिहारी बाबू भी। जब काफी देर हो गई, साथी घुमक्कड़ का फोन भी नहीं आया तो मैं खुद ही चल पड़ा थाने की तरफ।

बिहारी बाबू को जिम्मेदारी थमा कर, बैग की तकवाही और सुमो रुकवाने की जिम्मेदारी देते हुए। थाने के बाहर ही जन गण मन पुलिसकर्मी गा रहे हैं, जिसका कुछ अंश ही बचा है। छोटे से ही उद्यान में सावधान विश्राम हो रहा है।

सीढ़ी चढ़ कर थाने के अंदर आया तो दाएं बाएं कमरा ढूढने पर बाएं हाथ पर मुड़ा जहाँ बत्ती जल रही है। यहाँ पहले से ही लोग कतार में लगे हैं परमिशन लेने के लिए।

साथी घुमक्कड़ से पहले एक आदमी है जो कागज़ात पर दस्तखत ले रहा है। इन जनाब के बाद साथी घुमक्कड़ और फिर मैं अपना आधार कार्ड ले कर दस्तखत कराने लगे।

इतनी देर में बिहारी बाबू का फोन आया। बताने लगे की उन्होंने बैग सुमो की छत पर रखवा दिया है और दुकान के पास से ऐजवाल के लिए सुमो चल दी है। सुमो चालक अपने अड़ियल रुख के कारण रुकने के लिए मान नहीं रहा।

मैने उनसे दरख्वास्त की चालक पर रुकने के लिए दबाव बनाए। बात करते करते बाहर आया तो देखा सामने से सुमो चली आ रही है। इशारे में सुमो रुकवाई और अंदर आ गया।

अंदर थानेदार के दस्तखत लिए जिसमे उन्होंने ने कई सवालों में से एक मिजोरम जाने का उद्देश्य पूछा। उद्देश्य एक ही है वो है घूमना। 

कागज पर दस्तखत करते समय इंस्पेक्टर का पेन ही बिगड़ गया। अब क्या ये बुरे संकेत हैं ये तो वक्त ही बताएगा। दस्तखत होते ही निकल आया।

जोर की लघुशंका ने मुझे रोका और थाने के ही बाथरूम में हल्का हो कर बाहर निकल आया। यहाँ पुलिस स्टेशन पर भी सन्नाटा पसरा है। पुलिस स्टेशन के सामने बने एक घर में ही कुछ पुलिस वालों का जमावड़ा है। शायद यहीं सोते खाते होंगे।

रवानगी

साथी घुमक्कड़ पहले से ही सुमो में बैठ चुका है और मुझे अब पिछली सीट पर बैठना पड़ेगा। जहाँ पहले से ही बोरियां रखी हुई हैं। बिहारी बाबू उतरे खड़े थे पहले से ही और सीट को नीचे गिरा कर पीछे जाने का रास्ता बना दिया है।

पीछे बैठते ही अगली सीट गिरी और सुमो चल पड़ी अपनी मंजिल। पर कुछ ही आगे पो चौकी पर रोकना पड़ा। चालक ने स्वतः ही गाड़ी बंद कर दी।

सुमो में जितने बाहरी राज्य के लोग हैं सब अपना अपना काग़ज़ के कर पुलिस को दिखाया। हम दोनो के अलावा बिहारी बाबू जिनका कागजात जांचे जा रा हैं। पूरी संतुष्टि हो जाने पर ही सुमो को रवाना कर दिया।

भारत के अन्य हिस्सों के मुकाबले मिजोरम में सन्नाटा तो है ही साथ ही साफ सफाई भी है।

फिर चाहें जमीनी स्तर पर हो या फिर वायु की स्वच्छता या गुणवत्ता। आसमान एकदम साफ सुथरा और चका चक। बस सड़के ही थोड़ी ऊबड़ खाबड़ है।

ऐसे ही कुछ किमी का सफर तय करने के बाद ड्राइवर ने गाड़ी रोकी एक घर के सामने जिसके अंदर ही एक दुकान है। मुझे लगा शायद लंबे सफर में ये पहला पड़ाव है।

उतर कर कुछ सामान ले ही रहा था की ड्राइवर अंग्रेजी में दहाड़ पड़ा। यहाँ अंग्रेजी भाषा का चलन बहुत ही आम है। समान ले कर बैठ गया गाड़ी में। ड्राइवर ने अपना गुटका तंबाकू जैसा नशीला पदार्थ खरीदा।

सफर बहुत ही सुहाना बीत रहा है। गाड़ी में मेरे, साथी घुमक्कड़, बिहारी बाबू के अलावा एक दंपति है जो सबसे आगे विराजमान हैं। उसके पिछली सीट पर दद्दू और उनकी पोती। सबसे पीछे मैं और मेरे बगल में बोरियां जिसमे महीनों पुरानी मछलियां पड़ी हैं।

हर कुछ मीटर चलने के बाद ये बोरियां एक एक कर गिरने लगीं। पीठ पर ऐसे हावी हो जाती हैं जैसे ये बोझ हैं। जो की एक सिर दर्द हैं। पीछे बैठे बैठे घुटनो का बुरा हाल है। पहले से पीठ का दर्द और भी तगड़ा हो गया है। जिस कारण किसी भी अवस्था में बैठने से दर्द नहीं जा रहा है।

अगली सीट पर पीठ टीका कर बैठ सकता हूँ जिससे थोड़ा आराम मिलेगा। रास्ते भर अब मैं साथी घुमक्कड़ को ऐसे ही पीछे बैठने के लिए परेशान करता रहूँगा।

कुछ दूरी के बाद साथी घुमक्कड़ को पीछे बुला लिया और मैं आगे निकल आया।

हॉर्न से सम्मान

सड़क काफी जगह अभी तक अच्छी और मक्खन जैसी मिली है। पर अब कीचड़ से भरी सड़क पर से भी गुजरना पड़ा रहा है। सामने से आ रहे ट्रक ने रास्ता रोक दिया।

जिसमें पहले ट्रक को पीछे होना पड़ रहा है और सुमो आगे निकल गई। जाते जाते सुमो ने हॉर्न बजाया। बगल में बैठी मोहतरमा ने बताया की मिजोरम में हॉर्न बजाना सख्त मना है जिसका जिक्र उत्पल ने अगरतला में किया था।

मोहतरमा ने बताया की यहाँ एक ड्राइवर तभी हॉर्न बजाता है जब उसे दूसरे ड्राइवर को सम्मान देना होता है। ऐसे ही इस सुमो चालक ने भी ट्रक ड्राइवर को हॉर्न बजा कर सम्मान दिया।

मोहतरमा ने अपना परिचय देते हुए मारियाना नाम बताया और एक शिक्षक होने के नाते मुझे भी लगातार शिक्षा दे रही हैं। पीछे पड़ी सूखी मछलियों के बारे में बताया की मिजोरम में लोग इसका अचार बनाते हैं। मछली जितनी पुरानी हो उसे उतना ही अच्छा माना जाता है।

इसलिए ये दद्दू बोरी भर भर कर ले जा रहे हैं। तीन चार महीने का राशन, सूखी मछली का अचार। पर यहाँ मैं दुर्गंध से मरा जा रहा हूँ।

स्वच्छ वातावरण

सुहाने मौसम में और स्वच्छ वातावरण में इस तरह घूमने में मजा आ रहा है। पहाड़ियों से गाड़ी कभी इस पहाड़ी से उस पहाड़ी पर। सड़के भी इतनी खाली की कोई अगर चादर बिछा कर लेट जाए तो भी खतरा नहीं है।

रस्तेभर ड्राइवर साहब मारियाना से अपनी भाषा में बतियाते हुए चल रहे हैं। कभी गाना गाते हैं कभी जोर से हंसते हैं। इस पर मारियाना में बताया की यहाँ की बोली भाषा ही ऐसी है जैसे हिंदी में वाक्य खतम करने के लिए पूर्ण विराम लगाते हैं। वैसे ही मिजो भाषा में वाक्य खत्म करने का ये इशारा है गाना गाना।

पांच घंटे के सफर के बाद आखिरकार सुमो रुकी एक ढाबे के सामने। एक एक कर के हम सब उतरे और सबसे आखिरी में मैं। भूख जोर की लगी है और लघुशंका भी।

ढाबे में भाषा की लड़ाई

सुमो में बैठे हर सवारी का यही हाल है। बारी बारी से पहाड़ी में नीचे बने दुसलखाने के दरवाजे के बाहर खड़े हो रहे हैं। बात आई खाने की तो ये क्रिया निपटा कर आ खड़ा हुआ ढाबे के रिसेप्शन पर।

पर ऑर्डर लेने को खड़ी देवी को ना मेरी भाषा समझ आ रही है ना मुझे उनकी। उनकी मिजो भाषा का अनुवाद करने और अपना ऑर्डर लिखवाने के लिए मुझे मारियाना को बुलाना पड़ रहा है।

मारियाना को समझाया की शाकाहारी खाने के अलावा कुछ नहीं चाहिए। मगर रसोई घर के पास बैठी ये महिला को लग रहा है हम भी मांसाहारी हैं।

मारियाना ने उन्हें समझाया और ऑर्डर को सही कराया जिसमे अब सिर्फ चावल हैं जो पहले पोर्क चावल थे। चाय का एक एक प्याला ले हम निकल आए ढाबे के पिछले हिस्से में।

यहाँ पहले से मौजूद जनता जनार्दन अपना अपना खाना खाने में जुटे हैं। परिवार द्वारा संचालित इस ढाबे में कोई सदस्य खाना पका रहा है तो कोई बर्तन साफ कर रहा है। सबकी मिली जुली कोशिशों से ढाबा चल रहा है।

ढाबे पर चावल ही खाए, भुगतान किया। बाकी सवारियां भी खाने पीने में मस्त हैं। एक दो और सुमो भी अभी तक खड़ी थीं जो अबतक निकल चुकी हैं।

वक्त हो चला है मंजिल तक पहुंचने का। हम सब सुमो में लद कर निकल पड़े इस पहाड़ी मार्ग पर। 

शाम तक सुमो ऐजवाल के बाहरी इलाके में प्रवेश कर गई। दूर से एक पहाड़ी पर ऐजवाल बहुत ही उम्दा और शानदार नजर आ रहा है।

इसे देख कर मुझे शिमला की याद आ गई। अब तक बिहारी बाबू उतर चुके हैं इसलिए आगे थोड़ी जगह हो गई है। सब सवारियां ऐजवाल पहुंचने की तैयारी कर रहे हैं। सड़क किनारे अब हलचल दिखाई पड़ रही है। कहीं गैराज तो कहीं घर।

साथी घुमक्कड़ और ड्राइवर वाऐलो के साथ

मिलेनियम चौराहा

ऐजवाल के मिलेनियम चौराहे पर गाड़ी रोकी। सब सवारियां उतरने लगीं। इधर हम उतर रहे हैं उधर धड़ाधड़ दुकानें बंद हो रही हैं। मुझे लगा कर्फ्यू के चलते ऐसा हो रहा है। इच्छावश मारियाना से पूछा तो मालूम पड़ा यहाँ यही समय है दुकान बंद करने का।

सुबह के दस बजे के निकले हम शाम से छह बजे ऐजवाल पहुंच रहे हैं। करीब आठ घंटे में 170 किमी का पहाड़ियों में सफर तय हुआ। सुमो की छत से बैग उतारे जिससे अब मछलियों की बू आ रही है। पीछे और ऊपर बोरियां दद्दू की ही रखी हुई हैं।

पहुंच तो इतमीनान से गया हूँ पर अब चुनौती है यहाँ पर ठहराव की। इसी विषय पर बात करते हुए मारियाना ने कई होटल सुझाए और सुमो की ही एक महिला सवारी के साथ एक टैक्सी में जाने को कहा। सच में मारियाना ने हमारी काफी मदद की है इस सफर में। खासतौर पर मिजो भाषा का अनुवाद करने में।

उन्होंने अपना फोन नंबर देते हुए आगे भी ऐसे ही मदद का हांथ बढ़ाया। सुमो के ड्राइवर वैलो और मारियाना से अलविदा लेते हुए टैक्सी की तरफ बढ़ा। एक भ्रम तो ऐजवाल पहुंचने पर दूर हुआ की बगल में बैठे दद्दू मारियाना के दद्दू नहीं हैं।

आंटी जी के साथ मैं और साथी घुमक्कड़ निकल पड़े होटल की तलाश में। पहाड़ी पर ऊपर से नीचे करते करते कुछ होटलों के बाहर गाड़ी रुकी मगर होटल में बात नहीं बनी।

आखिरकार टैक्सी के ड्राइवर की सलाह पर ये तय हुआ कि बस अड्डे जा कर ही अगले शहर को कुछ करेंगे। टैक्सी चालक हमें पहाड़ी पर और नीचे उतारते हुए बस अड्डे ले आया।

बस अड्डे पर टैक्सी ड्राइवर अड़ गया किराए को ले कर। दो चार चक्कर लगाने का 5००। किराया सुन कर ना सिर्फ मैं बल्कि साथी घुमक्कड़ भी स्तब्ध है।

किराए में पचास रुपए देने लगा तो ड्राइवर और भड़क गया और गुस्से में बिना पैसे लिए ही चला गया। सामने खड़े दो सज्जन हिंदी भाषा में इस टैक्सी ड्राइवर को अपना मित्र बताया। मैने उनके मित्रो को वो पैसा थाना कर निकल पड़ा बस अड्डे में।

किसी और की मेहनत का पैसा मेरी जेब में तो नहीं रहना चाहिए। बस अड्डे पर ही सुरक्षित जगह देख कर तंबू लगाने की व्यवस्था कर ली।

आज पहली बार इतने दिनो की घुमक्कड़ी में भूखा सोना पड़ रहा है। शायद मिजोरम में आते ही पनौती शुरू हो गई है।

दामचारा से ऐजवाल 200km

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