हिमाचल का कश्मीर चितकुल

चितकुल | ट्रैकिंग और हाईकिंग | भारत | हिमाचल प्रदेश

भोर भयो

कल रात में एक अनिश्चित आश्रय मिलने के बाद चीजें काफी सरल हो गईं थीं। भारी भीषण बारिश में रुकने के प्रबंध ना होने के कारण शायद हालत कितने बत्तर हो जाते इस बात की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

गरम पानी की जब जरूरत महसूस हुई तो आंटी जी ने गरमा गरम चाय मुहैया कराई उसके बाद खाना भी। शायद मेरे जीवन का ये दूसरा ऐसा अनुभव होगा किसी गरीबी रेखा के नीचे के स्तर के घर में ठहरना या खाना खाना।

जात बिरादरी मायने नहीं रखती जितनी साफ सफाई मायने रखती है। वही यहाँ भी है। बचपन में जब स्कूल से वापस आने के बाद घर की चाभी भूल जाया करता था।

तब रेलवे कॉलोनी के गैंगमैन के साथ चोखा बाटी खा कर उन्ही के पलंग पर सो जाता था। ऐसा छह साल के स्कूल में पांच छह मर्तबा हुआ होगा।

पलंग भी जामुन के पेड़ के नीचे लगा होता था। उसी की छांव में। कुदरत से बचपन से ही नाता रहा है और खासा लगाव भी।

आज उठ तो जल्दी ही गया हूँ। ये सोचकर की भारत के आखिरी गांव चितकुल को घूम कर फटाफट यहाँ से निकल जाऊंगा। पर मजेदार बात ये है कि स्पीति की तरह यहाँ दिन में एक बस नहीं बल्कि दो बस अलग अलग समय पर निकलेंगी।

जो काफी सुविधाजनक है। मोबाइल में नेटवर्क भी टनाटन है। दुनिया भर से संपर्क भी बना रहेगा। रात ने आंटी जी ने एक कमरा हमारे लिए फ़ौरन खाली करवा दिया था।

ताकि सही तरीके से थकान उतार सकें। और हुआ भी ऐसा ही। गरमा गरम बिस्तर से निकलने के बाद बहुत तरोताजा महसूस कर रहा हूँ।

इस कठोर ठंड में स्नान ले कर जान जोखिम में डालना सही बात नहीं होगी। नित्य कर्म के बाद गरमा गरम चाय के साथ सुबह हुई।

सैर सपाटा चितकुल

चितकुल गांव में सैर सपाटे की बात आई तो बेहतर यही होगा बिना बैग लिए घूमना। जब बात होमस्टे की आती है तो ये पहाड़ी निवासी हम शहरीवासी पर आंख मूंद कर भरोसा कर लेते हैं।

शायद ये इस छल कपट की दुनियां से अभी वंचित नहीं हैं। इसलिए भी दिल के इतने साफ होते हैं। आठ बज रहे होंगे कि मैं सही समय रहते निकल गया।

साथी घुमक्कड़ से इसी बात पर चर्चा हो रही है कि अगर समय से घूम फिर कर आ गए तो दस बजे वाली बस अन्यथा दो बजे वाली बस से इत्मीनान से निकला जाएगा।

धूप अच्छी खासी निकली है आज। सामने दिख रही पहाड़ियां अपने सिर पर बर्फ का ताज लिए खड़ी हुई हैं। मानो कह रही हों हम ही यहाँ के राजा हैं।

आसमान साफ है लेकिन फिर भी मैं अपनी जैकेट साथ ले आया हूँ। क्या पता कब मौसम बिगड़ जाए! बढ चला हूँ चाइना बॉर्डर की तरफ।

भारत के आखिरी गांव कहे जाने वाले चितकुल की सीमा पर पहुंचना है। सड़क बिल्कुल भी निर्मित नहीं है बस पैदल चलने लायक है।

देखते हैं ये मंज़िल कहाँ तक जाती है। मेरे बाएं हाँथ पर पहाड़ों मे लोगों ने खेती कर रखी है। जहां तक समतल है वहाँ तक खेती।

इसके बाद किसी पर्वतारोही को चड़ने का नशा हो तो एक सांस में पहाड़ी भी चढ़ सकता है। हमें तो अच्छा खासा वक्त लग जाएगा ऐसी पहाड़ियों में ऊपर तक पहुंचने में।

दाहिने हाँथ पर पूरब की ओर नदी बेहेती दिख रही है। धारा तेज़ है। पर ऊपर से देख कर तो यही लग रहा है कि इसको पार करके दूसरी पहाड़ी पर आसानी से पहुंचा जा सकता है।

धूप इतनी तेज़ है की सुबह सुबह जैकेट उतारनी पड़ रही है। मजेदार बात तो ये है कि खाली पड़े मैदान दावत दे रहे हैं तम्बू गाड़ने की।

काश अगर कल रात में यहाँ तक आ पाता तो आखिरी विकल्प के तौर पर यही करता। लेकिन कल भारी बारिश में लग रहा था अब कुछ ना हो सकेगा। ना कोई दर ना कोई ठिकाना बस चलते जाना था।

हम मानव परिस्थितियों से जकड़ जाते है बाकी कुछ भी कर गुजरने की कोई सीमा नहीं है। थोड़ा और बढ़ता हूँ तो पाया एक कई तम्बू गड़ हैं।

यहाँ कई तम्बुओं से बना एक गड़ जिसे देख कर यही लग रहा है कोई व्यावसायिक क्षेत्र। आओ पैसे दो रात बिताई और निकल लो। पहले तो लगा अर्मी कैंप होगा। पर नहीं।

कुछ ही दूरी पर बायो टॉयलेट को भी व्यवस्था कर रखी है। कोई समय बेसमय अगर आ जाए तो अपनी व्यवस्था या तो गांव के किसी घर में देख सकता है या फिर यहाँ।

ना किसी प्रकार की ठंड है ना ठंडी हवा। बस हल्की हल्की गर्मी बढ़ रही है। कभी कोई दुपहिया वाहन से तो कभी कार से धूल का झोंका उड़ा कर सरसराते हुए आगे निकल जाता।

कच्ची सड़क होने के कारण ऐसा धूल का गुबार उड़ता जिससे बचने के लिए या तो आड़ लेनी पड़ती या कपड़े से चेहरे को ढकना पड़ता है।

सच्चा साथी

हमारे अलावा कोई और पैदल यात्री नहीं दिख रहा इस मार्ग पर। मिला तो एक भालू जैसा दिखने वाला कुत्ता। पहाड़ी कुत्ते दिखने में जितने खतरनाक लगते हैं उतने होते नहीं।

लोमड़ी जैसे आकार के दिखने वाले ये भालुनुमा कुत्ते बहुत ही प्यारे होते हैं। थोड़ा सा स्नेह और लग गया पीछे। जाने क्या चाहिए।

कुछ नहीं तो अब तक दो किमी चल चुका होऊंगा। पर सीमा अभी समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रही। लेकिन आसपास के माहौल को देख ऐसा लग रहा है मानो की ख्वाब की दुनिया में कदम रखा हो।

बर्फ से ढके पहाड़ तो है पर पहुंच नहीं सकता। नदी का बहाव मानो बोल रहा हो साथ बेह चलो। साथ मे है एक चरवाहा। जो अपनी भेड़ों के साथ उसी दिशा में बढ़ रहा है जिस दिशा में मैं।

ये चरवाहे भी एक तरह से भारत की सुरक्षा में अहम योगदान निभाते आए हैं। फिर चाहें वो कारगिल का युद्ध हो या लदाख की गलवान घाटी।

घाटी नाम ही चरवाहे के ऊपर रख दिया है। कुछ दूर से ही एक चौकी दिखाई पड़ रही है। जहां सेना का एक जवान तैनात है। उस चौकी के आगे कोई भी गाड़ी या आम आदमी आगे जाता नहीं दिख रहा।

चेकपोस्ट

जब मैं पहुंचा तो मुझे भी औरों की तरह यहीं तक रुकना पड़ा। चरवाहा अपनी भेड़ लेके आगे बढ़ता गया। सिर्फ गांव के रहने वाले या सेना के जवानों का ही प्रवेश करने पर पाबंदी नहीं है।

सुरक्षा के लिहाज से बहुत ही उचित कदम है। इजाजत लेके कुछ आगे तक आ गया। जहां कुछ दो जवान काम करते दिख रहे हैं।

बातचीत में पता चला इनमे से एक जवान का सीधा नाता कानपुर से है। चूंकि उनकी ससुराल है हमारी जन्मभूमि में। तो शहर के एक दो जगहों के नाम लेके आंकलन करने लगे।

बहुत बातें होने लगीं। कुछ उन्होंने अपनी तैनाती और सेना में रहने के अनुभव सांझा किए। कुछ हमारे बारे में पूछने लगे। चंडीगढ़ से लेकर अबतक के सफर को एक सांस मे बयां किया।

दोनों जवानों ने अपना परिचय देते हुए गुरुग्राम निवासी बताया। बात होने लगी आज के उनके टास्क की। जिसमे वो पानी की नाली को ब्लॉक करके पानी जमा कर रहे हैं।

साथ ही किसी बोतल के साथ खेलते हुए भी दिखे जिसमे पीने के पानी की व्यवस्था करेंगे। हालांकि भारत चीन बॉर्डर यहाँ से लगभग 120 किमी भी ज्यादा है।

लेकिन आम नागरिकों को यहीं तक आने की अनुमति है। सामने देखा तो तीन चार लड़कों की टोली आती दिख रही है। उनको भी यहीं पर रोक दिया जाएगा।

चेकपोस्ट पर पोज़ देते हुए लेखक

और भी सैलानी

पास आए तो मालूम पड़ा ये नौजवान माया नगरी मुंबई से यहाँ छुट्टियां मनाने आए हैं। अपने होटल से यहाँ तक पैदल ही सफर तय कर दिया।

मगर ये वो नहीं जो हम हैं। सजे धजे लिबास में इन्हे तो मैं टूरिस्ट की संज्ञा दूंगा। उन तीन नौकरीपेशा लड़कों में से एक अच्छा गायक है।

जब उसके बाकी के साथी जोर देने लगा तो मान मनौव्वल करवाने लगा। तब जबरन फौजी भाइयों ने आग्रह किया कि इनके लिए ना सही यहाँ तक आए हो तो हमारे लिए ही गा दो।

तब जा कर कहीं गले में स्वर आया गायब साहब के। और गाना भी चुन कर गाने लगे अपने गिटार के साथ। “देखो वीर जवानों अपने खून पे इल्जाम ना आए”

गाना सुन जवानों की आंखे भर आईं। खैर अब समय आ चुका है अलविदा कहने का। कुछ एक तस्वीरों के साथ यादों को कैमरे में कैद कर लिया।

वापस जाने के लिए मुड़ा ही था कि सामने से एक बड़ी गाड़ी आती दिखी। सरसरते हुए पोस्ट के भी आगे बढ़ गई। पोस्ट पर कुछ देर के लिए रूकी लेकिन जब परमिशन ना मिली तो वापस मुड़ने लगी।

पोस्ट पर तैनात जवान से पता पड़ा की आर्मी के किसी कर्नल की गाड़ी थी जो और भी आगे जाने के इच्छुक हैं। पर कर्नल हो या ब्रिगेडियर हर एक के लिए नियम बराबर हैं।

वापसी में मेरे साथ साथ चल रहा है वो पहाड़ी कुत्ता। जिसे नशा सा सवार हो गया है साथ चलने का। आखिर कहाँ तक ये जाएगा साथ देखने वाली बात होगी।

तय हुआ अबकी ऊपर के रास्ते से ना जा कर नदी के किनारे किनारे जाया जाएगा। शायद स्नान भी कर लिया जाएगा। पहले सिर्फ नीचे उतर कर आगे बढ़ने की योजना थी।

पर नदी के तेज़ बहाव को देख कुछ वक्त नदी के किनारे बिताना ठीक लगा। पीठ दर्द के कारण हल्की हल्की धूप सेंकने का भी मन हो रहा है।

एक हाँथ में जैकेट और दूसरे मे कैमरा लिए आ गया नीचे पीछे पीछे वो भालूनुमा कुत्ता भी। पानी का बहाव रात में और भी तेज और ज्यादा हो जाता होगा।

जिस वजह से ये काफी पीछे तक आ जाता है। नदी का बहाव तेज साथ में शीतल जल। नहाने के विषय में सोचना भी पाप है। पर पिछले एक हफ्ते में शायद ही साथी घुमक्कड़ ने नहाया होगा।

सो खुद की भलाई के लिए भी कपड़े उतार कर उतर गया पानी में। हम भारतीय तो एक दफा पानी के नजदीक भी पहुंच जाते हैं पर मैंने अधिकांश विदेशियों के बारे में उनके ना नहाने के बारे में सुना है।

नहा धो कर वही कपड़े ही सही पर शरीर की शुद्धता बरकरा रहनी चाहिए।

घाटी की सफाई की जिम्मेदारी

जबतक इधर नहाने धोने का कार्यक्रम चल रहा है तब तक के लिए कुछ दूर आ गया।

इधर देखा तो काफी कचरा जमा हुआ है। कहीं कांच की टूटी बोतलें तो कहीं अध जली प्लास्टिक की बोतल। इनमे से एक जगह बोन फायर के नाम में भारी तादाद में कचरा जला हुआ पड़ा है।

पास में पड़ी है बोरी। मानो घाटी केह रही हो आज यहाँ थोड़ा सा हाँथ लगा कर सफाई ही कर डालो। बोरी उठाई और कचरा भरने लगा।

उधर मेरी देखा देखी साथी घुमक्कड़ भी कचरा बटोरने लगा। कुछ देर में मेरे हाँथ एक आते की खाली बोरी लगी जो मैंने उसे पकड़ा दी। फिर तो जैसे घाटी की सफाई का अभियान तेज हो गया।

कचरा बटोरते लेखक

कुत्ता भी भरपूर साथ दे रहा है। शायद वो भी समझने लगा है कि क्या हो रहा है। इसलिए जहां जहां कचरा पड़ा होता वो उसके ऊपर से गुजरने लगता।

जैसे जैसे आगे बढ़ रहा हूँ बोरी का वजन कचरे के ढेर से बढ़ता ही जा रहा है। गीला और सूखा कचरा दोनों। दुख की बात तो ये है कि हम सैलानी की तरह यहाँ घूमने तो आते हैं पर बेगानों की तरह गंदगी फैला कर निकल लेते हैं।

इनमे में अधिकतर पढ़े लिखों द्वारा ही ये हरकत होती है। कांच की टूटी बोतल, प्लास्टिक की कोल्ड ड्रिंक्स वाली बोतल, पन्नी, बिस्कुट चॉकलेट के रैपर वगैरह कूड़े के रूप में ज्यादा देखने को मिल रहा है।

साड़ी हुई पन्नियां जब नदी में जाएंगी तो ये नदी को और दूषित करेंगी। ना सिर्फ ज़मीन पर रह रहे जीव जंतुओं के लिए खतरा है बल्कि पानी के अंदर उन मछलियों के लिए भी।

निराशा भी है और क्रोध भी। यदि हम जिम्मेदारी के साथ घुमक्कड़ी करें तो इन सब की नौबत ही ना आए। ना सिर्फ मैं यहाँ आज सफाई कर रहा हूँ।

यहाँ रहने वाले तो अक्कर ऐसी समस्या से गुजरते होंगे। जब बाहर के लोग आकर उनके घर को गन्दा कर के चले जाते हैं। जैसे मूड गांव में देखने को मिला था।

पूरे के पूरे गांववासी ने मिलकर सफाई अभियान चलाया था। भले ही उनका मकसद धार्मिक हो पर नेक था।

मेरी हाँथ में अब तक एक बोरी भर चुकी है। अब दूसरी भी भरने वाली है। आगे कुछ बसेरा है जिसके पीछे काफी सडे पुराने जूतों का ढेर है।

उसको भी बैग में डाल आगे बढ़ चला। अब इन मजदूर भाइयों को कौन समझाए कि यहाँ कूड़ा फेकना कितना गलत और हानिकारक है।

और आगे दृष्टि गई तो ऊपर चढ़ने का कोई विकाप नहीं दिख रहा है। घड़ी में भी समय हो चला है निकालने का। लगभग डेढ़ घंटे चले इस सफाई अभियान को यहीं रुकना पड़ रहा है।

अगर आज के दिन रुकना होता तो बस अड्डे तक तो सफाई हो ही जाती। खड़ी पहाड़ी में ऊपर चढ़ना इतना आसान नहीं है। और कचरे की बोरी भी ऊपर ले कर जानी है।

अगर ये नीचे गिर गई तो सारी मेहनत बेकार हो जाएगी। तारों से बंधे ईंट के सहारे ऊपर चढ़ने का प्रयास करने लगा। पुरजोर कोशिश और मशक्कत के बाद आखिरकार पहला पांव ऊपर धकेल खुद को जाली के सहारे ऊपर उठाया।

कचरे की बोरी को सामने दिख रहे टेंट हाउस के डस्टबिन में ला पटका। जबतक पीछे मुड़ता तब तक साथी घुमक्कड़ भी ऊपर आ चुका है।

वापसी

और देखते ही देखते नेल्सन और गुलशन भी अपनी फटफटिया के साथ आ धमके। बातें हुईं तो कल रात सांगला से चितकुल तक पहुंचने की सारी कहानी बयां की।

नेल्सन दो साल पहले भी चितकुल आ चुका है। उसके चेहरे के हाव भाव देख कर जान पड़ रहा है कि को आज यहाँ घाटी की हालत है उससे वो खुश नहीं।

कुछ देर बातें हुई और वो दोनों अपनी फटफटिया में बैठ कर निकल गए बॉर्डर की तरफ। पास में रखी पानी की टंकी से हाँथ धुल कर बढ़ चला घर की ओर।

अब लग रहा है शायद ये आखिरी बस भी ना मिले। साफ सफाई में इस कदर मशगूल हो गया था कि समय का होश ही नहीं रहा।

घर पहुंच कर बैग निकाले और रात में रुकने का पैसा देने लगा। पहले तो आंटी जी ने आना कानी की पर मैंने ही उन्हें जबरन थमा दिया।

जो मुसीबत में काम आए वही सच्चा साथी।

अप्रमाणित आखिरी ढाबा

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2 Comments

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