हजारों मंदिर का शहर कांचीपुरम

कांचीपुरम | तमिलनाडु | धार्मिक स्थल | पंचतत्व मंदिर | पवित्र स्थल | भारत | शक्तिपीठ

नवीन सुबह

कांचीपुरम आने की योजना कल अचानक ही बनी। इसी उधेड़बुन में था की बैंगलोर में एक दिन और ठहरा जाए या फिर आगे बढ़ा जाए। उधर साथी घुमक्कड़ चेन्नई में बैठा है। जिसको क्या बोलूं समझ नही आ रहा।

कांचीपुरम या चेन्नई? बैंगलोर स्टेशन तक भी आ जाने के बाद सुनिश्चित नहीं हो पा रहा था की करना क्या है अब। अंत में कांचीपुरम के लिए जी टिकट कटाया।

कांचीपुरम आने का कारण यहाँ पर सतीश के द्वारा दिया गया आमंत्रण। कल शाम को ही यहाँ पधारा हूँ। सतीश ने अपने घरवालों से मिलवाया और मुझे एक अलग कमरे में ठहरा दिया।

आंख खुली तो पाया दो अनजान युवक पास ही में सो रहें हैं। हालांकि की भोर में नींद खुली थी कुछ हलचल होने की वजह से लेकिन मैं फिर सो गया था।

सतीश ने अपने मित्रों के आगमन के बारे में पहले ही सूचित कर दिया था। जो की सहूलियत भरा रहा। वर्ना ऐसे कोई अचानक आ कर आश्चर्य में ही डाल देगा।

रात में ही सतीश ने जल्दी निकलने का संकेत दे दिया था। इसलिए सुबह उठ कर तैयार हो चला।

मेरा निकलने का समय भी हो चला है। कांचीपुरम ना केवल अपनी रेशम की साड़ियों के लिए जाना जाता है बल्कि उससे भी ज्यादा इसे बनारस जैसा उच्चतम दर्जे का स्थान दिया गया है।

सतीश अपना दुपहिया वाहन तैयार कर घर के बाहर खड़ा हो गया। मैं भी निकलने के लिए एकदम तैयार हूँ। सतीश की स्कूटी में कुल तीन लोग लद कर निकल पड़े वरदराज पेरूमल मंदिर।

पेरुमल मंदिर के भीतर का नज़ारा

वरदराज पेरूमल मंदिर

भारत में कांचीपुरम को हजार मंदिरों के शहर के रूप में जाना जाता है। ऐसा शहर जहां पत्थर भी बोलते हैं। कांचीपुरम की गिनती देश के सात पवित्र शहरों में होती है।

अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार काशी उज्जैन, द्वारका और कांचीपुरम शामिल हैं। कभी पल्लवा साम्राज्य की राजधानी रही कांचीपुरम आज परिचय की मोहताज है।

सतीश ने बताया की पेरूमल मंदिर भगवान विष्णु के अवतार अर्थवर्दर को समर्पित है। जो हर 40 वर्षों बाद कुंड से स्वतः निकल कर भक्तो को दर्शन देते हैं।

स्कूटी बाहर लगा कर मैं मंदिर के बड़े द्वार के छोटे भाग से अंदर की ओर निकल आया। सतीश वो तालाब दिखाने लगा जहां कुछ महीनो पूर्व में अर्थवर्दर के दर्शन हुए हैं 40 साल के बाद।

तालाब के भीतर की मूर्ति को तो देखा नही जा सकता पर यहाँ मुख्य मंदिर में दर्शन करने आ गया। ये मंदिर दो मंजिला है। जिसमे नीचे देवता और ऊपर सोने की छिपकली के दर्शन के लिए है।

ऊपर आने पर पता चला की दर्शन के लिए मामूली मूल्य चुकाना होगा। काउंटर पर बैठे सज्जन को पैसे दे कर मैं सबके साथ जाली के भीतर आ गया।

हल्की फुल्की भीड़ है। मैं आगे बढ़ते बढ़ते उस कक्ष में आ गया जहां सोने की छिपकली कक्ष की छत पर चिपकी है। मजेदार दृश्य तो ये देखने को मिल रहा है की लोग इस छिपकली को सिर से ले कर पूंछ तक कई दफा छू रहे हैं।

कुछ तो भूल ही गए थे की आगे भी बढ़ना है। यहीं के यहीं खड़े हो कर रह गए थे। सीढ़ी पर चढ़कर मैने भी सोने की छिपकली की पूंछ छुई सिर बाहर की ओर निकल आया।

यहाँ भगवान विष्णु की उनके हर अवतार में प्रतिमाएं स्थापित हैं। बाहर निकल कर आसपास की जगह देखने लगा। देख कर मालूम पड़ रहा है की अभी कुछ दिन पहले कितनी भरी संख्या भी भीड़ हुई होगी।

सतीश ने बताया दुनिया भर से लाखों भक्त यहाँ आए हुए थे दुर्लभ दर्शन करने। इस दौरान महा पूजन हुआ करता था। किसी को भी पानी में उतरने को इजाजत नहीं थी। किसी को भी नहीं पता इस तालाब में पानी का स्त्रोत क्या है।

दर्शन करने के बाद सतीश मुझे पीछे के तालाब के समीप ले आया। यहाँ बहुत सारी मछलियां है। जिनको दाना डालने पर पास आ जाती हैं।

आगे मंदिर का अंतिम हिस्सा है जो खंडहर जैसा लग रहा है। पक्षी भी हैं तरह तरह के। तालाब के पास अच्छा लग रहा है। इसलिए यहाँ बैठना भी।

मंदिर का चक्कर लगाने लगा तो यहाँ बंद पड़ा परिसर भी देखा। यहाँ अब पानी पर सफाई पूरी है। मंदिर का ढांचा दुरुस्त और मजबूत है। महिलाएं मंदिर की साफ सफाई में व्यस्त हैं।

चक्कर लगाते हुए मंदिर के सामने वाले हिस्से में आ गया। मंदिर में एक सौ मीटर का हॉल है जिसमे रामायण और महाभारत की कथाओं का वर्णन मूर्ति के द्वारा दर्शाया गया है।

पत्थर के बने छल्ले अभूतपूर्व शिल्पकारी का प्रदर्शन

इसी मंदिर की बाहरी दीवार पर लटके छल्ले आकर्षण का केंद्र हैं। जो पत्थर के बने हैं। कहते हैं कोई नहीं जानता इसकी संरचना कैसे हुई।

1053 में चोला साम्राज्य में बने का विस्तार भी चोलाओं ने ही किया। भगवान विष्णु को समर्पित ये मंदिर में हर दीवार पर विष्णु टीका लगा दिख रहा है।

कुछ तस्वीरें लेने के बाद हम बाहर आ गए। सतीश पास के ही रेस्तरां में मुझे के आया। यहाँ सुबह के नाश्ते में मैने इडली मंगाई और साथी ने डोसा।

पेट पूजन के बाद अब कहाँ जायेंगे ये तो सतीश ही बता पाएगा। तय हुआ की अब कांची अम्मन मंदिर की ओर प्रस्थान किया जाएगा।

कामाक्षी मंदिर

कामाक्षी मंदिर

कहा जाता है की यहाँ माता पार्वती ने यज्ञ करके भगवान शिव से विवाह की कामना की थी। एक स्कूटी पर फिर से तीन लोग सवार हो गए।

बाहर दुपहिया वाहन खड़ा कर सतीश के साथ मैं भी भीतर आ गया। अंदर बने भव्य मंदिर में पुराने हिस्से के सामने नया हिस्सा बना हुआ है जो देखते ही पता चल रहा है। मंदिर बंद होने से ठीक बीस मिनट पहले आ पहुंचा हूँ। उम्मीद है दर्शन हो जायेंगे।

कामाक्षी मंदिर को ब्रम्हा विष्णु महेश घेरे हुए हैं। मान्यताओं के अनुसार यहाँ कामाक्षी मंदिर अनंत काल से है। ये भारत के 51 शक्तिपीठों में से एक है। यहाँ माता सती का कंकाल गिरा था।

यहाँ पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान मां कामाक्षी देवी की आराधना की थी। इस मंदिर की मूर्ति को स्वयंभू माना जाता है। मां कामाक्षी ने शिव से विवाह की अभिलाषा हेतु सुई की नोक पर तपस्या की थी।

सोने का एक चित्र भी हुआ करता था जिसे तंजावुर स्थांतरित कर दिया गया था। मान्यता है की ये मंदिर शंकराचार्य द्वारा निर्मित है।

सतीश को काफी जानकारी है। अंदर बने प्रांगण में मैं आ गया दर्शन करने। यहाँ और लोगों की तरह मैं कतार में खड़ा हो गया। भीड़ है पर जबरदस्त नहीं।

कुछ ही देर में दर्शन हो गए कामाक्षी माता के। बाहर एक सोने का डंडा खड़ा है। जिसके आसपास लोग दिया जला रहे हैं। यहाँ भी अर्थवराज मंदिर की तरह तालाब के बीचों बीच मूर्ति है।

घने काले बादलों के बीच मंदिर और भी सुंदर लग रहा है। तालाब में फव्वारे लगे हुए हैं। दूसरे छोर पर मूर्ति रूप में एक आदमी औरत बैठे हैं। कुछ वक्त यहाँ बिताने के बाद मैं बाहर की ओर प्रस्थान करने लगा।

निकल अड़े एकंबरेश्वर मंदिर। घड़ी में सुई पौने एक के पास आ गई है। पर मंदिर के द्वार पास आने की अनुमति नहीं दे रहे। यहाँ अब मंदिर बंद हो रहा है। इसलिए हमे अब वापस जाना होगा।

कैलाशनाथ मंदिर

कैलाशनाथ मंदिर

सतीश ने आश्वासन दिया की शाम को हम यहाँ फिर आयेंगे। फिलहाल के लिए निकल पड़ा अब दूसरे मंदिर की ओर जो है कैलाशनाथ मंदिर।

महज दो किमी की दूरी पर कैलाशनाथ मंदिर सतीश के दुपहिया वाहन पर बैठ कर आ गया। यहाँ भी सन्नाटा पसरा है पर भीतर जा सकते हैं।

कैलाशनाथ मंदिर शिल्पकारी का अद्भुत नमूना है। यहाँ की शिल्पकारी कई अन्य परंपराओं से प्रभावित रही है। इस मंदिर पर दक्षिण भारत की सबसे महान मंदिर होने की मोहर लगी हुई है।

नरसिम्हा वर्मन द्वितीय ने इसका कार्य शुरू कराया था। समय के साथ शिल्पक्री बेहतर होती गई। मंदिर के सामने वाला हिस्सा और गोपुरम उनके पुत्र द्वारा बनवाया गया।

यहाँ जो सबसे ज्यादा आकृति दिखाई पड़ रही है वो है शेर की। जो नरसिम्हा वर्मन के साम्राज्य का प्रतीक चिन्ह था। बालू पत्थर से बनवाया गया है।

इससे पहले मंदिर या तो लकड़ी के या तो चट्टानों को काटकर बनाई जाते थे। मंदिर के आसपास छोटे छोटे कुल 58 मंदिर बने हुए हैं। मंदिर की दीवारों पर शिव की अलग अलग रूप में शिल्पकारी की गई है।

ये पत्थर जो आज शीथल दिखाई पड़ रहे हैं वो कभी चटक रंगों से सजे हुए करते थे। बल्कि मूर्तियां भी रंगीन थीं।

एक स्थानीय निवासी होने के बावजूद सतीश को अपने शहर के मंदिरों के बारे में इतना ज्ञान है। अन्यथा मैं अनभिज्ञ ही रह जाता की मैं आया कहाँ हूँ।

एक स्थानीय निवासी होने के बावजूद सतीश को अपने शहर के मंदिरों के बारे में

कहा जाता है की इस मंदिर ने कांचीपुरम को बरबाद होने से बचा लिया था। करीब घंटा भर बिताने के बाद साथी घुमक्कड़ ने सुझाया उस आश्रम में चलने को जहां शहर भर के जानवर जिनकी खराब दुर्दशा है वो रखे जाते है।

राजा कुलम आश्रम

निकल गए शहर के बाहर रेल फाटक पर करते हुए। गनीमत है की फाटक खुला है अन्यथा यहाँ और समय नष्ट होता।

अब इस समय कांचीपुरम से बाहर चेन्नई की ओर जाने वाली सड़क मार्ग पर आ गया हूँ। कांचीपुरम से मिलों दूर स्थान पर आ तो गया पर स्थान ही नहीं मिल रहा।

आसपास बैठे लोगों से पूछते पर भी या तो किसी को मालूम नहीं या फिर किसी ने नाम ही नहीं सुना। गूगल नक्शे की मदद से देखा की हम थोड़ा आगे आ गए हैं।

करीब दो सौ मीटर वापस चलते हुए नीले रंग का दरवाजा दिखा। खटखटाने पर भीतर से एक भाईसाहब आए। अपना परिचय देते हुए बताया की इस स्थान के मालिक से मुलाकात करनी है।

तब कहीं जा कर हमें अंदर आने का न्योता मिला। द्वार पर ही कुकुर, हंस तैनात है आश्रम की सुरक्षा के लिए। बड़े आश्रम में बने घर के बाहर आ कर खड़ा हो गया।

सुरक्षा के तौर पर ये जानवर भी मेरे पीछे पीछे आ गए। हंस तो जोर जोर से चीखने लगे थे द्वार पर दस्तक देते ही। घर के द्वार के बाहर खड़ा में अंदर जाने की प्रतीक्षा में हूँ।

ऊपर से जब मालकिन ने हमें ऊपर आने को कहा तब कहीं जा कर सब जानवर शांत हो गए। कुत्ता भी और हंस गजब के वफादार हैं।

यहाँ काम करने वाले भाई अंदर अपने मालिक से पूछ कर हमें ऊपर के माले पर ले आए। नीचे धरातल पर सिर्फ एक बड़ा हॉल जिसमे ध्यान करने योग्य काफी खुली जगह है।

पहले तो पहुंचने में मशक्कत फिर यहाँ के मालिक से मिलने में भी थोड़ी मशक्कत करनी पड़ी। उनके फार्म घर पहुंच के स्वागत किया सरास ने, मालिक को आवाज़ लगाई कुकुर ने और आदरपूर्वक घोड़े अंदर तक ले गए। देखरेख करने वाला आया और हमलोगों को संचालक के पास ले गया।

भीतर आ कर हमें कुछ देर बैठा लिया गया। कमरे में भी कई प्रकार के कुत्ते बकरी घूम रहे हैं। कुछ ही देर बाहर बैठना हुआ होगा की हमें अंदर बुला लिया गया।

अंदर आया तो देखा की सफेद वस्त्रों में मालकिन किन्हीं दो व्यापारियों के साथ कुछ विषय पर चर्चा कर रही हैं। अलग अलग भाषाओं में।

इनकी हिंदी भी गजब की है और तमिल भी। उनसे रूबरू होने का अवसर मिल रहा है।

प्यारे पशुओं के मध्य लेखक

प्यारे पशु पक्षी

राजा कुलम नामक इस जगह पर भांति भांति के पशु पक्षी पाले गए हैं। खासतौर पर उन आवारा जानवरों को लाने का प्रयास ज्यादा रहता है जो सड़कों और गली कुंचो पर अपने आप को कूड़ा खा कर या सड़क दुघर्टना के तहत हानी पहुंचा लेते हैं।

उनसे इस बारे में काफी चर्चा होने लगी की कैसे वो इतनी बड़ी व्यवस्था चलाती हैं। जानवरों के लिए जो कितना कल्याणकारी सिद्ध है।

उनसे भेंट की बाद अब निकलने का सोच रहा हूँ। पर माता बिना भोजन के जाने ही नहीं दे रहीं। पास में पड़ी मेज कुर्सी पर देखरेख करने वाले ढेर सारा भोजन ले आए।

जैसे मैं जन्मों का भूखा हूँ या अब खाना नहीं मिलेगा। खाने की थाली सजाने के बाद भोजन गृहण करने लगा। हर प्रकार की सब्जी और पकवान, तीखे से ले कर मीठे तक।

भोजन के बाद माता ने हमे अपना खेत घर में सैर करने को कहा। बाहर निकल कर कृष्ण की आवाज देने लगीं। उनकी आवाज सुन कर सभी जानवर दौड़े चले आए।

वो सभी को रोटी डालने लगी। सब जानवर यहाँ ऐसे रहते हैं जैसे सभी भाई बंधु हों। देखरेख करने वाले हमें उस जगह ले जा रहे हैं जहां सभी जानवर देखरेख में रखे गए हैं।

जालीदार कमरे में बंद भेड़ बकरी कुकुर को खोल कर आजाद कर दिया। कुछ और आगे चल कर गाय का डेरा आ गया।

पास पड़ी एक बीमार गाय के पास आए हम। देखरेख कर्ताओं ने कहा कुछ ही दिन की मेहमान है। खाना पीना छोड़ दिया है।

कर्मियों की कोशिश है की इसको थोड़ा चलाया जाए। यहाँ से उठाकर दूसरी जगह पर ले जाया जाए। इसी प्रयास में हम सब मिलकर उठाने लगे।

बहुत कोशिशों के बावजूद ये गाय टस से मस ना हुई। शायद शरीर में जान ही नहीं बची है। कुछ खा भी नहीं रही। रोटी का टुकड़ा मूंह तक लाने के बाद भी। बेजान इस गाय की कुछ ही दिनों की जिंदगी है। हराकर हम सब यहाँ से चल पड़े।

दूसरे हिस्से में आया जहां सैकड़ों की तादाद में गाय और सांड है। ये सभी जानवर बहुत ही अजीब बर्ताव कर रहे हैं। वो यह की वह सभी जानवर इंसानों से दूर भाग रहे हैं।

ऐसा शायद इसलिए क्यों की इन जानवरों को इंसानों के बीच रहने की आदत कम या ना के बराबर है। दो घंटे व्यतीत करने के बाद मैं राजा कुलम से वापस निकल पड़ा कांचीपुरम के प्रसिद्ध मंदिर एकामबरेश्वर मंदिर के लिए।

एकाम्बरेश्वर मंदिर का भव्य नज़ारा

एकामबरेश्वर मंदिर

एकामबरेश्वर मंदिर वो मंदिर है जहां माता पार्वती अपने पापों का प्रश्चित करने के लिए धरती पर जन्म लेने के पश्चात स्वयं शिवलिंग का निर्माण किया था।

यह मंदिर “पंचभूत स्थलम” के पांच पवित्र शिव मंदिरों में से एक का दर्जा प्राप्त है और यह “धरती” तत्व का प्रतिनिधित्व करता है। मंदिर की भीतरी दीवारों पर 1008 शिवलिंगम् सज्जित हैं।

दुपहिया वाहन खड़ा करने बाद भीतर आने लगा। इसका इतना विशाल और सुंदर गोपुरम और इमारत देख स्तब्ध हूँ। भीतर आ के भगवान शिव के दर्शन किए।

यहाँ का प्रवेश द्वार दक्षिण के मंदिरों में सबसे बड़ा है। मंदिर अंदर से काफी बड़ा है और देखने योग्य है। दीवारें 1008 शिवलिंगों से सुसज्जित है।

एक शिवलिंग 108 छोटे शिवलिंग से मिलकर बना है। 23 एकड़ में फैला ये मंदिर अद्भुत है। यहाँ लगे एक आम का पेड़ बताया जाता है की 3500 साल पुराना है। मंदिर हालांकि 600 में बना था यानी 7वीं शताब्दी में।

कहा जाता है भगवान शिव और पार्वती की शादी इसी पेड़ के नीचे भगवान विष्णु की उपस्थिति में हुई थी। मंदिर के भीतर बने दस खंबे ऐसे हैं जिनसे दस अलग अलग संगीत उत्पन्न होता है।

मंदिर के अलग अलग हिस्सों में तस्वीरें लेने लगा। मंदिर इतना अमीर है की यहाँ कई चीजों को चादर में लपेट कर रख दिया गया है आम जनता की देख से दूर।

हर मंदिर की तरह यहाँ भी तालाब है। प्रांगण के बाहर ही एक सज्जन दुकान लगाए मंदिर और प्रशाद बेंच रहे हैं।

हमने जो समय मन्दिर में बिताया वो शायद पर्याप्त नहीं है। इतने विशाल परिसर को भली भांति देखने के लिए कम से कं 3/4 घंटे तो चाहिए ही।

कांचीपुरम में कुल 50किमी की यात्रा

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *