हज़ार स्तम्भ मंदिर और वारंगल किला

आंध्रप्रदेश व तेलंगाना | भारत | वारंगल

भेदभाव

थकान और रात भर चली आंख मिचोली में नींद पूरी न हो सकी।  सरकारी काम वाली बाई के जगाने पर नींद टूटी।

घड़ी में सुबह के छह बज रहे हैं। एहसाह हुआ पर्यटन के लिए निकलना भी है।

फर्श पर से अपनी अंग्रेजी चटाई एयर स्लीपिंग बैग उठाकर बेंच पर रख दी।

रात भर बड़े को बगल में लिटा कर सोया था। ऐसा घेराव बनाया था जिसको शायद ही कोई भेदता।

बेंच पर रखे बैग में एक एक कर सामान अंदर रखने लगा।

अच्छी बात ये है की यहाँ पर स्नान घर भी है। सारे क्रिया कर्म यहीं निपटाए जा सकते हैं।

भीड़ रात में जमकर थी अब महज कुछ ही लोग उपस्थित हैं। या लोग ट्रेन पकड़ने निकल गए या फिर स्टेशन के बाहर।

बारी बारी से स्नानघर का उपयोग कर निकल आया।

पर यहाँ भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है।

यहाँ स्नानघर के बाहर हिसाब करने बैठी महिला दक्षिण भारतीयों से न्यूनतम किराया ले रही है। मुझ जैसे उत्तर भारतीयों से दुगनी वसूली।

मैने इस बात पर विरोध किया। पास में बैठे कुछ तेलुगु युवक ये सब देख रहे हैं। दूर से ही आवाज लगाते हुए उन्होंने भी इस पर आपत्ति जताई।

किराया वसूली करने वाली काकी और इन युवकों की अपनी भाषा में बहुत तीखी नोक झोंक होने लगी।

काकी अपनी भाषा पर उनको लड़कों पर ही टूट पड़ी। उन्हें वसूली करने से रोकने पर अपनी झल्लाहट दिखाने लगी।

काकी काफी खिसिया गईं हैं और मुझसे बार बार और पैसा मांग रही हैं।

मेरे स्टेशन के अधिकारियों से इस विषय पर चर्चा की चेतावनी मात्र से ही चुप हो गईं।

उनके डर का आलम ये है कि जब साथी घुमक्कड़ स्नान कर बाहर आया तब उन्होंने न्यूनतम किराया लिया वो भी उन्होंने मांगा नहीं।

काकी का कहना ये है की जब वो लूट मचा रही हैं तो उनके तेलुगु भाषी के लोग उनका विरोध करने के बजाए साथ क्यों नहीं दे रहे।

उनके हिसाब से यही होना चाहिए था। की वो भेदभाव कर लूट मचाएं और अपनी जेब भरें। उनके खिलाफ कोई आवाज भी ना उठाए।

पौष्टिक आहार

देखा जाए तो भारतीय रेलवे स्टेशन अत्यंत ही सुविधाजनक पड़ जाता है कई तर्को में। मुझे ये कल रात्रि ये आभास हुआ।

बैग ले कर वेटिंग रूम से बाहर निकल आया उन लड़कों का शुक्रिया करते हुए जिन्होंने मेरे लिए आवाज उठाई।

वारंगल में हजार स्तंभ मंदिर के बारे में बहुत सुन रखा है। बाहर निकल कर अमानती घर के बारे में पूछने पर पता लगा कि दाईं ओर सबसे किनारे स्थित है।

अमानती घर में पहले से कोई बैग जमा करा रहा है। जब मैं बैग जमा करवाने के लिहाज से मेज़ पर अपना बैग रखा तो यहाँ नई कहानी सुनने को मिल रही है।

बिना ताले के बैग जमा नहीं करा सकते ऐसा जमाकर्ता ने बोला। किसी तरह जमाकर्ता से आग्रह करने पर उन्हें मना लिया। इस वादे के साथ की कुछ ही घंटों की बात है।

दोनो बड़े बैग को चैन और बड़े ताले में बांध दिया कर रख दिया। सबके बैग अंदर रखे हुए है और मेरा बाहर ही।

अंदर रखने की बात बोल कर पर्ची कटी और मैं बाहर निकल गया।

स्टेशन से बाहर निकल कर देखने लगा क्या नाश्ता करना चाहिए। अगर नाश्ता करने में समय दूंगा तो काफी समय बीत जाएगा।

बाहर केले के भी दो चार ठेले हैं। दिन की हैदराबाद की ट्रेन को मद्देनजर रखते हुए परिसर के बाहर से उचित दाम में दर्जन भर केले ही खरीद लेता हूँ।

कुछ खाए बाकी बैग में डाल दिए। इंटरनेट पर स्टेशन से छह किमी दूर स्थित है हजार खंभों वाला ये मंदिर।

बस का तो कुछ अता पता नहीं। ठेले पर केला बेंच रहे दद्दू ने भी ऑटो से निकलने की सलाह दी।

ऑटो से ही निकल पड़ा मंदिर। आज यहाँ वारंगल में मंदिर और किला दो जगह चिन्हित की हैं घूमने के लिए।

ऑटो वाले को हजार स्तंभ मंदिर समझ ही नही आया। फोटो दिखाने पर समझा।

मंदिर से आगे चौराहे तक ले आया। जब नजर पड़ी आगे निकल आया हूँ तब रुकवाया।

उतर कर किराया थमाया और चल पड़ा वापस मंदिर। ये इलाका कुछ कुछ कानपुर के नवाबगंज जैसा लग रहा है।

हज़ार स्तम्भ मंदिर के बाहर खड़े ऐश्वर्य तिवारी

हज़ार स्तम्भ मंदिर

पैदल कुछ दूरी पर इस मंदिर के सामने आ गया। यहाँ बड़ा बोर्ड आर अंग्रेजी और तेलुगु भाषा में लिखा है।

राजा रुद्र देव ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था इसलिए इस मंदिर का नाम उन्हीं के नाम पर पड़ा।

रुद्रेश्वर स्वामी नाम से प्रसिद्ध यह मंदिर का फिलहाल कुछ ही हिस्सा शेष है।

इसमें एक हजार खम्भे है। आधुनिक इंजीनियरों ने इन सभी खम्भों को हटा दिया है।

परिसर के बाहर बड़ी बड़ी गाडियां और ऑटो खड़े है। इसी पता चलता है की लोग अब भी पूजा पाठ जारी रखे हुए हैं इस मंदिर में।

अन्यथा कई प्राचीन मंदिरों में ऐसा देखने में नहीं आया है। तस्वीर निकलवा कर अंदर निकल आया।

मंदिर की बाहरी दीवार पर बेहतरीन कारीगरी की गई है। जो हर खंभे पर देखी जा सकती है।

मंदिर इस तरह से निर्मित है मानो कोई विमान रखा हो। चारों ओर से बेहतरीन नक्काशी।

हर एक दीवार और खंभे को बेहतरीन ढंग से दर्शाया गया है। खंभों पर गणेश कार्तिकेय की मूर्ति उत्कीर्णित है।

हर सामने दिखी दीवार पर एक छोटा सा मंदिर है। जिसमे अलग अलग देवी देवता हैं।

इन उत्कीर्णित मंदिरों के अगल बदल द्वारपालों को पहरा देते दिखाया गया है।

इतने खरांचे बने हुए हैं की मंदिर को एक आकार के रूप में ढाला गया है। नीचे ऊपर उभरा हुआ और बीच में थोड़ा अंदर धसा।

अपना छोटा बैग ले कर मंदिर के दक्षिण भाग में आ गया। सिर्फ यही इकलौता मंदिर है।

बाकी के स्तंभों वाला मंदिर को और भी अंदर है जिसे बंद कर बाहर नो एंट्री का बोर्ड लटका दिया है।

मन्दिर में कई छोटे शिवलिंग भी मौजूद हैं। भक्त की आवाजाही से मंदिर में चहल बनी है।

जो देखने में आ रहा है वो ये की मंदिर में लोग शादी के रिश्ते लेकर अपने परिवाजनों समेत वर/वधू देखने आए हैं।

दोनो परिवार आपस में बात कर रहे हैं। लड़के को लड़की दिखाई जा रही है और लड़की को लड़का। ये भारत में आम बात है मंदिर में दिखाई। 

मैं जूते उतार हांथ दो कर दर्शन के लिए निकल पड़ा मुख्य गर्भ गृह में। मंदिर के अगल बगल धूल से भरा मैदानी इलाका है।

सीढी चढ़ ऊपर आ आ गया। यहाँ के खंभों की रचना बहुत अनोखी है।

हज़ार स्तम्भ मंदिर के स्तम्भ को समझने की कोशिश

सबसे नीचे आयताकार छोटी रचना। उसके ठीक ऊपर बड़ा वर्ग। बीच में गोलाकार फिर नीचे वाले से थोड़ा बड़ा आयताकार।

ऊपर जाते जाते गोलाई बड़ी हो गई है जो एक वर्ग से जा कर मिल रही है। गजब की बनावट है।

इन सभी खंभों के ऊपर बनी छत में भी काफी नक्काशी करी गई है। जो हर ओर से एक समान है।

जैसे आजकल की मशीनें काम करती हैं। सभी समांतर आकार की बनावट छोटे छोटे टुकड़े।

बाहर एक सज्जन में कुर्सी लिए प्रसाद का वितरण कर रहे हैं। अंदर की ओर प्रवेश कर गया। यहाँ बहुत अंधेरा है।

तेल से महक रहा है गर्भ गृह। यहाँ भगवान विष्णु की प्रतिमा है और साथ ही शिवलिंग भी।

शिवलिंग है तो नंदी बाबा भी होंगे। नंदी बाबा की बड़ी विशाल मूर्ति बाहर है।

द्वारपाल के रूप में स्थापित हैं गज। गर्भ गृह में आते ही आरती शुरू हो गई। मैं आरती में शामिल हो कर धन्य हो गया।

यहाँ शायद जानबूझ कर बिजली की कम व्यवस्था है। दीया से ही रोशनी कर रखा है।

आरती की थाली बाहर आ चुकी है। आरती को सिर पर फहराया और बाहर की ओर निकल पड़ा।

बाहर हांथ जोड़कर कुछ देर नंदी बाबा के पास बिताया।

मंदिर का चक्कर लगाने पर पता लग रहा है की मन्दिर एक तारे के आकार का है। जो की अद्भुत है।

मंदिर का चक्कर लगा कर दूसरी तरफ आ गया। दूसरी तरफ से मंदिर और भी न्यारा लग रहा है।

मंदिर परिसर पर सिंहासन के ऊपर ही कई लोग चक्कर लगा रहे हैं।

यहाँ लगे हैंडपंप से पानी निकाल कर अपनी प्यास बुझाई। बाकी के मंदिर के हिस्से को भी खोलकर उसकी मरम्मत कर जनता के लिए खोला जाना चाहिए।

मंदिर के बाहर लगे पत्थर के पाइप ये दर्शा रहे है की मंदिर में पानी भी भर जाए तो उसकी भी निकलने की व्यवस्था अव्वल दर्जे की है।

सिंहासन का निचला भाग ऐसा फूल पत्ती से सजा है मानो नीचे भी मंदिर है। मानो नीचे खजाना भरा हो।

इसे देख कर यही लग रहा है जितना ऊपर मंदिर निकल हुआ है उतना ही नीचे भी होगा।

पर्याप्त समय बिता कर निकलने लगा वारंगल किले की ओर।

हज़ार स्तम्भ मंदिर में द्वारपाल के तौर पर गज और नंदी

ऑटो या रेंटल ऐप

यहाँ से करीब बीस किलोमटर दूर वारंगल का किला है जो मंदिर से शहर के दूसरे छोर पर स्थित है।

ट्रेन भी दिन में है और किला तो देखना ही है।

सो किले के लिए निकल पड़ा। यहाँ से पहले स्टेशन जाना होगा उसके बाद स्टेशन से किले तक के लिए ऑटो मिलेगी।

मंदिर के सामने से ही स्टेशन के लिए बस आसानी से मिल गई।  गाने सुनते हुए छह किमी भी काट दिए।

मंदिर से स्टेशन तक का सफर तो ठीक रहा। अब बस अड्डे से निकलने के बाद स्टेशन के सामने से किले के लिए ऑटो मिलेगा।

पर सोच रहा हूँ रेंटल दुपहिया वाहन पर सवार हो कर निकल जाऊं।

ऑटो में बैठे बैठे रैपीडो ऐप से वाहन खोजने पर उपलब्ध मिल भी गया किले तक जाने के लिए। 

कुछ ही देर में अपरिचित नंबर से फोन आने लगा। शायद चालक का होगा।

अब जब दुपहिया वाहन के चालक ने आने के संकेत दिए तो ऑटो से उतर गया।

कॉल पर ना मुझे उसकी भाषा तेलुगु समझ आ रही है ना उसे अंग्रेज़ी समझ आए।

ये भी गजब खिलवाड़ है। काफी देर यही सिलसिला बरकरार रहा।

चालक जैसे तैसे गाड़ी ले कर आ भी गया। पर भाषा की असहजता को देखते और बढ़े हुए दामों को ध्यान में रख कर उसे वापस लौट जाने को कहा।

रैपिडो ऐप पर भी चालक को मना कर के उसे वापस लौटा दिया। ऐप पर पहले तो सस्ते में दिखा रही थी अब महंगा कर दिया है।

कुछ देर में मैंने दूसरा वाहन आरक्षित कर लिया।

समस्या इस दुपहिया चालक के साथ भी यही है भाषा संबंधित लेकिन थोड़ी कम। इनके साथ महंगे किराए की समस्या है। इनकी भी यहाँ से चलता कर ऑटो का रुख किया।

बेहतर है इतनी धूप में ऑटो से निकल जाऊं। कम से कम सिर पर छत रहेगी।

ऑटो का रुख करने लगा। पास में ऑटो स्टैंड में से एक ऑटो बिलकुल अभी अभी भरकर निकल गया।

अब एकदम खाली ऑटो में बैठना पड़ रहा है। फिर इसके भरने का इंतजार करो। ना जाने कितना समय लगेगा!

एक के बाद एक सवारियां आती गईं। समय से ऑटो भर गई है। पर इतनी भीषण गर्मी में ठूस ठूस के सवारी भरने का क्या तात्पर्य है?

चालक पीछे चार और आगे तीन सवारी बैठाई हुई हैं।

वारंगल किले का वो हिस्सा जहां किसी को जाने की अनुमति नहीं

ध्वस्त वारंगल किला

किले पर पहुंच कर और भी अचरज हुआ। क्योंकि यहाँ तो किले जैसा कुछ भी नजर नहीं आ रहा है।

ध्वस्त हो चुके किले की दूर दूर तक कहीं परछाईं नजर नहीं आ रही।

आंध्र प्रदेश सरकार को इसके पुनः निर्माण पर विचार करना चाहिए।

भारत में ऐसी कई धरोहरें है जिनको वक़्त रहते सहेजा जा सकता है अगर सरकार चाहे तो। पर्यटन बढ़ेगा तो रोजगार भी अवश्य बढ़ेगा। 

खिड़की से टिकट ले कर प्रवेश किया। आश्चर्य की बात है की एक पहाड़ी का किले के नाम पर टिकट पड़ रहा है।

किले के भीतर पार्क जैसा बना हुआ है। बच्चों के लिए झूले लगे हैं। और मेरे लिए पहाड़ी पर चढ़ने का लक्ष्य।

आगे लगे इतिहास के बोर्ड पर लिखा है कि आठवीं शताब्दी तक यादावा राजाओं का शासन रहा जिसके बाद बारहवीं शताब्दी में काकतिया साम्राज्य आया।

किले पर दो हमले अलाउद्दीन खिलजी ने करवाए। पहले हमले में उसका सेनापति वारंगल पर एक लाख सैनिकों के साथ टूट पड़ा था।

ठीक आठ साल बाद सनकी अलाउद्दीन ने फिर हमला किया। लेकिन बचा कुचा किला तुगलक का तीसरा हमला ना झेल सका और हमेशा के लिए यह किला मिट्टी में विलीन हो गया। किले के साथ हजार स्तंब मंदिर का सर्वनाश करवा दिया

अलाउद्दीन खिलजी भारत के इतिहास का वो धब्बा है जिसे मिटाया नहीं जा सकता।

पहाड़ी पर बने मंदिर के पास ऐश्वर्य तिवारी

सामने दिख रही पहाड़ी पर एक छोटा सा मंदिर है। फटाफट सीढ़ियों पर चढ़ कर ऊपर आ गया।

मंदिर तो चालू नहीं लग रहा है। आसपास पसरा सन्नाटा देख कर यही लग रहा है।

यहाँ पहाड़ी पर तो शादी का फोटोशूट चल रहा है। शादीशुदा जोड़े को बिना परेशानी दिए आस पास का इलाका देखने को मिल रहा है।

पहाड़ी से दूर दूर तक किले की दीवारें नजर आ रही हैं। कभी ये किला तीन स्तर पर हुआ करता था।

दुश्मन को अंदर घुसने के लिए तीनों स्तरों से हो कर गुजरना पड़ता जो की संभव नहीं था। इसी कारण इस किले को भेद पाना मुश्किल रहा।

लेकिन जब घुसबैठ हुई तो पूरे ही साम्राज्य का सर्वनाश हो गया।

तो धांसू और आंध्र प्रदेश सरकार इसे और धांसू बना सकती है।

मंदिर के पास भी प्रेमी जुगल बैठा हुआ है। मंदिर में ना तो पूजा होती है ना पाठ।

पास में बने निगरानी स्तंभ की तरफ चल पड़ा। जहाँ उस काल में सैनिक पहरा दे कर लोगों को सचेत करते होंगे।

सकरी सीढ़ी से चढ़ कर ऊपर आ गया। यहाँ भी रेलिंग लगा रखी है जैसे नीचे पहाड़ी को रेलिंग से सुरक्षित बनाया है।

पहाड़ी के सामने दिख रहे तालाब में भी कुछ चट्टाने पड़ी हुई हैं। तालाब के बीचो बीच एक बेहद ही छोटा द्वीप जिस पर नारियल का पेड़ है।

तालाब में खड़ी नाव को देख कर कहा जा सकता है की मोटर नाव की सैर कराई जाती होगी पर्यटकों को।

करीब आधा घंटा गुजारने के बाद नीचे की ओर चल पड़ा। पार्क से बाहर निकलते हुए सामने बना दूसरा पार्क दिख रहा है।

वारंगल किले के अवशेष जिन्हे देखने का टिकट है

जाली से झांकने पर अवशेष दिखाई पड़ रहे हैं। जिनको जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।

पास में लगे भुट्टे की दुकान से भुट्टा खरीद कर चबाने लगा।

अब जब वापस जाने की बारी अाई तब एक भी ऑटो नहीं है। यहाँ आना तो आसान है लेकिन यहाँ से जाना मुश्किल दिखाई पड़ रहा है।

रेंटल वाहन भी ‘ढेढ़ सौ रुपिया लेगा’ ऐसा दिखा रहा है।

पास खड़े एक ऑटो वाले से बात करने लगा स्टेशन तक चलने की।  महाशय चाह रहे है पूरा ऑटो बुक करवा लूं।

जब मैंने खुद रेंटल गाड़ी की मदद से जान की बात रखी तो आ गया ऊंट पहाड़ के नीचे।

अब प्रति सवारी के हिसाब से मान गया। ऑटो से निकल पड़ा। रास्ते भर किले के अवशेष दिखाई पड़ रहे हैं।

रुक कर तस्वीरें भी निकलवाता चल रहा हूँ। इससे इस बात का अंदाज़ा लगाया जा सकता है की ये किला कितना बड़ा रहा होगा।

वारंगल स्टेशन

समय से स्टेशन पहुंच गया। हैदराबाद जाने के लिए टिकट कल ही आरक्षित करवा लिया था। जिससे अभी सुविधा हो रही है।

अमानती घर से पर्ची दिखा कर बैग लिया। बैग जस का तस वहीं रखा है। जमाकर्ता ने ना जाने अंदर क्यों नहीं रखा।

ताला खोल कर चैन खोली और बैग में ही दोनो चीजें ऐसे ही डाल लीं। प्लेटफार्म संख्या चार पर ट्रेन खड़ी है।

अचानक मूसलाधार बारिश ने भी दस्तक दे दी है। पैदल पुल के रास्ते चार पर आ गया।

भीगते हुए ट्रेन में चढ़ हैदराबाद के लिए एक नए सफर पर निकल पड़ा।

वारंगल स्टेशन से हज़ार स्तम्भ मंदिर से वारंगल किला तक का कुल सफर 35km

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