जान हथेली पर लेके पहुंचा दामचरा

भारत | त्रिपुरा | दामचारा

अगरतला से अलविदा

कल दिनभर की घुमक्कड़ी जहाँ एक ओर उज्यांता महल और शाम को नीर महल। अगरतला में इतना काफी है मेरे लिए। मगर उत्पल जी चाहते हैं की हम भारत बांग्लादेश सीमा पर बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी भी देखें।

साथी घुमक्कड़ ने आगे बढ़ने का फैसला कर लिया है। हालांकि उत्पल जी ये भी चाह रहे थे की हम उद्यानगरी की गुफाएं जरूर देखने जाएं। जिनके ऊपर रहस्यमई आकृतियां मौजूद हैं।

आज सुबह से ही हल्की हल्की बारिश हो रही है। इसी बारिश में मैने तय किया निकलने का। सुबह नहा धोकर कर बैठा ही था इतने में उत्पल जी हमें बस अड्डे तक छोड़ने के लिए अपने घर से ऑफिस आ गए।

बारिश में सारा सामान गाड़ी में लादा और निकल पड़ा अड्डे पर। जब से कार में सवार हुआ हूँ तब से उत्पलभी ना जाने का आग्रह कर रहे हैं। और बार बार गाड़ी वापस लेने की बात भी कर रहे हैं।

ऐजवाल पहुंचने के लिए अगरतला से दो तीन जगह रुकना पड़ेगा। जिसके लिए बस अड्डे से सिलचर तक के लिए या उसके नजदीक इलाके तक बस पकड़नी पड़ेगी।

बूंदा बांदीके बीच उत्पल जी ने समय रहते बस अड्डे पर पहुंचा दिया। उन्होंने भी कुछ जरूरी काम आ गया इसलिए बस अड्डे पर छोड़ना हुआ और कुछ तस्वीरें ही खिंचवा कर निकल गए। इस वादे के साथ की दोबारा मिलेंगे।

उत्पल के साथ लेखक और साथी घुमक्कड़

अभी सुबह के साढ़े दस बज रहे हैं। पूछताछ काउंटर पर पता करने पर मालूम पड़ा कि पानीसागर के लिए यहाँ से इकलौती बस है जो बारह बजे आएगी।

जब तक बस नही आती तब तक पेट पूजा हो जाए। बस अड्डे पर ही एक खाने पीने की दुकान दिख रही है। यहाँ दलमोथ बिस्कुट के अलावा चाय कॉफी भी है।

पर भोजन नहीं है, जिसकी अभी आवश्यकता है। भोजन ना सही चाय पूड़ी ही बेहतर रहेगा बिस्कुट से। हालांकि बस अम्बासा में जरूर रुकेगी पर कब ये नहीं पता।

चाय पूड़ी ही ऑर्डर करना पड़ा और  कुछ देर में आ भी गया। कमरे से ही बाहर भी झांक ले रहा हूँ की कहीं बस जल्दी ना आ जाए और मैं नाश्ता करता रह जाऊं।

सवारियां भी धीरे धीरे एकत्रित हो रही हैं अगरतला से अलविदा लेने के लिए। वीरान इस बस अड्डे में नाश्ता भी वीरानों जैसा है। समापन और भुगतान के बाद बैग उठा कर इंतजार करने लगा बस का। ठीक बारह बजते ही बस का हॉर्न सुनाई पड़ा।

अगरतला से अलविदा लेने का समय आ चला है। एक नए शहर और राज्य की ओर मिजोरम। भारत का अनछुआ राज्य जो किसी जमाने में केंद्र शासित प्रदेश रह चुका है।

शुरू हुआ लम्बा सफर

सिर्फ मिजोरम ही नहीं बल्कि पूर्वोत्तर भारत के कई राज्य केंद्र शासित थे। बस के किनारे आते ही मैं बैग उठा कर चढ़ गया। शुक्र है बस में खाली सीट है।

पर इस जोरदार धूप में कैसे पूरा होगा ये सफर कहना मुश्किल है। तकरीबन आधे घंटे सवारियों के इंतजार में यूं ही खड़ी रही ये बस। इस बीच कुछ सवारियां भी आईं और बस मजे की भर गई है। साढ़े बारह बजते ही चल पड़ी।

घने जंगलों से गुजरते हुए डेढ़ घंटे में हम अंबासा पहुंच गए। यहाँ सवारियों को सांस लेने के लिए कुछ देर का समय दिया गया है। पर अगरतला बस अड्डे के जैसा ही यहाँ भी वीरान।

आसपास ठेला लगाए कोई फल बेंच रहा है तो कोई चाय पकोड़े। जिनको यहाँ उतरना था वो निकल गए अपनी मंजिल। भद्दर गर्मी में मैने से नीचे उतरना ही सही समझा।

नजर पड़ी ठेले पर तो आ गया कुछ खरीदने। कुछ बिस्कुट खरीद कर बैग में डाल लिए। साथ ही चखा अनानास फल। जिसका स्वाद अत्यंत ही लजीज। इतना की एक से मन न भरा तो एक प्लेट और मांगा लिया।

व्यवस्था चरमराई हुई है। साफ सफाई तो नाम मात्र की भी नहीं। सौंचलय है पर बंद। चाभी किसके पास है पता नहीं। इसलिए सौंचालाय के बाहर ही सब कचरा कर रहे हैं चाहें आदमी हो या औरत।

खाली खड़े ऑटो

बस में सवारियों के भरते ही बस दोबारा निकल पड़ी। अंबासा के बाद अब जहाँ उतरना है वो है पानीसागर जहाँ से दामचारा पहुंचना है। जहाँ से कल सुबह ऐजवाल निकल जाना है।

एक जनाब अपने साथ दस टोकरी लेके लद गए। जिसके बाद तो वो आफत फैलाई है अन्य सवारियों के लिए जिसके लिए शब्द ही नहीं।

उथल पुथल सड़क पर ड्राइवर भी बस ऐसे लिथाड़ते हुए चला रहा है जिसके कारण सवारियां अपनी सीट छोड़कर इधर उधर गिरती नजर आ रही हैं।

एक तो जरा सी सीट जिसमे तिरछे हो कर बैठने में ही फिट हो पा रहा हूँ उसमे भी बस हवा में उड़ रही है। लगता है आज घुटने टूट जाएंगे।

ऐसे उछलते हुए आज का दिन बीता। धीरे धीरे अंधेरा भी छाने लगा। शाम होते होते मंजिल भी आ ही गई। सुबह का निकला और अब अंधेरे में पहुंच रहा हूँ।

अगरतला छोड़ कर अच्छा तो नहीं लग रहा है पर आगे तो बढ़ना ही है। वो भी तब जब कंडक्टर ने याद दिलाया उतरने के लिए।

पानीसागर में ऑटो के लिए मारामारी

बैग लेके उतर तो गया अब देखना है की दामचरा जाने के लिए कोई वाहन मिल जाए।

इसी मंशा से मैं तिराहे को पार कर के बाजार के इस तरफ आया जहाँ कई सुमो खड़ी हुई हैं। पर इस समय दामचरा जाने के लिए कोई भी तैयार नहीं है।

खासतौर पर सवारी ढोने वाली आखिरी सुमो छह बजे निकल जाती है। अभी वक्त हो चला है शाम के सात। जो इक्का दुक्का वाहन जायेंगे भी तो उनका किराया आसमान छू रहा है।

आधा घंटा तो यूं ही गुजर गया ऑटो और सुमो के चक्कर लगाते हुए। पर बात कहीं भी ना बनी। अंधेरा और बढ़ गया है। तिराहे पर दिख रहे ढाबे पर पूछताछ करने पर भी कुछ ठोस जानकारी ना मिल सकी।

थकान मिटाने के लिए इसी ढाबे में चाय पर चर्चा हुई पर उसमें कोई निष्कर्ष ना निकल सका। भूंख के चलते इन्ही महाशय के यहाँ से कुछ मीठा बंधवा लिया।

ताकि दामचरा पहुंच कर खाया जा सके। पर दामचरा पहुंचने के आसार दिख नहीं रहे। इसलिए ये मीठी गुझिया यहीं गप्प कर गया।

पीछे रेलवे स्टेशन भी है। खयाल तो यही आ रहा है की यहीं सो जाऊं। किसी ने बताया की कल मंगलवार है इसलिए दामचरा में बाजार लगता है जिसके कारण सुमो गाड़ी नौ बजे तक निकलेगी।

यहाँ ठहर भी जाऊं तो सुबह कितनी जल्दी यहाँ से निकलना होगा की दामचरा से ऐजवाल जाने तक का वाहन पकड़ा जा सके। इस विचार पर स्थानीय निवासी संतुष्ट ना दिखे।

उनकी नजर में अगर एक रात पहले पहुंच जायेंगे तो सुमो का मिलना भी तय है। पर ऐसे सुबह हड़बड़ी में निकलना खतरा हो सकता है।

अब जब ये स्तिथि बन आई है तो मजबूरन आज के आज ही पहुंचना होगा। यहाँ अभी जो इक्का दुक्का वाहन दिख रहे थे अब वो भी नहीं है।

त्रिपुरा पुलिस ने की सहायता

साथी घुमक्कड़ के सुझाव पर हम पुलिस स्टेशन की ओर बढ़ने लगे इस उम्मीद से की यहाँ से कोई मदद मिलेगी। कुछ सौ मीटर की दूरी पर पुलिस स्टेशन पर बैग लेके आ पहुंचा।

स्टेशन में दाखिल होता इससे पहले सीआरपीएफ के जवान ने रोक लिया। उनको सारी कहानी सुनाई तो उनका बस यही कहना था की अगर कोई लड़ाई या जूडो कराटे में महारथी हो तो ही खतरा मोड़ ले कर दामचरा जाना।

बतौर ये पूर्वोत्तर भारत में करीब बीस साल से तैनात हैं। ऊंच नीच छोटी बड़ी हार तरह की लड़ाई लड़ी। इसलिए संभाल कर रहने की सलाह दी खासतौर से लड़कियों से दूर रहने की भी।

हवलदार से बात करके जब हमें अंदर जाने की अनुमति मिली तब थाने में बैठे कुछ पुलिस ले लोग दिखे। पर इनमे से अफसर एक भी ना था।

पुलिस कर्मियों को स्तिथि का ब्योरा दिया और दरख्वास्त की हमें यहाँ रुकने की। पर सुरक्षा कारणों के चलते ऐसा ना हो सका। इसके उलट एक सब इंस्पेक्टर ने हमें दामचरा पहुचाने का बीड़ा उठाया।

आधे घंटे चली इस चर्चा में सब इंस्पेक्टर देब बर्मा ने एक गाड़ी का इंतजाम कराया। इस गाड़ी का चालक पुलिस के करीबी है। फोन पर ही सारी व्यवस्था कराते हुए दामचरा में रुकने का प्रबंध भी कराया।

जब सारे प्रबंध हो गए तो एक रेस्त्रां में हमें भोजन के लिए आमंत्रित भी किया। शायद पुलिस के द्वारा इतनी मदद के बाद पुलिस के प्रति सम्मान और नजरिया दोनो ही बदल गया।

ये मेरी और देब बर्मा जी की आखिरी मुलाकात थी। भरपेट खाना खाने के बाद चालक अपनी गाड़ी ले आया जिससे हमें अब दामचरा निकलना होगा।

जब सारा सामान गाड़ी में रखा और कुछ सफर तय किया तब चालक ने यहाँ के किस्से कहानियां बयां करनी शुरू की। जैसे एक बार अंधेरी रात में इसी रास्ते पर एक बेटे ने अपने पिता को अनजाने में पुलिस वाला समझ कर गोली चला दी थी जिसके बाद उनकी पिता की मौत हो गई थी।

चालक टूटी फूटी हिंदी में किस्से सुनाता जा रहा है और इस अंधेरे रास्ते में डर बढ़ता जा रहा है। कुछ किमी पर सुरक्षा के लिए चौकी है जहाँ हर गाड़ी को रोक कर तलाशी ली जा रही है।

इधर जहाँ पहले मैं निश्चिंत होकर सफर कर रहा था अब किस्से सुनने के बाद लग रहा है मंजिल तक जितनी जल्दी पहुंची उतना अच्छा है। एक के बाद एक दूसरी चौकी भी आई और वहाँ भी टॉर्च की रोशनी में जांच हुई। नक्सली प्रभावित ये इलाके पुलिस के कब्जे में हैं और कुछ नक्सली के।

अब ड्राइवर भी चुप है और हम भी। कामना है तो बस उस गेस्ट हाउस तक पहुंचने की जहाँ पर देब बर्मा जी ने आज की रात का ठहरने का इंतजाम करवाया है।

अंधेरे में कार कहाँ को चली जा रही है इस बात से मैं बिल्कुल अनजान हूँ। बस इतना समझ आ रहा है कार कभी सीधी तो कभी दाएं बाएं मुड़ रही है।

आखिरकार एक लंबी मोड़ से मुड़ते हुए एक घर के बाहर ला कर गाड़ी खड़ी कर दी। पुलिस की पहचान के चालक थे इसलिए सुरक्षित यहाँ तक भरोसा करके आ पहुंचा।

अनजान कोई और सुमो से आता तो जा जान कहाँ को जाता।

अगरतला से पानीसागर से डामचरा तक की कुल यात्रा 200किमी

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