ग्यारह हजार मंदिरों का शहर

उत्तर प्रदेश | भारत | वृंदावन

बदली योजना

रात में एक दफा नींद खुलने पर देखने लगा की मोबाइल कितने प्रतिशत चार्ज हो गया है। समय हुआ होगा कुछ तीन बजे। मोबाइल पूरा चार्ज हो गया था। निकाल कर अलग रख दिया।

पर फिर उसके बाद टुकड़ों में ही नींद आई। सुबह उठकर मथुरा निकलने की तैयारी करने लगा। मालूम पड़ा की पवन(सामुदायिक मित्र) की हालत रात में ज्यादा बिगड़ गई थी। जिस कारण घरवालों को उसे अस्पताल ले कर भागना पड़ा था।

चिंता का विषय है। फिलहाल तो पवन सो रहा है। मेरे ख्याल से ज्यादा समय ना लेते हुए मथुरा निकलना चाहिए। उधर मैने मथुरा में सामुदायिक मित्रों से आने की बात कर ली है।

स्नान कर मैं एकदम तैयार हो गया। कपड़े और अन्य सामान बैग में रख कमरे के बाहर निकल आया बैग सहित। कुछ देर में माताजी ने नाश्ते में हलुआ और भैंस का ताजा दूध परोसा।

इधर नाश्ता पूरा कर के ही बैठा था की कमरे से पवन निकल आया। अब उसे देख कर लग रहा है तबियत कुछ ठीक है। चर्चा छिड़ गई की आज यहीं रुक जाऊं और पास में जंगल और खेत का भ्रमण कर लूं।

अंतः यही कर रहा हूँ की आज यहीं गांव की हवा लूंगा और कल सुबह जल्दी ही निकल जाऊं ताकि मथुरा वृंदावन में घूम सकूं अच्छे से। अपने वृंदावन के मित्रों को भी इस बारे में सूचित कर दिया।

पवन अपने पिता के साथ चिकित्सक को दिखाने निकल गया है। इधर मैं अपने कुछ पिछले लेख लिखने में जुटा हूँ। आराम करने लगा।

हेमंत के पास फोन आता है जिसके माध्यम से मुझे पता चला की पवन अस्पताल में ही भर्ती हो रहा है। तुरंत योजना में परिवर्तन करते हुए मैं भी निकलने की तैयारी करने लगा।

रात बीती करौली गांव में

इधर हेमंत ने अपने मित्र की गाड़ी तैयार करा कर मुझे करावली तक पहुँचने की व्यवस्था कर दी। गाड़ी में बैठ कर दो किमी दूर टेंपो स्टैंड आ गया।

यहाँ से हाईवे तक का साधन मिलेगा। ऑटो भरने में तो अभी काफी वक्त लगेगा। बेहतर रहेगा की लिफ्ट लेते हुए मथुरा पहुँच जाऊं।

एक एक बाद एक दो दुपहिया वाहन के माध्यम से मैं मथुरा जाने वाले सीधे मार्ग पर आ खड़ा हुआ। जो एकदम सुनसान है। है तो सिर्फ एक चश्मे का ठेला। जहाँ तगड़ी बिक्री हो रही है।

लिफ्ट की उम्मीद तो बिलकुल भी नहीं लग रही। कोई ऑटो ही मिल जाए वही पर्याप्त होगा। कुछ दूर ही चला होऊंगा की एक लोडर आता दिखा।

पुल पार तक के लिए बैठ गया। चालक ने बताया की वो मथुरा तक जायेंगे तो मैं भी अब इसी वाहन में मथुरा में ही उतरूंगा। कुछ दूरी तय करने के बाद दूसरे पुल से एक और सवारी लद गई।

वृंदावन में भटकना

भीषण जाम और गर्मी में किसी तरह मथुरा आ पहुँचा। यहाँ से लिफ्ट लेते हुए वृंदावन जाने की तैयारी है। वृंदावन में अपने मित्र के पास जो पिछले डेढ़ साल से यहीं पर निवास कर रहे हैं।

एक मोटर गाड़ी से कुछ दूर तक। पर अब गूगल नक्शा अजीबोगरीब मार्ग दिखा रहा है। मुझे वापस जाना पड़ रहा है मोटर गाड़ी से उतर कर।

विपरीत दिशा में चलते हुए दूसरी मोटर गाड़ी में सवार हो गया। अब सही रास्ते पर जा रहा हूँ। पर चालक बता रहे हैं की वृंदावन जाने के लिए हाईवे ही सही रास्ता था।

ये भाईसाहब अपने बच्चे को लेने स्कूल जा रहे हैं। सौ साथ में मुझे भी ले जा रहे हैं। वापसी में ये मुझे वहाँ तक छोड़ देंगे जहाँ से मुझे वृंदावन के लिए साधन मिल जाएगा।

पतली गलियों से होते हुए एक अनभिज्ञ विद्यालय उसके बाद वापसी करते हुए हाईवे पर उतार कर खड़े रहे जब तक मुझे वाहन ना मिल गया।

साधन तो ना मिला दूसरी मोटर गाड़ी पर सवार हो निकल पड़ा छटीकरा, वृंदावन। मित्र द्वारा दिए गए पते पर पहुँचने की कोशिश में साधन में सवार हो गया।

वृंदावन फाटक

आधे अधूरे पते की तरफ बढ़ते हुए परिक्रमा मार्ग की ओर बढ़ने लगा। आखिरकार बिजली रिक्शा में बैठ कर परिक्रमा मार्ग में ही गोल गोल घूमते हुए अट्टल्ला चौराहा पार करते हुए नीम करोली मंदिर के भी आगे निकल गया।

आसपास लोगों से रसियन घर पूछने पर भी नहीं मालूम पड़ा की घर आखिर है कहां। कालीदेह पूछने पर मालूम पड़ा की अभी दूर जाना होगा। मैं काफी विपरीत दिशा में आ गया हूँ। हालांकि ये भी यमुना के पास है और कालिदेह भी।

पहले अट्टल्ला तक फिर अट्टल्ला से कुछ दूर कालीदेह के लिए ऑटो मिल गया। इधर मैं यही सोच रहा हूँ की मित्र अगर सीधे जगह सांझा कर देता तो शायद बहुत ही आसान पड़ जाता पहुँचना।

तेज धूप, भूख से हाल बेहाल है। बस किसी तरह घर पहुँचना है। कालीदेह पहुँचकर रशियन घर पूछा तो इशारे में किसी ने यमुना की ओर जाने को कहा।

पैदल चलने की क्षमता तो है पर अब कोई जोखिम नहीं उठाना चाहता। इसलिए रिक्शे में ही बैठे बैठे ही घर की चौखट पर ऊबड़ खाबड़ रास्तों से आ गया।

मित्र मैरी को फोन घूमा कर बताया। अभी तक उसे हर जगह की तस्वीर खींच खींच कर भेज रहा था। ये सुनिश्चित करने के लिए की सही जगह हूँ या नहीं।

गौशाला में व्यतीत हुआ समय

बाहर आई साड़ी में महिला को देख कर लगा ये मैरी है। पर वो नहीं थी। गुलाबी रंग में दुबली पतली मैरी आई। कमरे में बैग रख इमारत में मैरी ने मुझे रात के लिए सोने की जगह दिखाई। कुछ देर में हम निकल गए भोजन के लिए।

आज मैरी के लिए थोड़ी देर हो गई है। देखते हैं भोजन प्राप्त होता है या नहीं। पहले जब सुबह आ रहा था तब मैरी की दूसरी योजना थी। बाद में जब मना कर दिया तो मैरी ने भी अपनी योजना बदल ली।

पर अंत में जब आना तय हुआ तब किसी मित्र से मिलने की योजना बन गई। पर मुझे आने में ही इतनी देर हो गई की सारी की सारी योजनाएं धरी की धरी रह गई। बातों बातों में दो किमी का सफर पैदल ही तय कर आश्रम पहुँच गए।

चौथी मंजिल पर पहुँच कर भोजन ग्रहण करने बैठ गया। यहाँ भी गुरुद्वारे जैसा चलन है। अपना उठाओ अपना बर्तन खुद धो। खाने के लिए सैकड़ों लोग उपस्थित हैं।

देसी विदेशी दोनो समुदाय के लोग खाना परोसने में जमकर हिस्सा ले रहे हैं। खाने में कड़ी, दाल रोटी चावल। भोजन कर बर्तन धो कर रख वापस नीचे आ गया।

खाते वक्त जूते की चिंता थी। पर वापसी में मिल गए। भोजन कर हम पास के उद्यान में आ गए कुछ देर के लिए सुस्ताने। जो की इसको का हो उद्यान है।

कुछ वक्त बातों में बीत गया। प्यास लगी तो आसपास की जगह देखने में आई। यहाँ गौशालाएं भी हैं जिन्हें अलग अलग नाम दिया गया है।

पानी की खोज में मुलाकात हुई एक विदेशी बच्ची से। जो साफ शुद्ध हिंदी बोल रही है। इनका जन्म ही यहीं हुआ होगा जिस कारण इतनी स्पष्ट हिंदी इस बच्ची के मुख से निकल रही है।

पता लगा की कार्यालय के केबिन में ही पानी मिलेगा जो गौशाला के पास है। यहीं पर आ कर जूते बाहर उतार के भीतर बैठे सज्जन से अनुरोध कर जल ग्रहण करने को मिला।

बाहर आने पर मुलाकात हुई सज्जन से जो रहने वाले राजस्थान के हैं पर यहाँ सांसारिक मोह माया त्याग कर जीवन गुजार बसर का रहे हैं।

इस्कॉन गौशाला

उद्यान में पहुँच कर मैरी से भी मिलवाया। और ये महाशय यहीं से चलता हो गए। बंदर और वृंदावन का अजब मेल है। बंदर यहाँ बहुत ही उतपाती हैं।

किसी का चश्मा छीन लेंगे तो किसी का मोबाइल तोड़ देंगे। जब तक उन्हें खाने को ना दिया जाए तब तक वापस नहीं करेंगे सामान। वापसी भी तभी जब फ्रूटी दी जाए।

वापस गौशाला की ओर चल कर कुछ समय जानवरों के साथ व्यतीत करना उचित लग रहा है। यहाँ पर रह रहे जानवर भी बहुत ही शांत चित्त हैं।

जो अमूमन नहीं देखा जाता है सड़को पर घूमने वाले जानवरों में। फिर वो गाय हो या बैल। पास खड़े होने पर सब अपने को स्नेह कराने के लिए बेताब हैं।

कालीदेह,  शाहजी मंदिर

शाम हो चुकी है और धूप भी ढल चुकी है। बेहतर रहेगा अब यहाँ के मंदिरों में घूमने निकला जाए। इस्कॉन के परिसर से बाहर निकलते हुए हम कालीदेह रवाना हो गए।

कहा जाता है की किसी काल में कालीदेह तक यमुना हुआ करती थी जो अब सिकुड़ते हुए बहुत कम रह गई है। पैदल ही कालीदेह मंदिर आ पहुँचा।

यहाँ दो कालीदेह मंदिर है एक नया और दूसरा पुराना। पुराने मंदिर में प्रवेश करते हुए सीढ़ी से उतरने पर कालिया नाग की मूर्ति दिख रही है जिसके ऊपर कृष्ण नाचते हुए नजर आ रहे हैं।

बरगद के पेड़ तक चक्कर लगा कर निकल पड़ा निधिवन। जो की मंदिर है। कुछ ही आगे मिला पुरानी टंकी जहाँ तक यमुना बहा करती थी।

पतली गलियों से होते हुए शाहजी मंदिर आ गया। यहाँ लगे भीषण द्वार की तस्वीर मैरी लेने लगी। इन्हे भारतीय शैली के बने दरवाजों की आकृति बहुत ही लुभाती है।

वानर सेना हर जगह है। इसलिए यहाँ भी सचेत रहना होगा। खासतौर पर जूते और मोबाइल को ले कर। ये गया तो फिर ना जाने कहां तक भागना होगा।

मैरी का यहाँ अक्सर आना होता है। तय हुआ की वो बाहर ही बैठ कर जूते की तकवाही करेगी तब तक मैं झटपट मंदिर में दर्शन कर आता हूँ।

शाहजी मंदिर लखनऊ के सेठ शाह कुंदन लाल द्वारा निर्मित करवाया गया था। जिसका कार्य 1876 में पूरा हुआ था।

बंदरों की वजह से तस्वीरें निकलना संभव कम दिख रहा है। मंदिर की बनावट बहुत्वी भिन्न है। सामने फव्वारा लगा है जो फिलहाल बंद है। बंदरों का झुंड हर जगह है।

मंदिर में राधा रमण की मूर्ति बीचों बीच है। मुझे लगा पीछे की ओर भी मंदिर होगा पर ये इतना ही बड़ा है। दाएं बाएं दुर्गा और शिव की मूर्ति है।

तस्वीर लेने का मन तो है पर संभव नहीं। दर्शन कर बाहर निकल आया। मैरी को मोबाइल पकड़ा कुछ तस्वीरें निकलवाई ही थीं की वानर सेना उसके पीछे से हमला करने की फिराक में है।

शाहजी मंदिर

मोबाइल अपने कब्जे में कर यहाँ से निकलना बेहतर समझा। बगल में जूते जमा कराने वाली की दुकान है जो जालियों से ढकी हुई है शायद इन्ही बंदरों की वजह से।

बाहर निकलते हुए दरवाजे को निहारने लगा जो हुबहू रूमी दरवाजे की शकल में है। हो भी क्यों ना आखिर लखनऊ के सेठ द्वारा बनवाया गया ये मंदिर है।

लस्सी के बहाने बगल की गली में मुड़ गए। यहाँ एक एक लस्सी गपकने के बाद इन्ही के यहाँ जूते रखवा दिए। ताकि सुकून से बिना जूते की चिंता किए बगैर निधिवन घूम सकूं।

निधिवन

भुगतान कर अगली गली में मुड़ गया निधिवन के सामने। यहाँ हर गली में कोई न कोई मंदिर मिल ही जाएगा।

कहा जाता है की संगीत सम्राट रसिक शेखन स्वामी श्री हरिदासजी की यह साधना स्थली रही है। स्वामी जी और अन्य अनेक आचार्यों की समाधियाँ यहाँ विद्यमान हैं।

स्वामी जी ने जीवन पर्यन्त इसी वन में निवास किया था। जन श्रुति है कि इस रमणीक वनस्थली में श्री कृष्ण राधा रानी ने विभिन्न क्रीड़ाएं की थी।

यहाँ श्री बाँके बिहारी जी का प्राक्टय स्थल है जहाँ एक कुँज से उनका श्रीविग्रह प्रकट हुआ था। उसके समीप रंग महल में। श्रीश्यामा कुँजबिहारी जी की नित्य बिहार लीला होती है।

निकट ही ललिता कुण्ड है। जन श्रुति है कि मुगल बादशाह अकबर ने तानसेन के साथ यहाँ आकर स्वामी हरिदास जी के दर्शन किये थे।

सीढी चढ़ मैं भीतर दाखिल हो चला। यहाँ पूरा इलाका और मार्ग बांस की जाली से ढका हुआ है। ताकि बंदर का आतंक भक्तों को ना झेलना पड़े।

अंदर बने राधा मंदिर और फिर आगे इसी तरह कोई ना कोई मंदिर आता गया और मैं दर्शन करता गया। यहाँ पुजारी बहुत सारे हैं। जो साथ चल रहे हैं उनके पास बहुत से भक्त हैं और सबको कथा सुनाते जा रहे हैं।

अंत में आ निकला आंगन में जिसके आसपास संतो की समाधि है। कहते हैं आधी रात को यहाँ संत आ कर नाचते हैं। पंडितो के अनुसार जो यहाँ नाचता है उसके जीवनभर के लिए कष्ट से मुक्ति मिल जाती है और जीवन हसी खुशी बीतता है।

हास्यास्पद है पर लोग नाच रहे हैं। प्रस्थान कर बाहर निकल आया। लस्सी की दुकान से जूते उठाए और चल पड़ा यमुना नदी को ओर आरती में शामिल होने।

रास्ते में देखने को मिल रहा है कैसे बंदर ने एक आदमी का नीला चश्मा उठाकर भाग रहा है। अब ये बिना फ्रूटी के नहीं मानेगा। इसी को देखते हुए मैरी एक किस्से का जिक्र करने लगीं।

बताया की ऐसे ही एक नौजवान का फोन ले कर तोड़ दिया था उसके तीन चार फ्रूटी देने के बावजूद भी। और आसपास के लोग अट्टहास कर रहे थे इस घटना पर।

निधिवन प्रवेश द्वार

बंदर यहाँ गुंडों की तरह रहते हैं बस अपनी मनमानी। तभी हर घर या दुकान जाली से ढकी हुई है।

अंधेरा होते होते हम यमुना नदी पहुँचे आरती शामिल होने। पर यहाँ आ कर देखा की आरती का समापन हो चला है। घाट पर ही है शांत मुद्रा में बैठ यमुना मां को निहारने लगा।

पूरब से आ रहे जलते दियों का समूह बहुत ही मनमोहक है। ना तो मोबाइल में और ना ही कैमरे में इसकी तस्वीरें कैद हो रही हैं। मुझे मैरी को याद दिलाना पड़ रहा है की प्रेम मंदिर भी चलना है जो सबसे प्रसिद्ध है।

प्रेम मंदिर

करीब आधे घंटे बैठने के बाद निकल पड़ा प्रेम मंदिर। प्रेम मंदिर खासतौर पर अपनी जगमगाहट के लिए प्रसिद्ध है। पैदल ही छह किमी का सफर आधे घंटे में तय हो गया। बस मैं मैरी के संग साथ साथ चलता रहा। अकेले आता तो जाने कितना वक्त लग जाता।

सड़क पर चाट बताशे पानी पूरी वालों और नूडल्स बनाने वालों के ठेले से ही घिरा हुआ है। गुब्बारे, खिलौने बेचने वाले भी कम नहीं हैं।

भीड़ गजब की है जिसकी उम्मीद थी। प्रेम मंदिर भी जगमगा रहा है। चारों ओर उजियारा फैला हुआ है। मंदिर की दीवार पर हर कुछ देर में झालर की रोशनी बदल रही है।

कभी नीली कभी पीली लाल हरी गुलाबी जिससे इमारत हर रंग में सराबोर नजर आ रही है। मंदिर के दूसरी ओर कृष्ण की झांकी भी लगी हुई है।

प्रेम मंदिर

मंदिर में तस्वीर लेते हुए चक्कर लगा कर दूसरी ओर निकल आया। भीड़ भी एक जगह खड़ी हो जाए तो जाम से हाल बेहाल हो जाएगा।

भूख लगी है यहाँ कैंटीन की भी व्यवस्था है। पर महंगा ही होगा। थक कर थोड़ा भीतर निकल कर बैठ गया। मंदिर के ऊपर चमकता हुआ चांद अलग ही चार चांद लगा रहा है। जैसे माथे पर बिंदी।

कुछ ऊर्जा आई तो लगा मंदिर के भीतर भी जाना चाहिए। जूते उतार भीतर निकल आया मंदिर के बंद होने के कुछ ही देर पहले ही।

अंदर से मंदिर की बनावट बहुत ही भव्य है। सफेद संगमरमर से दो मंजिला मंदिर बहुत ही चमक रहा है। अंदर ना आए तो क्या खाक मंदिर आए!

हर जगह सुरक्षाकर्मी तैनात हैं। मंदिर के बीचों बीच एक जगमगाता झूमर लटक रहा है। जो मंदिर की शोभा बढ़ा रहा है। यहाँ भी भिन्न भिन्न प्रकार का प्रकाश दिया गया है।

खंबे से ले कर दीवार, कटघरा तक सबमें आकृति दी गई है। खंबे पर विष्णु या कृष्ण की मूर्ति जड़ी हुई है। एक पट्टे के अनुसार जनता को मार्ग दिखाने का प्रयास किया गया है। जिससे जनता अपने आप ही दर्शन कर ऊपर फिर नीचे आ रही है।

बाहर आना ही हुआ की सुरक्षाकर्मी मंदिर खाली कराने में जुट गए।

करौली से मथुरा से वृन्दावन तक कुल सफर 104किमी

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