गुमनामी के अँधेरे में बाराबाती किला

उड़ीसा | कटक | भारत

भुवनेश्वर से कटक रवाना

पर्याप्त समय देने के बाद, तेज धूप में दो बजे तक कटक के लिए उदयनगिरी और खंडनागिरी गुफाओं से निकल गया।

गाड़ी निकलते समय कुछ गंभीर माहौल था। जिसके चलते दो गुटों में कुछ कहा सुनी हो है।

जाने क्यों गाड़ी खड़ी करने की ना तो पर्ची कटी। ना कोई सुध लेने आया। वाहन को बाईं ओर कटक के रास्ते मोड़ते हुए हाईवे पर आ गया।

धीरे धीरे मौसम बिगड़ रहा है, काली घटाएं छाने लगी हैं। हाईवे पर हल्की बूंदबांदी भी होने लगी।

कहीं तेज बूंदाबांदी होने पर मैं पूरा ही भीग जाऊंगा। ना बैग में रैन कोट है और ना ही कोई किनारा या पेड़। जिसकी छांव में खुद को छुपा लूं।

बचपन से कटक के बारे में सुनता आ रहा हूँ। जब यहाँ क्रिकेट के मैच खेले जाते थे और टीवी पर प्रसारण आता था।

तब सोचता था बीस मिनट पहले ही यहाँ सूर्यास्त क्यों हो जाता है उत्तर के मुकाबले। भूगोल पढ़ने के बाद इसका उत्तर मिला।

कटक ही वो स्थान है जहाँ महान क्रांतिकारी और एजाज हिंद फौज के जनक सुभाष चन्द्र बोस का जन्म हुआ था।

हाईवे पर भीड़ जैसी होती है वैसी है। पर रफ्तार इतनी तेज नहीं है जो अमूमन होती है। ओडिशा में हरियाली के नाम पर बहुत पेड़ हैं।

बारिश की बूंदे कुछ ही दूर तक रहीं जो ज्यादा देर नहीं टिकी।

महानदी को पार करके कटक में दस्तक दे चुका हूँ। बमुश्किल आधे घंटे में ये सफर तय हो गया मात्रा कुछ किमी का ये सफर।

कटक को और भूवनेश्वर को मिला दिया जाए तो इससे भी कई गुना बड़ा मुंबई शहर है।

भटकते हुए सुभाष चन्द्र बोस के घर जाने की इच्छा है। पर यहाँ मानो शहर में कर्फ्यू लगा हो। दुकानें, फैक्ट्री, मिलें सब बंद हैं।

बहुत भटकने और गलत रास्ते पर भी निकल जाने के बाद जो चंद लोग सड़कों पर दिख रहे हैं उनकी मदद की रास्ता समझने में।

तब सज्जनों ने बताया की मैं विपरीत दिशा में आ गया हूँ। गूगल नक्शे के सहारे पहले तो सही रास्ते पर आया।

फिर इसी के सहारे बोस बाबू के घर की ओर मुड़ा।

बंद मिला सुभाष चंद्र बोस संग्रहालय

बड़े सफेद बंगले को देख कर मालूम हुआ यही नेताजी का घर होगा।

देश की असली आज़ादी के हकदार नेताजी की मौत कब कहाँ किस हालत में हुई ये आज तक सरकार ने जनता को नहीं बताया है।

पर 2001 में आई मुखर्जी कमीशन में इतना जरूर पता चला की उनकी मौत ताइवान के हवाई हादसे में तो कतई नहीं हुई थी। उस दिन क्या बल्कि उस पूरे वर्ष भी ताइवान में ऐसी कोई हवाई दुर्घटना हुई ही नहीं।

करीब दो बजने को हैं पर इनके घर में ताला जड़ा हुआ है। घर के अंदर बने सुरक्षा घर में बैठे सुरक्षाकर्मियों ने जैसे ही बताया आज संग्रहालय बंद है दिल बैठ गया ये सुनते ही।

सुभाष बाबू के घर पहुंच कर निराशा हांथ लगी। सुभाष चन्द्र बोस जी के घर को संग्रहालय में तब्दील कर दिया गया है।

दुर्गा पूजा के अवसर पर यह संग्रहालय बंद है।

दुर्गा पूजा तो पश्चिम बंगाल का मुख्य त्योहार है फिर ओडिसा में इसका इतना असर देखने को क्यों मिल रहा है। समझ नहीं आया मुझे?

ओडिसा में नवरात्रि की छुट्टी होती है ऐसा बमुश्किल ही किसी राज्य में होता होगा की इस अवसर पर एक हफ्ते का अवकाश हो।

जिस लालसा से संग्रहालय देखने आया हूँ वही बंद मिला। मेरे पीछे पीछे एक परिवार भी इसी लालसा से आया पर उन्हें भी वापस लौटना पड़ेगा।

बंद संग्रहालय के बाहर तस्वीर खिंचवाते लेखक

घर के बाहर लगे हैंड पंप में पानी पी कर प्यास बुझाने लगा। मन को तसल्ली देते हुए कुछ और ही घूमने लायक जगह देखने लगा।

विशेष तौर पर सिर्फ संग्रहालय देखने ही आया था यहाँ पर ऐसी निराशा हांथ लगेगी ये ना सोचा था।

इंटरनेट पर देखने पर पता चला पास में ही बराबाती किला है जो बहुत दूर से आकर देखने लायक तो नहीं है।

पर अब जब कटक में हूँ तो कहीं ना कहीं तो जाऊंगा ही। पानी से पेट भर के निकलने की तैयारी करने लगा।

संग्रहालय ना सही सुभाष जी के घर के साथ ही कुछ तस्वीरें ले लेता हूँ। कभी जीवन में दोबारा इस शहर के आसपास भी आने का मौका मिलेगा तो यहाँ जरूर आऊंगा।

पर ध्यान दूंगा इस हफ्ते दुर्गा पूजा ना हो। ताकि दोबारा समय खराब न होने पाए।

घड़ी में तीन बज रहे हैं। समय के हिसाब से कटक में घूमने लायक जगह देखूंगा तो बहुतेरी जगहें मिलेंगी।

गुमनामी की हद

वाहन चालू किया और निकल पड़ा बराबाती किला। जो इस समय खंडहर ही है।

मशहूर है तो इसका प्रवेश द्वार। जिसको बनवाया गया था दुश्मनों से सुरक्षा के लिहाज से।

नेताजी के घर से महज कुछ किमी की दूरी पर ये किला। गूगल नक्शा कई दफा गुमराह कर देता है। बेहतर है स्थानीय लोगों से पूछते चलो।

किले से कुछ दो सौ मीटर की दूरी पर हूँ की तेज वर्षा होने लगी। ज्यादा देर ना चली पर संकेत दे गई मौसम के बिगड़ने का।

किला इतना जर्जर और खंडहर इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है।

प्रवेश द्वार से अब यातायात प्रवाहित होता है। प्रवेश द्वार पर बकायदा ट्रैफिक हवलदार खड़ा हुआ है। नक्शे के सहारे किला तो नहीं पर किसी चौराहे पर आ पहुंचा।

स्थानीय निवासियों से जगह का नाम पूछा तो उन सबका मूंह सिकुड़ने लगा। ना इन लोगों ने ऐसा कोई किला देखा है ना सुना है।

बड़ी मुश्किल से एक साहब ने हिम्मत करते हुए पूरी बात सुनी। और किले तक पहुंचने का सटीक रास्ता भी बतला दिया।

गाड़ी घुमाई और भाईसाहब के बताए हुए रास्ते पर निकल पड़ा। किसी मस्जिद या दरगाह का नाम बताया जिसके ठीक बगल में ये किला है।

आज इस किले की ये हालत है की इसकी पहचान आस पड़ोस की इमारतों से हो रही है।

कभी राजाओं का निवास होता ये किला आज अपने ही अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है।

चौराहे पर पहुंच कर पास खड़े कुछ पुलिसकर्मी से नाम पूछने पर पता लगा कि अंदर की ओर स्तिथ है।

गाड़ी एक किनारे ही खड़ी करनी पड़ रही है। क्योंकि आगे रास्ता ही बंद कर रखा गया है गाड़ियों की आवाजाही को ले कर।

मस्जिद तो मिल गई पर किला कहीं नजर नहीं आ रहा। मस्जिद के बाहर खड़े मौलाना से पूछने पर पता चला की मस्जिद किले की ही जमीन पर है।

गुमनामी के अँधेरे में बाराबाती किला

किले को देखने की मंशा से हमारे लिए माली ने उद्यान के दरवाजे खुलवाए।

ना तो यहाँ अंदर जाने का शुल्क है ना किला देखने का। बस हुक्म है उद्यान में ना लोटने का।

पीठ पर बैग लाद कर अंदर आने पर होश फाख्ता हो गए। यह किला किसी भी कोण से किला लग जी नहीं रहा।

अगला हिस्सा सिर्फ उद्यान है। थोड़ा आगे चल कर टीला बना हुआ है। जिस पर चढ़ने और ही पता चलेगा क्या है?

पीछे पीछे एक नव युवक भी आ रहा है। जो पर्यटक जान पड़ रहा है। शायद उसको भी यही दिशा निर्देश दिए गए हैं जो मुझे दिए गए थे।

पत्थर की चटाई पर सीधा चलते हुए मेरे समीप आ गया। सवाल तो मुझसे ऐसे पूछने लगा जैसे मैं ही यहाँ का संरक्षण करता हूँ।

बाईं ओर मुड़ कर सीढियां चढ़ने लगा। ये सफर काफी थका देने वाला है। साथी घुमक्कड़ वीडियो बनाते हुए पीछे रह गया है।

किले के नाम पर सिर्फ यहाँ पेड़ पौधे उगाए जा रहे हैं। जब तक साथी घुमक्कड़ आता है तब तक के लिए मैं यहाँ लेट कर अपनी पीठ को थोड़ा आराम दे सकता हूँ।

अगर सरकार चाहे तो खंडहर को आबाद कर सकती है। सिर्फ बचा है तो किला दरवाज़ा। जिसका इस्तेमाल लोग आज भी आवाजाही के लिए करते हैं।

साथी घुमक्कड़ के आगे निकलते ही मैं उठ खड़ा हुआ। टीले पर पहुंच कर पिछला हिस्सा देख पा रहा हूँ।

जो अब जंगल में तब्दील हो गया है। खंडहर भी है। साथ ही किला होने का प्रमाण भी दे रहे हैं।

टीला भी चौकौर बना हुआ है। जो शायद किले की छत हुआ कृति होगी। किला काफी बड़ा रहा होगा जिसका प्रमाण उसका प्रवेश द्वार है।

अंदर भी अवशेष काफी कुछ बयां कर रहे हैं किले के बारे में।

खँडहर पड़ा बाराबाती किला

कभी हुआ करती थी नौ मंजिला इमारत

इंटरनेट पर पढ़ने के बाद तो जैसे मेरे पैरों तले जमीन ही खिसक गई जब ये पढ़ा की कभी ये नौ मंजिला इमारत हुआ करती थी।

ऐन ई अकबरी में इस किले का उल्लेख है। कलिंग साम्राज्य की छाप इस किले में भी है।

अफगान सुलतानों के बार बार हमले से सुरक्षा के लिए अनन्य भीमा देव ने इस किले का निर्माण तेरहवीं शताब्दी में करवाया था।

चालुका, भोई, मुगल, मराठा साम्राज्य के बाद अंतिम बार अंग्रेजों ने इस पर हुकूमत की थी।

अब्दुल फजल ने सोलहवीं शताब्दी के दौरे के बाद अपनी किताब में इस किले का जिक्र किया है। जब ये नौ मंजिला हुआ करती थी।

महानदी और काठाजोडी नदियों के बीचों बीच बने इस किले को कितना ध्यान में रखकर बनाया गया होगा।

राजा मुकुंद देवा द्वारा बनवाए गए इस नौ मंजिला महल में सब कुछ था।

जैसे पहली मंजिल पर हांथी घोड़े। दूसरी मंजिल पैदल सेना और सुरक्षाकर्मियों के लिए। तीसरी चौकीदारों के लिए। चौथी लोहाग्रह के लिए।

पांचवी मंजिल पर रसोईघर। छठी में जनता दरबार सजाया जाता था। जहाँ जनता की फरियाद सुनी जाती थी।

सातवें पर निजी कमरा हुआ करता था। आठवी मंजिल महल की औरतों के लिए होता था। नौवीं मंजिल पर राजा का दरबार हुआ क्रिया था।

पर ये किला अचानक से गायब कहाँ हो गया। ये किला आखिरी बार मराठाओं के हाथों से छीन लिया गया था।

सन् 1803 में अंग्रेजी फौज ने इस पर कब्जा जमा लिया था। नौ मंजिला इमारत की एक एक ईंट को पीडब्ल्यूडी विभाग ने तोड़ तोड़ कर उसकी पुल, सड़क, रेल, बना डाली।

पढ़कर जितना बुरा लगा उससे ज्यादा हैरानी हो रही है। क्योंकि भारत के अब तक जितने हिस्सो मे गया हूँ वहा यही पाया है की अंग्रेजो ने भारतीय इतिहास को संजो कर रखा है। ना की खिलजी या मुगलों की तरह उसे उजाड़ने का प्रयास किया हो।

आज अगर ये नौ मंजिला इमारत मौजूद होती तो इसका अलग ही रंग होता।

खंडहर को खंगालने के बाद चल पड़ा।

कभी हुआ करती थी यहाँ नौ मंजिला ईमारत

भारी बारिश

फोन पर प्रीतेश के सुझाव के अनुसार अब अगली मंजिल होगी ओडिशा का समुद्री संग्रहालय।

जो देश का इकलौता समुद्री संग्रहालय है। पत्थर की चादर पर चलते हुए बाहर निकल आया।

गाड़ी तक पहुंच कर मस्जिद के सामने दौड़ रहे हंसों को दाना डालने में अच्छा लग रहा है।

वाहन चालू करके निकल पड़ा। यहाँ ना जाने इतनी पुलिसकर्मियों की भीड़ क्यों है?

किले से निकलते वक़्त हल्की हल्की बूंदबांदी के साथ बारिश तेज हो रही है। मैं काफी भीग भी चुका हूँ।

किले के गेट से थोड़ा आगे जबतक रुका रुका तबतक खेल हो चुका था।

प्रवेश द्वार से बाहर निकलना ही हुआ की अचानक मूसलाधार वर्षा होने लगी। खुद को बचाने के चक्कर में कुछ दूर वाहन दौड़ते हुए एक दुकान में आ खड़ा हुआ।

बारिश का रुकने का इंतजार करने लगा। मेरे अलावा यहाँ पहले से ही तमाम लोग मौजूद हैं। जो निकलने की फिराक में हैं।

अब तक अच्छा खासा भीग चुका हूँ। बाहर से ले कर अंदर तक। बारिश के कम होते ही मैं ही इस जमात से सबसे पहले निकला।

कुछ दूरी पर स्तिथ संग्रहालय तक पहुंचते पहुंचते थोड़ा बहुत सुख गया। शरीर की गर्मी से कपड़े भी सूख गए।

कुछ दूरी पर महानंदा नदी के किनारे भारत का इकलौता मरिटाइम संग्रहालय है। गाड़ी संग्रहालय के खाली जगह पर लगा दी। जहाँ अन्य गाडियां लगी हुई हैं।

भीड़ अच्छी भली नजर आ रही है यहाँ। बाईं ओर टिकट घर की ओर आते हुए दो टिकट निकलवाए।

इतनी देर में कपड़े और सूख गए हैं। अब हल्का महसूस कर रहा हूँ।

कुछ इस प्रकार हुआ करती थी नौ मंजिला बाराबती ईमारत

देश का इकलौता समुद्री संग्रहालय

चार बजे किले से निकलने के बाद अब जा कर साढ़े चार बजे दूसरे स्थल पर खड़ा हूँ।

अगर बारिश न हुई होती तो शायद और पहली ही आ जाता। टिकट घर पर रत्ती भर भीड़ नहीं है।

पास में पड़ी तोप सिर्फ नाम मात्र के लिए है। आगे से लोहे की जाली लगा कर उसे बंद कर रखा गया है।

टिकट ले कर संग्रहालय में प्रवेश कर गया। शुक्र है यहाँ मुर्शिदाबाद के कठगोला जैसा तस्वीरें पर कोई रोक नहीं है।

संग्रहालय में चित्र के माध्यम से दर्शाया गया है की उस काल में लोग नदी या समुद्र से कैसे ताल मेल बैठाते थे।

कैसे पूरा गांव तब भी थोड़े में गुजार बसर कर लेता था। इस समुद्री मार्ग से दुनियाभर में भारत ने डंका पीटा है।

संग्रहालय में भगवान बुद्ध की अलग अलग मुद्राओं में मूर्तियां भी हैं। किसी में तपस्या करते हुए किसी में समाधि में लीन।

उस काल में कैसे एक नाव को दस जानो की सहायता से उसका रख रखाव किया जाता था। जमीन से पानी में उतारने का पटरी के सहारे हुआ करता था।

अगले कमरे में बड़ी बात मशीन रखी हुई हैं। जिनके विषय में मैं अपने कॉलेज के दिनों में पढ़ा करता था।

संग्रहालय के दूसरे हिस्से में पुरानी कारों का भी बोल बाला है।

यह संग्रहालय दर्शाता है समुद्र के ऊपर रहने वालो के मानवों के जीवन व्यापम के विषय में। उनकी द्वारा इस्तेमाल में लाई गई मशीनें और वस्तुएं।

यह भी उसी जगह निर्मित है जहाँ पहले जहाजों के लिए बड़ी बड़ी मशीन चालू अवस्था में थी। आज भी वो मशीनें वहीं कि वहीं रखी हैं।

इन्हे इधर से करने के लिए भी मशीन लगानी पड़ेगी।

संग्रहालय से निकल कर दूसरे हिस्से में जाने लगा। यहाँ सिर्फ मैदान है। लहलहाते पेड़ इस बात का गवाह हैं की पेड़ों को भी कितनी प्राथमिकता दी गई है।

ऐसा अमूमन किसी संग्रहालय में नजर नहीं आता। हां संग्रहालय में पेड़ के जीवाश्म जरूर मिल जायेंगे जैसे पटना संग्रहालय में देखने को मिला था।

बाल बच्चो के अलावा यहाँ छात्रों की एक बड़ी टोली भी है। आ कर बैठा ही हूँ की इनके दल से एक लड़का दरख्वास्त करते हुए आया।

अपने दल की एक साथ फोटो खींचने की मांग करने लगा। बदले में सोचा मेरी और साथी घुमक्कड़ की वो तस्वीर खींच दे पर अब मन ही नही हो रहा।

घुमक्कड़ी के दौरान अक्सर ऐसा होता है जब हम किसी से अपन परिवार या कोई हमसे अपने दल या परिवार की तस्वीर लेने की सिफारिश रखता हो।

अब संग्रहालय भी बंद हो रहा है। अगला हिस्सा तो बंद ही हो चुका है। पुरानी कारों के बगल में एक और कमरा है जहाँ मैं नहीं गया हूँ।

कदम स्वयं ही बढ़ चले इससे पहले ये कमरे में ताला पड़े। यहाँ सुमाद्र के ऊपर रहने वाले मनुष्यों से बारे में बताया गया है।

उनकी पोषक टंगी हुई धूल खा रही है। और देखता की संग्रहालय का ये हिस्सा भी बंद करने की आवाज आई।

देश का इकलौता समुद्री संग्रहालय

जोब्रा एनीकट ब्रिज

संग्रहालय में कुछ वक़्त बिताने के बाद बाहर निकल आया। अबतक शरीर और कपड़े काफी सूख चुके हैं।

मालूम ही नहीं पड़ रहा की बारिश में भीगा था। अब वापस निकलने का समय हो रहा है।

पास की महानदी पर बने पुल पर जाना चाहूँगा। इतनी विशालकाय नदी शहीद ही कभी देखी हो। वाहन पर सवारी करते हुए यही खयाल आ रहा था।

गाड़ी चालू की और चल पड़ा महानंदा नदी के ऊपर बने पुल पर।

पुल के पहले चौक पर भारी भरकम सुरक्षाबल तैनात हैं। चौक से आगे बढ़ते हुए मैं आधे पुल तक आ गया।

महानदी इतनी चौंड़ी और विशालकाय। इसका रौद्र रुप ही अपने आप में डरावना है। गुवाहाटी में बेकाबू ब्रह्मपुत्र नदी की याद आ गई।

यह नज़ारा मुझे कानपुर के गंगा बैराज की याद दिला रहा है।

पानी के इस तेज बहाव को देख कर यहीं विचार उमड़ रहा है कि जो भी इसकी चपेट में आएगा क्या वो बच पाएगा? बस थोड़ा ट्रैफिक ज्यादा है।

बारिश में भीगा बदन अबतक पूरा सूख चुका है। कुछ तस्वीरें लेने के बाद यहाँ से निकल पड़ा।

चौक से होते हुए शहर को और खंगालने का मन किया। बाईं तरफ मुड़ा तो पाया एक पूरी सड़क ही लाइट से सजी हुई जगमगा रही है।

परसो दशहरा है हो ना हो ये उसी की सजावट है। काफी अंदर तक वाहन ले जाने पर पता लगा बहुत ही दूर तक है ये सजावट।

जोरों की भूख लगी है। बाहर निकल कर आसपास दुकानें खोजने लगा। बाईं तरफ कुछ ठेले लगे हैं।

यहाँ पर चाय पकौड़ी का स्टॉल नजर आ रहा है। चाय पकौड़ी से पेट भरे ना भरे भूवनेश्वर पहुंचने की जरूरतमंद ऊर्जा आ जाएगी।

चाय तो फीकी निकली पर पकौड़ी बहुत स्वादिष्ट हैं। एक के बाद एक प्लेट चलती रहीं। तब तक जब तक इनका पकौड़ी बनाने वाला गूदा खतम ना हो गया।

आया था नेताजी का संग्रहालय देखने जा रहा हूँ जर्जर बाराबाती किले की यादें ले कर।

दुपहिया पर सवार होकर चल दिया मैं वापस भुभनेशर की ओर।

भुवनेश्वर के कटक और वापसी का कुल सफर 111 km

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