गोल्डन टेंपल अमृतसर और जलियांवाला बाग

अमृतसर | धार्मिक स्थल | पंजाब | भारत दर्शन

आगमन

रात्रि के दो बजे मैं अमृतसर आ धमका। आधी नींद में मैंने ड्राइवर साहब को ये केहते हुए सुना कि जिनको गोल्डन टेंपल जाना है वो अगले चौराहे पर उतर जाएं।

मैं खुद को नींद के आगोश से बाहर लाया, बैग उठाया। बाईपास पर गाड़ी रूकी और एक साथ कई सवारियां उतरी। मैं ठहरा आलसी सो उतरा भी सबसे आखिर में।

उतरते ही दो चार रिक्शे वाले अपना ‘कहाँ जाना है’ प्रस्ताव ले कर आए। इस अंधेरी रात में भी हल्की फुल्की हलचल से मैं हैरान नहीं हूँ। उसमे से एक रिक्शे वाले से गोल्डन टेंपल तक का सौदा तय हुआ।

लद कर निकल गया गोल्डन टेंपल। अमृतसर में ना तो मैंने कोई होटल बुक कराया है, ना ही ट्रैवल कम्युनिटी के किसी बंशिदे से संपर्क हुआ। इसलिए अब थोड़ी मशक्कत तो करनी ही पड़ेगी।

चंडीगढ़ में बीती रात  मैंने फोन घुमाया था अपने सरदार मित्र को। क्योंकि इनका यह धर्मस्थल है। इनका आना तो लाजमी है।

सरदार जी से ज्यादा जानकारी किसे होगी। उसके सुझावनुसर मुझे अर्जन दास धर्मशाला में रुक जाना चाहिए। यहाँ किसी घुमक्कडी समुदाय मित्र ने रिक्वेस्ट नहीं स्वीकारी है।

इसमें गलती मेरी ही रही क्योंकि ठीक एक दिन पहले ऐन मौके पर कैसे कोई स्वीकृति देगा। रिक्शे वाले को इक्ताला कर दिया कि कहाँ उतरना है।

सूनसान गलियों और सड़क से गुजरते वक्त मन में यही खयाल आ रहा है। ये वही अमृतसर है जहाँ चप्पे चप्पे पर इतिहास की सुई घूमती रही है। रिक्शेवाले ने ठीक धर्मशाला के सामने उतारा।

अर्जन दास निवास

पैसे दिए और बैग उतार कर एक किनारे खड़ा हो गया। ठीक से सांस भी नहीं ली थी की आस पास सटे होटल के दलालों ने धावा बोल दिया।

मैं अपने आप को उस सेलेब्रिटी की तरह महसूस कर रहा हूँ जो एयरपोर्ट से निकलते हैं और मीडियाकर्मी-पत्रकार उन्हें घेर लेते है, और सेलेब्रिटी अपनी अकड़ में आगे बढ़ जाते हैं।

ठीक उसी अंदाज में मैं नजर अंदाज़ करते हुए अर्जन दास निवास में दाखिल हुआ। धर्मशाला में इतनी रात में भी थोड़ी बहुत हलचल है जो जाहिर है मशहूर स्थल पर आम बात है।

कमरा खाली मिलेगा या नहीं इस पर भाला लिए नीली पग में निगरानी कर रहे सरदार जी ने काउंटर पर पता करने का इशारा किया।

काउंटर पर पूछताछ के दौरान दो बातें सामने आईं पहला की सभी कमरे पहले से ही बुक हैं, आज की रात के लिए एक भी कमरा खाली नहीं है लेकिन पब्लिक हाल में व्यवस्था बन सकती है।

हॉल की तरफ का रास्ता पूछते हुए काउंटर से बाहर आया। गोल्डन टेंपल के ठीक सामने बने इस इमारत में दाखिल होते ही पहरा देते हुए सरदार जी दिखे। उन्होंने बाईं तरफ मुड़ जाने का इशारा किया।

रात्रि के तीन बजने को हैं। जब सारी दुनियां गहरी नींद में सो रही है तब साथी घुमक्कड़ और मैं अपना अपना भारी भरकम बैग लेके पहुंचे हॉल में।

यहाँ जिस तरह से लोग अचेत अवस्था में सो रहे हैं, इसे देख कर मन में संशय ही उत्पन्न हो रहा है। दिलप्रीत जी ने भी सचेत किया था, यहाँ सामान संभाल के ना रखा तो चोरी होने के खतरा रहता है।

दरवाज़े की आढ लेके अन्दर झांका तो देखा संचालक मेज़ पर सर पटके सो रहा है। वो इतनी गहरी निद्रा में है अगर उसके शरीर को पूरी ताकत के साथ झकझोर दिया जाए तो भी शायद कोई प्रतिक्रिया ना देगा।

मैं अन्दर आया और मेज़ को खटकाया। कोई रेस्पॉन्स नहीं मिला। इसलिए मजबूरन मुझे नौजवान सरदार के कंधे को हल्के हांथ से हिलाया तब कहीं जा उनकी नींद टूटी।

इससे पहले मैं कुछ बोलता वो बेहोशी में कागज कलम उठा कर एंट्री करने लगे। उन्होंने नाम पूछने के लिए सिर उठाया ही की मैंने तुरंत उनसे बैग रखने और लॉकर की उचित व्यवस्था जाननी चाही।

अपने ठीक पीछे छोटे बड़े हर तरह के लॉकर दिखलाए, व्यवस्था से संतुष्टि नहीं मिलीदेश के भिन्न भिन्न जगहों से आए लोगों को देख मन शशंकित होने लगा कि किसी ने ताला तोड़ दिया तो मैं तो सोता रह जाऊंगा।

इससे पहले मैं संचालक को कुछ पूछता वो पुनः सो गया। हॉल में बच्चे और महिलाएं बहुत दयनीय स्थिति में सो रहे हैं। सामान की सुरक्षा को देखते हुए मैं धर्मशाला से बाहर निकल आया।

द्वार के बाहर खड़े दल्लों के लिए अच्छा मौका है, सुबह के साढ़े तीन बज रहे हैं और मैं चाहूँगा कि सूख चैन की नींद मिले।

सुबह हुई व्यवस्था

प्रवेश द्वार से बाहर आते ही कुछ दल्ले अपने फायदे के लिए पीछे लग गए, जिसमे से एक ने पास में ही होटल होने की बात कही।

बातचीत हुई और समय को देखते हुए उचित रेट में रूम देने को राजी हो गया। इतनी रात गए कुछ दुकानदारों ने अपनी दुकान भी खोल ली हैं।

एक जनाब तो सामान की सफाई करते हुए सामान दुकान के बाहर रखते दिखे। होटल तो तय हो गया, अब बारी है वहां तक पहुंचने की। इस लड़के के साथ एक और दलाल हैं।

एक कि बाइक पर मैं बैठा दूसरी पर साथी घुमक्कड़। गोल्डन टेंपल से दो चार गली छोड़ कर हम होटल पहुंचे। रात में रिसेप्शन पर ही आलीशान होटल के मालिक को छोटू ने जगाया और डील कराई।

शुरुआत में तो मलिक ने आनाकानी कि लेकिन जब उसे पता चला चंद घंटो के मेहमान है तो वो राजी हो गया। कागजी कार्यवाही के बाद, मलिक ने कमरे की चाभी थमाते हुए कमरा नं बताया और लिफ्ट से जाने की हिदायत दी।

दो प्राणी दोनों बैग ले लिफ्ट में समान भरकर दूसरे माले के कमरे तक आ गए। आंखो में गजब की नींद भरी है, मोबाइल और पावर बैंक चार्जिंग पर लगा पैर पसार कर सो गया। सोते सोते चार बज गए।

गोल्डन टेंपल

ऐसी गहरी नींद में गया कि सुबह के दस बजे आंख खुली। होटल के मलिक से वायदे के मुताबिक बारह से एक बजे के बीच में रूम खाली कर देना है।

फटाफट घंटे भर में मैं स्नान कर के ग्यारह बजते ही हरमिंदर साहिब मंदिर निकल गया। अमृतसर शहर और गोल्डन टेंपल भारत के इतिहास में हमेशा पुलकित रहेगा।

अमृतसर की पुरानी गलियां और खंडहर पड़े मकान चीख चीख कर विभाजन की कहानी बयां कर रहे हैं। इसे हर कोई महसूस के सकता है।

आजादी के इकहत्तर साल बाद भी उस दर्द को इन खंडहर घरों में करीब से देखा जा सकता है। गली गली होते हुए अर्जन दास पहुंचा जहाँ रात में कड़ी मशक्कत के बाद भी कुछ हासिल ना हो सका था।

मंदिर मस्ज़िद में चप्पल बचाना भी एक बड़ी कला है। इमारत में चप्पल छुपा कर गोल्डन टेंपल में की ओर रवाना हुआ।

यहाँ जरूर कहीं ना कहीं चप्पल स्टैंड होगा लेकिन ना मैंने किसी से पूछा ना ही कहीं ध्यान दिया। धर्मशाला और गोल्डन टेंपल आमने सामने ही हैं।

गोल्डन टेंपल के चबूतरे पर पांव रखा ही है कि वहां बैठे बुज़ुर्ग ने टोका और नग्न सिर के साथ अन्दर जाने की इजाजत नहीं दी।

उन्हीं के पास रखे झऊए में से कपड़ा निकाल कर सिर पर बांध लिया। भारी भीड़ के साथ चलने पर भी वो आवाज़ नहीं दबी जो कहीं से जोर जोर से खड़खड़ाती आवाज़ सुनाई दी।

ध्यान दिया तो दाएं तरफ एक साथ हजारों बर्तन के धुलने की झनझन आवाज़ अपनी ओर देखने को विवश कर रही है।

इस तरह बर्तन धुलने की आवाज़ यहाँ के अलावा विश्व के शायद ही किसी कोने में सुनाई दे। इतना मधुर इतना मदिर। एक साथ हजारों बर्तनों का धुलना! मोहक बर्तन ध्वनि सुनते सुनते गोल्डन टेंपल के द्वार तक आ गया।

द्वार पर से ही पवित्र मंदिर चमचमा रहा है। एक अजब सी शांति है यहाँ के माहौल में। लोग थक कर किनारे भवन जैसी लाइन कि छांव में बैठ रहे हैं। जो चल रहे हैं वो गोल्डन टेंपल को निहारे बिना रह नहीं पा रहे।

गोल्डन टेम्पल सरोवर

मैं जत्थे से आगे निकल कर जलभराव की ओर बढ़ा। वहां नीचे उतर कर जल चढ़ा भी दिया और वापस निकल आया। उतनी ही देर में एक महिला उतर गई उसे झट से हटाने वहां तैनात युवक आगे आ गए।

शायद मुझे भी नहीं उतरना चाहिए। इतनी भीड़ के बीच सूचना बोर्ड छिप गया तो चेतावनी की खाक पढ़ता। इतनी शांति और शुद्ध वातावरण शायद ही मैंने पहले अनुभव किया हो!

मन ठंडा ठंडा कूल कूल हो गया।

यहाँ सेवादार सरदार तैनात है जो हस्टपुष्ट तो नहीं है लेकिन अकेले सवा लाख को निपटा देने का माद्दा रखते हैं। चलते चलते मैं दूसरे द्वार के पास आ गया।

मंदिर के चार द्वार है जो इस बात का प्रतीक हैं की यह हरमिंदर साहिब अभी धर्म जाति से परे सभी के है। ऊंचे नीच अमीर गरीब किसी के बीच कोई फर्क नहीं।

इसी द्वार के पास मैं फोटु खीचवा रहा हूँ तभी सेवादार का एक कठिला सरदार मुझे टोकता है “सर यहाँ फोटु ना खिचवाईं, तुस्सी आगे निकल जाओ”।

मैं आगे बढ़ा ही की इतने में एक जोड़ा फोटो खीचने की दरख्वास्त करने लगा। एक तरफ मैं फोटो खीच रहा हूँ दूसरी तरफ निगाहें सरदार जी पर टिकी हैं।

लेकिन इस बार वो कुछ नहीं बोले। धूप इतनी तेज़ है की एक जगह खड़ा होना मुश्किल नज़र आ रहा है। चला आया आकाल तख़्त के पास, अन्दर जाने को सोचा भी लेकिन लम्बी कतार देखने को मिली, विचार वहीं त्याग दिया।

जो सबसे अच्छी बात मुझे लगी वो ये कि यहाँ स्पेशल दर्शन जैसा कुछ भी नहीं है जो भारत के अन्य मंदिरों में अक्सर देखने को मिलता है।

विचार किया जाए तो ये एक तरह का भेदभाव है लोगो के प्रति, अमीर पहले या जिसे जल्दी है वो पैसा दे कर पहले दर्शन करले, बाकी अपना अपना देखें।

आक़ाल तख्त के दर्शन के लिए लंबी कतार है, मैंने बाहर से ही हांथ जोड़े और प्रसाद वितरण की तरफ मुड़ गया। शुद्ध घी से बना प्रसाद शायद ही मैंने कहीं चखा हो, उससे भी घी टपक रहा है।

प्रसाद स्वादिष्ट है, इससे इतना घी मेरी हथेली में फ़ैल गया। बहुत स्वादिष्ट! दशकों पुरानी परंपरा लोगों के बीच अभी भी जिंदा है।

बावजूद इसके कि जब भी किसी अफगान शाशक ने भारत पर हमला किया, हरमिंदर साहिब दरबार को नहीं बख्शा। जितनी बार तोड़ा गया उतनी बार इस मंदिर का निर्माण हुआ।

गोल्डन टेम्पल अमृतसर मिला लोगो का हुजूम

आकाल तख़्त साहिब के दर्शन कर मैं लौटने लगा मुख्य द्वार जहाँ खनखन बर्तनों की आवाज़ आ रही थी। विचार आया लंगर छाकने का लेकिन ये नहीं पता है जाना किधर को है? गोल्डन टेंपल में अमोल समय बिता कर वापस होटल आ गया।

गोल्डन टेंपल का लंगर

जब होटल मलिक को पता चला कि बिना लंगर छांके ही हम आ गए , तब उन्होंने वो जगह बताई जहाँ लंगर छंका जाता है। समय काफी बीत गया है। कमरा भी खाली करना है।

इसलिए मैंने साथी घुमक्कड़ को लंगर छांकने भेज दिया और खुद जुट गया बोरिया बिस्तर समेटने में। सारा सामान बैग में भर कर रूम खाली करदिया। सारा सामान लेकर लिफ्ट से रिसेप्शन हॉल में आ कर बैठ गया।

जब तक साथी घुमक्कड़ नहीं आया तब तक इंटरनेट पर अमृतसर के आस पास की घूमने की जगह देखने लगा। जलियांवाला बाग तो यहाँ से 200 मी से भी कम दूरी पर है।

साथी घुमक्कड़ के लौटने के बाद मैं गया लंगर छांकने। बारी बारी से इसलिए भी गए क्योंकि मंदिर परिसर या आसपास कहीं भी जूते उतारने की व्यवस्था नहीं दिख रही थी। इसलिए जूते, बैग होटल में ही छोड़ नंगे पैर दोबारा गया।

लंगर छांकने के लिए लंबी कतार है, लेकिन आप गोल्डन टेंपल आएं और लंगर ना छांका तो समझो अधूरी ही रह गई यात्रा।

भीड़ आगे बढ़ रही, एक सरदार जी थाली पकड़ा रहे हैं दूसरे गिलास। यहाँ सेवा भी लोग अपनी मर्ज़ी से देते हैं। सिख समुदाय के लोग ही खाना बनाते हैं और वही सेवा।

मंदिर की सिर्फ व्यवस्था है। थाली गिलास ले कर भीड़ को पहली मंजिला पर खड़ा कर दिया गया।

हर समुदाय के लोग, अमीर गरीब, बूढ़ा नौजवान, छोटा बड़ा, गोरा काला हर तरह का व्यक्ति कतार में खड़ा है। आधे घंटे प्रतीक्षा के बाद कतार टूटी और सबको हॉल में जाने दिया। जहाँ पहले जो खा चुके हैं वो अब उठ कर जा चुके हैं वहां अब बाहर खड़े लोग बिछौने पर बैठने लगे।

खाना परसने वाले भी सेवा कर्मी। कोई थाली दे गया तो कोई गिलास, कोई दाल तो कोई खीर। इंतजार है तो बस रोटी का। जब रोटी वितरण चालू हुआ तब मुझे लगा थाली में डाल कर निकल जाएंगे पर ऐसा नहीं हुआ।

मुझसे हांथ फैलाने को कहा। मुझे कुछ समझ ना आया ऐसा क्यों बोला। बगल में बैठे सरदार जी ने कहाँ हांथ फैलाओ तभी अन्न मिलेगा। मुझे तबतक रोटी नहीं मिली जब तक हांथ नहीं फैलाए।

ये इस बात का संकेत है चाहे आपने जीवन में कितना कुछ क्यों ना हासिल कर लिया हो लेकिन ऊपरवाले के दरबार में सब खाना हांथ फैला कर है मिलता है।

खाना गपकर बाहर आया, बाहर दानपेटी दिखीं सोचा कुछ रुपए दान करदुं पर कमबख्त बटुआ तो होटल में ही भूल आया हूँ। जहाँ बर्तन धुले जा रहे हैं वहां छोटा बालक भी अपनी सेवा दे रहा है।

ये इतना मनमोहक दृश्य है कि मन किया कैमरे में कैद करलूं फिर सोचा कैमरे में नहीं मन में बसा लो।

ये टेंपल ऐसे ही चलता है। यहाँ सभी काम करते हैं, कई अपने घर से राशन लाते हैं। अपने आप में अनोखा मंदिर है ये। हर व्यक्ति को यहाँ जरूर आना चाहिए।

और मंदिरों की तरह व्यापार नहीं है। होटल आने थोड़ी देर जरूर हुई। आज रात पठानकोट की ट्रेन है,एक दिन और रूम बुक करने का कोई लाभ दिखता नजर नहीं आया।

इसलिए दोनों बैग होटल संचालक से बात कर उन्ही के पास रखवा दिए।

जलियांवाला बाग

बैग रखवा पूरी संतुष्टि के साथ जलियांवाला बाग को निकल गया। गलियों से गुजरते हुए ढेढ़ बजे तक जलियांवाला बाग में दाखिल हुआ। गोल्डन टैंपल के बेहद नज़दीक।

जलियांवाला बाग का प्रवेश द्वार

चौथी कक्षा में जलियांवाला बाग के विषय में हिंदी लिटरेचर की पुस्तक में पढ़ा था वो अभी तक याद है। कैसे जनरल डायर ने अपनी सनक के चलते मासूमों को बंदूक की नोक पर गोलियों से भुनवा डाला था।

पूरे बाग में आने जाने के लिए सिर्फ एक फाटक हुआ करता था। सामने बहुत लंबी दीवार। छुटपन में मैं यही कल्पना करता था कि ये बाग कैसा दिखता होगा जिसमें आने जाने के लिए सिर्फ एक फाटक।

उस दिन प्रार्थना सभा में सम्मिलित होने के लिए एकत्रित हुए थे। वो गेट वो दीवार, कैसा दृश्य रहा होगा जब ये कृत्य घटित हुआ होगा। बेहद ही दुखद।

ठीक सौ साल बाद 2019 मैं ठीक उसी द्वार से अन्दर प्रवेश तो कर रहा हूँ लेकिन मेरा मस्तिष्क 1919 में घूम रहा है। दीवारों पर हांथ फेरते हुए आगे बढ़ा आंखे स्वातः ही नम हो गईं।

आगे बढ़ने पर उस घटना का जिक्र हिंदी, अंग्रेजी, पंजाबी में वर्णन है जिसे हर कोई जानने का इच्छुक नजर आ रहा है। इतिहास से अनजान जो भी इसे पढ़ रहा है वो गहरे शोक में डूबता दिखा।

कईयों की आंखे भर आईं। इतनी नीच घटना पर स्वताः मन व्याकुल हो उठता है। मुझे तो उन पर भी खिन्न ही रही है जिन हिन्दुस्तानी हवलदारों ने अपनी ही जनता पर गोलियां चलाई।

ठीक सामने उस हत्याकांड में शहीद मासूमों की याद में स्मारक बनाया गया है।

शहीदों की याद में बना स्मारक जलियांवाला बाग

अंडाकार स्मारक के पीछे कभी दीवार हुआ करती थी जो अब नहीं है, दीवार के पीछे अब मकान हैं। वो बहुचर्चित कुंआ जिसमे कूद कर सैकड़ों लोगों ने अपनी जान दे दी थी।

औरते बच्चे बूढ़े जवान निहत्थे निर्दोषों की बलि चढ़ा दि गई थी। फिलहाल आज के समय में इस कुएं की घेराबंदी कर दी गई है। झांक कर तो लोग ऐसे देख रहे हैं मानो कल परसो की ही घटना हो।

हम भारतीय इस घटना से इतने वाकिफ हैं कि हर कोई लालायित रहता है ज्यादा से ज्यादा जानकारी के लिए। मुझे मानव तो नहीं लेकिन कुएं में सिक्कों का ढेर जरूर जमा दिखा। धूप तेज है लेकिन लोगों का जोश कमतर नहीं।

बाहर की ओर एक संग्रहालय बना हुआ है जिसमें व्याख्यान है उस साप्ताहिक दुखद घटना का। घटना के पहले और बाद की कहानियों का जिक्र।

ये भी की कैसे उद्घम सिंह ने इंग्लैंड जा कर जनरल डायर को गोली मार कर बदला पूरा किया था। इन शहीदों को मेरा शत शत नमन।

ऐतिहासिक कुआं और वस्तुएं देखने के बाद दूसरे गेट से जलियांवाला बाग के बाहर आ सुस्ताने लगा। सौ साल पहले एक था अब दो दरवाज़े हैं।

बैठा ही था कि वागह-अटारी बार्डर पर जाने वाली जीप का एक ड्राइवर प्रस्ताव ले कर आ खड़ा हुआ। मेरे बगल में बैठी बूढ़ी काकी भी इन्हीं के साथ जाएंगी लेकिन थोड़ी शाशंकित हैं।

दीवार पर बने गोलियों के निशान जलियांवाला बाग

वो चिंतित हैं कहीं इनके साथ धोखा तो नहीं हो जाएगा।

मैंने धीरज देते हुए आश्वाशन दिया। मैं साथी घुमक्कड़ के बाहर आने का इंतजार करने लगा। चर्चा हुई और सहमती बनी वाघा बार्डर जाने की।

ड्राइवर जितनी सवारियां इकट्ठी करता जाता उतनो का नाम एक कागज में लिखता। सो मैंने सूची में दो नाम और जुड़वा दिए।

अब काकी भी संतुष्ट दिख रही हैं की वो ठगी तो नहीं जाएंगी। इस अनजान शहर में एक जिम्मेदारी सी मिल गई, ये काफी अच्छा एहसास है।

कुछ ही देर में चालक को जीप की सभी सवारियां मिल गईं। उसने सभी सवारियों को एक जगह इकट्ठा किया और अपनी टेंपो की तरफ ले जाने लगा।

मोटी पतली गलियों में टेंपो घूमाना संभव नहीं। जब तक टेंपो अपनी घूमने की प्रक्रिया पूरी करती उतनी देर सब सवारियां पास की लस्सी की दुकान से लस्सी लपेटने लगीं।

काकी और काका भी, और मैं भी। टेम्पो चालक घुमा लाया और सबकी लस्सी खतम होने का इंतजार करने लगा। सवारियां टेंपो में बैठ लस्सी का आनंद ले रही हैं।

इसी बीच चालक बार्डर तक के जाने और वापस अमृतसर आने दोनों का किराया लेने लगा।

कुआ जिसमे कूद कर दी थी हज़ारो ने क़ुरबानी जलियांवाला बाग

 

चंडीगढ़ से अमृतसर से गोल्डन टेम्पल से वागाह बॉर्डर 385km

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4 Comments

  1. Mujhe pdh kr apne khud ki amritsar trip ka yaad aa gya, Boht acha likha hai. aapne environment boht ache se establish kiya hai. 👍👍

  2. I have been to Amritsar 3-4 time, it’s so beautiful and peaceful. Aur haa , Golden Temple min andar bohat badi jagah hai joote rakhne ke liye, they take care of shoes very nicely. Aur Prasad bohat zyada tasty hota hai yrrrr
    I really enjoyed it, like jab mine wo “thanda thanda cool cool” padha tha tab I literally laughed 😂😂

  3. Hey Aishwarya I am so used to reading your Hindi and I really enjoyed it so much that English padne me maja Nahi aa raha.

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