गंगोत्री, उत्तराखंड, किस्से, स्टोरीज ऑफ इंडिया
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ग्लास हाउस में गुज़ारी रात

बस पकड़ने की फ़िक्र

सुबह के चार बजे का अलार्म बजा और तड़के ही नींद खुल गई। रात में हुए वाक्ए के बाद अब लग रहा है जितनी जल्दी हो सके भागो यहाँ से।

पता नहीं लवली भाई के मुख से सुने किस्से के बाद कैसे नींद आ गई। पर आधी रात में ऐसा किसी के साथ भी ना हो। फटाफट बिस्तर समेटा और सारा बिखरा हुआ समान बैग में भरने लगा।

अजय के नित्य क्रिया पर जाने के बाद मैंने कमरे में बिखरा सारा सामान इक्कठा कर के बैग में भरा। गद्दे पर बिछे चद्दर को भी तय कर के बैग में डाला।

बस के निकलने का समय तो छह बजे बताया है कंडक्टर महाशय ने। मुझे पहुचनें में ही शायद आधा घंटा लग जाए। अभी साढ़े चार बज रहे हैं। हर हालत में मुझे आधे घंटे पहले पहुंच जाना है।

अजय के आ जाने के बाद अंधेरी सुबह में मैं निकल पड़ा कुल्ला मंजन करने। और बमुश्किल कुछ मिनटों में सब निपटा कर आ गया कमरे में।

इधर अजय एकदम तैयार बैठा है। देर है तो बस बैग उठा कर निकलने की। लवली भाई को जगाने का तो कोई फायदा भी नहीं होगा। सोए भी देर से ही होंगे।

घड़ी में पांच बज रहे हैं और मैं निकल पड़ा बस अड्डे। गनीमत है कि बिरला हाउस का मैंन गेट का दरवाजा फट्ट खुला पड़ा है। जैसी किसी को कोई लेना देना नहीं हो।

गीली घास में अंधेरी सुबह में घोड़ों के हिनहिनाहट में रास्ते में चलता चला जा रहा हूँ। मन में बस एक ही ख्याल उत्पन्न हो रहा है कि बस ना छूटे और कुछ भी हो जाए।

इसी बीच कमर कसते हुए, अपनी गति को तेज करते हुए बस अड्डे पर जितनी जल्दी हो सके पहुंच जाऊं। अब तक मन में ये ख्याल भी निकल चुका है कि किसी भूतिया घर में रुका भी था।

बस अड्डा

पैदल चलते चलते पहुंच गया हूँ उस स्थान पर जहाँ कल शाम को बस की बुकिंग करवाई थी। शुक्र है कि बस सवारियों का इंतजार कर रही है।

बैग लेके बस में चढ़ा और अपनी बुक हुई सीट पर बैठ गया। बाईं तरफ नजर पड़ी तो देखा दद्दू भी विराजमान हैं अपनी सीट पर अपने साथी के साथ।

पर लगभग सभी सवारियों के आ जाने के बाद भी बस जहाँ की तहाँ खड़ी है। समय भी हो चला है। मालूम पड़ा किसी दो सवारियों के लिए रूकी हुई है जो अभी तक नहीं आई हैं।

तकरीबन आधा घंटा रुकने के बाद आखिरकार वो बिछड़ी हुई सवारियां आ ही गईं जिनके लिए बस रूकी हुई थी। सुबह का वक्त है इसलिए मौसम हल्का सर्द है।

बस निकल पड़ी उत्तरकाशी के सफर पर और उम्मीद है कि दो बजे तक तो पहुंचा ही देगी। अंधेरा होने के कारण पहाड़ों मे कुछ भी दिख नहीं रहा है।

खिड़की खोली तो ऐसी ठंडी हवा का झोंका आया कि दोबारा से बंद करने पर मजबूर हुआ। बैग को पैर के पास रख समय की नजाकत को देखते हुए देखते ही देखते आंख कब झपक गई पता ही नहीं चला।

बरकोट

आंख खुली तो बस को किसी भरे बाज़ार में पाया। फ़ौरन मोबाइल खोल कर गूगल नक्शे पर देखा तो पता लगा बरकोट के समीप ही कहीं हूँ।

भीड़ इस कदर है सड़क पर की बस का निकलना दूभर हो गया है। फिर भी सांप की तरह रेंगते हुए बस इस बाज़ार से आगे बढ़ रही है।

चलते चलते एक जगह आ कर खड़ी हो गई और सभी यात्रियों को कुछ देर की मोहल्लत दी गई। सुबह के नौ बज रहा हैं गर्मी इस कदर पड़ रही है मानो किसी समतल शहर में आ गया हूँ।

बदन से जैकेट निकाल कर उतारनी पड़ रही है। ताकि कुछ राहत की सांस ले सकूं। जब ड्राइवर साहब ने समय दिया ही है तो बेहतर होगा की कुछ जलपान कि व्यवस्था भी देख ली जाए।

बस से बाहर उतर कर भीड़ भाड वाले बाज़ार में आया तो देखा ज्यादा कुछ खाने पीने की व्यवस्था तो नहीं है। कुछ एक समोसे जलेबी की दुकान और अगल बगल परचून की।

इस भीषण गर्मी में समोसा जलेबी तो खाने से रहा। जनरल स्टोर से बिस्कुट के कुछ पैकेट ले लिए। जो रास्ते भर काम आते रहेंगे। इतना ही समय बीत पाया कि बस का हॉर्न बज पड़ा।

वापसी उत्तरकाशी

और भागते हुए आया बस के भीतर। बाकी सवारियों के चढ़ते ही चल पड़ी। कंडक्टर के अनुसार तीन से चार घंटे के भीतर उत्तरकाशी पहुंच जाएंगे।

इन हरे भरे पहाड़ियों में गुजरते हुए ऐसा लग रहा है मानो यहीं बस जाऊं। अगर इस भीषण गर्मी को एक तरफ कर दिया जाए तो फिर ये जन्नत है।

बहुतेरे जगह को सड़क निर्मित है मगर कई जगह ऐसी भी आ रही हैं जहाँ बस डोल रही है। मगर हर रास्ते से सामने बर्फीली पहाड़ी का नज़ारा ऐसा दिख रहा है मानो पहाड़ियां पुकार रही हों।

सड़कों पर यात्रियों का तांता देखा जा सकता है। भरी हुई बसें और छोटी गाडियां रास्ते पर सवारियों को लेकर विश्राम मुद्रा में सस्ता रही हैं। मगर ड्राइवर साहब के इरादे कुछ और ही हैं।

ये अब कहीं ना रुकने वाले। बस गांव से होते हुए गुजरने लगी पुल से। जो नदिया के उस पार नैय्या लगाएगी। इस तरह के अनेकों पुल हमें पहले भी मिले हैं और आगे भी मिलेंगे।

रास्ते में पहाड़ों के दूसरी तरफ रेलिंग तक नहीं है। कुछ है भी तो टूटी फूटी। ये साफ दर्शाता है कि बारिश के दौरान यहाँ पहाड़ियों पर कभी कभार पूरी की पूरी सड़क तबाह हो जाती है।

कई जगह मलबा तो कई जगह इतने विशालकाय पत्थर देखने को मिल रहे हैं। जिसे हिलाना भी इंसान की कल्पना से परे है। सर्दियों की बर्फबारी के दौरान तो यहाँ आने लायक भी रास्ता नहीं बचता।

सवारियों का चढ़ने उतरने का सिलसिला जारी है। घने जंगलों के बीच से गुजरते वक्त नजर पड़ी जलते हुए लकड़ी के ढेर पर। कुछ इसी तरह से इंसान अपनी सहूलियत के लिए थोड़ी सी जगह पर आग लगाता है फिर वही आग विकराल रूप धारण कर लेती है।

और इस तरह से जंगलों मे आग फैलने लगती है जिस कारण सबसे ज्यादा कष्ट जानवरों को झेलना पड़ता है। जंगल इस कदर घना है कि धूप की किरण ज़मीन पर पड़ने को तरस रही है।

जंगल में लगी आग

बस जिस भी स्टॉप पर रुकती वहाँ खीरा ककड़ी वाले अपनी टोकरी ले कर प्रस्तुत हो जाते। हिमाचल के मुकाबले उत्तराखंड की सड़को की हालत खस्ता है।

बस की भीड़ भी अपना योगदान दे रही है बस का तापमान बढ़ाने में। भागीरथी के समांतर चल रही बस अब संकेत दे रही है कि उत्तरकाशी दूर नहीं।

मैं अपना बिखरा सामान समेट कर छोटे बैग में भरने लगा। पुल के पार करते ही हम शहर में पधार चुके हैं। अभी दिन के डेढ़ बज रहे हैं।

आखिरकार उत्तरकाशी

देखा जाए तो कुल साढ़े सात घंटे के भीतर बस ने जानकीचट्टी से उत्तरकाशी ला पटका। और बड़कोट से चार घंटे में। पिद्दी से बस अड्डे में बस जा घुसी।

जिसमे मात्र एक बार में दो से ज्यादा बसें आ ही नहीं सकती हैं। दद्दू सहित सभी सवारियां उतरने लगीं। बस अड्डे पर धूल इस कदर है जिसकी कोई सीमा नहीं है।

बगल मे खड़ी बस से सटी बस से उतरने लगा तो सबसे पहले यही हल्ला सुनाई पड़ा कि गंगोत्री जाने वाली बस कहाँ से मिलेगी।

पूछताछ

मेरा भी यही प्रश्न है। और इसी का उत्तर लेने पहुंचा खिड़की पर तो उसे बंद पाया। हैंडपंप से पानी भरने के बाद बगल में लगी दुकान से पता चला कि अब गंगोत्री जाने के लिए कोई बस उपलब्ध नहीं है।

तो कुछ मीटर पैदल चल कर जीप स्टैंड से जीप करके जाना पड़ेगा। इसके अलावा दूसरा कोई विकल्प भी नहीं है। यही करना भी ठीक समझा।

खिड़की काउंटर के पास धूमिल ही रहे बैग को उठाते हुए चल पड़ा जीप स्टैंड की ओर। चलते चलते जा घुसा एक ऐसी जगह जहाँ सिर्फ और सिर्फ बस ही बस नजर आ रही हैं।

बस अड्डे के पिछले हिस्से में पहुंचा तो उन्होंने भी वही बात दोहराई जो दुकान वाले ने दोहराई थी। जिस बस से आया हूँ वो ऐसे खड़ी है मानो अब कभी अपने काल में दोबारा चलने का मौका ना मिले इसे।

साथ मे दद्दू भी चल रहे है जो बनारस के रहने वाले हैं। इनकी भी चारधाम जाने की योजना है। इसी के चलते हमारा और दद्दू का साथ जानकीचट्टी के पहले दिन से बना हुआ है।

पीठ पर झोला टांगे आगे आगे चल रहे हैं ऐसे जैसे सारी जिम्मेदारी इन्हीं के कंधो पर है। जोश में कोई कमी नहीं है। तकरीबन एक किमी चलने के बाद आया टैक्सी स्टैंड।

यहाँ पहुंच कर पता चला कि भैया गंगोत्री के लिए टैक्सी तो जाएगी मगर इंतजार करना पड़ेगा। बगल में भरी टैक्सी खड़ी है जो निकलने के लिए रवाना हो रही है।

खिड़की से पहले पर्ची कटवानी पड़ेगी जिसका तय भुगतान लिया जाएगा। उसी के बाद टैक्सी में विराजमान हो सकते हैं। दद्दू की तरह मैंने भी दो टैक्सी टिकट बुक करवाने लगा अगली जाने वाली टैक्सी के लिए।

पहली गाड़ी तो भर कर निकल गई। अब बारी है ये गाड़ी भरने की। देखा तो एक भाईसाहब पहले से ही मौजूद है जो जीप की छत पर सिलिंडर तानने को खड़े हैं।

ऊपर से जब ड्राइवर साहब बोलने लगे कि अपने अपने बैग भी ऊपर ही रख दो तब तो मानों जैसे हाँथ पनव ही फूल गए हों। क्या पता चलती जीप से सामान ही पहाड़ों में लुढ़ककर नीचे गिर जाए तो!

इस शंका का निवारण करते हुए ड्राइवर साहब बताने लगे कि उसे तिरपाल से ढक कर रस्सी से बांधा जाएगा। ये सुन का जान में जान आई।

और बैग ऊपर ही सिलिंडर के बगल मे लदवा दिया। कुछ ही देर में एक अधेड़ उम्र का जोड़े के आते ही सवारियां पूरी हो गई। गाड़ी स्टार्ट होती की मैंने पहले ही आगे की सीट पर कब्ज़ा जमा लिया है।

नया सफर जीप

लमसम ढाई बज रहे हैं अभी और हम निकल पड़े गंगोत्री के लिए। शहर से बाहर निकलते हुए उसी पुल के रास्ते हम जाने लगे जिसपर से कुछ देर पहले ही गुज़रे हैं।

आसमान में बादल भी हैं और साथ ही तेज़ धूप। इन दोनों में ही फिलहाल तो सूरज ने बाजी मार रखी है। भागीरथी के समांतर ही चलते जाना है।

इन हरे भरे ऊंचे ऊंचे पर्वतों को देख ह्रदय कांप उठता है। सीना तान खड़े इन पहाड़ों के सामने अपने आप को तिनके समान महसूस कर रहा हूँ।

भागीरथी नदी के पास तो चौड़ें चौड़े मैदान है। अमूमन ही ये नदियां बारिश में अपना विराट रूप धारण करती होंगी। की पानी सड़क तक बेहते हुए आ जाता है।

पर इन्हीं नदी के किनारे बसे घर भी देखने को मिल रहे है मगर थोड़ा दूर। शायद केदारनाथ त्रासदी के बाद इंसानों में थोड़ी अकल तो आ ही गई है।

मैं हाँथ में अपना कैमरा लिए कभी ड्राइवर के सिर के ऊपर से कभी दाएं कभी बाएं से, चौतरफा फोटो खींचने में लगा हुआ हूँ। आमतौर पर इन पहाड़ियों पर जाने की जुर्रत कोई करता नहीं होगा।

क्यूंकि ये इतने घने हैं की इनमे जंगली जानवरों का निश्चित ही वास होता होगा। छोटे बड़े हर प्रकार के पहाड़ दिख रहे हैं और सभी खतरनाक हरियाली के साथ अडिग हैं।

ऐसे बड़े बड़े पत्थर ये चीख चीख कर बता रहे हैं कि किस कदर यहाँ भूस्खलन होता होगा। जिस कारण पहाड़ से गिर कर ये पत्थर अब या तो नदी किनारे पड़े हैं या फिर सड़क किनारे।

मनेरी के पास से गुजरते हुए हमें मानव निर्मित मनेरी वाटरफॉल देखने को मिल रहा है। ड्राइवर साहब बता रहे हैं कि बरसात के समय ये और भी विकराल हो जाता है।

ये पहाड़ी ये नदी का किनारा

हिमाचल और उत्तराखंड के पहाड़ों में काफी अंतर है। हिमाचल के पहाड़ ठोस और बुनियादी दिखाई पड़े। वहीं उत्तराखंड के पहाड़ छितरे और ज्यादा पथरीले।

भागीरथी नदी के समीप कपडे धोती महिलाऐ

शायद इस कथन से कई लोग सहमत ना हों। पर दोनों जगह जो एक बात सामान है वो ये कि दोनों ही जगह इंसानों ने पहाड़ों पर कब्ज़ा किया है जो कभी जानवरों का आशियाना हुआ करता था।

तभी आज भी तेंदुए और चीते के घर में घुसने कि वारदाते अक्सर यहाँ होती रहती हैं। गाड़ी आगे बढ़ी और एक पहाड़ जलता हुआ दिखाई पड़ा।

जिस कुछ देर पहले चर्चा करी थी कि किस कदर जंगलों में आग लगती है। शायद ये पाठ निचले तबके के आदमी को सीखना बहुत ही ज़रूरी है।

घुमावदार रास्तों पर हर कोई यहाँ गाड़ी चला भी नहीं सकता। उस तेज़ी के साथ जो यहाँ का रोजमर्रा वाला चालक है। खासतौर पर नौसिखियों को तो बैठना ही नहीं चाहिए चालक सीट पर।

दिन ढल रहा है रास्ते में अनेकों जीप, ट्रेवलर गाडियां देखी जा सकती हैं। कुछ ऐसे भी लोग हैं जो अपनी फतफटिया से सैर करने को ज्यादा सरल मानते हैं।

उनकी भी तादाद अच्छी खासी है। हवा में धुंध के कारण दिखाई थोड़ा कम देने लगा है। कभी कोई पहाड़ी चड़नी पड़ रही है तो कभी उतरनी।

रास्ते इस कदर भ्रम पैदा करने वाले हैं कि ड्राइवर भी चकरा जाए रहे हैं। जैसे अभी हाल फिलहाल में गलत मोड़ से मुड़ कर कहीं और ही को चल पड़े थे।

फिर वापस गाड़ी घुमाई और सही रास्ते पर ले कर आए। अभी तक जितने झरने उत्तरकाशी से गंगोत्री के रास्ते देखने को मिले हैं उतने कहीं और नहीं।

सूखी टॉप

सूखी टॉप पर गाड़ी आ पहुंची है। अभी हर्षिल पहुंचने में घंटा भर लग जाएगा। सूखी टॉप पर पहुंचा ही हूँ कि भारी भरकम जाम देखने को मिला।

वक्त साढ़े पांच हो चला है। ना जाने कब ये जाम खुलेगा। पहाड़ों में अक्सर ऐसे जाम लग जाते हैं। कभी किसी दुर्घटना के चलते तो कभी ओवरटेक करने के चलते भी।

सूखी टॉप के सामने लगातार पहाड़ियों कि श्रृंखला का ये अद्भुत नज़ारा शायद ही कहीं और देखने को मिले। जीप हल्की हल्की आगे बढ़ रही है।

पहाड़ियों कि श्रृंखला

इससे पहले पूरी तरह से आगे निकल जाए ऐसे सुन्दर नज़ारे को मन में बसाने के अलावा कैमरे में भी बसा लूं तो और भी उम्दा होगा।

कुछ एक तस्वीरें ली जिसमे से एक एकदम साफ आईं। और जीप उस जगह से हट कर और आगे को आ गई। आगे लगे शीशे से साफ दिख रहा है जाम बहुत ही लंबा है।

ये कब खुलेगा कोई भरोसा नहीं। गाड़ी में बैठे सभी यात्री आंखे फाड़ फाड़ कर बाहर के नज़ारे को ऐसे निहार रहे हैं जैसे पहले कभी पहाड़ ही ना देखे हों।

हालांकि इसमें इनकी कोई खता नहीं। तकरीबन आधे घंटे जाम में खड़े होने के बाद आखिरकार गाड़ी चल ही दी। काले घने बादलों के बीच ऐसा लग रहा है गाड़ी ज़मीन पर नहीं आसमान में उड़ रही हो।

पहाड़ियों से गाड़ी मुड़ते हुए ऐसे मोड़ पर आईं जिसके सामने सिर्फ बर्फ की ही पहाड़ी नजर आ रही हो। मानो खुद हिमालय सामने खड़ा हो। गाड़ी के तेज़ रफ़्तार में होने के कारण फोटो लेना सम्भव नहीं हो पा रहा है।

पहला और अंतिम पड़ाव

जाम की थकान से निकलने के बाद पुराली में ड्राइवर साहब ने मन बनाया जीप रोकने का। जीप रूकी और जैसे सभी यात्रियों ने राहत की सांस ली।

बगल में दिख रही दुकान में चाय नाश्ते की व्यवस्था देख सबके चेहरे खिल गए हैं। उससे भी पहले सबको अपनी अपनी टंकी खाली करने की याद आई।

और इसी रेस्त्रां के पिछवाड़े में सब बारी बारी से टंकी खाली करने पहुंच गए। सबसे आखिरी में मेरा नंबर आया। बात आईं कुछ दिया है तो कुछ लेना भी पड़ेगा।

हल्की फुल्की भूंख भी लग ही रही है। सो चाय और समोसा ऑर्डर कर दिया। मेरे साथ साथ चल रहे अधेड़ उम्र का जोड़ा थोड़ा भावुक नजर आ रहा है।

और एक साथ ही हमारी मेज़ पर विराजमान हो कर उन्होंने भी कुछ ना कुछ ऑर्डर दे डाला। अजय ने कैमरे से भरा बैग रख चाय की चुस्की लेने लगा।

ज्यादा वक्त नहीं बीतने पाया कि ड्राइवर साहब ने सबको चलने का आदेश सुना दिया। सारी की सरी सवारियां भुगतान करके बैठने लगी जीप में।

इस बार मैंने भी अपना स्थान बदल कर पीछे की सीट पर आ गया। सोचा इन खूबसूरत पहाड़ियों कि तस्वीरें लेने की ये बढ़िया जगह है।

बैग रह गया रेस्त्रां में

अगल बगल हाँथ मारा पर बैग दिखा ही नहीं। अजय को पूछा तो उसके होश फाख्ता हो गए। पूरी गाड़ी में अबतक हल्ला मच चुका है कि बैग दुकान पर ही छूट गया है

ड्राइवर साहब ने समझदारी दिखाते हुए गाड़ी मोड़ी और वापस दुकान की ओर चल पड़े। अच्छी बात ये है कि अभी ज्यादा सफर तय नहीं किया है।

और कुछ आधा किमी पीछे वापस आया। मेरे गाड़ी से उतरते ही बरसात चालू हो गई। उधर रेस्त्रां में बैग जहाँ का यहाँ सीट पर रखा हुआ था। शुक्र है मिल गया।

कैमरा मिलने के बाद का पहला फोटो

हल्की बूंदबांदी के बीच जीप में यही चर्चा हो रही है कि समय रहते याद आ गया वरना ना जाने क्या होता। बैग में दोनों कैमरे जस के तस पड़े हुए थे।

बरसात के बीच अब वो नज़ारा तो नहीं आ रहा पर बैग मिलने की खुशी ज्यादा है। हर्षिल आते आते गाड़ी से दो नौजवान बीच रास्ते में ही उतर गए।

शायद ये आज यहीं कहीं नदी किनारे तंबू गाड़ेंगे। ड्राइवर साहब ने बताया कि हर्षिल राजमा और सेब के लिए बहुत ही प्रसिद्ध है। साथ ही इसका नाम भी श्री हरी के नाम पर पड़ा है।

अब घनघोर अंधेरा हो चुका है। अभी भी गंगोत्री पहुंचने में घंटे डेढ़ घंटे का समय लग सकता है। नक्शे पर देखा तो पता लगा अभी भी यहाँ से 26 किमी की दूरी तय करनी बाकी है।

इससे पहले मैं कुछ अजय को दो चार बातें बैग के लिए सुनता वो समझदारी के साथ गाने सुनने लगा। अंधेरे में अब बाहर कुछ भी दिखाई नहीं पड़ रहा है।

इंतजार है तो बस गंगोत्री धाम पहुचनें का। बचपन से ही इस जगह के बारे में बड़े बूढ़े लोगों से काफी सुना भी है। आज वहाँ तक पहुंचने का मौका मिल रहा है।

कहते है कि गंगा को उद्घमं स्थान गौमुख है। जहाँ से मां गंगा निकलती हैं जो कि गंगोत्री से कुछ 18 किमी दूर है। पर वहाँ तक जाने की तो मेरी ऐसी कोई भी योजना नहीं है।

गंगोत्री पधारे

रात के आठ बज रहे हैं और हम सकुशल गंगोत्री आ गए। मुझे लगा यहाँ भी यमनोत्री की तरह ट्रेक्किंग करनी पड़ेगी। गाड़ी से उतरा और ऊपर सिलिंडर के बगल मे रखा बैग निकलवाया और चल पड़ा।

साथ में चल रहे हैं जोशीले दद्दू। उनका भी हाल हमारी तरह है। वो भी यहाँ कोई कमरा या आश्रम तलाशेंगे और वहीं रुकेंगे। पर यहाँ पता लगा कुछ ही आगे गंगोत्री मंदिर है।

मुश्किल से आधा किमी। यमनोत्री की तरह चढ़ाई नहीं है। एक बड़े से गेट के भीतर गाड़ियों का प्रवेश वर्जित दिख रहा है। तो सभी जीप और दुपहिया गाडियां बाहर ही खड़ी हैं।

बाज़ार में खूब हलचल है। भक्तों का तांता लगा हुआ है। जमकर भीड़ देखने को मिल रही है। जैसे जैसे आगे बढ़ रहा हूँ कोई ना कोई या तो अपने होटल में बुलाता या अपने रेस्त्रां में।

अभी ठीक से सांस भी नहीं ली है और ये हाल है। पहले तो मुझे एक कमरे की तलाश है। जहाँ इत्मीनान से बैग रख सकूं। मगर जितने भी होटलों या आश्रम में पूछ रहा हूँ वहाँ दाम आसमान छू रहे हैं या तो खाली ही नहीं हैं।

गंगोत्री

मेरे दाएं हाँथ पर एक छोटी सी दुकान में गौमुख जाने का रजिस्ट्रेशन हो रहा है। जानकारी करते करते मालूम पड़ा की शाम को इस लाइन के लिए भी सुबह पर्ची कटानी पड़ती है। तब जा कर आप योग्य होते हैं यहाँ खड़े होने के।

पूछताछ में पता चला कि गौमुख तक का परमिट ऑनलाइन भी मिल जाता है। और मात्र डेढ़ सौ लोगों को ही एक दिन में जाने को मिलता है। तो बेहतर है गंगोत्री आने से पहले ही परमिट लेलो।

साधु संतों का क्या है। उन्हे कोई पर्ची कागज की ज़रूरत नहीं। झोला ताना और चल पड़े। मगर सुनने में आ रहा है कि जब ऊपर से हरी झंडी मिल जाती है तभी गौमुख जाने दिया जाता है।

क्यूंकि वहाँ भी कभी भूस्खलन या पहाड़ गिरने के मामले सामने आते रहते हैं। इस वजह से भी कभी दिनभर इंतजार कर रहे यात्रियों को खाली हाँथ लौटना पड़ता है।

नदी के किनारे आ गया। यहाँ पर जोरदार लहरों की आवाज़ सुनी जा सकती है। मैंने अपने जीवन काल में गंगा का इतना तेज़ बहाव शायद ही कहीं देखा हो।

टिमटिमाती रोशनी के बीच नदी के उस पार पहाड़ का निचला हिस्सा जगमगा उठा हो।

ग्लास हाउस से आस

होटल की तलाश में किसी ने बताया कि अगर कमरा चाहिए तो मंदिर के भी आगे निकल जाओ वहाँ कमरा आराम से मिल जाएगा।

सो यही करने के लिए मंदिर के पास से गुजरने लगा। बंद पड़े मंदिर के बाहर लोग हाँथ जोड़े खड़े प्राथना करते नजर आ रहे हैं।

हाँथ जोड़ते हुए मैं भी आगे बढ़ गया। मंदिर से सौ मीटर की दूरी पर बने आश्रम में कमरा पूछा तो कमबख्त यहाँ भी कमरा खाली ना मिला। वापस चल पड़ा मंदिर की ओर।

ठीक कुछ दूरी पर बना ग्लास हाउस बहुत ही रिझा रहा है। अन्दर झांक कर देखा तो दरी बिछी दिखी। शायद हर किसी को अन्दर जाने की अनुमति नहीं है।

राह से गुजर रहे आचार्य से पूछा तो मालूम पड़ा की यहाँ रुकने के लिए विशेष तौर पर मंदिर के आचार्य से अनुमति लेनी होगी। वो कहाँ मिलेंगे इस पर दिशा दिखाते हुए उन्होंने नदी की ओर जाने को कहा।

भागते हुए नीचे जाने लगा तो मंदिर के आचार्य सीढ़ी पर ही मिल गए। उनको सारी आप बीती बताई पर फिर भी उन्हें दया ना आईं। और नदिया के उस पार बने आश्रम में जाने को कहा। बहुत मान मनाऊल के बाद आखिरकार उन्होंने रुक जाने की अनुमति दे ही दी।

जब रुकने की व्यवस्था होती दिख गई तो बात आईं पेट पूजा की। बाज़ार में अब तक कई रेस्त्रां बंद हो चुके हैं। बमुश्किल एक अभी भी खुला है जिससे थोड़ी आस है।

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नमस्ते, मैं ऐश्वर्य तिवारी हूं। ये उन दिनों की बात है जब मैं अपने जुनून का पालन करने के लिए अपने कॉर्पोरेट जीवन को पीछे छोड़ दिया।भारत को जानने के मेरे अंदर हमेशा एक जिज्ञासा थी क्योंकि इस देश में हर कुछ मील के बाद विविधता, विभिन्न संस्कृति है। हर दिन मेरे लिए एक नए शहर में एक नई प्राणी के साथ एक नया दिन है। मैं एक घुमक्कड़ हूं जो के विभिन्न हिस्सों में घूमना पसंद करता है और जल्द ही भारत से बाहर हो सकता है।

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