गंगोत्री धाम में माँ गंगा के दर्शन

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कल रात की मशक्कत का फल

कल रात ग्लास हाउस में सोने की अनुमति तो मिल गई थी। पर समस्या आ रही थी कि इन दो बड़े बड़े बैग का क्या किया जाए। और मोबाइल और जूते कहाँ रखे जाएं।

ऐसे में यही तरकीब सूझी की जूते और मोबाइल को स्लीपिंग बैग में डाल कर सो लिया जाएगा। और दोनों बैग की बद्धी को एक दूसरे से बांध कर उसमें चेन बांध दी जायगी।

और उसी बैग को सिरहाने रख कर सो लिया जाएगा। यही तरकीब सही लगी और यही आजमाया भी। मोबाइल और जूते को पन्नी में लपेट कर स्लीपिंग में पैर के पास डाल लिया। और बैग को चेन से बांधकर उसी पर लदकर सो गया।

सुबह हुई तो सारा सामान जहाँ का तहाँ मिला। कुछ भी चोरी नहीं हुआ। ग्लास हाउस में दरी बिछाकर और भी लोग सोए थे। उनमें से कुछ तड़के ही निकल लिए थे। कुछ अभी भी से ही रहे हैं।

इस बात से बखूबी मुखातिब था की जितनी जल्दी कतार में खड़ा हो जाऊंगा उतनी जल्दी मंदिर में दर्शन हो जाएंगे। घड़ी में छह बज रहे हैं।

उठा और ये तय हुआ कि बारी बारी से नित्य क्रिया के कि जाएंगे। पहले साथी घुमक्कड़ गया। तब तक मैंने सारा बिखरा हुआ समान समेटने लगा।

स्लीपिंग बैग में से जूते अलग किए और मोबाइल जेब में डाला। साफ करके उसे बड़े बैग में रखने लगा। जब तक साथी घुमक्कड़ नहीं आ जाता तब तक मंजन तो किया ही जा सकता है।

पर सामान अकेले नहीं छोड़ा जा सकता। ग्लास हाउस की खूबी यह है कि इसमें अन्दर और बाहर जाने का एक ही रास्ता है। तो कोई बाहर निकलेगा भी तो नजर में आ जाएगा।

काफी वक्त बीत गया पर साथी घुमक्कड़ का कोई अता पता नहीं है। रोजाना इतनी देर तक मंजन करने की भी आदत नहीं है। जब समय और बढ़ गया तो ग्लास हाउस के मुहाने पर आ खड़ा हुआ ये देखने के लिए की ये आदमी आयगा भी या नहीं।

ग्लास हाउस के मुहाने पर अपने परिवार के साथ खेलती बच्ची को देख अपना बचपन याद आ गया। जब परिवार के साथ मैं भी कहीं बाहर घूमने जाया करता था।

साथ ही साथ ग्लास हाउस के अंदर भी झांक ले रहा हूँ कि सामान तो नदारद नहीं हुआ है। अन्दर एक और परिवार है जिसने मेरी तरह इसी कांच के घर में रात गुजारी है।

वो भी अपना बुरिया बिस्तरा समेट कर निकलने की तैयारी में हैं। ग्लास हाउस का निर्माण चाहें जिस लिए भी हुआ हो लेकिन रात को तो ये विश्राम घर बन गया था।

पर जहाँ मैं सोया था उसके आसपास हैलोजेन और माइक की तारें बिछी हुईं थी। जिससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है की इस हाउस ने भजन कीर्तन जागरण होते रहते हैं।

मजेदार बात ये भी है कि हर कोई रुक भी नहीं सकता यहाँ। क्यूंकि रात बिरात समय समय पर या तो पुजारी या देखरेख करने वाले आते रहते हैं कि कौन कौन मौजूद है कमरे में।

ग्लास हाउस के उस तरफ से गंगा जी का शानदार नजारा देखा जा सकता है। कमबख्त साढ़े छह बज रहे हैं और दूर से मुझे साथी घुमक्कड़ आता हुआ दिखाई दे रहा है।

इतनी देर में आने का सवाल पर जवाब मिला कि भाईसाहब काफी देर तो दुसालखाना ही ढूढते रह गए। जिस कारण विलंब हो गया।

नित्य क्रिया के लिए तलाश

मैं मंजन ही करते बाहर से ही निकल गया। पास के नल्के में कुल्ला किया और ब्रश वाला ग्लास हाउस मे रखे बैग में रखें आया।

साथी घुमक्कड़ ने मुझे कहीं नीचे की ओर जाने का सुझाव दिया। जो मुझे बिल्कुल भी पल्ले ना पड़ा। मंदिर के कैंपस के बाहर आया और नीचे जाने लगा।

पर नीचे मुझे कुछ भी ना मिला। आसपास के लोगों से पूछा तो किसी ने दाएं तो किसी ने बाएं जाने को कहा। सो चलता चला गया और दाएं हाँथ पर थोड़ा ऊपर को ओर चल पड़ा।

यहाँ आया तो देखा भीड़ लगी है जिसमे इक्का दुक्का लोग अपनी बारी का इंतजार करते दिखे। अब लगा शायद सही जगह आ गया हूँ।

पर जैसा माहौल है उस हिसाब से तो यही लग रहा है किसी आंगन में घुस आया हूँ। खैर जो भी हो अपना काम बनता भाड़ में जाए जनता वाला हिसाब होता दिख रहा है।

सारा काम निपटा कर चल पड़ा ग्लास हाउस की ओर। नहाने का फंडा बहुत ही सरल है। और वो है नदी। गंगा किनारे कोई खड़ा हो कर अगर ये पूछे कि कहाँ नहाना है तो लानत है उस शक्स पर।

ग्लास हाउस में आया तो ये तय हुआ घाट पर बैग भी साथ ले जाना उचित रहेगा। क्यूंकि इतनी दूर तक बैग छोड़ के जाना भी खतरनाक साबित हो सकता है।

स्नान का समय

बैग उठाया और चल पड़ा नदी किनारे स्नान करने। ग्लास हाउस के बाहर जानता काफी जमा होने लगी है। मंदिर के सामने लाइन लगने का सिलसिला शुरू हो चला है।

बेहतर यही होगा जितनी जल्दी इस कतार में मैं शामिल हो जाऊं। बैग लेकर फटाफट सीढ़ी के द्वारा पहुंचा घट पर। यहाँ का नजारा तो देखने लायक है।

चारों और बस लोगों के नहाने की होढ़ मची हुई है। गंगा मैया का बहाव देखने लायक है। इतना वेग और तेज़ शायद ही कहीं और देखा हो।

इस कदर की अगर कोई इसमें बहा तो गंगाजी में बेह कर कहाँ तक जाएगा किसी को अंदाज़ा नहीं। अगल बगल सब निर्वस्त्र हो कर स्नान करने में इतने व्यस्त हैं कि किसी को देखने का समय ही नहीं।

घाट किनारे जमा भीड़

फिर चाहें वो औरते हो, आदमी, बच्चे या बूढ़े। सबके नहाने का स्थान एक-घाट। पहले तो मुझे थोड़ी शर्म महसूस हुई स्नान करने के लिए निर्वस्त्र होने में।

बाद में अब ना कोई शर्म ना हया। पर मुश्किल ये है कि नहाया कैसे जाए। क्यों ना फूल वाले भैया की दुकान से बाल्टी या मग्गा उधार ले कर नहा लिया जाए।

ये तय हुआ पहले साथी घुमक्कड़ पानी का स्वाद चखेगा फिर मैं। मग्गा लेने के लिए मैं निकल आया फूल की दुकान में। जहाँ पर उम्मीद कम ही थी पर छोटी बाल्टी मिलने में तनिक भी देरी ना हुई।

खुशी खुशी बाल्टी पकड़ा दी। उधर जब तक साथी घुमक्कड़ नहाने के लिए गया। तब तक घाट पर अलग अलग नज़ारे देखने को मिले। कोई नहाने के नाम पर कौआ स्नान कर रहा है।

कोई पुजारी से पूजा पाठ करवा कर गंगा किनारे अपने पापों का प्रष्चित कर रहा है। इस पर ब्राम्हण भी मोटी कमाई करने नजर आ रहे हैं।

यहाँ घाट तो बहुत से हैं और सभी व्यस्त हैं। मैं जिस घाट पर बैग लेके खड़ा हूँ यहाँ तो अगल बगल गांव की महिलाएं जल चढ़ाती हुई या तो पूजा पाठ करती हुई ही नजर आ रही हैं।

अच्छी बात ये है कि महिलाओं के लिए अलग से स्नानघर बना हुआ है। जिस वजह से सभी को सहूलियत है। उधर हाँथ में बाल्टी लिए साथी घुमक्कड़ जा पहुंचा घाट और सडासड पानी डालकर नहा भी लिया।

मन ही मन ख्याल भी आने लगा अब इस ठंडे पानी का मेरे बदन पर पड़ने की बारी है। कई लोग घट किनारे ही नहाते दिखे। किसी ने इतनी हिम्मत नहीं की गंगा जी में उतर कर डुबकी लगा ले। जाने क्यों?

मिशन स्नान

साथी घुमक्कड़ के आ जाने के बाद बाल्टी थामी और कपड़े एक किनारे उतार कर चल पड़ा। गंगा जी का वेग इतना हावी है कि इसके सामने किसी के टिकने का बस ही नहीं चल सकता।

घाट किनारे आ खड़ा हुआ। पर भीड़ इस कदर है की नहाने के लिए स्थान ही नहीं मिल रहा। सोच रहा हूँ बगल में खड़े दादू अपना काम धाम निपटा कर जाएं तो स्नान शुरू किया जाए।

खामखां मेरे साथ साथ इनका भी स्नान हो जाएगा दोबारा। इधर मेरे बाएं तरफ एक आंटी जी और उनके बगल में बैठे एक सज्जन कौआ स्नान करके ऐसे भागे जैसे भूत से सामना हो गया हो।

नहाने के लिए हिम्मत जुटाते लेखक

हिम्मत करके बाल्टी नदी में डाली और भर के अपने ऊपर डालने लगा तभी एक महान पुरुष बगल में आ खड़ा हुए। अब इनके जाते ही जैसे पानी से भरी बाल्टी सिर पर डाली सात पुश्ते याद आ गई।

इतना ठंडा पानी किसी भी नदी का नहीं होगा जितना यहाँ है। पैर तो मानो जम गए हो। पता भी नहीं चल रहा पैर हैं भी। फटाफट बचे कुचे शरीर में पानी डाला और बाल्टी लेके किनारे आ गया।

मिशन स्नान पूरा हो गया। मानो पूरा शरीर सुन्न पड़ गया हो। थोड़ा ऊपर से किसी लड़की की चीखने की निरंतर आवाज़ आ रही है।

घाट किनारे माहौल

उसकी मां उसे जबरन पानी में ले जाना चाह रही हैं। पर जमे हुए पानी की ताकत का अंदाज़ा है इस लड़की को तभी इतना चीख पुकार कर रही है।

आखिरकार मां की जीत होती दिख रही है। उसे घाट तक तो ले आईं पर उस लड़की पर पानी की एक बूंद पड़ते ही वो हाँथ छुड़ा कर फिर भाग गई।

ये सिलसिला ऐसे ही ना जाने कब तक चलेगा। बैग के पास आ कर खुद को थोड़ा शांत किया। शरीर पोंछा कपड़े डाले। लगा पूजा पाठ भी कर लेना चाहिए।

पर सुविधा नहीं है। बाल्टी ले जा कर वापस फूल वाले को पकड़ा दी। नहाने के बाद बहुत ही तरोताजा महसूस है रहा है।

उस लड़की कि चीख पुकार अभी भी सुनी जा सकती है। आखिरकार उस जिद्दी लड़की नहीं तो नहीं नहाया। घाट पर स्नान और पूजा पाठ का सिलसिला जारी है।

अमीर गरीब हर तबके का आदमी यहाँ नजर आ रहा है। जो थोड़े ज्यादा मॉडर्न कहलाए जाने वाले लोग हैं वो होटल से ही तैयार होकर आ गए हैं और यहाँ कौआ स्नान कर रहे हैं।

नदी के उस पार बने घाट पर सन्नाटा पसरा है। शायद वहाँ पर प्रशाशन कि अनुमति ना हो इस्तेमाल करने की। साढ़े सात हो चला है। जितनी जल्दी लाइन में लगूंगा उतना सजग रहेगा।

नदिया के पार का सन्नाटा

उस पार बने आश्रम में भी अच्छी खासी भीड़ नजर आ रही है। मगर पुल पार करते हुए सबको इधर ही आना पड़ेगा। हालांकि नदी के दूसरे छोर पर कुछ एक युवक नदी किनारे कुछ हरकत करते दिखाई पड़ रहे हैं।

ऊंचे ऊंचे पहाड़ जो अभी इतने सुहाने लग रहे हैं रात में नजर भी नहीं आ रहे थे। टीप टाप बन कर एक आधी फोटो खींचवाईं और बैग लेके निकल पड़ा मंदिर की लाइन में लगने।

वापस ग्लास हाउस

गीली सीढ़ियों पर से चलते हुए ऊपर आ पहुंचा। लोगों का हुजूम अभी भी घाट की तरफ अग्रसर हो रहा है।

बैग लिए लिए ग्लास हाउस पहुंचा तो ना सिर्फ यहाँ सन्नाटा पसरा मिला बल्कि कांच पर धूप पड़ने के कारण जो गर्मी उत्पन्न हो रही है वो भी विवाह कर रही है बाहर निकलने को।

दोनों बैग को कल की ही तरह चेन से बांधकर चादर बिछा कर लपेट दिए। क्यूंकि बैग के साथ दर्शन करना थोड़ा मुश्किल साबित होगा।

मगर समस्या आ रही है इन जूतों की। इसे किन्हीं जूता चप्पल स्टैंड में जमा कर दूं तो ज्यादा बेहतर है। ऐसा घर तो मंदिर के कैंपस के बाहर ही मिलेगा।

सो मैं दोनों जोड़ी जूते ला कर सुरक्षित जमा करवाने के लिए बाहर आ गया। द्वार के बाहर ही एक चप्पल घर मिला। जो बाकायदा एक कमरे में है। ज्यादा सहज और सुरक्षित। और

मैंने अलग तौर पर इन महंगे जूतों को अलग से बोरी में भरवाकर अलमारी के सबसे ऊपरी हिस्से में रखवाया। ताकि उनसे भी कोई ग़लती की गुंजाइश ना रहे।

टोकन लिया और आ गया। ग्लास हाउस में भगवान के भरोसे बैग छोड़ कर निकल आया। हाँथ में कैमरा और मोबाइल ले कर।

कतार में लगने की होड़

कतार बहुत तेज़ी के साथ बढ़ती चली जा रही है। और ये इतनी बढ़ गई है कि की जीना उतरकर पीछे दिख रहे आश्रम के सामने तक पहुंच गई है।

रेलिंग रस्सी और सुरक्षाकर्मियों से आगे बढ़ते हुए भागा भागा आया और हनुमान जी की पूंछ की भांति लंबी होती कतार में लग गया।

मेरे देखते ही देखते कतार इतने पीछे तक पहुंच गई की गौमुख को जाने वाले रास्ते तक जा पहुंची है। दूसरी लाइन लगने पर सुरक्षाकर्मी ने फौरन हरकत में आते हुए इस कतार को भंग किया।

और लाठी के दम पर पीछे भगाया। इधर मेरे पीछे खड़े कुछ आदमी गंगोत्री की व्यवस्था को खस्ता हाल बता रहे हैं। उन चार पांच लोगों के दल में से एक सज्जन का मानना है कि यहाँ की व्यवस्था गुजरात के मुकाबले काफी पीछे है।

उनकी इस टिप्पणी ने मेरा ध्यान आकर्षित किया। मैंने इच्छावश और जानना चाहा। आगे बताते हुए बोले कि जिस हिसाब की यहाँ सुरक्षा है उससे कहीं अधिक गुजरात के मंदिर में होती है।

साथ ही भीड़ को कितने हिस्से में बांट कर दर्शन करने के लिए भेजने होते हैं वो भी बेहतर है। बोलने लगे गुजरात यहाँ से पंद्रह साल आगे है।

उनके इस कथन से मेरे अंदर गुजरात जाने की इच्छा और प्रबल होने लगी। आगे बोले की वहाँ पर जगह जगह भक्तगणों की रहने और खाने पीने की व्यवस्था तो मुफ्त ही हो जाती है।

बातें हो ही रहीं थी कि इतने में एक चाय वाला गुज़रा। अब भला जो शक्स दर्शन के लिए खड़ा हो वो कैसे कुछ खा पी सकता है। मगर यही बेचने वालों का धर्म है।

पर इन सज्जन की एक बात से तो मैं पूर्णतः सहमत हूँ। की यहाँ जो वीआईपी एंट्री दी जा रही है कुछ पैसों के खातिर वो ग़लत है। आखिर लाइन में लगने वाला तो भक्त ही होता है।

गुजरती भौ की बातों को गौर से सुनते लेखक

फिर ये अमीरों के चोचले वाला खेल क्यों? कुछ पैसे दे कर अलग से छोटी लाइन में लग दर्शन कर लेना। ये सामाजिक भेदभाव है जो भक्तों मे किया जा रहा है।

पर ये पूरी तरह से सरकार और प्रशाशन के हाँथ में है। और एक तरह से कमाई का दूसरा माध्यम भी। ऐसे लालची प्रवत्ति का विकास होता है जाता है।

ये अमीर लोग आराम से अपने होटलों से उठकर बिना किसी कष्ट के आते हैं और पैसे का खेल करके अंदर हो जाते हैं। सब पैसे का चक्कर है बाबू भैया।

लाइन धीरे धीरे आगे बढ़ रही है और बढ़ते बढ़ते जीने के ऊपर आ पहुंची है। जो बीच लाइन में लगने की कोशिश कर रहे हैं सुरक्षाकर्मी उन्हे डंडे के बल पर खदेड़ रहे हैं।

इन जनाब के मुताबिक तो बिहार उस लिहाज से काफी पीछे है और हमारा यूपी? ये कथन कितने सत्य हैं ये तो उस राज्य में जा कर पता चलेगा।

धूप तेज हो चली है। घंटा भर लाइन में खड़े रहने के बाद अब जा कर लग रहा है मंदिर के कपाट तक जल्दी है पहुंचूंगा। महिलाओं, पुरुषों और अमीरों की अलग अलग कतारें हैं।

पहले बड़ी लाइन में लगे कुछ लोगों को अन्दर जाने देर रहे हैं उसके बाद इतने ही मात्रा में अमीरों को भी। भला जिन्होंने ने पैसा दिया है उनकी तो पुजारी जल्दी सुनेगा ही, भगवान का पता नहीं।

आखिरकार डेढ़ घंटे कतार में खड़े होने के बाद नंबर आ ही गया। गेट के समीप इस कदर भीड़ है कि आगे वाले पीछे और पीछे वाले आगे हो गए हैं।

अमीरों के हाँथ में अन्दर जाने के लिए एक अलग से पर्ची है। जो अगर खो गई तो वो भी आम आदमी की तरह या तो लंबी लाइन में लगेंगे या दोबारा वो पर्ची बनवाएंगे।

मेरे गेट पर पहुंचते ही यही हुआ। कुछ आम आदमी कुछ अमीर अन्दर भेजे गए। मैं बाहर ही खड़ा रह गया। मेरे पीछे जो खड़े थे वो मुझ को लांघते हुए निकल गए आगे।

आखिरकार मिला अंदर जाने का मौका

गेट खुला और इस बार मुझे भी अन्दर जाने का अवसर मिला। अन्दर जाते ही गंगा जी की मूर्ति को नमन किया और मुझे आगे भेज दिया गया।

मूर्ति के पास तक किसी को भी जाने की अनुमति नहीं है सिवाय पंडित के। सभी देवी देवताओं के दर्शन के बाद बाहर आ गया। बाहर आते ही लगा एक और बार अन्दर जाने को मिल जाता तो मज़ा आ जाता।

पर ये संभव नहीं है। और संभव है भी तो बहुत ही लंबी लाइन में लग कर। जिसके लिए समय पर्याप्त नहीं। गुजराती भाऊ ने अपना नाम राजेश बताया।

सोचा इनके साथ तस्वीर लेलुं। आखिर कभी ना कभी तो “पंद्रह साल आगे गुजरात” को देखने तो आना हुआ तो मुलाकात कर ली जाएगी।

राजेश भाई और उनके साथी

ग्लास हाउस की तरफ मुड़ा। लाइन के बीच से निकलते हुए। पुलिस वाले को लगा मैं कतार को भेदने की कोशिश कर रहा हूँ जो कि बिल्कुल नहीं है।

रास्ते में दद्दू मिल गए। बातचीत तो पता चला वो कल रात को ही नदिया के उस पार निकल गए थे। जहां उन्हें आश्रम में ठिकना मिल गया था।

जब मैंने अपना कल रात का ठहराव बताया तो सुन कर दद्दू चौंक गए। जानकीचट्टी में दद्दू ऐसे खुले में रुके थे और यहां मैं रुक गया।

कांच के इस घर में गर्मी एकाएक ऐसे बढ़ गई है कि खड़ा होना मुश्किल हो रहा है। फटाफट बैग उठाया और बाहर निकल आया।

सोचा आगे की दुकान से जूते ले कर किसी रेस्तरां में पेट पूजा कर ली जाए। राजेश भाई के द्वारा बताया गया कि अगर हम केदारनाथ जा रहे हों तो यहाँ का गंगा जल जरूर साथ लेते जाएं।

क्यूंकि यहाँ का ही जल केदारनाथ की शीला पर चढ़ाया जाता है। और वो जनाब बद्रीनाथ, केदारनाथ होते हुए गंगोत्री आए थे। इसी के चलते साथी घुमक्कड़ चल पड़ा लुटिया में पानी लेने।

मैं बैग की देखभाल के लिए यहीं रुक गया। नजर पड़ी मंदिर के पिछले हिस्से में बने घर पर जहाँ आचार्यों को भोज कराया जा रहा है।

एक एक कर संतो को दावत दी जा रही है। मुझे लगा शायद ये आम जनता के कि भी होगा। पर जब पूछा तो मालूम पड़ा सिर्फ मंदिर के महंतों के लिए ही है।

और प्रसाद थमा कर चलता कर दिया। कुछ ही देर में साथी घुमक्कड़ आ गया। अब बैग ले कर इस स्थान से विदा लेने की बारी है। कैम्पस के बाहर आया और दुकान के बाहर आकर टोकन दिखाया।

टोकन देखते ही महाशय ने सबसे ऊपर रखे जूते की बोरी नीचे उतारी और खोल दी। जैसे किस्से सुने थे जूते गुम होने के वैसा कुछ भी नहीं हुआ।

मंदिर के कपाट पर जमकर भीड़ है। लोग अभी भी आ रहे हैं अपने अपने दल के साथ। खैर मेरी आज की तो यही योजना है कि समय पर उत्तरकाशी पहुंच जाऊं।

पहले पेट पूजा फिर काम दूजा

पर उससे पहले अन्न ग्रहण कर लूं तो बेहतर रहेगा। ग्यारह बजने को आए हैं और पास के ही आलीशान रेस्त्रां में बैग लेके घुस गया।

अब भूख बर्दाश्त के बाहर हो रही है। रेस्त्रां तो ठीक ठाक लग रहा है। खाने पीने के दाम भी। सुबह में नाश्ते के लिए आलू के पराठे और मसाला चाय ऑर्डर कर दिए।

मात्र दो घंटे में ही दर्शन हो गए हैं। रेस्त्रां में सन्नाटा पसरा हुआ है। अधिकांश लोग दर्शन के लिए लाइन में लगे होंगे तो यहाँ क्या ही होंगे।

पहले बीच की सीट चुनी फिर सोचा खिड़की के पास बैठ कर नदी किनारे का नजारा भी लेता रहूँगा। बैग उठा कर आ गया इधर।

नदी का ये तेज़ वेग सामने पड़ी चट्टान पर टकरा कर दो भागों में बट रहा है। मतलब साफ है कि टिकना है तो चट्टान की भांति अडिग होना अडिग।

पर जब कुदरत का केहर बरपता है तब चट्टान भी कंकड़ का रूप ले लेती है।

रेस्त्रां में नाश्ते का इन्तज़ार करते लेखक

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