फोर्ट कोच्चि और संग्राहलय

केरेल | कोच्चि | भारत

पलरिवाट्टम

कल रात्रि सरथ के घर पर महफिल जमी थी। जब उसका मित्र भी सरथ से मिलने आया था। देर रात तक चली बात चीत में काफी कुछ सरथ द्वारा मुझे जानने को मिला।

सरथ ने हमारा बिस्तर जमीन पर लगा दिया था। जमीन पर सोए हुए अरसा हो चला था। साथ ही जमीन पर सोने से सुकून ज्यादा मिलता है। थकान के कारण का कब सो गया पता ही नहीं चला।

सोने के बाद सरथ साथी घुमक्कड़ के साथ रात्रि बाजार घूमने निकला। जहाँ दोनो ने स्वाद चखा नए तरह के जूस का जो दूध और नारियल के पानी से बनता है।

सुबह उठ कर पुराने कोच्चि और किले का दौरा करने का सोच रहा हूँ। स्नान ध्यान के बाद नाश्ते पर सरथ ने बुलाया है। सरथ का ये घर काफी बड़ा है।

रसोईघर उतना बड़ा जितने में कोई दो लोग पलंग डाल कर सो जाएं। वैसे तो सरथ घर में शायद ही कभी खाना पकाता हो। पर आज मेहमानो के लिए कुछ नाश्ता अपने हाथो से तैयार किया है।

कुछ हल्का नाश्ता पेट की सेहत के अनुसार। नाश्ते पर सरथ अपने गांव एलेप्पी के बारे में बताने लगा। जहाँ दो दिन गुजार कर मैं कल ही लौटा हूँ।

सरकारी नौकरी के कारण उन्हें कोच्चि में पटका गया है। इस सप्ताह वो अपने घर को रवाना हो जाएंगे। चाय नाश्ते पर जमकर बातें हुई।

लगे हाथ साथी घुमक्कड़ ने अपने मामा को अवगत कर दिया की वह कल रात ही कोच्चि पहुंच चुका है। इस बात पर उसके हमउम्र मामा ने को घर आने का न्योता दे डाला।

बड़े बस्ते से जरूरी समान जैसे कैमरा, पानी की बोतल इत्यादि निकाल कर छोटे बैग में डाल ली।

संग्रहालय में अनुसन्धान केंद्र

रवानगी

घड़ी में बारह बजने को हैं। योजना यही है की किले पर घूमने के बाद साथी घुमक्कड़ के मामा से भी मुलाकात हो जाएगी और शाम तक वापस घर। रात भर आराम करूंगा और सुबह मुन्नार को निकल जाऊंगा।

साथी घुमक्कड़ के मामा नौसेना पुलिस में कार्यरत है। वह रहते है पुरानी कोच्चि के नौसेना क्वार्टर में जहाँ से कुछ दूरी पर नौसेना का कैंप है।

घर से निकलने के बाद मैं इधर पलारिवेट्टम आ पहुंचा। बस में लदकर निकल पड़ा पुरानी कोच्चि। तेज़ धूप और उमस के बीच आज का दिन कटने मुश्किलात होगी।

बस सवारियां भरते हुए निरंतर चलती जा रही है। शायद ही कोई कोना छोड़ा है जहाँ से सवारी ना चढ़ी हो। करीब घंटाभर बीत जाने के बाद आ पहुंचा बस अड्डे।

पुराना मालूम पड़ रहा है। लगा बस अड्डे पर ना रुक कर अगले पड़ाव को या फिर दोबारा पलारिवेट्टम निकल रही है। पर ये तो बस अड्डे में बस को सही जगह लगा रहे हैं।

आखिरकार फोर्ट कोच्चि आ ही गया। जनता जनार्दन से मालूम पड़ा की किले जैसा यहाँ कुछ भी नहीं है। फोर्ट कोच्चि के नाम पर मात्र एक प्राचीनकाल का दरवाजा है। जिसे हिंदू राजा ने बनवाया था।

तब से अबतक किले पर कई हमले हुए। पर रह गया है तो सिर्फ किले का दरवाजा। ये सच्चाई लोगों से सुनने में आई। चाय की टपरी पर इतनी जानकारी प्राप्त हुई।

जितना अंतरजाल पर देखा था उससे याद है यहाँ संग्रहालय भी है। किला ना सही संग्रहालय ही सही। निकल पड़ा गली कूचों से होते हुए पुराने कोच्चि संग्रहालय।

इधर पेट में चूहे दौड़ रहे है, ऊपर से ये तेज़ धूप। भूख बर्दाश्त के बाहर है। लग रहा है जहाँ खाना दिखे बस टूट पड़ूं।

मगर पुरानी कोच्चि की इन गलियों को देख कर सारी थकान, भूख सब भूल गया। इन गलियों को देख कर ऐसा प्रतीत होता है मानो यूरोप के किसी देश में तंग गलियों में टहेल रहा हूँ।

जगह जगह दीवारों पर चित्रकारिता दिख रही है। ना ना प्रकार के चित्र दीवारों को सजाने के लिए उकेरे गए है। कहीं किसी के घर के दरवाजे के बाहर तो किसी की घर की खिड़की पर ऐसी चित्रकला जिसकी तारीफ किए बिना कोई रह ना सके।

संग्रहालय ढूंढते हुए किराने की दुकान से बिस्कुट खरीद कुछ भूख मिटाने की कोशिश करने लगा। नाश्ता भी हल्का फुल्का ही किया था। बल्कि सुबह भूखा ही उठा था।

संग्रहालय के भीतर ईसाई समुदाय से जुड़ी वास्तु

कोच्ची संग्राहलय

संग्रहालय ढूंढते में काफी समय लग रहा है। संग्रहालय जैसी कोई इमारत ही नहीं जान पड़ रही है। गूगल नक्शा भी ठीक से नहीं बता पा रहा।

पास दिख रहे विद्यालय को ही साथी घुमक्कड़ संग्रहालय समझ बैठा। पर मुझे उसके सामने वाली इमारत संग्रहालय लग रही है। पास के मैदान में बच्चे फुटबाल खेल रहे हैं।

खुली दुकान पर पूछने पर शंका दूर हुई। यही सामने वाली इमारत में ही पुर्तगाली संग्रहालय है। बाहर से देखने पर यह एक विशाल कैंपस में फैला हुआ दिखाई पड़ रहा है।

भीतर दाखिल हो चला पर जनता जनार्दन कहीं नजर नहीं आ रही। दाएं जाऊं या बाएं! संशय है। दूर बैठे चपरासी ने बाईं ओर जाने का इशारा किया।

उद्यान से होते हुए मुख्य इमारत के सामने आ खड़ा हुआ। टिकट घर पर प्रतीक्षा करने लगा। कब कोई आए टिकट पकड़ाए और मैं भीतर प्रवेश कर सकूं।

प्रतीक्षा करते करते काफी देर हो चली है पर कोई हलचल नहीं दिख रही। जोर की आवाज दे कर बुलाने लगा। पर फिर भी कोई हलचल ना दिखी।

पुकार सुन एक शरीर सौष्ठव नव युवक निकला। इस जनाब ने अंदर आ जाने को कहा। तीन कमरों में बसा यह संग्रहालय किसी ईसाई समुदाय के लिए अति आकर्षक का केंद्र हो सकता है।

याहैं कोच्चि में बसने आए पुर्तगालियों के यीशु से जुड़े मूर्तियां और अवशेष देखने को मिल रहे हैं। टिकट विक्रेता ही गाइड है, वहीं यहाँ का करता धरता है, सबकुछ है।

पूरा संग्रहालय घूम लेने के बाद उसने टिकट काटा और संग्रहालय से जुड़ीं कुछ रोचक जानकारियां साझा की। खुद भी पुर्तगाली भाषा का अच्छा ज्ञाता है।

विदेश से आए पर्यटकों से पुर्तगाली, फ्रेंच या स्पेनिश भाषा में ही बातिया रहा है। संग्रहालय के नीचे भूमिगत हिस्से में हमें ले जा रहा है।

यहाँ पानी भरा हुआ है। बताने लगा यहाँ से समुद्र के रास्ते तक सुरंग हुआ करती थी। फिलहाल यहाँ पानी भरा हुआ है। जो हमेशा ही रहता है। कभी नहीं सूखता।

संग्रहालय के बाहर लेखक

फोर्ट कोच्चि

संग्रहालय में बहुत बड़ा खुला स्थल भी है। जिसमे विद्यालय और छोटा अनुसंधान केंद्र भी है। संग्रहालय के बाद फोर्ट कोच्चि जाने की इच्छा हुई, आस पास के दुकानदारों से पूछने पर पता चला कि वह सिर्फ नाम का किला है।

जिसका सिर्फ दरवाज़ा शेष है बाकी कुछ भी नहीं जिसे देखने जा सके। यह सुनने की देर थी कि मैं कूच कर गया बस अड्डे पर जहाँ से निकल पड़ा अन्नू जी की बताई ही जगह थोपुमपड़ी।

बस उतर कर मैं क्वार्टर के पिछले हिस्से पर खड़ा था जहाँ से उनका घर अभी भी दो किमी दिखा रहा है। थोड़ी देर में अन्नू जी वहाँ खुद अपनी चार पहिया वाहन से लेने हमे पहुंच गए।

उनके घर पहुंच कर हम सभी ने दिन का भोजन किया। शाम होते होते योजना बनी फिल्म देखने की। हम सभी निकल तो पड़े गाड़ी में बैठ कर फिल्म देखने लेकिन अधिकतर जगह टिकट बिक चुके हैं।

कई जगह मल्लू फिल्म लगी है तो कहीं अंग्रेजी। घूमते घूमते पलारिवेट्टम आ गया जहाँ से सुबह निकला। और लूलू मॉल में आयुष्मान खुराना अभिनीत फिल्म देखने के लिए चार टिकट बुक हुए।

यह पहला ऐसा मौका है जब किसी हिन्दी फिल्म जिसे कानपुर में फिल्माया गया हो और वह फिल्म मैं कानपुर से बाहर किसी दूसरे शहर में देख रहा हुं, वो भी देश के अंतिम छोर से।

कल सुबह मुन्नार जाने की योजना तो धरी की धरी रह गई। सलाह सहमति यह बनी की फिल्म देखने के बाद सरथ के घर से दोनों बैग उठा कर मामा जी के घर रुक जाए जाएगा।

फिल्म के दौरान मैंने इसकी खबर सरथ को दी तो मालूम पड़ा वह भी लूलू मॉल में मूथन मलयाली फिल्म देखने आया है। बाला बेहद ही रोमांचकारी फिल्म है जो एक टकले के ऊपर आधारित है।

फिल्म के ख़तम होते ही गाड़ी निकल पड़ी सरथ के घर जहाँ से उसको अलविदा कहा और निकल पड़े अन्नू जी के घर।

सामुदायिक मित्र सारथ के साथ लेखक
एलमक्कारा से संग्रहालय से थोप्पुमपडी से लुलु तक का कुल सफर 85किमी

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