दुनिया की सबसे बड़ी पक्षी मूर्ति जटायुपुरा

केरेल | कोल्लम | भारत

एलेप्पी से कोल्लम

देर से भले ही सोया था पर उसका असर सुबह उठने पर नहीं पड़ने पाया। भोर में प्रातः पांच बजे उठ कर स्नान ध्यान करने लगा। साथी घुमक्कड़ को भी उठा दिया।

आधे घंटे की कार्य शैली के बाद निकल पड़ा कोल्लम के लिए। हालांकि घर से बाहर जाते समय मुख्य द्वार पर निकलने में थोड़ी दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है।

जब घर के रखवाले कुत्ते ने आ कर रास्ता रोक लिया और बाहर ना जाने देने के लिए अड़ गया। काफी देर मशकक्त के बाद भी नहीं पार पा सका इस मुसीबत से।

वो तो भला हो आंटी जी का जो इतनी सुबह उठ गई हैं। ये कृत्य देख अपना काम काज छोड़ द्वार से बाहर करने हमें छोड़ने aa गईं। वरना क्या पता कब तक यहाँ खड़ा होना पड़ता।

हालांकि इस बारे में जॉन ने कल रात में जानकारी दी थी। सुबह इस समस्या से निजात पाने के लिए उन्ही को खोज रहा था। पर उनकी अर्धांगिनी ही सही। कोई तो आया रक्षक बन कर इन जंगली कुत्तों से बचाने।

सूनसान सड़क पर स्टेशन की ओर निकल पड़ा। कोल्लम सिर्फ इसलिए जा रहा हूँ ताकि वहां बने विशाल जटायुपुरा की मूर्ति देख सकूं। जो हाल फिलहाल में बनकर तैयार हुई है।

जॉन के घर से स्टेशन ज्यादा दूर नहीं है और सुबह सुबह कोई साधन भी नहीं उपलब्ध है। तेज कदमों के साथ घर से स्टेशन सवा दो किलोमीटर पैदल ही निकल पड़ा।

सुबह का समय है इसलिए शांत माहौल का अनुभव कर रहा हूँ। अन्य शहरों के मुकाबले प्रदूषण का स्तर भी न्यूनतम है। केरल में हरियाली ही अपना सारा काम कर देती है।

स्टेशन पहुंचते ही मोबाइल निकाल लगा सामान्य वर्ग का टिकट आरक्षित करने। जो झटपट हो गया। भीतर प्रवेश कर प्लेटफार्म पर ट्रेन का इंतजार करने लगा।

सुबह सुबह उठना और कहीं इतनी सुबह यात्रा करने में बहुत आनंद आता है। कुछ देर का इंतजार और ट्रेन स्टेशन पर आ धमकी। चढ़ने के लिए इक्का दुक्का ही लोग हैं। लदकर छह बजे की ट्रेन से निकल पड़ा कोल्लम।

ट्रेन में भी बैठने की जगह मिल गई है। उस दिन की तरह भीड़ नहीं है जैसे तिरुवनंतपुरम से वरकला जाते समय थी। सफर भी महज डेढ़ घंटे का है।

ट्रेन से झांकने पर देखा की पटरी पर दो महिलाएं हाथ में झोला लिए बतिया रही हैं। ये दृश्य हम कहीं भी देख सकते हैं। बीच सड़क पर, पानी के ऊपर और आज तो हद ही हो गई।

पटरी पर खड़े हो कर गप्पे मारती महिलाए

रामायण के अनुसार जब रावण ने सीता जी का अपहरण किया और आकाश मार्ग से उनको लेकर दक्षिण दिशा की ओर बढ़ रहा था तब जटायु की नजर सीता जी चीख पुकार पर पड़ी।

जटायु उड़ान भरकर सीता जी को मुक्त कराने के लिए रावण से युद्ध करने लगे। युद्ध करते करते वह इसी स्थान पर गिरे और अपने प्राणों को तब तक रोके रखा जबतक उनके पास राम जी नहीं आए।

उनको सारी घटना का वर्णन बखान किया और इसी स्थान पर अपने प्राणों की आहुति दे दी।

कोल्लम से अयूर

डेढ़ घंटे के सफर के बाद ठीक आठ बजे मैं कोल्लम आ गया। स्टेशन पर कुछ तस्वीर लेने के बाद मालूम पड़ा की जटायुपुरा जाने के लिए रेलवे स्टेशन से बस का सहारा लेना पड़ेगा। स्टेशन ज्यादा बड़ा नहीं है।

रेलवे स्टेशन के नजदीक चिन्नक्कड़ा बस स्टैंड पर पौने नौ की बस के इंतजार में समय गुजरने लगा। सवारियों के आते ही मैं निकल पड़ा जटायुपुरा के लिए।

कंडक्टर के माध्यम से पता चला की यह बस अयूर तक ही जा रही है। वहां से जटायुपुरा के लिए दोबारा बस बदलनी होगी।

यहाँ से 33 किमी दूर आयूर का सफर तय करने में घंटा भर लग गया। सोच रहा हूँ बाकी का सफर में पैसा जितना कम खर्च हो उतना बेहतर है।

अयूर बस स्टैंड से कुछ दूरी तय करने के बाद लिफ्ट मांगते हुए निकल पड़ा। दो चार मोटर वाहनों को रुकवा कर जटायुपुरा के काफी निकट आ गया हूँ। यहाँ से वो पहाड़ी भी नजर आ रही है जहाँ जटायुपुरा साफ दिखाई पड़ रहा है।

बाकी का सफर पैदल ही तय हो जाएगा। दूरी अधिक नहीं है। पैदल चलते हुए आगे बड़े से गड्ढे में पैर पड़ा, मुड़ा और लगा अब और आगे नहीं चल सकता।

जूते निकाल कर देखा तो पर में सूजन पाई। लगा आज का सफर यहीं खत्म करना पड़ेगा। अब तनिक दूर भी चलना संभव नहीं जान पड़ रहा है।

जैसे तैसे मैं उस मोड़ पर आ गया जहाँ से जटायुपुरा कुछ आधा किमी की दूरी पर है। बंद पड़ी दुकान पर कुछ देर आराम देने लगा पैर को। लंबा चलना मुश्किल लग रहा है।

जटायुपुरा अर्थ केंद्र

दोबारा यात्रा शुरू करते हुए जटायुपुरा अर्थ केंद्र आ पहुंचा। ऐसा आलीशान बनाया गया है जैसे किसी रहीस का बंगला हो। सुरक्षाकर्मियों से पूछते हुए बंद घर की ओर आ गया।

आला दर्ज की व्यवस्था है यहाँ। एक पल को लगा कि होटल के प्रतीक्षालय कक्ष में बैठा हूँ। भीड़ भी हल्की फुल्की नजर आ रही है। काउंटर पर दाम पता किए जिसके लिए अंदर से भाईसाहब एक पर्ची लेने पहुंच गए।

प्राप्त जानकारी के अनुसार मालूम पड़ा की यहाँ से टिकट लेकर पैदल मार्ग या उड़न खटोला से जाया जा सकता है।

चंदयामंगलमगांव में जटायु कुदरती उद्यान सात साल में बनकर तैयार हुआ है। इसको बनाने में सौ करोड़ रुपए खर्च किए गए है। इसे फिल्म निर्माता राजीव आंचल ने बनाया है।

कहा जाता है कि भगवान श्री राम के पैरों के निशान भी यहाँ मौजूद हैं।

टिकट जानकर थोड़ी हैरानी हुई। ऊपर बनी मूर्ति को देखने के लिए पैदल जाने का सीमेंट मार्ग है जिसका किराया सभी दरें मिलाकर ₹600 है।

इस समय पैदल चलने कि अवस्था में तो नहीं हूँ तो उड़न खटोले से ही जाना पसंद करूंगा। उड़ान खटोले का किराया सुना तो दंग रह गया। ससौ करोड़ की बनाने की सारी वसूली जनता के माध्यम से करि जा रही है।

जिसका भाड़ा ₹1500 है। सोच में पड़ गया। पैदल चलने की स्तिथि में नहीं हूँ दूसरा यह की मैं इस मानव निर्मित मूर्ति को देखने हेतु इतनी राशि देने के पक्ष में भी नहीं हूँ।

आखिरकार ये तय हुआ की मानव निर्मित मार्ग और मूर्ति देखने की इच्छा त्याग दी। पानी पी कर वापस अयूर बस अड्डे की ओर निकल पड़ा।

इतनी देर में साथी घुमक्कड़ के घर से फोन आ गया। उनकी माता जी ने तो जाने का समर्थन किया। साथी के ऊंगल में मरारी तट में डुबकी लगाते हुए जो फांस घुसा था उसकी वजह से वह दर्द से कराह रहा है।

बेहतर रहेगा पास के किसी चिकित्सालय में जा कर अपनी इस उंगली का उपचार करा ले। जनता से पूछते हुए बस आड़े तक आ पहुंचा।

अयूर बस स्टैंड पहुंचने के बाद एक दुकानदार से मालूम पड़ा की थोड़ी ही दूर सरकारी अस्पताल है।

यहीं आ गया साथी को ले कर। अस्पताल कुछ पुराना जान पड़ रहा है। भीतर प्रवेश कर सारा हाल बताया। उपचारिका ने हमे दाईं ओर से कमरे में जाने का निर्देश दिया।

कुछ देर के इंतजार के बाद यहाँ की उपचारिका ने साथी को कमरे ने बुला कर उसकी उंगली को मरहम पट्टी की। करीब दस मिनट के उपचार के बाद चेहरे पर अब सुकून दिख रहा है। ये दर्द बढ़ता ही जा रहा था। सबक भी मिला की हर समुद्र में आंख मीच कर नहीं कूदना है।

वरकला सिवगिरि से कोच्ची वापसी

भुगतान किया और टहलते हुए निकल पड़ा बस अड्डे। इस समय कोल्लम जाने का कोई फायदा नजर नहीं आ रहा है। ना ही सीधी ट्रेन है कोची के लिए। वरकला से ही सीधी ट्रेन मिलेगी कोच्चि के लिए।

तय हुआ की वरकला पहुंच कर कोच्चि निकल लिया जाएगा। बस स्टैंड पर वापस आ कर वरकला के लिए जा रही बस में बैठ गया जो यहाँ से नजदीक है।

बस जिस मार्ग से गुजर रही है वह एकदम शांतिपूर्ण और बेहद खूबसूरत है। बस सदियों पुरानी लग रही है। लोहालाट। पर आवाज इतनी कर रही है जिसका कोई जिक्र ही नहीं।

कंडक्टर के टिकट काटने के बाद इत्मीनान से सफर का मजा लेने लगा। जाने किन जंगलों के बीच से गुजर रहा हूँ। यात्री भी चढ़ते जा रहे हैं इन रास्तों पर से।

इस बस की खिड़कियां भी और बसों से भिन्न हैं। इनका बंद करने का शीशा ऊपर ही घुसा दिया गया है। ताकि ना आगे वाली सीट के यात्री को समस्या हो ना पीछे।

अयूर से वर्कला का कुछ ऐसा रहा सफर

सवारियां भी कम है। जटायुपुरा में पैसा दे कर मार्ग में जाने से बेहतर तो मुझे यहाँ का नजारा लग रहा है। चारों ओर हरियाली और शुद्ध ताजी ठंडी हवा।

माध्यम गति से दो बजे वरकला पहुंच गया। बस अड्डे से निकल कर रेलवे स्टेशन आ पहुंचा। स्टेशन से ही सीधे कोच्चि के लिए ट्रेन है। जो घंटे भर बाद है।

समाय का सदुपयोग करते हुए आ गया रेल के भोजनालय में। एक एक डोसा मंगा इंतजार करने लगा।

और रेल भोजनालय के मुकाबले यहाँ स्वच्छता भी है बल्कि खाना भी स्वादिष्ट है। पिछली बार जब वरकला आया था तब शाम के समय यहीं भोजन किया था। यह ना केवल स्वादिष्ट है बल्कि बाज़ार के मूल्य से कम मूल्य पर है।

गरमा गरम डोसा का स्वाद लिया। जिसके बाद एक तस्तरी इडली भी मंगाई। ऐसा लगता है यहाँ कभी सन्नाटा होता ही नहीं है। एक जाता है तो दूसरा आता है। कोई भी मेज खाली रह ही नहीं सकती।

खान पान के बाद भुगतान कर प्लेटफार्म पर निकल आया। ट्रेन का इंतजार करने लगा। सुबह के मुकाबले अब ज्यादा सवारियां दिख रही हैं प्लेटफार्म पर।

ट्रेन भी अपने निर्धारित समय से आ पहुंची। बैठने की जगह ना सही खड़े होने की जगह है। साढ़े तीन बजे की ट्रेन से निकल गया। सफर लंबा रहा। चार घंटे की यात्रा के बाद रात्रि के साढ़े साथ बजे एर्नाकुलम जंक्शन आ पहुंचा। वापस दो दिन बाद कोच्चि आ कर अच्छा लग रहा है।

ना तो कांधे पर वो भारी भरकम बैग है ना किसी बात का तनाव। एर्नाकुलम से सीधी मेट्रो के जरिए पलारिवेट्टम पहुंचा जहाँ आज सामुदायिक मित्र सरथ के घर पर बाकी की रात बीतेगी।

आज सिर्फ यह खल रहा है कि कोल्लम जा कर भी वहां ना जा सका जहाँ जाने के लिए कोल्लम गया था। शायद ज़िन्दगी दूसरा मौका दे वहां जाने का किसी नए दिन।

अल्लेप्पी से कोल्लम से वर्कला से कोच्ची तक की कुल यात्रा 345किमी

जटायु अर्थ सेंटर- समय, बुकिंग, प्रवेश शुल्क और टिकट की दरें

जटायु अर्थ सेंटर सुबह 9.30 बजे खुलता है और शाम 5.30 बजे बंद हो जाता है

जटायु अर्थ सेंटर प्रवेश शुल्क – 400 रुपये / व्यक्ति + कर

15 साहसिक गतिविधियां (सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक) – 1000/- रुपये

ट्रेकिंग और पेंटबॉल (दोपहर का सत्र दोपहर 3 बजे से शाम 6.30 बजे तक) – रु.1300/-

15 साहसिक गतिविधियां और ट्रेकिंग (सुबह 10 बजे से शाम 6.30 बजे तक) – 1500/- रुपये

15 साहसिक गतिविधियां और पेंटबॉल (सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक) – रु.1800/-

सभी गतिविधियां, पेंटबॉल और ट्रेकिंग (सुबह 10 बजे से शाम 6.30 बजे तक) – 2300/- रुपये

पूरे दिन की गतिविधियाँ (सुबह 10 बजे से शाम 6.30 बजे तक) – 3500/- रुपये

जटायु अर्थ सेंटर कैसे पहुंचे?

जटायु अर्थ सेंटर चादयामंगलम, कोल्लम, केरल, भारत में स्थित है

जटायु अर्थ सेंटर केरल और भारत के सभी प्रमुख शहरों और कस्बों से आसानी से पहुँचा जा सकता है।

ट्रेन से जटायु अर्थ सेंटर पहुंचना

कोट्टारक्कारा रेलवे स्टेशन – जटायु अर्थ सेंटर से 22 किमी (सड़क मार्ग से 30 मिनट)
क्विलोन रेलवे स्टेशन – जटायु अर्थ सेंटर से 43 किमी (सड़क मार्ग से एक घंटे की यात्रा)
त्रिवेंद्रम रेलवे स्टेशन – 52 किमी
अन्य नजदीकी रेलवे स्टेशनों में अलुवा रेलवे स्टेशन, एर्नाकुलम रेलवे स्टेशन, मदुरै रेलवे स्टेशन और कोयंबटूर रेलवे स्टेशन शामिल हैं।

हवाई मार्ग से जटायु पृथ्वी केंद्र पहुंचना

निकटतम हवाई अड्डा त्रिवेंद्रम हवाई अड्डा है जो जटायु अर्थ सेंटर से लगभग 52 किमी दूर है और हवाई अड्डे से सड़क मार्ग से चट्टान तक पहुँचने में एक घंटे का समय लगेगा।

सड़क मार्ग से जटायु पृथ्वी केंद्र पहुंचना

जटायु अर्थ सेंटर त्रिवेंद्रम-कोच्चि राजमार्ग से लगभग 200 मीटर की दूरी पर है।

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