दुनिया के सबसे बड़े संग्रहालयों में से एक सालारजंग

आंध्रप्रदेश व तेलंगाना | भारत

मंदिर मंदिर दर्शन

कन्हैया जी ने आज सुबह जल्दी आने का आग्रह किया था। फिर भी निकलते हुए थोड़ी देर हो ही गई। फटाफट तैयार होकर बुलाई हुई जगह पर पहुंच गया।

रात बहुत ही अच्छी बीती और नींद भी गजब की आई।

मुलाकात के बाद अंकल अपने दुपहिया वाहन में मुझे एक मंदिर से दूसरे मंदिर ले जा रहे हैं। यहाँ वह स्वयं पिछले पच्चीस सालों से आ रहे हैं दर्शन करने। बताने लगे की ऐसा वे तबसे कर रहे हैं जब से राजस्थान से हैदराबाद में बसे हैं।

छोटे बड़े मिलाकर कुल तीन से चार मंदिर में दर्शन कर चुका है पिछले बीस मिनट में। ये उनकी दैनिक दिनचर्या में शामिल है। जिससे शायद हर कोई प्रभावित होगा।

बारी है पेट की पूजा की। स्कूटर में बैठ कर पास के रेस्तरां में आए। यहाँ अंकल जी ने हमारे लिए डोसा ऑर्डर किया एयर अपने लिए गरम चाय।

बताने लगे की इस दुकान का डोसा बहुत ही मशहूर है। साथ में गरम गरम डोसा खा कर पर पेट पूजा की। यहाँ हर दुकान का कुछ न कुछ मशहूर है।

सुबह सवेरे नाश्ता करने के बाद हम निकल पड़े अंकल के साथ उनके कार्यालय। उनकी एक स्कूटी में तीन लोगों का घूमना वो भी मुख्य सड़क पर पुलिस कर्मी के सामने थोड़ा ज्यादा हो जाएगा।

वो कुछ दूरी तक चलते और जैसे ही पुलिस वाला दिखाई देता, उसकी नजर से बच कर झट से हममें से एक धीरे से गाड़ी से उतर जाता और जहाँ से पुलिस कर्मी दिखना बंद हो जाता वहाँ कहाँ से फिर लद जाता।

पूरे भारत में ऐसा हर कोई करता ही है और जिसने ना किया उसने क्या किया! पुरानी गलियों से गुजरते हुए इस तरह उनके कार्यालय पहुंच गए।

यहाँ की गलियों में ही व्यापार का खून है जो जाने कितने वर्षों से दौड़ रहा है। कमरे के भीतर भगवान के चरण स्पर्श करके कार्यालय में आज के दिन की शुरुआत की।

अपने व्यवसाय और थोड़ा बहुत खुद के बारे में बताया कैसे इतना बड़ा कारोबार खड़ा किया। राजस्थान से कैसे यहाँ पलायन करा वगैरह वगैरह। काफी संघर्ष करने के बाद आज इस मुकाम पर हैं।

काफी देर बातें चलती रहीं। कुछ देर बाद अपने बेटे विष्णु को बुलवा कर हमारे साथ घूमने को कहा। अंकल से अलविदा ले कर विष्णु के दुपहिया वाहन में हम तीन प्राणी बैठ कर निकल गए हैदराबाद के बहुचर्चित सलारजंग संग्रहालय।

दाग लगने से प्रसिद्ध हुई चित्रकारी और चित्रकार

सलारजंग संग्रहालय

मुझे सलारजंग का के द्वार पा उतारकर कर विष्णु निकल गए अपने काम काज के लिए। मैं फिलहाल पुराने हैदराबाद में हूँ। हल्की बारिश होने लगी है।

सलारजंग आने की कोई भी योजना नहीं थी। बल्कि मैं तो चारमीनार जाना चाह रहा था। कुछ देर मंथन के बाद आखिरकार मुख्य द्वार से प्रवेश किया। इधर उधर टिकट काउंटर ढूंढने के बाद बहुत अंदर जा कर काउंटर दिखा।

काउंटर से टिकट लिया। पता चला की यहाँ संग्रहालय में बैग तक ले जाने की अनुमति नहीं है। अपने साथ ले कर आया छोटा बैग पास के लॉकर रूम में जमा कराने आ गया।

कुछ मूल्य चुकाया और जमा हो गया बैग। लाकर की बड़ी सी चाभी मिली। जिसे जेब में रख कर चल पड़ा भीतर।

आज संग्रहालय में भीड़ बहुत है। हल्की बारिश थोड़ी आफत जरूर बनी है। दरवाजे पर उच्च स्तरीय सुरक्षा चाक चौबंद है। बिना रसीद के संग्रहालय के किसी भी कोने की तस्वीर नहीं खींची जा सकती। करते हुए पाए गए तो भारी जुर्माना देना होगा।

सुरक्षा जांच के बाद संग्रहालय में प्रवेश कर गया। यह संग्रहालय ना केवल भारत में बल्कि पूरी विश्व स्तरीय पर बड़े संग्रहालयों की सूची में शामिल है।

तीन मंजिला में बटा ये संग्रहालय में मैंने पहले धरातल भाग देखने निकल आया। यहाँ नवाब युसुफ अली खान से जुड़ी उनकी वस्तुएं और अन्य चीजों का जमाव है।

चांदी के बर्तन, दान, स्त्रियों का साजो सामान, कांच के महंगे कप, गिलास हर आकर के। अनेक प्रकार के वस्त्र, वेशभूषाएं, चिट्ठी पत्री रखने वाला सिलेंडर के आकार का दान।

सलारजंग के पूर्वजों का इतिहास भी बड़ा संजो कर रखा हुआ है। भूतकाल के सारे नवाबों का। महत्वपूर्ण किताबे, खेल के क्षेत्र में जीते गए मेडल।

सैनिको का लिबास

सैनिकों का लिबास उनकी पोशाक उनका रहें सहन सब दर्शाया गया है। नवाबों की तलवारों से ले कर भालों तक। परिवारजनों के चित्र।

साथ में भारतीय कांग्रेस के कुछ दिग्गज नेताओं गांधी, नेहरू, पटेल के साथ तस्वीरें भी हैं।

मजेदार बात ये है की भगवान की भी मूर्तियां यहाँ देखने को मिल रही है। जो थोड़ा ताज्जुब करने वाली बात है। यहाँ तक कि साड़ियो की भी प्रदर्शनी लगी रखी है।

धरातल भाग में ये हिस्सा एक बार ही देखने योग्य है। पिछले हिस्से के सामने मैदान है छोटा सा। जो अब ढाका हुआ है छत से। यहाँ हर घंटे घड़ी बजती है तो लोग उसे देखने का इंतजार कर रहे हैं।

दूसरा भाग

सीढी चढ़ कर दूसरे भाग में आ गया। गलियारों में भारत के विभाजन के पूर्व का चित्रण दर्शाया गया है।

ऊपरी भाग में बाहर की दीवारों पर पुराने हैदराबाद से ले कर किले की पुरानी तस्वीर लगाई गई हैं। सालरजंग अस्पताल भी बनवाया गया है।

कर इसके दूसरे भाग में भव्य चित्रकारिता है और यूरोपियन अंदाज़ में थ्री डी मूर्तियां हैं।

जिन्हें बार बार देखने पर भी आंखे नहीं थकती। इसके बारे में कहावत है कि यह सभी थ्री डी चित्रकारी एक ही आदमी द्वारा एक बार में ही बना दी गई है। जिसमे से एक मूर्ति में उससे काला धब्बा लग गया था। जिसे अभी भी साफ देखा जा सकता है।

शायद ये काला धब्बा ना होता तो इतनी चर्चा भी ना होती इस मूर्ति के बारे में।

हांथी के दांत पर नक्काशी

एक कमरे में सिर्फ हांथी के दांतो पर बनी तरह तरह कि कलाकृतियां और नक्काशी। हाथियों के दांत की प्रदर्शनी सबसे भव्य लग रही है।

किसी दांत पर सोफे या कुर्सी मेज की नक्काशी किसी पर खूब सारे हाथियों की। किसी दांत को तलवार के रूप में प्रस्तुत करना तो किसी दांत पर इमारत बना देना।

हांथी के दांत की चार कुर्सी। हांथी के दांत के देवी देवता, पेड़, समान। ताजमहल, कुतुब मीनार स्वयं हांथी भी। रथ, वीना, आदमी औरत। अलग अलग नक्काशी।

शस्त्र वाले कक्ष युद्ध के मैदान में इस्तेमाल की गई तरह तरह के कटार, खंजर, चाकू, कुल्हाड़ी, गड़ासे, तलवारें, भाले, छोटी बंदूकें, सैनिकों की पोशाकें सजी हैं।

नवाबों, राजा महाराजाओं द्वारा इस्तेमाल में लाई जाने वाली वस्तुएं जैसे थाली चम्मच प्लेट कटोरी इन सबको भी प्रदर्शनी में लगाया गया है।

अलग अलग शस्त्र से सुसज्जित

किसी एक कमरे में भांति भांति प्रकार की छड़ी। किसी में शैतान का आकार, जानवरों या फिर पशु पक्षियों की कलाकृति वाली छड़ी। कमरों के बाहरी दीवार पर हैदराबाद का इतिहास चित्र के माध्यम से दर्शाया गया है।

इनमे से एक तस्वीर में अस्पताल की छवि भी है। मुझे तो ये अस्पताल कम होटल ज्यादा लग रहा है। दूसरे हाल में सिर्फ फर्नीचर पुराने सोफे, मेज़, कुर्सियां, डायनिंग मेज़, श्रृंगार मेज़, बच्चो को खिलाने वाला झूला, पालकी।

एक में सजावटी बेहद सुंदर घड़े। जो मुझे सबसे अधिक लुभावना लगा वो हांथी के दांतो की नक्काशी। इतना भव्य संग्रहालय शायद ही कहीं होगा। मुझे पूरा संग्रहालय बारीकी से देखने में तीन घंटे लगा गए।

कहा जाता है कि वर्तमान में जितना सामान संग्रहालय में है किसी समय इससे दुगना हुआ करता था कुछ चोरी हो गया, कुछ लापता।

तकरीबन तीन घंटा संग्रहालय में बीत चुका है। मैं तो एक दफा देखते देखते थक कर बैठ गया था। इतना बड़े संग्रहालय में शायद ही पहले कभी गया होऊंगा।

संग्रहालय से बाहर निकाला तो देखा सब भीगा भीगा है, तीन घंटे के भीतर बारिश भी हो गई। कुछ तस्वीरें खींचवाई, लॉकर रूम से बैग उठाया और चल दिया चारमीनार।

काशीगंज से सालारजंग से संग्रहालय तक की कुल यात्रा 40किमी

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