स्पीति वैली, स्टोरीज ऑफ इंडिया, हिमाचल प्रदेश
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दुनिया का सबसे ऊंचा पेट्रोल पंप

मेरा मन प्यासा

पिछले रास्ते से तीन बुद्ध मूर्तियां देखने को मिलीं। जो आगे वाले हिस्से से बिल्कुल भी नहीं दिखाई पड़ रहीं थीं। इन्हे देख के लग रहा है एक भव्य भवन बनाने की योजना है यहाँ पर।

प्यास भी लग आईं। पानी के लिए जब बोतल पर हाँथ पड़ा तो वो खाली निकली। पास में ही बने मजदूरों के भवन से शायद पानी की व्यवस्था हो जाए।

इसी आस में भवन के पास आ खड़ा हुआ। पर यहाँ तो अलग ही सन्नाटा छाया हुआ है ऊपर से घोर अंधेरा। मुड़ कर वापस चलने ही वाला था कि अचानक से एक महाशय प्रकट हुए जिन्होंने उनकी कुटिया में आने का कारण पूछा।

प्यास की इच्छा को पूरा करने का मेरा उद्देश्य जानने के बाद उन्होंने अपने पीने वाले स्त्रोत से पानी निकाल कर दिया। पानी जैसे ही मूह में भरा मानो पूरा जबड़ा जाम हो गया हो। इतना ठंडा जिसकी कोई हद्द नहीं है।

निवेदन करते हुए थोड़ा काम ठंडा पानी पीने की इच्छा ज़ाहिर की तो मालूम पड़ा इससे गरम पानी यहाँ उपलब्ध नहीं होगा। इन बर्फीली पहाड़ियों में ऐसा ही जमा देने वाला पानी मिलेगा।

जैसे तैसे अहिस्ता आहिस्ता पानी गले के नीचे उतरा और प्यास बुझाई और चल पड़ा पहाड़ियों के रास्ते नीचे एक बार फिर से। ये पहाड़िया इतनी खतरनाक हैं कि यदि आपका एक कदम दाएं से बाएं हुआ नहीं की सीधे खाई में। ऊपर से ये भारी भरकम बैग।

वही मेरे साथ भी हो रहा है। धीरे धीरे छोटे कदमों से आगे बढ़ता गया।

क्या नज़ारा है!

सामने बर्फीली पहाड़िया और उसके भी पहले हरी भरी खेती। ये ऐसा दृश्य है जिसकी हम शहरी वासी सिर्फ कल्पना ही कर सकते हैं। इसे कमरे में कैद करना कितना उचित होगा।

फटाफट बैग उतरा और उसमे से कैमरा निकाल तस्वीर ली। एक किनारे रख कर खुद की भी तस्वीर ली। जब तीन चार रीटेक हुए तब जा कर एक अच्छी तस्वीर निकल कर आईं।

कीह मठ के सामने पहाड़ी का नज़ारा

पथरीले रास्ते से होते हुए नीचे जाना अपने आप में एक जोखिम भरा काम है। जाना तो है ही सो बैग उठाया और चल पड़ा। ऐसे शॉर्ट कट रास्ता पकड़ने के चक्कर में कई बार गलत जगह भी आ खड़े होते है हम।

भारी बैग होने के कारण पीठ में दर्द शुरू हो चुका है। एक पल को मन में आया कि बैग को लुढ़का दूं। पर ऐसा करने पे ज्यादा नुकसान मेरा ही है। शायद बैग नीचे जाते जाते फट ही जाए। इसलिए बेहतर है साथ ही ले चलूं भले ही धीरे धीरे ही सही।

ऊंचाई से नीचे सड़क पर गाडियां सनसनाते हुए एक पल में इधर से उधर जाती दिख रही हैं और मैं कुछ ही कदम चल पाया हूँ। अब तक अजय नीचे पहुंच भी गया है। पर मुझे अभी आधा सफर और तय करना है।

कुछ जगह तो पैर भी फिसल चुका है। पर शुक्र है कोई खतरा नहीं हुआ। आहिस्ता आहिस्ता बचा हुआ सफर भी तय करने लगा। चीचम की तरह यहाँ किसी जानवर की लाश नहीं दिखी।

नीचे की पर जाती हुई एक सीधी रेखा पर चलते हुए नीचे आ पहुंचा। तेज़ धूप के कारण ठंड कम है। प्यास के मारे बुरा हाल हुआ जा रहा है। नीचे पहुंचते ही एक किनारे बैग रखा और आसपास टेहेलने लगा।

सामने पहाड़ी का बेहतरीन नज़ारा देखते ही पानी का खयाल तो जैसे दिमाग से उतर ही गया हो। फिर क्या था अजय को कैमरा पकड़ा एक आधी फोटो खींचना तो बनता ही है।

शुद्ध धारा

सो वही हुआ और मैंने उसकी खींची। दो जने साथ में हो तो फोटो लेने में सुविधा हो जाती है। फोटो के कार्यक्रम के बाद दाईं तरफ जाते हुए एक नलका दिखा जिससे भदभड़ते हुए पानी बह रहा है।

इससे बेहतर क्या हो सकता है। फ़ौरन शर्ट पैंट समेट कर हाँथ मूह धुला और तेज़ धारा में हाँथ लगाकर पानी पीने लगा। ये पानी उतना ठंडा नहीं है जितना ऊपर मजदूर की कुटिया में मिला था।

आराम से पिया जा सकता है। पानी के साथ खेल खत्म होने के बाद अब निकलने की बारी आई। वापस काजा। मगर कोई गाड़ी रुकने को तैयार ही नहीं। बेहतर यही रहेगा की बैग सहित पैदल ही निकल लिया जाए।

क्या पता रास्ते में कोई गाड़ी वाला रोक कर जगह दे दे। इसी उमीद के साथ आगे बढ़ने लगा। गांव से बाहर आया तो देखा एक वृद्धाश्रम में कुछ बुज़ुर्ग अपना काम स्वयं करते दिखे।

काफी बड़े से इस वृद्धाश्रम में जाने की इच्छा तो हो रही है पर समय के अभाव के चलते ऐसा नहीं हो सकेगा। दूसरा पता नहीं ये बुज़ुर्ग हमारा आव भगत करने के विचार में होंगे या नहीं।

अक्क्सर जब घर से त्याग करने का मन करने लगता है तब वृद्धाश्रम

अमूमन ज्यादातर लोग मना कर देते हैं। तो बेहतर यहीं रहेगा अपने रास्ते चलना। कुछ 4-5 वृद्ध बाहर खड़े होकर हाथ हिलाने लगे। और एक लम्बी सी मुस्कान के साथ दुबारा स्पीति आने का न्योता भी इशारे इशारे में दे दिया।

लिफ्ट की दरकार

बड़े से गेट से बाहर निकलने के बाद फिरसे एक लम्बी रोड दिखी। जिसे या तो शॉर्टकट के जरिए जाया है सकता है या फिर उसी सड़क पर चलते हुए वाहन के इंतजार में जाने का विकल्प भी है।

मैं रोड के जरिए भी जा सकता हूँ पर केवल लिफ्ट को मद्देनजर रखते हुए ऐसा उचित नहीं होगा। इसलिए पहाड़ों के बीच से शॉर्टकट बेहतर रहेगा। और ये पहाड़ी रास्ता उतना खतरनाक भी नहीं है जितना पहले वाली पहाड़ी थी।

उतारना शुरू किया और भारी भरकम बैग को बैलेंस के साथ उतरना कभी आसान नहीं होता। ठीक यही हालत मेरे साथ है। खैर पहले से यहाँ उतारना ज्यादा कठिन नहीं है।

आराम से कुछ किमी का सफ़र इस शॉर्टकट के जरिए कम समय में पूरा हो गया। पर मंज़िल अभी बहुत दूर है। रोड पर आ खड़ा हुआ हूँ।

पर कोई भी गाड़ी रुकने को तैयार ही नहीं है। ना उमीदी के चलते मैं भी चल पड़ा एक लम्बी सी सड़क पर। जिसके दाई तरफ बर्फ की चादर से ढके पहाड़।

ये ऐसा है जैसा हम फिल्मों देखते है। लिफ्ट तो मिलने से रही तो क्यों ना कुछ तस्वीरें ही हो जाए। अजय को कैमरा थमा कुछ फोटो निकलवाई।

यूँही चला चल राही

पर ये नज़ारा ऐसा है मानो सड़क रुकने का नाम ही नहीं ले रही हो।

गाड़ी आती जाती रहीं पर कोई रोकने को ही तैयार नहीं है। इनमे से अधिकतर गाडियां टूरिस्ट वाली दिखी जो यात्रियों से खचाखच भरी दिखीं।

ये रोककर कर भी क्या लेते जब बैठने को जगह ही नहीं है। वैसे ऐसी सड़क पर कौन नहीं पद यात्रा करना चाहेगा? गाड़ी में बैठ कर वो मज़ा नहीं जो इन खाली सड़कों पर बैग लादे लादे फिरने में है।

लोडर का सहारा

पीछे मुड़ कर देखा तो एक लोडर आता हुआ दिखा। उम्मीद तो कम है लेकिन फिर भी हाँथ देकर रोकने की कोशिश की। और उम्मीद से परे गाड़ी रूकी भी।

ड्राइवर साहब ने हाल जाना और मंज़िल पूछी। जब मंज़िल एक ही निकली तो गाड़ी में फ़ौरन लद जाने का फरमान सुना दिया। अपना परिचय देते हुए अरुण नाम बताया और एक आईस क्रीम विक्रेता के तौर पर अपना पेशा ज़ाहिर किया।

आईस क्रीम वो भी इतनी बर्फीली जगह पर कौन ही खाता होगा? मेरा तो नाम सुनते ही गला चोक हो जाए ऐसी ठंडी जगह पर।

सफर गुजरता गया बाते होती गई। तभी सामने से एक विदेशी साइकिल से होता हुआ निकल गया। ऐसे बहुत से लोग है जो साइकिल से स्पीति का दौरा करते हैं और रुकते भी हैं।

पहाड़ी के उस तरफ इशारा करते हुए अरुण ने बताया अभी हम उस गांव में जाएंगे सामान की डिलेवरी करने। जहाँ पर खूब सारे लामा रहते हैं।

लामा बनना भी अपने आप में बहुत इच्छाशक्ति रखने वाले लोग ही इसे अपना सकते हैं। और इन्हीं लामा की तरह होती हैं नून जो अपना गृहस्थ जीवन त्याग कर इस सादे जीवन को अपनाना बेहतर मानती हैं। इतना बोलते हुए अरुण ने गाड़ी घूमा ली।

छोटा रंगरिक गांव

एक नदी को पार करते हुए हम पहाड़ी के इस तरफ और दूसरे गांव में आ गए। सोच रहा था अगर ये गाड़ी ना मिलती तो क्या मैं इस गांव में आ पाता? या इतनी जानकारी मिलती!

किस्मत का खेल है। जहाँ मुझे उमीद नहीं थी कि शाम तक भी काजा पहुंच जाऊं अब वही एक पल में दूसरे गांव में आ गया। जिसकी कल्पना भी शायद नहीं की थी।

लिफ्ट लेने के भी फायदे अनेक हैं और अपने नुकसान भी। लकड़ी के पुल से गुजरते हुए अरुण ने गांव का नाम रंगेरिक बताया।

कभी लंबे समय के लिए आया तो स्पीति के हर एक गांव में जाऊंगा। क्युकी यहाँ का हर एक गांव अपने आप में अलग पहचान रखता है और खासियत भी।

रंगरिक गाँव की आबो हवा

डोलती हुई गाड़ी आगे बढ़ते हुए एक पत्थर के बने टीले के पास आ खड़ी हुई। यही है रांग्रिक। पत्थर के इस टीले पर बुद्ध भाषा में कुछ लिखा नजर आ रहा है।

जिसे अरुण ने पढ़ कर सुनाया। और इसका अर्थ भी समझाया। उसमे उन्होंने प्रमाण भी दिखलाया की कैसे ये भाषा को संस्कृत भाषा से उठाया गया है।

पहला ही अक्षर ॐ से मिलता जुलता पाया। कुछ देर गाड़ी रूकी ओर फिर हम चल पड़े बौद्ध आश्रम जहाँ लमाओ को आईस क्रीम भी भेजनी है अरुण को।

बेबाक अरुण

इसी को देखते हुए अरुण ने गाड़ी में एक्सेलेरेटर भरा और ऊबड़खाबड़ सड़क पर गाड़ी दौड़ते हुए आ पहुंचे गांव।

यहाँ अरुण को सब पहले से ही जानते हैं। चढ़ाई के कारण गाड़ी आगे ना जाने की वजह से गाड़ी को यहीं विराम देना पड़ रहा है। सामने बैठे दो लामाओ को आईस क्रीम पकड़ाई।

और एक एक हमें भी। चढ़ाई चढ़ कर कुछ जानकारी जुटा कर आया तो पता चला जो सामान लेने आया है वो अभी है है नहीं। निराशाभाव वाले चेहरे ने सब बयां कर दिया।

बाकी गांव से विकसित दिख रहा है। यहाँ बेहतर सुविधाएं देखने को मिल रही हैं। सामने बनी सरकारी इमारत इस बात की गवाह है।

आईस क्रीम अभी पूरी खतम भी नहीं हुई की अरुण ने गाड़ी स्टार्ट कर वापस चलने के संकेत दे दिए। बहती हुई आईस क्रीम के साथ ही दौड़ते हुए गाड़ी में बैठा।

और गांव से भी कम जनसंख्या है रंग्रिक की। ढलान की ओर गाड़ी मोड़ते हुए अरुण महिला लमाओ का घर दिखाने लगा। उस ओर अक्सर आईस क्रीम की डिलीवरी करने जाता है अरुण।

यूं ही बातों का सिलसिला चलता रहा और गाड़ी भी। अरुण लगते तो बिल्कुल भी पहाड़ी नहीं हैं। इसका कारण भी उनका पेशा ही है जो कभी इस घाटी से उस घाटी या फिर शहरी इलाका में आना जाना लगा रहता है।

अरुण मेहेज कक्षा आठवीं तक पढ़े है पर उनकी बुद्धिकौशल को देख कर ऐसा बिल्कुल नहीं लगता। एक आठवीं पास इन्सान की इतनी गहरी सोच वो भी विभिन्न विषयों पर ये अद्भुत है।

गाड़ी उसी पुल पर आ गई जहाँ से रंग्रीक गांव काजा से जुड़ता है। प्राकृतिक बुलावे के कारण गाड़ी रोकनी समझी और एक कोना पकड़ कर हल्के होने लगे।

कोना ही क्या? जब यहाँ कुछ बना ही नहीं है। चारो ओर सन्नाटा और मैदानी पहाड़ी इलाका। दूर दूर तक इन्सान की झलक देखने को नहीं मिल रही।

हां पास में एक बंद पडा पेट्रोल पंप का ठेला जरूर दिख रहा है। जो कभी चालू ही नहीं हुआ। हल्के होने के बाद गाड़ी से बोतल निकाल हाँथ की सफाई और सर्रराटा भर कर चल पड़े।

कुछ अपने परिवार के बारे में बताते बताते गाड़ी की रफ्तार धीमी कर ली। अपने पिता और माता के अलग अलग धर्म होने के कारण उनका यहाँ निवास है।

सैलानियों को सन्देश

गाड़ी अब काजा की ओर बढ़ रही है। जहाँ अरुण ने उस बोतल वाले संग्रह पर ला खड़ी कर दी जिसे एक विदेशी ने अपने हाँथो से पिरोया है।

लोग अगर जागरूक रहे तो क्या वाकई ऐसे संदेशों की जरुरत है?

उस विदेशी ने पूरे स्पीति घाटी से यात्रियों द्वारा फेंकी गई बोतलें इक्कठी कर के इसे बनाया है। और ये संदेश देने की कोशिश भी की है कि कैसे एक जिम्मेदार घुमक्कड़ की तरह पर्यटन करना चाहिए।

ऐसे तमाम पहाड़ियां है जिसको हम इंसानों ने अपनी गंदगी से नष्ट कर रखा है। और सफाई के नाम पर सबसे सरल उपाय सरकार को कोसना। खतम।

कुछ एक आधी तस्वीर इसलिए भी ताकि लोगों को इसके प्रति जागरूक कर सकूं। की घूमते समय क्या करना है क्या नहीं। अरुण किसी भी जगह ज्यादा देर नहीं रुकता।

सो यहाँ भी फटाफट निपटा कर हम गाड़ी में बैठे और चल पड़े काजा। काजा अब दूर नहीं। बाएं हाँथ पर एक बहुत विशालकाय पहाड़ी देखी जा सकती है।

जिसकी चढ़ाई देखने में ही अत्यंत कठिन और जटिल मालूम पड़ती है। पर फिर भी धीरे धीरे गाडियां आगे बढ़ रही हैं। ये इतनी सीधी पहाड़ी है कि कोई सड़क पर एक पल के लिए खड़ा हो कर तबीयत से निहार भर ले तो शायद औंधे मूह गिर जाए।

दुनिया का सबसे ऊँचा पंप

कुछ ही देर में हम काजा आ पहुंचे। बाईं तरफ बस अड्डा और दाईं ओर दुनिया का सबसे ऊंचाई पर स्तिथ पेट्रोल पंप। अरुण ने गाड़ी मोड़ी पेट्रोल पंप की ओर। और मुझे निकलना है बस अड्डे की ओर।

यहाँ होगया झोल। पर अरुण ने बताया पंप के पिछला हिस्सा ही अरुण का स्थानीय अड्डा है। अन्दर जाने से पहले ही अरुण ने गाड़ी रोकी।

अब जाहिर है यहाँ उतरने की बारी आ चुकी है। तय मुझे करना है कि पहले किधर को निकलूं बस अड्डे या भोजनालय। अगली सीट से उतरा और पिछली डिक्की से बैग निकालने लगा।

काफी देर घूमने फिरने के बाद भूंख भी जोरों की लगी है। उससे पहले नजर पड़ी सामने लगे बोर्ड पर जिसपर लिखा है। “आप इस समय दुनिया के सबसे ऊंचे पेट्रोल पंप पर खड़े हुए हैं।”

बैग उतार कर गाड़ी से बाहर आ निकला। बोर्ड के साथ फोटो खींचने की अब तैयारी है। ये ना सिर्फ हिमाचल का बल्कि दुनिया का सबसे ऊंचा पुल है। जो कि समुद्र तल से १२२७० फीट की ऊंचाई पर स्तिथ है।

बैग किनारे रख कर इक्का दुक्का तस्वीरें अरुण ने ऐसे ही निकाल दीं। थोड़े संशय में हूँ कि किधर को जाऊं। बस अड्डे या काजा की मार्केट।

इतने में अरुण ने हमसे विदा लिया और गाड़ी स्टार्ट करके निकल पड़ा पेट्रोल पंप के पिछले हिस्से में। इस वादे के साथ की कल हिक्किम गांव तक का सफर हम सुबह सवेरे साथ तय करेंगे।

पेट्रोल पंप के अंदर ही उसका आशियाना है। लोहे के कचरे के ढेर के अलावा बड़े बड़े ट्रांसफार्मर से हटके एक कमरा भी है। कुछ देर ऐसे ही निहारता रहा जैसे पहले कभी इतनी ऊंचाई पर इतना माल देखा ना हो।

पेट की भूख ले चली मुझे मार्केट की ओर। स्थानीय लोगों से पता चला कि मूड गांव को जाने वाली बस शाम के चार बजे तक मिलेगी। तब तक के लिए क्या किया जाए?

बेहतर यही रहेगा कि कुछ देर मार्केट में समय बिता कर ही बस अड्डे पहुंचा जाए। तब तक बस के भी निकलने का समय हो जाएगा।

बैग उठा कर निकला ही और कुछ ही आगे बढ़ा की डॉ कपिल से आज दोबारा मुलाकात हो गई। जिनसे कल चीचाम जाते वक्त बस से मुखातिब हुआ था।

आश्चर्यचकित और अनिश्चिता के इस दौर में मुलाकात भी हुई और बात भी। हां मिलने का वादा किया था पर इतनी जल्दी मुलाकात होगी इसका अंदाजा नहीं था।

हसीं मजाक के बीच उन्हें है रही दिक्कत के बारे में भी कपिल जी विस्तार से बताने लगे। जैसे हिक्किम गांव जाने के लिए दो पहिया गाड़ी का ना मिलना।

पेट पूजा हो जाए

इसी के चलते कपिल और उनके साथी काजा थाने की ओर रुखसत करने का मन बना लिया है। और वहीं पर उस दुकानदार कि शिकायत दर्ज कराएंगे।

खाने की बात छिड़ी तो पंजाबी ढाबे में जाने की सलाह दी। किफायती और नॉर्थ इंडियन खाना उपलब्ध रहेगा। सो उनकी मशवरे के मुताबिक मैं चल पड़ा पंजाबी ढाबे की ओर।

चौराहे से कुछ दूरी पर स्तिथ इस ढाबे में आ पहुंचा। जहाँ साफ सफाई के साथ अच्छे खाने की खुशबू अलग से ही आ रही है।

दो बजने के साथ ही यहाँ खाना पानी बंद हो जाता है। पर फिर भी हम जैसे सैलानियों के लिए दोबारा गैस जलवा कर रोटियां सिकवाइं।

कमाल का हाव भाव दिखाते हुए मेहमान नवाजी का सही तरीका भी सिखाया। गरमा गरम भोजन आया पर मैंने सीमित खुराक ही ली।

ज्यादा खाना भी हानिकारक हो सकता है। खा पी कर भुगतान करने के बाद मैं बाहर निकल आया। इतने में कपिल जी शिकायत दर्ज करवा कर आ चुके हैं।

इत्मीनान से उन्होंने उस घटना का जिक्र किया जो उन्हे थाने ले गई। और अब मैं मूड गांव निकालने की तैयारी में हूँ। आज की रात उसी गांव में बीतेगी।

ऐसा सुना है कि पूरा का पूरा मूड गांव मिट्टी(mud) का बना हुआ है। इसलिए इसे लोग मूड गांव के नाम से जानते हैं।

बस अड्डे की और जाने वाले रास्ता पकड़ते हुए सबसे अलविदा लिया और चल पड़ा नए सफर पे।

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नमस्ते, मैं ऐश्वर्य तिवारी हूं। ये उन दिनों की बात है जब मैं अपने जुनून का पालन करने के लिए अपने कॉर्पोरेट जीवन को पीछे छोड़ दिया।भारत को जानने के मेरे अंदर हमेशा एक जिज्ञासा थी क्योंकि इस देश में हर कुछ मील के बाद विविधता, विभिन्न संस्कृति है। हर दिन मेरे लिए एक नए शहर में एक नई प्राणी के साथ एक नया दिन है। मैं एक घुमक्कड़ हूं जो के विभिन्न हिस्सों में घूमना पसंद करता है और जल्द ही भारत से बाहर हो सकता है।

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  1. Parul says:

    Such an amazing blog.

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