दुनिया का सबसे ऊँचा मंदिर बृहदेश्वरा

तंजावुर | तमिलनाडु | भारत दर्शन

थंजावुर रवानगी

मुझे थंजावुर के लिए और प्रेम भाई को दिल्ली के लिए रवाना होना है। अंतर बस इतना है मुझे सुबह निकल जाना है और उन्हें शाम तक। प्रेम भाई ने अपनी मेहमानवाजी से कानपुरिया का दिल जीत लिया।

उनकी उपस्थिति में निकलना उचित रहेगा क्यों की उन्हें दिल्ली निकलने की तैयारियां जो करनी है। फटाफट तैयारी करते हुए मैं बैग बांधने लगा। स्नान ध्यान कर सारे कपड़े बैग में डाल लिए।

प्रेम के परिवारजनों से मिलकर साढ़े दस बजे तक मैं निकल लिया। नाश्ता वगैरह स्टेशन परिसर में ही कर लिया जाएगा। इधर प्रेम अपने दुपहिया वाहन के साथ तैयार खड़े हैं।

उनका घर स्टेशन से बहुत ही नजदीक है। चिदंबरम भी ज्यादा बड़ा नहीं है। मुख्य स्थान के अलावा बाकी गांव जैसा ही है। पर यहाँ के लोगों ने मंदिर को संजो कर रखा है।

प्रेम भाई खुद अपने दुपहिया वाहन से स्टेशन तक अलविदा कहने आए। एक बैग टंकी के ऊपर दूसरा मेरे कंधे पर और साथी घुमक्कड़ को बीच में लटका कर।

स्टेशन पर पहुंचते ही वही पुराना दृश्य याद आने लगा जो अभी दो दिन पहले बीता था। साथी घुमक्कड़ इस वृद्ध आदमी को ढूढने लगा जो लड़ाई को आतुर था। पर वो तो ना मिले।

स्टेशन के बाहर से ही थंजावुर जाने वाली ट्रेन के दो टिकट आरक्षित करवा लिए। स्टेशन परिसर पर आ कर दाहिने तरफ मुड़ गया जहाँ दुकान है।

चाय पर चर्चा करते हुए प्रेम अपने पढ़ाई के बारे में बताने लगे। दुकानदार को मैने पैसे देने की कोशिश की पर उसने नहीं लिए। क्योंकि प्रेम ने मेहमानो से पैसे लेने के लिए तमिल में मना कर दिया था।

कुछ गपशप के बाद प्रेम भाई निकल गए अपनी राह और मैं प्रतीक्षा करने लगा ट्रेन की। ठीक बारह बजे ट्रेन का आना हुआ।

बारह बजे की ट्रेन से ठीक तीन घंटे में मैं थनजवुर पहुंच गया।

थंजावुर में आगमन

खस्ता हालत में अमानती घर

यहाँ काफी उमस का सामना करना पड़ रहा है। परिसर में कुछ वक़्त बिता कर निकल पड़ा अमानती घर ढूंढने। योजनानुसार किसी अमानती घर में बैग जमा कर के निकल जाऊंगा घूमने।

जैसा की अब तक करता आया हूँ। बैग रखो और घूम फिर कर दूसरे शहर निकल जाओ। यहाँ भी उसी कोशिश में हूँ।

कदम बढ़ चलें है व्यस्त इलाके की ओर। जहाँ कुछ आदमी दिखाई पड़ रहे हैं। इन्हीं से पूछकर कुछ जानकारी हासिल करता हूँ। किसी रेलवे कर्मचारी से पूछने पर इशारा करते गोदाम की तरफ जाने को बताया।

गोदाम पहुंचा तो देखा यहाँ अमानती घर जैसा कुछ भी नहीं लग रहा। बस एक कर्मचारी चैन की नींद सो रहा है। हिलाने पर वह उठा और अपनी भाषा में अगड़म बगड़म कुछ बोला।

उसके भाव से यही लगा शायद यही देखरेख करता है कोने में बने अमानती घर की। आखिरकार नजर तो आया। पर यहाँ तो माल भी ढोया जा रहा है।

सोता हुआ ये आदमी जगा तो सही। होश में आने के बाद इस संचालक के भरोसे बैग इसके द्वारा बताई हुई जगह पर रख दिया।

रजिस्टर पर पंजीकरण करने के बाद रसीद कटवा ली। पर इनका ढीला ढाला रवैया देख कर मुझे आज बैग वापस मिलने का भरोसा बहुत कम ही नजर आ रहा है।

क्या पता मेरे जाने के पश्चात यह मनुष्य फिर सो जाए और ऐसे खुले में रखे बैग ले कर कोई निकल ले तो? तो क्या वापस आ कर रेलवे को जिम्मेदारी लेनी होगी बैग की भी और ऐसे कर्मचारियों की भी।

पेट पूजन  पड़ा महंगा

खैर जोरों कि भूंख़ लगी है, स्टेशन से बाहर निकल आया छोटे बैग के साथ। सुबह चिदंबरम में चाय नाश्ता करने के बाद से पानी पर जी रहा हूँ।

यहाँ थंजावुर में शायद ही कोई दुकान खुली नजर आ रही है। अधिकतर दुकानों के बाहर ताला लटका दिख रहा है।

दो किलोमीटर पैदल चलने पर एक रिहायशी रेस्त्रां(एकमात्र खुली दुकान) में प्रवेश किया। अंदर आ कर मेज कुर्सी पर स्थान गृहण किया।

मेन्यू-कार्ड पर अपेक्षा के अनुरूप मंहगा भोजन मिल रहा है। उत्तर भारत का खाना मंगाया। पर इतने महंगे खाने ना तो स्वाद आ रहा है ना ही मजा।

खाने से आत्मा भी त्रप्त नहीं हुई। फिर भी चलने फिरने लायक शरीर हो गया है। कमजोरी दूर हो चली है। भुगतान करके निकल पड़ा बृहदेश्वरा मंदिर।

ना सिर्फ दुकानें बंद हैं। बल्कि सड़क पर भी अच्छा सन्नाटा पसरा है। मंदिर पास में ही दिखा रहा है। सड़क पर वाहन भी कम ही दिखाई पड़ रहे हैं।

राजराजेश्वर मंदिर में दर्शन

पैदल मार्ग से चलते हुए आ पहुंचा बृहदेश्वरा मंदिर। मंदिर का अखंड इतिहास अपने आप में गौरांवित करता है।  बहार कड़ी विदेशी बस देख कर मालूम पड़ रहा है की कहाँ कहाँ से पर्यटक आये हुए हैं।

बाहरी दरवाजे से मंदिर को किले का रूप दिया गया है। जिसके आगे खाई है ताकि अमाननीय लोग भीतर न घुस पाएं। ताकि मंदिर को कोई हानि ना पहुंचा सके। जैसे अभी कुछ वर्षों पहले हम्पी के मंदिरों को पहुंचाया गया था।

मंदिर में दाखिल होने के दो द्वार हैं। पहले द्वार के बाहर तस्वीरें लेने लगा। तस्वीरें लेने में भी अड़चने आ रही हैं कभी कोई आ खड़ा होता तो कोई। शहर भर में भीड़ नहीं दिख रही थी पर इस मंदिर को देखने लोग दूर दूर से आए हैं।

मराठा द्वार

मराठा द्वार

यह ब्रिहदिश्वर मंदिर का पहला प्रवेश द्वारा है, जो मराठा प्रवेश द्वारा के रूप में जाना जाता है। यह एक धनुषाकार प्रवेश द्वारा है। जिसे मराठों द्वारा सीधे हमले से आंतरिक प्रवेश द्वारा की रक्षा करने के लिए बनाया गया।

यह ईंट ओर चूने के गारे से बनाया गया था। इस प्रवेश द्वारा को पूर्व की ओर प्लास्टर के चित्रों से सजाया गया था। इस प्रवेश द्वारा के दोनों ओर क्रमशः गणेश और सुब्रह्मण्यम को समर्पित दो छोटे तीर्थों का पता चलता है।

भीतर जाने के पहले जूते चप्पल बैग जमा करवा कर आगे बढ़ना होगा। पहले द्वार में प्रवेश करते ही दाहिने हाथ पर दिख रहे जमा कमरे में भीड़ जा रही है। अपना सामान भी जमा कराने यहाँ आ खड़ा हुआ।

देखता हूँ  जूते रखने का अलग कक्ष है और झोला रखने का अलग। कुर्सी मेज़ पर बैठे दद्दू से दोनो समान अलग अलग कक्ष में रखवा कर टिकट कटवा कर चल पड़ा मंदिर की ओर।

केरलातांकन तिरुवासल

केरलातांकन तिरुवासल

राजा राजा प्रथम केरल(चेरा) पर अपनी जीत की स्मृति में ये द्वार का निर्माण कराया गया था। इस गोपुर के भीतर एक समतल भितिस्तंभ है जो मध्य भार्ग के दोनों ओर समतल कोष्ठक का समर्थन करते हैं। सामने की पंक्ति में भूटागनों को सामने रखा हुआ दिखाया गया है।

इस गोपुर की ऊपरी मंजिल में प्लास्टर के चित्र है। पूर्व की ओर उध्वा धन्तावा की प्लास्टर की आकृति है और काली क्रमशः उत्तर और दक्षिणी भाग में है। उमा साहिथा शिव और महेशा शिव की प्लास्टर मूर्तियों को मध्य विलेन्द्र के दोनों ओर देखा जाता है।

इसके अलावा शिव जैसे चंद्रशेखर, भीक्ष्ण, कलारी, गंगाधर के बहुत से शिल्पकारी दर्शन देखे जा चुके है। यहां दक्षिणामूर्ति और ब्रह्मा के लिए अलग-अलग मंदिर है जो क्रमशः दक्षिणी और उत्तरी पाश्र्वों पर स्थित है।

मंदिर के दूसरे द्वार से पूरा पूरा मंदिर दिखाई पड़ रहा है। जिसके ठीक सामने नंदी बाबा विराजमान है। जिसे पत्थर को काट कर बनाया गया है। इनका वजन भी करीब बीस टन बताया जाता है।

मंदिर परिसर में आते ही जमकर तस्वीर लेने लगा। बैठने की भरपूर जगह है। इसलिए जगह जगह लोग विश्राम करते दिखाई पड़ रहे हैं।

कुछ देर के लिए मैं भी विश्राम करने लगा। सामने बने मंदिर की हिस्से में बहुत ऊंचाई पर एक मंदिर है। जहाँ लोग दर्शन कर रहे हैं। घास वाले मैदान से उठ इधर ही चल पड़ा।

तमाम सीढियां चढ़ ऐसा लग रहा है धरातल से दूसरी मंजिल पर आ गया हूँ। यहाँ से कोई अगर गिर जाए तो उसका सिर खुलना तय है।

देवी के छोटे से मंदिर में दर्शन करने के लिए अच्छी कतार है। दर्शन कर उतरने लगा नीचे। मालूम पड़ा मुख्य शिवलिंग जो तीन मीटर ऊंचा है उसके दर्शन के लिए सामने से जाना होगा।

मंदिर के दूसरे माले पर दूसरा मंदिर

कुछ तस्वीर लेने के बाद मोबाइल जेब में डाल कर मैं मुख्य मंदिर के सामने आ खड़ा हुआ। मंदिर को ठीक से देखने के लिए भी कम से कम बीस सीढ़ी तो चढ़नी ही होंगी। भीतर मंदिर में आ पहुंचा।

भक्तों की भीड़ से सराबोर यहाँ प्रांगण में गर्मजोशी देखने लायक है। साथ ही है भीषण अंधेरा। प्रकाश का पूरा प्रबंध है।

शोर शराबे के बीच मंदिर में शिवलिंग के दर्शन हो रहे हैं। जिसके बाहर पंडित जी सब को पानी का प्रशाद वितरित कर रहे हैं। पर यहाँ किसी को जल्दी जल्दी बाहर नहीं भेज रहे।

इत्मीनान से सबको मौका मिल रहा है। मंदिर में पुरानी वस्तुएं भी देखने को मिल रही हैं। साथ ही भीतर से चमगादड़ों की महक भी आ रही है।

पुरानी वस्तुओं में संगीत से जुड़े वाद्य, लकड़ी मेज, पूजा से जुड़ी सामग्री शामिल है। पीछे के दरवाजे से ही सबको बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है।

बाहर आ कर मंदिर का चक्कर लगाने जा रहा हूँ। यहाँ हर कोने में किसी न किसी देवता की मूर्ति लगी हुई है।

लोग हजारों की संख्या में विश्व भर से यहाँ आए हुए हैं इस मंदिर को देखने।

कुछ ही देर में अंधेरा भी होने लगा है। वैसे ही प्रकाश का उत्सर्जन हो रहा है। जैसे ये प्रकाश मंदिर पर पड़ रहा है वैसे ही इसकी सुंदरता में चार चांद लग रहे हैं।

मंदिर में दर्शन के पश्चात मैं रेलवे स्टेशन की ओर बढ़ चला तिरूचिपल्ली जाने के लिए।

मुझे डोसा बहुत पसंद है, इसको और समय को मद्देनजर रखते हुए थोड़ी पेट पूजा की और निकल पड़ा तिरूचिपल्ली के लिए। एक घंटे के भीतर तिरूचिपल्ली पहुंच गए। जहाँ से अब मुझे मुसिरी। के लिए निकलना होगा शीघ्रता।

मंदिर का पिछला हिस्सा

बृहदेश्वर मंदिर से जुड़े रोचक तथ्य

मंदिर में कई द्वार है। जिनका निर्माण अलग अलग साम्राज्यों के महाराजों ने कराया।  मंदिर में समय समय पर पांड्यों, मराठाओं, विजयनगर शासकों ने निर्माण कराया है।

राजा राजा चोला। कहा जाता है वो भगवान शिव के भक्त थे। जो उनके नाम पर था जिन्होंने मंदिर का निर्माण करवाया था संन १००५ से १००९ के मध्य में। पहले इस  मंदिर  का नाम राजराजेश्वर मंदिर हुआ करता था।  जिसे मराठाओं ने बदल कर बृहदेश्वरा कर दिया। 

मंदिर का निर्माण पहेली तकनीक के तहत किया गया है। मतलब किसी गिट्टी या मौरंग का इस्तेमाल नहीं हुआ है। यानी दो पत्थरों के बीच कुछ भी नहीं।

कहते हैं ब्रहादेश्वर मंदिर और उसके गुम्बद की छाया जमीन पर नहीं पड़ती। अदभुत शिल्पकारी का प्रदर्शन है।

यह मंदिर बिना नीव खोदे बनाया गया है। यानी समतल धरती पर। मंदिर का आधार इतना चौड़ा है जिसके कारण मंदिर इतने सालों से इतना सीधा रखा है।

जैसे इटली की झुकी हुई मीनार, लंदन का घंटाघर वक्त के साथ झुक रहा है। पर ये बृहदेश्वरा ऐसे का ऐसा ही तना खड़ा है पीछे १००० सालों से।

भगवान शिव को समर्पित बृहदेश्वरा मंदिर शैव धर्म के भक्तों के लिए पवित्र स्थल है। विश्व में यह अपनी तरह का एकमात्र मंदिर है जो कि ग्रेनाइट का बना हुआ है। एक लाख तीस हजार टन से भी ज्यादा का ग्रेनाइट।

इस मंदिर को 1987 में यूनेस्को ने विश्व धरोहर घोषित किया है। तेरह मंजिला यह मंदिर 66 मीटर ऊंचा है। आश्‍चर्य की बात यह है कि तंजौर में आस-पास साठ किमी तक न कोई पहाड़ और न ही पत्‍थरों की कोई चट्टानें हैं।

कहते हैं यहाँ 3 हजार हाथियों की मदद से इन पत्‍थरों को यहाँ लाया गया था। इस मंदिर में सीमेंट गिट्टी किसी भी चीज का प्रयोग नहीं हुआ है।

इसके पत्थर एक दूसरे से इंटर लॉकिंग के माध्यम से जुड़े हुए हैं। यही वजह है कि यह मंदिर हजारों सालों से टिका हुुआ है। मंदिर का गुंबद अपने आप में एक आश्‍चर्य है।

यह एक विशालकाय पत्‍थर से बना है। जिसका वजन 81 टन से भी अधिक है। उस जमाने में जब कोई क्रेन या लिफ्ट भी नहीं थी, फिर कैसे?

इतने विशालकाय पत्थर को दोनों ओर बनाए गए किलोमीटर लंबे लंबे ढाल की मदद से हाथियों के द्वारा खींच कर ऊपर रखा गया है। मंदिर में विशालकाय शिवलिंग को भी स्‍थापित किया गया है। इस कारण इसे बृहदेश्वर नाम दिया गया है।

जब एक हजार साल पूरे हुए थे तब रिजर्व बैंक ने 01 अप्रैल 2010 को एक हजार रुपये का नोट जारी किया था। जिस पर बृहदेश्वर मंदिर की भव्य तस्वीर है।

संग्राहकों में यह नोट लोकप्रिय हुआ। इस मंदिर के एक हजार साल पूरे होने के उपलक्ष्‍य में आयोजित मिलेनियम उत्सव के दौरान एक हजार रुपये का स्‍मारक सिक्का भारत सरकार ने जारी किया।

मुख्य प्रांगण के सामने

तजावूर एंव चोल

दक्षिण भारत के शक्तिशाली चोल शासक न केवल राजनैतिक स्थिरता के अग्रवर्ती थे, वरन् एक समय बिन्दु पर उन्होंने दक्षिण भारत के अधिकतर भागो पर अपनी प्रभुता स्थापित करने के साथ ही न केवल श्रीलंका, उत्तर भारत अपितु दक्षिण-पूर्वी एशिया में भी अपनी उपस्थिति का अहसास करवाया।

मध्यकालीन चोल गौरव की स्थापना का श्रेय पूर्ववर्ती चोल शासकों को जाता है जो ईसा की प्रारम्भिक सदी में उरैयूर से शासन कर रहे थे। विजयालय (850 870) के उदय के साथ ही पल्लवों, पांड्यों एवं मुतरैयारों के भविष्य का अंत हो गया एवं चोल साम्राज्य पंक्ति की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ।

वदावरु नदी के दक्षिण तट पर स्थित तंजावूर, कावेरी नदी के दक्षिण-पश्चिमी मुहाने पर स्थित एक समारिक एवं भौगोसिक महत्व का केन्द्र था।

10वीं ई. तथा प्रारम्भिक 11वीं ई. के चोल अभिलेखों में तंजावूर के लिए तन्जई नाम का उल्लेख मिलता है जो कि मुतरैयारों एवं सम्भवतयः नौवीं शती ई. के मध्य में

चोलों द्वारा नियंत्रित गाँवों के समूह का केन्द्र था। चोल राजराजा प्रथम ने विशेष कृपा दृष्टि स्वरूप यहा चिरस्मरणीय बृहदीश्वर मंदिर का निर्माण करवाकर तंजावूर को विशेष महत्व प्रदान किया।

जिसके परिणामस्वरूप यह नगर अनियोजित मंदिरों की नगरी बन गया। तंजादूर नगर का विकास विशेष रूप से पूर्व नियोजित विधि से एक धार्मिक एवं उत्सवों की नगरी के रूप में किया गया।

नगर का रूपांकन इस प्रकार किया गया जिससे नगर के केन्द्र से मंदिर तथा उल्ललई (मंदिर के चारों ओर आतरिक घेरा) पुरोहित / प्रशासक वर्ग हेतु तथा पेरम्बडी (बाह्य घेरा) अन्य व्यवसायी समूहों के आवासन की व्यवस्था हो।

राजराजा प्रथम की मृत्यु तथा राजधानी के गंगकोण्डचोलपुरम स्थानान्तरण के साथ ही तंजावूर का शैशव काल आरम्भ हो गया। यह जगर नायक एवं मराठा शासकों के अंतर्गत पुनः पल्लवित हुआ एवं इसने अपने पूर्व गौरव को प्राप्त किया।

समय के साथ नगर के मूलस्वरूप में किंचित परियोजन एवं अलकरण किए गए नायक काल में बृहदीश्वर मंदिर की चाहरदीवारी, सुब्रहमण्यम मंदिस्व आहाते एवं इसके भीतर विशालकाय नन्दी का निर्माण किया गया इस काल में कुछ जलाशयों का परिष्कारव कृषि हेतु जलीय भूमि का पुनः प्रयोग किया गया।

रघुनाथ नायक ने अपने राज प्रसाद में नृत्यकौशल व नाट्य मंचन हेतुरंगभूम निर्माण करवाया। मदुरई जायकों ने अंतिम जायक शासक विजयरा को 1673 ई. में पदच्युत कर दिया। 1675 ई. में तंजावूर मराठा शासका के हाच मराठा शासक शाहजी ने राजप्रसाद का सुमिर कार्य मनोहारी राजसिंहासन कक्ष का निर्माण करवाया।

वर्तमान में सरस्वती महल पुस्तकालय में पांडुलिपियों का संग्रह शाहजी द्वारा किया गया। इस काल में निर्मित राजगोपालस्वामी मंदिर निर्माण ने नगर की कीर्ति में और विस्तार किया।

इस काल में निधन वर्ग के निशुल्क प्रयोग हेतु सराय व  धर्मशालाओं का निर्माण करवाया गया। मराठों के अन्तिम शासक शिवाजी का कोई उत्तराधिकारी नहीं था। 

अतः 1855 ई. में अंग्रेजी अपने साम्राज्य में मिला लिया । शक्तिशाली एवं विस्तारवादी अंग्रेज प्रशासकों ने छोटे तजादूर को समृद्ध आर्थिक इकाई में परिवर्तित कर अपने अधिकार में कर लिया।

तमिलनाडु की चावल की तश्वरी के नाम से विख्यात थंजावुर आज भी राजराजा प्रथम द्वारा डाली गई नींव के चारों ओर ही व्याप्त है। ऐतिहासिक महत्व के स्थान के रूप में अपनी गरिमा बनाए हुए है।

बृहदेश्वर मंदिर में प्रकाश

बृहदीश्वर मंदिर

बृहदीश्वर मंदिर का निर्माण कार्य 1004 ई में आरम्भ किया गया एवं यह 1010 ई में पूर्ण हुआ। इसकी रूपरेखा सार्वभौमिक स्थापत्य संरचना महामरू को निरूपित करती है। इस मंदिर में निर्मित विशालकाय शिवलिंग  मूल रूप से शिव को समर्पित है।

इस मंदिर का नामकरण निर्माणकर्ताओं  ने स्वयं के नाम के अनुरूप राजराजेश्वरमुदयार मंदिर रखा। मंदिर का निर्माण एक आयताकार प्रागण के रूप में किया गया। इस मंदिर के लगभग 50 किमी दूर स्थित स्थान में आए गएकाश्म खंडों को निर्माण में प्रयुक्त किया गया।

इस मंदिर के गगनचुम्बी प्रनिर्मित शीघ्र का वजन 81,284 टन है। आंतरिक गर्भगृह वर्गाकार है। उत्तुंग शिखर की विमान की ऊंचाई 80.96 मी. तथा उच्चता के कारण दिसलीय भूमि (मिति) के बुर्दिक प्रदक्षिणपस्थित है। तलछन्द की समस्त मितियाँ चोलकालीन विलक्षण चित्रकला से अलंकृत है। 

प्रांगण में मुख्य मंदिर के अतिरिक्त तीन मन्दिर चण्डिकेश्वर अम्मन, सुब्रमण्यम गणेश व करुतुरर (राजपुरोहित) मंदिर निर्मित है। यहाँ नवराज व नंदी के लिए दो पृथक मंडपों की व्यवस्था की गयी है।  राजराजद तिरुवसल व केरेलांतक (आंतरिक गोपुरम) मंदिर के समकालीन है। जबकी मेहराव मराठाकालीन है।

मिति के अधिष्ठान (आधार) अभिलेखों से युक्त है जिनने चोल, पंड्या,  विजयनगर नायक व मराठा शासकों द्वारा निर्मित अभिलेख मुख्य है। जिनसे ज्ञात होता कि राजपरिवार व राजा द्वारा मंदिर को प्रचुर मात्रा में दान दिया गया है।

मंदिर को बड़ी संख्या में भव्य कांस्य व स्वर्ण प्रतिमाएँ भेट की गई। अभिलेखों में दान की स्वीकृति व मंदिर की अनुरक्षण आदि की विस्तृत व्यवस्था का जीवन विवरण भी उपलब्ध होता है। 

मंदिर के कोष्ठक विभिन्न देवी देवताओं यथा गणेश, श्रीदेवी भूदेवी के साथ विष्णु, भिक्षाटन, कालांतक, नटेश, आर्धनारीन्डर व चन्द्रशेखर आदि से अलघुत है जबधिक उत्रिपुराव का अलंकरण प्राप्त होता है।

बृहदेश्वर मंदिर का नक्क्षा
चिदंबरम से थंजावुर से त्रिचिपल्ली से मुसिरि 220किमी तक की कुल यात्रा

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