विश्व का एकमात्र डबल डेकर रूट ब्रिज

नॉनग्रियाट | भारत | मेघालय

टायरना

संध्या होने को आई है। घड़ी में पांच बज चुके हैं। और ठीक पांच बजे के बाद यहाँ प्रवेश बंद हो जाता है। पास में बने काउंटर से गाड़ी पार्किंग की पर्ची कटाई।

समस्या हेलमेट की आ रही है। सो वो भी रखवा दिया किसी तरह बात चीत करके इन्हीं की दुकान में। यही इनकी दुकान है और यही आशियाना।

गाड़ी पार्किंग में खड़ी है जिसकी रखवाली ये लोग सुबह शाम रातभर करेंगे। टायरना नाम का पहला गांव पड़ेगा उसके बाद नॉनग्रियाट गांव।

जहाँ है डबल डेकर रूट ब्रिज। लगभग 4.5 किमी का ये सफर कितनी देर में तय होगा ये तो कुछ देर में पता चल जाएगा। इधर बैग लेके निकला ही हूँ कि एक दलाल पीछे लग गया।

जो रास्ता दिखाने की ज़िद्द कर रहा है। पर मेरी भी जिद्द है रास्ता खुद बाखुद तय करने की। अभी बात चल रही है कि बड़े बैग यहीं रखवा दिए जाएं और जरूरी सामान ही ले जाया जाए।

पर फिर हुआ कि बैग सहित ही गांव की तरफ जाना सही रहेगा। सारा सामान अपने साथ रहेगा। कपड़े जो गीले हो चुके हैं उनको भी सुखा लिया जाएगा।

लगभग पांच किमी और 3500 सीढ़ियों को लांघने का सफर शुरू हुआ। सीढ़ियां तो शुरुआत से ही देखने को मिल रही हैं। जो यहाँ के निवासी हैं वो भी देखने को मिले।

सीढ़ियों को भी साफ सुथरा रखा जाता है। ना मिट्टी ना काई ना चिकनाई। जैसा सफ़र के दौरान दरांग जाते हुए एक छोटे से गांव के शॉर्टकट देखने को मिला था। जिसमे काई ज्यादा थी।

हरियाली इतनी है कि सीढ़ियों से भटक कर इन जंगलों में उतर जाए तो बिना गांव वालों की मदद के खुद को बचा नहीं सकता। ऐसे ना जाने कितनी दूर तक सीढ़ियां नीचे जा रही हैं।

गांव भी बहुत गहराई में है। फिलहाल तो मैं बरसाती जैकेट और पतलून पहने हूँ। इसलिए कि कहीं जंगल में भीगने की नौबत आईं तो दोबारा ना लादना पड़े।

पर चलते चलते हो रहा है कुछ उल्टा। एक तो बैग का वजन दूसरी तरफ शरीर में गर्मी जिसके कारण अब उतार देने का मन कर रहा है।

अभी तक रास्ते में हम दो के सिवाय और कोई नहीं दिख रहा है। मौका बढ़िया है। बरसाती जैकेट और पतलून उतारी और तहा कर बैग में रखने लगा।

अब गर्मी भी बर्दाश्त हो रही है और शरीर पर ज्यादा भोझ भी नहीं लग रहा। एक नवयुवक जोड़ा बगल से निकल रहे हैं वो भी गाइड के साथ जो उनको रास्ता दिखा रहे हैं।

आसमान में सूरज तो नहीं दिख रहा मगर उजाला पर्याप्त है। देखना ये है कि कब तक रहेगा। जब तक भी रहे अंधेरा होने से पहले नोंगरियाट पहुंचना है।

गर्मी लगने का एक कारण और भी है वो की नीचे की ओर जाना, उमस के कारण तापमान बढ़ने लगता है। कुछ दूर चलने के बाद इतना शानदार नजारा देखने को मिल रहा है जिसको शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता।

दूर से ही दिखता नॉनग्रियाट

यहाँ नॉनग्रियाट जाने का एक सीधा रास्ता ये भी है कि सिर्फ सीढ़ियों का पीछा करते रहिए। अपने आप ही आप नोंगरियाट तक पहुंच जाएंगे।

जगह जगह मकड़ी के जाले देखे जा सकते हैं जो यहाँ पर काफी आम हैं। शायद ये जंगल के घनत्व के कारण हो सकता है कि ये अपना आशियाना कहीं भी बना लेते हैं।

कुछ आगे चल कर एक गांव देखने में आया। यहाँ से रास्ता दो भागों में विभाजित हो रहा है। एक कच्चा दूसरा सीढ़ियों वाला। जाना सीढ़ी की तरफ ही है।

यहाँ नल्का लगा हुआ है जिससे पानी की दोनों बोतलें भर ली हैं और पी भी रहा हूँ। ताकि रास्ते भर चल सकूं। पानी का स्वाद बहुत ही अच्छा है।

जो जोड़ा गाइड के साथ आता दिख रहा था वो थक कर यहीं बैठ गए। बोतल में ओआरएस का घोल डाल ले रहा हूँ। जिसको पीने से शरीर में ऊर्जा बनी रहेगी।

वजनी बैग को कस कर बांध लिया है जिसके कारण चलने में सहूलियत हो रही है। जंगलों के जीव जंतुओं की भिन्न भिन्न आवाज़ें आ रही हैं।

क्या पता इन घोर जंगलों में कितने जंगली जानवर हैं। ये तो गांव वाले ही बता सकते हैं। सीढ़ियां इतनी हैं की अगर कोई ग़लती से गिर जाए तो फिर अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता की वो कहाँ को रुकेगा।

मानव निर्मित पुल

गांव में बोर्ड भी लगे हुए हैं जिन पर गंदगी ना फैलाने का सख्त संदेश जारी कर रखा गया है। इसी बोर्ड के कुछ आगे ही मिला एक लोहे का पुल।

जिसपर एक बार में एक ही आदमी जा सकता है। मैंने साथी घुमक्कड़ को पीछे ही रुक जाने को कहा और खुद आगे निकल आया। जैसे ही पांव रखा पुल ज़ोर ज़ोर से हिलने लगा।

ऐसा लग रहा है मानो गिर पड़ेगा। इतनी ज़ोर से हिल रहा है। एक किनारे पर जब मैं आ गया तब दूसरी तरफ से साथी घुमक्कड़ ने चलना जारी किया। पुल के नीचे नदी बह रही है। जिसमे पानी कम और बड़े बड़े पत्थर ज्यादा दिखाई दे रहे हैं।

यहाँ भी अन्य जगहों की तरह एक कुत्ता मिला। जिसे मैं अपना बिस्कुट खिलाने लगा। चाहें चितकुल हो या फिर और कोई अन्य स्थल कुत्तों का साथ अधिकतर जगह रहा है।

पुल पार करने के तुरंत बाद ही फिर से ढेर सारी सीढ़ियां चढ़ने के लिए दिख रही हैं। सिर्फ सीढ़ियां ही सीढ़ियां है। बहुत कमजोर या बूढ़ा आदमी यहाँ तक आ पाने की स्तिथि में नहीं होगा।

कुछ ही मीटर दूर चलने के बाद मानव निर्मित एक और पुल आ गया जो पहले के मुकाबले थोड़ा चौडा है। यहाँ पर एक साथ दो लोग चल सकते हैं और आ जा भी सकते हैं।

मानव निर्मित पुल

यहाँ नदी पहली वाली नदी के मुकाबले ज्यादा पानी है। गहराई भी अधिक है और बड़े बड़े पत्थर इसकी शान में चार चांद लगा रहे हैं। ठीक इस पुल के नीचे एक और पुल है।

जिसको देख कर लग रहा है कि वो पुराना पुल है जिसे कभी किसी जमाने में इस्तेमाल किया जाता रहा है। पर अब नहीं। पसीने से अब पूरा शरीर भीग चुका है।

थकान भी जबरदस्त है। रास्ते में मिली मोहतरमा ने अपने आप को बंगलुरू का निवासी बताया। जो अपने दल से बिछड़ चुकी हैं।

और पहाड़ियों कि तरह यहाँ भी कूड़ा और गंदगी में कमी ना आईं। खासतौर पर प्लास्टिक की बोतलें और पन्नियां। जाने कब हम प्रकृति के महत्व को समझेंगे।

हाँथ में ज्यादा देर बोतल भी नहीं पकड़ी जा रही। इसलिए मैं उसे बार बार बैग की बद्धि में कमर के सहारे खोस ले रहा हूँ। जिससे चलने में भी आसानी है रही है।

अँधेरा कायम हुआ

अँधेरा होने लगा है। और इससे पहले की पूरा ही हो मुझे डबल डेकर रूट ब्रिज तक पहुंच जाना है। शायद नोंगरियाट गांव आ चुका हूँ। क्यूंकि अब यहाँ अच्छी खासी बस्ती नजर आ रही है।

दीवारों पर होमस्टे का टैग पुता हुआ है लगभग हर घर के बाहर। जैसे जैसे आगे बढ़ रहा हूँ वैसे वैसे दाम भी बढ़ रहे हैं। और घर भी बड़े बड़े और आलीशान होटल जैसे बने हुए हैं।

काफी ऊपर तक आने के बाद भीडभाड बढ़ ही रही है। यहाँ तक आने के बाद अंधेरे में जाने के बाद कुछ भी नहीं समझ आ रहा है। तय किया डबल डेकर रूट ब्रिज की तरफ जाने का।

वहीं कहीं खाली पड़ी जमीन पर तंबू गाड दिया जाएगा। इस मंशा के साथ वापस जीने उतरने लगा।

इससे पहले एकदम रात हो जाए जल्द से जल्द ठिकाना ढूंढना पड़ेगा वरना पता नहीं कहाँ रात गुजारनी पड़ेगी। थकान और टूटे शरीर के साथ आ पहुंचा डबल डेकर रूट ब्रिज।

पर अंधेरे में कुछ भांप पाना संभव नही है। आगे कुछ घर बने दिख रहे हैं, जहाँ बत्ती टिमटिमा रही है। सिर्फ पेड़ और घने जंगलों में खुद को घिरा पा कर अब डर लग रहा है कहीं कोई जंगली जानवर अकेला पा कर हमला ना कर दे।

थका हारा, पुल पार करके आखिरकार बैग लेके आ पहुंचा इसी इलाके में। यहाँ सिर्फ दो घर ही बने दिख रहे हैं। जिस घर के सामने बैग रखा वहां कुछ हलचल है।

आगे बना घर पूरा पक्का और बड़ा बना दिख रहा है। बैग ले कर अब और भटकने की क्षमता नहीं है। यहाँ सामने बने घर में बात करी तो मालूम पड़ा एक रात की कमरे की कीमत मेरे जेब से ज्यादा है।

सोच रहा हूँ सामने दिख रहे घर में भी सौदा कर लिया जाए। बात करने के लिए साथी घुमक्कड़ को भेजा। जबतक साथी घुमक्कड़ वहां जा कर वापस आता अंधेरा ने गांव को अपने आगोश में ले लिया है।

साथी घुमक्कड़ वापस आया और बताने लगा उस घर में कीमत इस घर से भी ज्यादा है। तो पर वहां कुछ बात ना बनी।

जिस घर में सामने खड़ा हूँ वहां बात कर के तंबू लगाने की ज़मीन मांग ली। जिसकी उन्होंने झटपट इजाजत भी से दी। सौदा पक्का हुआ है। रात का खाना तो बेहद जरूरी है इतना वज़न जो लाद के यहाँ तक आया हूँ।

चच्चा जान अपने ही घर में खाने की सुविधा भी मुहैया करा रहे हैं। बस बोलने की देरी है और दो लोगों का खाना पकने लगा। आज से पांच सौ साल पहले तो ना यहाँ खाना पकाते होंगे ना इस सभ्यता से रहते होंगे जैसे आज रह रहे हैं।

नॉनग्रियाट जाते लेखक

अंधेरा जैसे बढ़ रहा था वैसे जंगली जानवर के हमले का डर और खतरा सताने लगा था। इसीलिए ज्यादा भटकने से अच्छा है इन्हीं जनाब के घर पर तंबू लगाना ठीक रहेगा, सो वही किया भी।

यहाँ के मकान मालिक ने अपनी घर की छत पर तंबू लगाने की इजाज़त दे दी। नीचे नवनिर्मित कमरे दिखाए थे, पर उनकी कीमत कुछ रास ना आईं।

जब बात आईं एक रात बिताने की तो अपना तंबू जिंदाबाद। इजाजत तो इन्होंने इसलिए भी दे दी क्यूंकि इनका आधा अधूरा निर्मित घर, जिसको बनाने के लिए पैसे भी चाहिए।

रकम चांहे जहाँ से आए। बैग लेके घर की छत पर पहुंचा तो यहाँ बिजली की नंगी तारें पाई। जिसे प्लास्टिक के पाइप से ढका हुआ है।

जगह को पहले ही साफ कर चुके हैं ताकि मैं अपना तंबू लगा सकूं। जब नीचे खड़ा था तो साफ सफाई की आवाज़ आ रही थी।

3500 सीढ़ियां चढ़ने उतरने के बाद शरीर बुरी तरह टूट चुका है। वो भी वजनी बैग के साथ तो और भी हालत खराब है। टॉर्च की रोशनी में बैग से तंबू निकला और लगाने लगा।

तंबू लगने के बाद सारे गीले कपड़े छत पर बिछे तारों पर डाल दिए। खाने पर जब आमंत्रण आया तो नीचे पहुंचा। यहाँ कुल मिलाकर तीन शक्श से और मुलाकात हुई।

जिनमे से एक नालंदा से हैं, बाकी दो लोग केरल से। आज तो बैगन कि सब्जी और रोटियां बनी हैं। हालांकि सभी सब्जियों की दुश्मन है बैगन जो मुझे ज़रा भी नहीं पसंद।

पर ज़िंदा रहना है तो खाना ही पड़ेगा।

अगली सुबह

कल देर रात तक बिहारी बाबू से गप्पे मारने के बाद तगड़ी नींद आई। कपड़े जो सुखाने के लिए डाले थे वो सूखे तो नहीं बल्कि और गीले हो गए हैं।

ये रातभर गिरी ओस का नतीजा है। अब धूप का इंतजार करना पड़ेगा तभी कपड़े रखने लायक होंगे बैग में।

उजाला हुआ तो डबल डेकर रूट ब्रिज को ठीक से देखने को मिल रहा है। अब आभास हो रहा है कल रात कहाँ कहाँ से गुज़रा। तय हुआ कि नित्य क्रिया के बाद यहीं स्नान किया जाएगा।

कुल्ला मंजन करने के बाद में पर सुबह की चाय परोसी गई। फटाफट चाय पर चर्चा खतम करके निकालने की तैयारी करने लगा।

बिहारी बाबू ठहरे सज्जन सेठ जो काफी दिनों से यहीं पर हैं। इनको यह जगह इतनी भा गई है कि अपने जीवन का एक टुकड़ा यहीं बिताने की आस में है।

केरल के शेर निकल चुके हैं सतरंगी झरना देखने(rainbow waterfall). बैग तंबू के अंदर ही रखकर कीमती सामान को छोटे बैग में डाल निकल पड़ा स्नान ध्यान के लिए।

मलिक को भी अवगत करा दिया है अपने निर्णय से। इनके घर मजदूरों के द्वारा काम भी चालू हो गया है।

डबल डेकर रूट ब्रिज

इस तरह के रूट ब्रिज को बनाने में तकरीबन 25 साल का समय लगता है। जो इनके पूर्वजों ने बनाया है। जिसका देखिकरण आज के गंव के लोग बहुत ध्यान से करते हैं। इस पुल को ही लगभग 500 से भी ज्यादा साल हो चुके हैं।

इसकी खास बात यही है कि यहाँ एक के ऊपर एक दो रूट ब्रिज हैं। जो इसे दुनियाभर में सबसे अलग और अनोखा बनता है। एक जड़ का बना पुल तो कई जगह देखने को मिल जाएगा पर दो पुल वो भी एक के ऊपर एक मिलना संभव नहीं है।

खासी जनजाति के लोगों द्वारा निर्मित इस पुल को रबर के पेड़ की जड़ों से जोड़ा गया है। कितनी भी धूप, बारिश हो ये पुल समय के साथ और मजबूत हो जाते हैं।

वहीं दूसरी ओर लकड़ी के पुल कमजोर हो जाते हैं। 2400 फुट की ऊंचाई वाला ये पुल का उपरी हिस्सा लगभग 20 मीटर लंबा है।

खासी और जयंतियां जनजातियों के लोगों ने जब गौर किया कि पेड़ की जड़ों के मदद से नदी को पार किया जा सकता है तब तब उन्होंने इसकी मदद से पुल का निर्माण किया है।

पेड़ की जड़ें सही दिशा में आगे बढ़े इसके लिए गांव के लोगों ने कई तिकड़म भी भिड़ाए हैं। कभी जबरन तो कभी बंबू की मदद से जड़ों को सही दिशा दिखाई गई है।

जिसके कारण आज ये पुल बन कर तैयार खड़ा हो पाया है। अपने कपड़े लत्ते लेकर आ पहुंचा मैं उमशियांग डबल डेकर रूट ब्रिज के सामने।

स्नान करने के लिए एक किनारे बैठता की एक यहाँ मौजूद एक महिला पहले से ही कपड़े धोने में लगी है। पानी यहाँ इतना साफ है कि नीचे का पत्थर साफ तौर पर देखा जा सकता है।

इससे पहले कि नहाने के लिए उतरता वो महिला अपनी भाषा बोलते हुए मुझे ले आई टिकट काउंटर पर। मेरे लाख बोलने पर भी नहीं मानी की कल का मेहमान हूँ।

और टिकट आज क्यों काट रही हैं। पर जबरन यहाँ टिकट काट ही लिया। कैमरे और शूटिंग का टिकट अलग से लगता है। जिसका मूल्य और भी अधिक है।

पर ना तो हम शूटिंग कर रहे हैं ना रिकॉर्डिंग। टिकट लेके वापस आया, बैग में सम्भाल के रखा और कूद पड़ा पानी में। कुछ तो ठंडा लग रहा है।

हर कोण से देखने पर अलग ही दिख रहा है ये पुल। जैसे आगरा का ताज महल।

डबल डेकर रूट ब्रिज के पास बने घर में बैठे बिहारी बाबू आशीष
टायरना से शिलॉन्ग से पुलिस बाजार से ढनकेति 85km

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