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स्वर्ग में बसा धर्मशाला क्रिकेट स्टेडियम

जम्मू निकलने की तैयारी

जम्मू पहुंचने के लिए सुबह जल्दी उठना और उठने के बाद समय से निकल जाना एक चुनौती है। चिड़ियों की चहचहाहट कान में पड़ने से मैं छह बजे तक सो कर उठा।

सर्द हवाओं के बीच टेंट के बाहिर निकला। मौसम बहुत ही सुहावना और ठंडा है। रात में अंधेरे के कारण आस पास और दूर की चीज़ों का अंदाज़ा भी नहीं लग पा रहा था वहीं अब दूर दूर तक देखा जा सकता है।

अगर समय रहा तो धर्मशाला क्रिकेट स्टेडियम जरूर जाऊंगा।

जैसे ध्यान दिया कि एक लारी वाला एक पहाड़ी से दूसरी पहाड़ी पर दूध की सप्लाई कर रहा है। ये सब इतनी दूर घटित हो रहा है जिसे देखने के लिए एकाग्रचित होना पड़ेगा।

मैंने ये नज़ारा अजय को भी दिखाने की कोशिश की पहले तो वो पहाड़ी ही ढूंढता रह गया, बड़ी देर बाद उसे लारी नजर आईं।

रात में अंधकार में जो छोटी सी जगह मालूम पड़ रही थी वही चारों ओर पहाड़ियों से ऐसे घिरी है जैसे भारतीय सिनेमा में पुलिस डाकू को चारो तरफ से घेर लेती है।

सूरज उगने की फिराक में है, वो भी मेरे तरह बाहर आने की फिराक में हैं लेकिन उनका अंदाज़ मुझसे जुदा होगा।

मैं टेंट से निकला वो पहाड़ों के बीच उगेगा। दो पहाड़ों के बीच में से उगता सूरज देखना कमाल का नज़ारा होगा। मुझे याद है वो दिन जब नोएडा में मैं टेंट खरीद कर लाया था और पास के मैदान में टेंट के परीक्षण के लिए गया था।

एक हांथ के बराबर की ये सामग्री बड़ी काम की निकली।

पानी से लड़ाई

मंजन करने के लिए पानी ढूंढने लगा। पर मेरी बोतल में तो बस दो बूंद जिंदगी की बचीं है। तंबुओं के पास बने आलीशान कमरे के पास जा खड़ा हुआ।

यही कमरा है यही रिसेप्शन इस कैंप का सब कुछ यही है। देखा तो कमरे में ताला भी नहीं डला है। बाहर से कुछ बोतलें अन्दर दिखाई पड़ रही हैं।

चिटकनी खोल मैं पानी की बोतल लेने अन्दर घुसा और मुझे एक भारी बोतल मिली।

जैसे मोहब्बत और युद्ध के मैदान में सब जायज है वैसे ही घुमक्कड़ों के लिए सब जायज है, जब  तक किसी का नुक़सान ना हो। पानी इतना ठंडा की मूह जम जाए।

मूह में पानी भरते ही ठीक ऐसा ही हुआ। जैसे तैसे कुल्ला करके जान छुड़ा भागा। स्नान के लिए दुसलखाने में जमा देने वाले पानी को हांथ लगाया तो मानो पानी बोल रहा हो कृपया थोड़ी उचित दूरी बनाकर रखें।

शरीर के लिए इस अवस्था में शुद्धिकरण के लिए दो मग्घा ही काफी है।

पहले मग्घे पानी ने समुद्र के ठंडे पानी की याद दिलाई, दूसरे ने हिमालय की। भागते हुए मैं ऐसे बाहर निकला जैसे भीषण आतंकी हमला हुआ हो।

पूरब से सूर्य उगा घाना उजियारा

धीरे धीरे सूर्य देव पहाड़ों के बीच हल्की हल्की झलक दे रहें है। देखते ही देखते बड़ी रफ्तार के साथ पहाड़ों को चीरते हुए बाहर आ गए। सूर्योदय के बाद ठंड मानो गायब हो गई हो। यही ठंड अब चुभने वाली गर्मी में तब्दील हो गई।

जो सारा समान अभी तक टेंट में बिखरा पड़ा था उसे एक एक कर अपने बैग में डालने लगा। टेंट के अन्दर का सारा सामान समेटने के बाद टेंट खोल कर फोल्ड किया और अजय के बैग में डाल दिया।

इतना समेटने में ही पसीने से तर बतर भीग गया, जहाँ कुछ देर पहले तक ठंड से ठिठुर रहा था वहीं अब गर्मी से चुभन हो रही है।

बैग उठा पहले कैंप छोड़ा और सीधा केयर टेकर के घर पहुंचा जहाँ जनाब और उनके परिवार से निकलने की अनुमति ली।

जो बल्ब कल रात लुप्लुपा रहा था वो इन्हीं की दुकान निकली। जो जीवन व्यपान पहाड़ी करते हैं वो शहरों में रहने वालों से बिल्कुल इतर है।

वापस कैंप वाली रोड की तरफ जाने लगा तभी जनाब छूटते ही बोले ऊपर छत की तरफ से निकल जाएं पहुंचेंगे वहीं। घर में जंगली कुत्ता पले होने के कारण सावधानी बरतते हुए एक एक कर हमें बारी बारी से फाटक तक छोड़ने आए।

जीना चढ़ कर पहली मंजिला से छत के रास्ते दुकान के सामने आ खड़ा हुआ।

बस अड्डे तक जद्दोदजहद

अलविदा ले निकल पड़ा धर्मशाला मार्केट जहाँ से पठानकोट जाने के लिए बस मिलेगी। सोलह किलो वजनी बैग ले कर उतरना जितना खतरनाक था उससे कहीं ज्यादा थका देने वाला बैग ले कर चढ़ना है।

असली परीक्षा अब शुरू होने वाली है। सफ़र शुरू हुआ कम दूरी तय करनी पड़े इसलिए शॉर्टकट से जाना बेहतर समझा।

अभी आधी दूरी भी नहीं तय की है और अभी से ही प्राण हलख को आ चुके हैं। हालांकि ज्यादा चढ़ाई नहीं है तब ये हाल है।

पसीने से शरीर तर बतर हो चुका है। मुझसे खाली पेट अब चढ़ाई भी नहीं चढ़ी जा रही। जी चाह रहा है यहीं थोड़ा सुस्ता लूं।

ऐसा लगने लगा है कि ऑक्सीज सिलेंडर ले कर किसी 5000 मीटर बर्फीली पहाड़ी पर चढ़ रहा हूँ। धीरे धीरे ही सही ऊपर बढ़ता गया।

अब ऐसे रास्ते पर आ पहुंच हूँ जहाँ दो सौ सीढ़ी का शॉर्टकट भी मौजूद है और दूसरे विकल्प के तौर पर लंबा रास्ता।

सूरज उगने के पहले का दृश्य

मैं ये सुनिश्चित करने से पहले एक खुली दुकान के पास बैठ कर सुस्ताने लगा। सुस्ताने का फायदा भी मिला और बिना रुके एक एक कर सीढ़ियां चढ़ता गया।

सांसे जरूर फूल रहीं हैं लेकिन अगर मैं कहीं रुका तो समय और ज्यादा लगेगा ऊपर तक पहुंचने में। इसलिए इसी मानसिकता के साथ कदम कदम बढ़ाता चला गया।

बगल से दौड़ते हुए दो बच्चों के पिता अपने पुत्रों को पास के इंदिरा गांधी स्कूल में कुछ समझाते हुए भेजने जा रहे हैं।

पहाड़ों में पढ़ाई करने वाले बच्चों की फुर्ती ही दुगनी होती है। बस कुछ एक सीढ़ी ही बची हैं और मेरा दम निकल गया।

सीढ़ियां खतम होने से दो सीढ़ी पहले ही रुका फिर आखिरकार दो सौ सीढ़ियां फतह कर है लीं। एक बार तो सीढ़ी चढ़ते वक़्त ऐसा लगा मानो बैग सहित मैं वापस गिर कर सबसे नीचे पहुंच जाऊंगा। मन ही मन पटाके फूटने की गूंज सुनाई देने लगी।

लेकिन अभी जंग यहीं नहीं खत्म हुईं है। यहाँ से भी चौराहे तक थकी आत्मा और वजनी बैग के साथ पहुंचना चुनौतीपूर्ण है।

करीब करीब सभी दुकानें खुल चुकी हैं और कुछ का खुलना अभी बाकि है। बाज़ार में अच्छी खासी हलचल देखने को मिल रही है। सूर्य देव के तेज़ के कारण पहाड़ों में भी गर्मी झेलनी पड़ेगी इस बात का अंदाज़ा कम ही था मुझे।

लिफ्ट करा दे

थका मांदा आधा किमी चलते चलते मैं इसी आशा से पीछे मुड़ देखने लगा कि कोई दुपहिया वाहन आए तो मौका पाकर लिफ्ट मांग ली जाए और बची कुची चढ़ाई एक मोटर गाड़ी में बैठ कर तय कर दूं।

पीछे से जितने भी दुपहिया आ रहे हैं या तो वो खाली ही नहीं हैं या फिर पहले है रुक जा रहे हैं। हालांकि ऊपर से नीचे की ओर जाने वाली गाडियां दे दना दन आती जा रही हैं।

मुड कर देखा तो एक नौजवान अपनी गाड़ी भगाते हुए ऊपर की ओर ही जा रहा है मैंने हांथ हिलाते हुए उसे रोंका। शुक्र है थोड़ा आगे जा कर रुक गया।

लद के निकल गया बस कुछ दूर की चढ़ाई तय करने के वास्ते। पर जनाब बोले कि वो बस अड्डे तक जाएंगे। फिर की मैंने भी वहां तक चलने की हामी भर दी।

आगे आगे चल रहे अजय को भी लिफ्ट से आ जाने की सलाह दी। बड़ी कारगर साबित हुई ये लिफ्ट, समय और ऊर्जा दोनों की बचत।

भविष्य में इस तरह की कई लिफ्ट मिलेंगी ऐसी उम्मीद है मुझे। बस अड्डे पर भाईसाहब ने उतारा और पास में पड़ी बेंच पर बैग रख अजय के आने का इंतजार करने लगा।

पूछताछ काउंटर पर पता चला कि गग्गल से पठानकोट जाने की सीधी बस मिलेगी। यहाँ से गग्गल तक के लिए जाने वाली बस को आने में अभी आधा घंटा है। अब अजय के बस अड्डे पर आने के बाद चर्चा हुई आगे की योजना पर।

चाय पर चर्चा

सुबह की कडी मशक्कत के बाद भूख और प्यास से गला सूखा जा रहा है। पहले तो सुबह की चाय का बंदोबस्त किया जाए।

आस पास कहीं चाय की दुकान नहीं नज़र आ रही लेकिन सड़क के उस पार सो तीन हैं। सड़क पार करके पक्की ईंट की बनी दुकान से दो कप चाय ऑर्डर दी और अजय को बस अड्डे पर ही बैग ताकने को छोड़ आया।

मेरे अलावा यहाँ शहरी इलाकों से आए कॉलेज छात्र छात्राएं भी नजर आ रहे हैं, जो गर्मियों की छुट्टी में धर्मशाला घूमने आए हैं। धर्मशाला के नाम में ही रंगबाजी है। इतना ही बता भर दो की यहाँ हो कर आया हूँ।

सामने वाला तो ऐसे ही धराशाई हो जाएगा। ध्यान भंग करते हुए गरमा गरम चाय कांच के गिलास में छान दी। मैं गरम गरम चाय से भरे दो गिलास उठा सड़क पार कर गया। दोनों हांथ में गर्म गिलास पकड़ने से उंगलियां और हथेली जल गईं।

इससे पहले कि गिलास छूटता मैंने अजय को गिलास थमा उंगलियों को झटकने लगा। चाय पर हुई चर्चा पर ये सहमती बनी की समय की सीमा को देखते हुए हम धर्मशाला स्टेडियम भी जा सकते हैं।

प्रयश और उसके बड़े भाई पीयूष की सलाह के इतर स्टेडियम तो एक बार देखना बनता है। जो यहाँ का निवासी है उसके लिए तो घर की मुर्गी दाल बराबर।

पर क्या पता दोबारा यहाँ कब आने को मिले। काउंटर पर बैठे अंकल जी ने ये सुझाव दिया कि अगर पठानकोट निकलना है तो बस के भरोसे ना रहो।

बस के आने का कोई निर्धारित समय नहीं है बेहतर यहीं रहेगा की यहाँ से गग्गल जीप से निकला जाए और फिर वहां से पठानकोट कें लिए सीधी बस।

कांगड़ा तक की सवारी

सुबह की चाय निपटाने के बाद बैग उठा गिलास चाय की दुकान में रख जीप स्टैंड का पता पूछते हुए निकला पास में बने जीप स्टैंड। जो सड़क से उतरते ही बाएं हाथ पर मौजूद है।

बस की अनुपस्थिति में जीप बड़ी ही कारगर साबित होती हैं। स्टैंड पर तो अभी जीपें खाली ही नज़र आ रही हैं।

इनमें से सबसे पीछे खड़ी जीप का चालक सवारियां भरने में जुटा है। मैं जीप में बैठ गया सबसे पीछे खुले सीट पर जहाँ से बाहर का नज़ारा आराम से देखा जा सके।

आगे की सीटों पर सवारियों को जबरन ठूंस दिया गया है। दुक्का सवारी की कमी थी वो भी पूरी हो गई।

मुझे पराए देश में छुटपन सफर रास कम ही आते हैं, या तो वो अपने शहर में हो या फिर किसी भी शहर में अपना वाहन। उन सफर में मज़ा आती है जिसमें बस या ट्रेन बिना रुके दनदनाते हुए चलती चली जाए।

सवारियां भरने के बाद जीप स्टार्ट हुए और चल दी छोटे सफर की ओर। मैकलोडगंज को अलविदा कहते हुए अच्छा तो नहीं लग रहा पर क्या करूं यही दस्तूर है।

घाटियों के बीच से होते हुए आधे घंटे में गग्गल पहुंच गया। एक किनारे लगा सभी सवारियां उतरती गईं और किराया दे निकलती गईं।

मुझे भ्रमित देख जीप वाले भैया खुद ही बोल पड़े जहाँ उतारा हूँ यहीं से बस मिलेगी पठानकोट के लिए। मैं उतर कर किराया थमा के एक किनारे बस का इंतजार करने लगा।

इंतज़ार

कांगरा में सीना ताने खड़ी हिमालय के पर्वत

आस पास की वादियों को देख कर लगने लगा अपने कैमरे में कैद कर लूं इन्हें। बैग से कैमरा निकाल पहाड़ों की तस्वीरें लेने में अपना ही मजा है।

जाने अंजाने में दूर की पहाड़ी की तरफ कैमरा घुमाया जहाँ एक चोटी पर ध्वस्त पड़े मकान पर नजर पड़ी। तस्वीर ली तो जर्जर मकान का मलबा दिखा।

पास में ठेला लगाए साहब बोले कुछ दिन पहले हल्का भूकंप आया था जिसके कारण ये सरकारी मिलिट्री क्वार्टर ध्वस्त हो गया।

गनीमत थी की क्वार्टर में उस वक़्त कोई नहीं था इसलिए सिर्फ माल का नुक़सान हुआ जान का नहीं। पहाड़ियों पर रहना कितना घातक हो सकता है इसका जीता जागता उदाहरण मेरे सामने है।

ठेले वाले भैया से पता चला पठानकोट जाने वाली बस आने में अभी काफी समय है। पास में बने बेहद छोटे पार्क में अपना झोला झंडा ले कर आ गया।

ये वादियां ये पहाड़ियां जैसे मानो कुछ कहना चाह रही हों, अपने पास बुला रहीं हों। हांथ में कैमरा लिए अजय के भरोसे बैग छोड़ चल पड़ा कुछ शानदार तस्वीरें निकालने।

बर्फ की चादर से ढकी ये पहाड़ियां इतनी सुंदर दिख रही है कि इन्हे निहारते हुए मैं कब सड़क पर एक किमी आगे निकल आया पता भी नहीं चला।

पर्याप्त तस्वीरें और वीडियो कैमरे में कैद करने के बाद वापस आया उसके कुछ ही क्षण बाद पठानकोट के लिए बस भी आ धमकी।

लद के निकल गया पठानकोट के लिए। जब सामने कंडक्टर टिकट काटने को तैयार खड़ा है तब मैं बस में ये चर्चा कर रहा हूँ धर्मशाला स्टेडियम चला जाए या नहीं।

कंडक्टर के दोबारा पूछने पर आखिरकार दो टिकट कटवा लिए धर्मशाला स्टेडियम के। पता नहीं दोबारा कब यहाँ आने का मौका मिले, मिले भी या नहीं तो जाते जाते मलाल क्यों रखना मन में।

पाइसा ले लिया पर टिकटवा नहीं दिया। ई तो गलत है। बस रूकी ओर धर्मशाला स्टेडियम वाली सड़क पर उतारकर निकल गई। किधर जाना है कुछ आइडिया नहीं मिल रहा।

गूगल नक्शे पर देखा तो मालूम पडा यहाँ से डेढ़ किमी अभी भी दूर है स्टेडियम। पहले तो ये ही ना समझ आया कि पुल के रास्ते से जाऊं या किनारे सट के।

मैंने पुल का रास्ता नापा और अजय ने किनारे वाला। लेकिन ज्यादा फर्क नहीं है। एक जगह एक ही समय आ पहुंचे दोनों और दाईं तरफ चल दिया।

dharmashala cricket stadium jate hue lekhak

तेज धूप और वजनी बैग के साथ पैदल चलते चलते हालत खराब हो गई है। इसी ताक में हूँ कि कोई स्टेडियम तक लिफ्ट करा दे, दो चार नहीं एक बार ही करा दे। पर अफसोस सूनसान सड़क पर कोई गाड़ी रोकने को तैयार नहीं।

तकरीबन एक किमी पैदल चलने के बाद नींबू पानी का ठेला दिखा। स्टेडियम से पहले ठेले पर कुछ थकान मिटाई। एक गिलास नींबू पानी ग्लूकोज का काम कर गया।

ठेले वाले भैया जी भी यूपी के ही निकल आए। शरीर में शक्ति का संचार हुआ। दिमाग की बत्ती जली और चल पड़ा स्टेडियम के ओर, लेकिन छोटे बैग ठेले पर ही रखवा दिए, ताकी छाती पर से कुछ वजन कम हो जाए।

धर्मशाला क्रिकेट स्टेडियम स्टेडियम

कुछ मीटर की दूरी पर प्रवेश द्वार तक पहुंचा। गार्ड ने दाएं तरफ इशारा करते हुए टिकट लेने को कहा।

टिकट खिड़की से टिकट ले ही रहा था कि वहां लगे बोर्ड पर नजर पड़ी जिसमे क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर का स्वागतम संदेश लिखा है।

एकदम से रोंगटे खड़े हो गए। एक पल को लगा कि वाकई सचिन आए हुए हैं लेकिन ध्यान से देखा तो बोर्ड पुराना है।

इतने में अन्दर से दो टिकट थमा दिए और मेरा सचिन से मिलने जा भ्रम टूटा। टिकट ले फाटक पर टिकट दिखाया। गार्ड ने अधा टिकट फाड़ मुझे बचा हुआ पकड़ा दिया।

अरे भई जब फाड़ना था तो टिकट क्यों दिलवाया। फटा टिकट ले स्टेडियम में प्रवेश किया। कमबख्त ये भारी बैग अगर कहीं रख जाता तो बड़ी सुविधा मिलती। पर यहाँ ऐसी कोई व्यवस्था नजर नहीं आ रही।

धर्मशाला स्टेडियम दुनिया का सबसे ऊंचाई पर बना एकमात्र क्रिकेट स्टेडियम है। ये पहली मर्तबा है जब मैं किसी स्टेडियम में प्रवेश कर रहा हूँ।

अपने शहर में ग्रीन पार्क स्टेडियम होने के बावजूद कभी मौका नहीं मिला। फाटक से कुछ दूरी पर उम्दा उद्यान बनाया गया है जहाँ कैंटीन भी शामिल है। जो अन्दर से होकर आ चुके हैं वो कैंटीन में लुत्फ उठा रहे हैं।

बरामदे से होते हुए सकरी गली से मैदान की तरफ आया, तो क्या नज़ारा देखने को मिला। ये तो ऐसा लग रहा है मानो कोई मॉडल तैयार कर के सामने रख दिया गया हो।

बर्फ से ढकी पहाड़ियों के आगे बने इस स्टेडियम का नज़ारा बहुत ही अद्भुत और अपने आप में रोमांचित के देने वाला है। आज के युवकों की भाषा में एक नंबर। इसको शब्दों में वर्णन करना कुछ असंभव सा नजर आ रहा है।

धर्मशाला क्रिकेट स्टेडियम में लेखक

पर्यटकों के लिए स्टेडियम का कुछ ही हिस्सा खोला गया है, बाकी के हिस्से में ताला पड़ा है। मैं दाईं तरफ मुड़ कर बैग टांगे टांगे आगे बढ़ता चला गया और तमाम पड़ी बेंच में से एक पर बैग रख दिया।

भरी धूप में भी भीड़ कम नहीं। हाल ही में भारत का यहाँ मैच हुआ था जिसमें श्रीलंका के हाथों करारी शिकस्त झेलनी पड़ी थी।

कुछ जने अपने समूचित परिवार के संग तो कुछ अकेले ही आए हैं। देखते ही देखते मैदान में पानी का संचार शुरू कर दिया गया। जमीन से फव्वारे निकले और नाचते हुए चारों दिशाओं में छिड़काव कर रहे हैं।

सबसे शानदार नज़ारा बर्फीली पहाड़ी के ठीक नीचे खिलाड़ियों का ड्रेसिंग रूम। लेकिन मैदान न्यूजीलैंड के मैदानों जितना छोटा।

दूसरे पाले में जा कुछ तस्वीरें निकाली। दिसंबर के महीने में तो और भी खूबसूरत नजारा होता होगा। जब चारो और बर्फ ही बर्फ।

यकीनन भारत में ऐसा दूसरा स्टेडियम तो नहीं ही होगा। यहाँ रुकने को तो और जी चाह रहा है पर पठानकोट भी समय से पहुंचना है।

भारी भरकम बैग ले कर निकलने लगा। गलियारे से निकल वाटर फिल्टर से पानी भरने लगा तभी दो युवक साथ में फोटो खींचवाने का आग्रह करने लगे।

इनमें में से एक ने पूछा भी क्या आप खिलाड़ी हैं, आपके बैग और पहनावे से तो ऐसा ही लगता है। जोर से हंसते हुए मैंने इंकार किया।

पानी भरने के बाद फोटो खींचवाई और वापस चल दिया। मैं खिलाड़ी तो नहीं लेकिन स्टेडियम के बाहर कोई खिलाड़ी कार से आता दिखा तो कोई भरी धूप में पसीना बहाते हुए।

स्टेडियम के बाहर भी ठेले लगे हैं इसी आस में शायद कुछ बिक्री हो जाए। मैच के दौरान तो यहाँ दर्शकों का तांता लगा रहता होगा।

बाहर आकर नींबू पानी वाले भैया के ठेले से बैग ले कर निकल गया मुख्य सड़क कि ओर। तेज तर्रार धूप में चलते चलते कचूमड़ निकल गया। काफी देर समय व्यापम करने के बाद मुख्य सड़क पर आ गया।

युद्ध स्मारक

जिस जगह बस से उतरा था उसके ठीक सामने भारत में युद्ध में शहीद हुए सैनिकों की याद में मेमोरियल बना है।

सोचा जब बस से उतरा ही हूँ तो क्यों ना कुछ पल उनके नाम कर दूं जिन्होंने अपनी ज़िन्दगी हमारे देश के नाम कर दी।

सड़क पार कर मेमोरियल के टिकट काउंटर पर पहुंचा। यहाँ से दो टिकट लिए और अन्दर दाखिल होने से पहले ये सुनिश्चित कर लिया की बैग किसी कीमत पर नहीं ले जाना है वरना बचे कूचे प्राण भी निकल जाएंगे।

सो टिकट खिड़की पर ही बात कर बैग उन्हीं के संरक्षण में रखवा दिए इस वादे के साथ की जल्द ही आ जाऊंगा। फाटक पर टिकट दिखा अन्दर दाखिल हुआ।

ये मेमोरियल ठीक कारगिल युद्ध से कुछ महीने पहले का बना हुआ है इसलिए केवल 1971 के युद्ध के वीरों तक ही ही सीमित है। जगह जगह वीर सपूतों के नाम गड़े हुए हैं।

सबसे आकर्षक पत्थर की दीवार पर चारो दिशाओं में नाम गुदा हुआ है और पास का तालाब इसकी शोभा बढ़ा रहा है।

वार मेमोरियल धर्मशाला

इस दीवार पर हिमाचल प्रदेश के अलग अलग जगहों से जिन सैनिकों ने बलिदान दिया है उनका नाम बड़ें ही गर्व के साथ लिखा गया है। कुछ जगह मरम्मत का काम भी चालू है।

छोटी पड़ाही पर बने होने के कारण इसे ऊंचाई पर बनाया गया। नीचे बच्चों के खेलने के लिए झूलों का प्रबंध है। कुछ स्कूली बच्चों को यहाँ लाया गया है।

देख कर अच्छा लगा क्योंकि बच्चे जितना इन वीर पुरुषों की गाथाएं पढ़ेंगे और सुनेंगे वे वैसा ही खुद को भी बनाना चाहेंगे।

सैनिकों के प्रति इस तरह का सम्मान हर प्रदेश की सरकार को व्यक्त करना चाहिए। झूले पर तो कम, ये बच्चे तो अपना गेंद बल्ला साथ में लेकर आए हैं।

बल्लेबाज गेंद हवा में मारता तो गिरकर पहाड़ी के नीचे जाती, बाकी के बच्चे गेंद लेने को भागते। अब मेरे भी भागने का समय हो चला है।

वाटर कूलर से पानी की बोतल पूरी भरली और फाटक की बाहर निकल आया। टिकट काउंटर से बैग उठा इधर तोपों के साथ इक्का दुक्का फोटो लीं।

काउंटर वाले भैया से पठानकोट जाने वाली बस का समय पूछने पर पता चला कि चंद मिनटों में बस आती ही होगी।

पठानकोट के लिए रवानगी

मैं फ़ौरन सड़क पार करके बस की राह देखने लगा। पहली बस आईऔर इत्तेफाक से ये पठानकोट ही जा रही है, शुक्र है ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ा।

भरी बस में बैठने को कहीं जगह नहीं। समान एक किनारे रख खड़ा रहा। कंडक्टर ने आश्वासन दिया कि कुछ दूरी के बाद बस खाली होने पर बैठने के लिए सीटें खाली हो जाएंगी।

जल्द ही जगह भी मिल गई। कांगड़ा नदी होते पार करते हुए जब बस आगे बढ़ी वो नज़ारा भुलाए नहीं भूलता।

इतना शुद्ध वातावरण, नदी के आर पार दिखने वाला पानी, उफ़ क्या नज़ारा है। सर्रराटे से बस निकल गई। ड्राइवर के लिए तो ये आम बात है पर मेरे जैसे घुमक्कड़ों के लिए नहीं।

वो नहीं जानते भगदड़ वाले शहरों में कितनी उलझने है। अभी याेजनानुसर पठानकोट पहुंचकर जम्मू को ट्रेन के रास्ते निकल जाऊंगा। बारह बजते बजते बड़ी जोर की भूख लग आई।

मन में यही प्रश्न उठ रहा है कि ये कमबख्त कब ड्राइवर साहब गाड़ी पर विराम लगाएंगे और हमें भोजन करने का अवसर मिलेगा। जैसे आगे बैठे ड्राइवर ने सबसे पीछे बैठे मेरे मन की बात सुन ली।

खाना पीना

आधा सफर तय करने के बाद बस एक ढाबे पर रूकी। बस के रुकते ही सवारियों ने ढाबे पर धावा बोल दिया। मैं लेट लतीफ सबके उतर जाने के बाद इत्मीनान से उतरा।

बस में बैठी स्कूली छात्राओं को बैग की निगरानी में लगा दिया। शांत पर्यावरण में बने इस ढाबे की अलग ही रौनक है। पहुंचा और फुल थाली का ऑर्डर दिया।

अब तक बस की अधिकतर सवारियां खाना खा कर उठ भी चुकी हैं और यहाँ अभी मैं सबकी थाली ही निहार रहा हूँ। मेरी साजी हुई थाली आई और वेटर को जल्दी जल्दी रोटियां लाने को कहा ताकि समय रहते निकला जा सके।

आधा खाना भी नहीं खाया था कि बस का हॉर्न बज उठा। ढाबे में मेरे अतिरिक्त अभी कुछ सवारियां है जो आराम से खा रही थी अब यही हांथ रॉकेट की तरह चलने लगे।

दूसरा हॉर्न बजते बजते मुझे छोड़ बाकी सवारियां उठ कर जा चूंकि हैं। या तो मुझे खाने में देर हो गई या बस जल्दी निकल रही है। लेकिन जो भी हो मैं ना खाना छोड़ने वाला हूँ ना बस।

अन्न की बरबादी मुझसे नहीं की जाती ना कभी मैंने की। तीसरे हॉर्न बजने पर ढाबे में जितनी खुराक ले रहे थे, सभी सवारियां बस के इर्द गिर्द इक्कट्ठा हो गईं।

मैं और साथी अजय अभी भी लगे हुए हैं। इससे पहले कंडक्टर पुकारता अजय अपना खाना खाकर निकल गया बस की तरफ। हद्द तो तब हो गई जब बस में बैठे सभी यात्री एक टुक मेरे ही आने का इंतजार करने लगे।

ड्राइवर साहब भी ज़ोर ज़ोर से हॉर्न बजा इशारा किए जा रहे हैं। बस में लगभग सभी सवारियां चढ़ चुकी हैं सिवाय मुझे छोड़ कर। बस कुछ देर में परदेसी ना हो जाए।

कंडक्टर बाबू को बस से नीचे उतरना पडा मुझे लेने लेकिन मैं टस से मस नहीं हुआ। खाना खतम करने से लेकर भुगतान करने तक बस इंतजार करती रही।

जब ढाबे से निकला तब मानो विजय की ध्वनि मेरे कानों में बजने लगी। कंडक्टर के अलावा धरातल पर कोई ना था।

बस में चढ़ रहा हूँ मानो मेरा स्वागत तालियों की गड़गड़ाहट के साथ होगा। पर मेरी कल्पना से परे ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। बैग और छात्राएं वहीं की वहीं थीं।

कुछ भी ना बदला था सिवाय मेरे भूख के। बस का दरवाज़ा बंद हुआ और चल पड़ी पठानकोट। अब चंद घंटो का सफर और तय करना है फिर मैं मंज़िल पर।

योजना अनुसार पठानकोट पहुंचने के पहले कुछ यात्रियों से मैंने ट्रेन से कटरा जाने के लिए उचित जगह उतरने को पूछा, जहाँ से रेलवे स्टेशन नज़दीक हो।

पठानकोट जाते वक़्त हाईवे से गुज़रती बस

इस पर सुस्ताते हुए एक भाई साहब बोल पड़े ट्रेन से क्यों बस से ही निकल जाओ वो आपको बीच मार्ग से मिल जाएगी। मन ही मन ज़ोर से बोला ट्रेन और बस में जो गति का फर्क होता है इसलिए ट्रेन मेरी प्राथमिकता रहती है समझे दद्दू!

जम्मू की तैयारी

उनकी बात को ध्यान में रखते हुए मैं बताई हुई जगह पर उतर गया। ठीक नाई की दुकान के सामने। नाई से जम्मू जाने वाली बस के बारे में जानकारी जुटाने लगा।

उन्होंने एक किनारे खड़े हो बस का इंतजार करने को कहा। उनका बोलना ही हुआ कि जम्मू की ओर जाने वाली बस आ धमकी। खाली बस में लद के निकल गया जम्मू जहाँ से कटरा और फिर माता के दरबार।

शाम के चार बजे जम्मू में दाखिल होते ही मोबाइल में लगे दोनों सिम के नेटवर्क जाम हो गए। ये मैं दूसरी मर्तबा बीस बरस बाद जम्मू में दाखिल हुआ हूँ।

मुझे याद है वो दिन आज भी जब ट्रेन से मैं जम्मू गया था और जिस पुल से गुज़रा था वो अद्भुद दृश्य आज भी मेरे दिमाग में वैसा का वैसा ही बसा है। खैर वो पंजाब के रास्ते होते हुए गया था अब हिमाचल से होते हुए जा रहा हूँ।

उस समय मोबाइल नहीं था, अब मोबाइल है लेकिन कोई नेटवर्क नहीं है। इस समय मोबाइल एक बेकार डब्बे में परिवर्तित हो गया है।

फोटो खींचने के अलावा इसका क्या ही काम। जम्मू की वेशभूषा ही सबसे अलग दिखीं जहाँ सब कुर्ता पैजामा में ही नज़र आ रहे हैं। शाम के छह बजे तक जम्मू पहुंचने के बाद कटरा के लिए दूसरी बस पकड़ी।

ये बार बार बस बदलना भी एक कला है जो हर किसी के बस की नहीं। जिसे करना तो पड़ेगा ही वरना कहाँ को आए और कहाँ को जाओगे वाला हाल हो जाएगा।

कटरा के मार्ग पर पहाड़ियां धर्मशाला की पहाड़ियों से बिल्कुल अलग। तमाम पेड़ो से घिरी सीधी पहाड़ियां मानो स्वर्ग का मार्ग यहीं से हो।

मैनें अपना मेमोरी कार्ड और पेन ड्राइव से भरा डब्बा निकाला और कैमरे का मोबाइल की सारे फोटो और वीडियो इसमें ट्रांसफर करने में जुट गया।

कटरा जाने के लिए चप्पे चप्पे पर चैकिंग है। जो यात्री हैं उनका बैग भी अच्छे से जांचा जा रहा है।

इसी तरह एक नाकेबंदी पर बस रूकी और बाहर से आने वाले सभी यात्रियों को बैग सहित नीचे उतारा गया। पहली दफा तो मुझे यही लगा कि हमें नीचे उतार ये बस नौ दो ग्यारह ना हो जाए।

बस भी धीरे धीरे बढ़ रही है जिससे यही आभास हो रहा है। नाकेबंदी पर एक पुलिसवाले ने आधार कार्ड देखा दूसरे ने बैग जांचा और कुछ सवाल पूछने के बाद वापस भेज दिया।

जिस तरह का माहौल है उसे देखते हुए मुझे तो एक पल के लिए लगा ये पुलिसवाले ही मुझे बंदी बना लेंगे। मैं चैन कि सांस लेते हुए बैग ले कर वापस अपनी सीट पर आ बैठा।

पहाड़ी दर पहाड़ी निकलने के बाद शाम के करीब सात बजे तक मैं आखिरकार कटरा पहुंच ही गया

धर्मशाला क्रिकेट स्टेडियम से टिकट लेते हुए लेखक

5 Comments

  1. Ankita Sharad says:

    Omg! I’m in love with your hindi writing style. Aisa lag raha tha padhte time as if travel book hindi main padh rahi hu. Ky baat

  2. Aditya Sharma says:

    Ur work , dedication and thrilling adventure inspired me a lot, It’s too good dude .

  3. Fotosapien_s says:

    Wow nice narratives. Loved this travelling story. PK movie dialogue, lift krade song😄, how to mentioned about the mountains and the views and that bus travel and your hunger story… anna ko brbad krna psnd nhi👍..
    Seems like I m travelling along with. Keep it up.

  4. Rahul kumar says:

    Nice post … when i read it, looks like i am visiting in place of you at each place you mentioned not in this posts other post also.

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