दक्षिण भारत का सबसे खूबसूरत तट

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वरकला निकलने की तैयारी

कल रात जब चर्चा चल रही थी घूमने कि, तब सामुदायिक मित्र अखिल ने वरकला जाने का सुझाव दिया उसके बाद तिरुवनंतपुरम घूमने का।

सुझाव बेहतरीन है इसी पर अमल करते हुए सुबह से ही वरकला जाने तैयारी भी होने लगी। कल कन्याकुमारी से आने के बाद दिन का सही उपयोग करते हुए मैले कुचैले कपड़े धो डाले।

सुखाने की भी जगह अच्छी मिल गई थी। पर यहाँ तिरुवनंतपुरम में लोगो की छतें भी टीन से ढकी हुई है। ऐसा इसलिए क्योंकि यहाँ अक्सर पानी बरसता रहता है।

एक कारण तो समुद्र है दूसरा यहाँ को हरियाली। कल जब छत पर पहुंचा तो लगा ही नहीं किसी शहर में हूँ। छत से बाहर झांकने पर यही लगता रहा की किसी जंगल में आ गया हूँ।

सुबह अखिल समय से अपने कार्यालय निकल गए चाभी मुझे थमा कर। अपने नए कार्यक्रम के अनुसार मैंने उनको सूचित कर दिया कि संभव है आज वापस आ कर शायद निकल जाऊ कोच्चि के लिए।

यहाँ रेलवे क्वार्टर से मुझे निकलने में थोड़ा विलंब हो रहा है। योजनानुसार तिरुवनंतपुरम रेलवे स्टेशन से ट्रेन पकड़ कर वरकला स्टेशन पहुंच जाऊंगा जो सुविधाजनक रहेगा। समय को ध्यान में रखते हुए टिकट भी स्टेशन के समीप पहुंच कर आरक्षित कराना है।

अगर जल्दी निकलता तो इस तेज धूप में वरकला के तट पर बदन की सिकाई हो जाती। इसलिए बारह बजे तक निकलना उपयुक्त रहा।

घर में ताला डाला और अखिल के द्वारा बताई हुई जगह पर चाभी रख निकल लिया बस अड्डे।

यहाँ की रेल बस्ती भी अन्य किसी रेल बस्ती से भिन्न और बहुत ही साफ सुथरी है। फाटक से महज कुछ दूरी पर बस अड्डा है। यहीं सभी की तरह दुकानों के सामने मैं भी स्टेशन जाने वाली बस का इंतजार करने लगा।

त्रिवेंद्रम में बस सुविधा जबरदस्त है इसमें कोई दो राय नहीं। क्यों केरल भारत का सबसे शिक्षित राज्य है यह नजर आ रहा है। बसें पुरानी हैं लेकिन व्यवस्थित हैं।

तिरुवनंतपुरम से वरकला

ज्यादा देर नहीं खड़ा होना पड़ा। बस आते ही सभी सवारियां की तरह मैं भी लद कर निकल गया। पर बैठने की जगह नहीं है। बस में घंटी बजा कर परिचालक बस रुकवाता है और दरवाजा बंद करने के लिए रस्सी से बंद करता है।

कर्नाटक में तो सिटी बजा कर परिचालक बस रूकवाते हैं। एक से बड़ कर एक। ना ना प्रकार की सिटी।

रेलवे स्टेशन के पास बड़े बस अड्डे पर उतर कर पैदल स्टेशन की ओर निकल पड़ा। स्टेशन के निकट पहुंचते ही सामान्य टिकट आरक्षित हो गया।

या तो मोबाइल यंत्र पर टिकट आरक्षित करा लो या फिर कतार में लग कर घंटो प्रतिक्षा करो अपनी बारी का। जिसमे ट्रेन के छूटने का खतरा ज्यादा रहता है जैसा रांची में हुआ था।

मचान संख्या सात पर पहुंच कर गर्मी में ट्रेन का इंतजार करने लगा। गर्मी, उमस से बुरा हाल है। पसीना पानी की तरह बह रहा है।

दूसरा सामान्य वर्ग का डब्बा भी या तो सबसे आगे या सबसे पीछे। बीच में होने की कोई गुंजाइश नहीं। खचाखच भरी ट्रेन भी समय पर आई।

भीड़ इतनी की चढ़ना तो दूर पैर रखने की भी जगह नहीं। सीट पर से ले कर हवा में लटके दिखाइब्दे रहे हैं यात्री। जैसे तैसे कर के मैं भीतर घुसा। किसी तरह जगह बनाई खड़े होने के लिए। जहाँ का तहाँ खड़ा रह गया।

अब इसी अवस्था में वरकला तक पहुंचना है। अपने आप और भीतर धकेलते अंदर आ गया। ट्रेन में इतनी भीड़ की अपेक्षा नहीं थी। क्योंकि बंगाल के बाद अभी तक के सफर में सामान्य डिब्बे में सामान्य ही भीड़ मिली।

कुछ ही मिनटों में वरकला आ जाएगा। तब तक के लिए यह गर्मी, भीड़ बर्दाश्त किया जा सकता है।

कल शाम जब अखिल जी के घर पहुंचा तो सबसे पहले तो हम सभी बाहर निकले चाय पर चर्चा के लिए।

कोझुकट्टा जो स्वाद में नमकीन था वो खिलाया, स्वादिष्ट था लेकिन था लाजवाब। देर शाम बाहर से राशन खरीद कर उनके क्वार्टर पर ही खाना बनाया।

स्वास्थ के प्रति लोगों की इतनी जागरूकता काफी प्रभावित करने लायक हैं। पानी उबाल कर पीना। पानी तांबे के बर्तनों में पीना और भी अन्य चीजें।

बीच में स्टेशन पर गाड़ी रुकी। और सवारियों के उतरने के लिए मुझे भी उतरना पड़ा। लगा अब दोबारा चढ़ना मुश्किल होगा। यहीं ना छूट जाऊं। पर जोर जबरदस्ती कर अंदर चढ़ ही गया।

वर्कला रेलवे स्टेशन

वरकला आगमन

दो बजे तक मैं वरकला पहुंच गया। ट्रेन की भीड़ से छुटकारा मिला। स्टेशन से बाहर निकल गूगल नक्शे की सहयता से तटवर्ती इलाके की तरफ बढ़ चला गलियों से गुजरते हुए।

तेज़ धूप है लेकिन यहाँ से समुद्र तट तीन किमी है। दमकती धूप में पैदल चलना कहीं भारी ना पड़ जाए। धूप इतनी तेज की मुझे सिर पर अंगौछा डाल कर चलना पड़ रहा है धूप से बचने के लिए।

आंख पर चश्मा और सिर पर अंगौछा इस कदर पड़ा है की राहगीर मानने लगे की कोई दृष्टिहीन मानव अपने किसी साथी के साथ जा रहा है।

तीन बजे तक समुद्र तट के किनारे पहुंच गया। यहाँ स्वागत किया कुत्ते ने। वही किस्म का सात फीट का कुत्ता जो त्रिचि में नवीन के उद्यान में था। पर चाट का स्वाद ले रहे मानव इस कुत्ते से भयभीत हो रहे हैं।

यहीं एक किनारे पड़ी कुर्सी पर विराजमान हो गया। वाकई में इस समुद्र तट की जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है। बहुत खूबसूरत नज़ारा है जो कि देखते बनता है।

यह हिस्सा थोड़ा ऊंचाई पर है। कुछ क्षणों के विश्राम के बाद मैं नीचे उतर कर आ गया। काफी आगे तक निकल पड़ा। भारतीयों से ज्यादा विदेशी नजर आ रहे हैं।

उन्हें अपनी चमड़ी काली करने में ज्यादा आनंद का आभास होता है। इसलिए बालू में परिवार सहित लोट रहे हैं। यही भारतीयों के साथ विपरीत है।

काफी दूर चलने के बाद एक स्थान पर आ कर रुक गया। यह स्थान मुझे उपयुक्त लगा। सुरक्षित और कम भीड़ वाला इलाका। सामान रखकर समुंदर की लहरों में खो जाना। चेतावनी के अनुसार बहुत आगे जाना मना है।

पूर्व में ऐसा करने पार बड़े बड़े तैराक अपनी जान से हाथ धो बैठे हैं। इतनी गहराई है कुछ दूरी पर जिसे समीप जाना भी ख़तरनाक माना जाता है।

इसलिए जगह जगह सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए हैं यह देखने को की कोई सीमा तो नहीं लांघ रहा। कई बार ऐसा करने पर वो सिटी मार कर लोगों को वापस सीमा में आने का संकेत दे रहे हैं।

वर्कला तट पर स्नान

वरकला तट पर स्नान

कपड़े उतार मैं अपने छोटे बैग में भरकर सामने ही आ गया नहाने। ऐसी जगह जहाँ जूते चोरी होने का डर हो वहाँ जूते पहन कर ही मत आओ सो यही किया भी है।

पहले ही लहरों में जा मैं भी सबका साथ देने आ गया पानी में। लहरों के बीच झूल रहा हूँ। इतनी देर में साथी घुमक्कड़ कूद पड़ा।

हर बार लहर जब झोर का धक्का मारती उतनी बार अपने छोटे से अस्तित्व का एहसास होता। वो लहरे अहम तोड़ जाती थी हर बार। इन सबसे परे मेरी नजर सामान पर भी है क्यों की उन पैंट के बीच में दो मोबाइल लपेटे रखे हुए हैं।

हालांकि जूते पहन के ही नहीं आया। पता था समुंदर में कूदना है तो चप्पल ज्यादा बेहतर रहेंगी। खारा पानी बार बार मूह के अंदर, आंखो में घुस कर जलन पैदा कर रहा है।

सामने से अचानक एक लड़का दौड़ते हुए आया और उसने छलांग लगा दी लहरों के ऊपर। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे अक्षय कुमार की फिल्म भूल भूलैया ने एक बालक दौड़कर पानी में छलांग मारता है। ऐसे कूड़ा की आसपास के लोग घबरा गए।

उसका यह कृत्य देख मैं आश्चर्य में पड़ गया। समुंदर में कौन कूदता है भाई?? पास बुलाकर उसका नाम, पता पूछा? बकौल, कोई सरकारी इम्तिहान देने आया था गोरखपुर से। गोरखपुर से वरकला परीक्षा देने।

शायद अच्छा चला गया इम्तिहान इसलिए इतना उत्साहित है। थोड़ी देर में मैं वहाँ से निकल कर साफ पानी से नहा कर एक शांतचित जगह पर काफी देर बैठा रहा।

काफी देर समुद्र में रहने के बाद अब लग रहा है निकलना चाहिए पानी से बाहर। पास ही में साफ पानी का नलका है। जिसकी और बढ़ कर यहीं पर शरीर स्वच्छ कर रहा हूँ। साथी घुमक्कड़ भी।

तट किनारे पर से अपना बैग मोबाइल उठा उस कोने पर निकल पड़ा जहाँ चट्टानों से लहरे टकरा कर अद्भुत दृश्य ही पेश कर रही हैं।

यहीं इसी किनारे बैग रख कर शांति में बैठ गया। कुछ ही आगे से ऊपर जाने का रास्ता भी है। शाम तक बैठ कर इसी रास्ते से निकल जाऊंगा।

समुद्र तट पर अक्सर कुत्ते खूंखार ही पाए जाते हैं। ऐसा शायद इसलिए क्यों की वह मछली इत्यादि खाने के आदी हो जाते हैं।

ऐसे ही यहाँ के दो खूंखार कुत्ते दांत बाहर निकाले मेरी तरफ बढ़ रहे हैं। मेरी किसी भी कृत पर वह मुझे काटने को आतुर दिख रहे हैं।

वर्कला तट के किनारे चट्टान पर तस्वीर

पास में पड़ी लाठी उठा कर जैसे ही फेकना हुआ दोनो भाग खड़े हुए। वरना आज इनसे कटना तय था। शांतचित जगह पर बैठ समुद्र की लहरों को सुनना बहुत ही मनमोहक है।

कैमरा निकाल यहाँ पर खचाखच तस्वीरें लेने लगा। मोबाइल से गोप्रो से और अपने कैमरे से भी अच्छी तस्वीरें निकली। लहरों के साथ चट्टानों पर।

थिरुवनंतपुरम वापसी

सूरज ढल रहा है और संभवः मैं सूर्यास्त होते ही वापस थिरुवनंतपुरम की ओर कूच कर जाऊंगा। सूर्यास्त होते समय काफी तस्वीरें ली।

अंधेरा होने से पहले पहले तक पास के रास्ते से ऊपर आ गया। यहाँ तो बहुत बड़ा बाजार दिख रहा है। अधिकांश विदेशी ही यहाँ देखे जा सकते हैं।

जिनके लिए विशेष कार्यक्रम का आयोजन भी हो रहा है कुछ दुकानों में। पुस्तकालय भी रेस्त्रां भी हर ओर विदेशियों का बोल बाला।

देसी सिर्फ अपने परिवारों के साथ घूमते नजर आ रहे हैं। अभी तो मैं भी मनमौजी तरह से घूम रहा हूँ। कुछ सालों बाद मैं भी जिम्मेदारियों के साथ होऊंगा।

हेलीपैड दर्शाता है वर्कला की लोकप्रियता

यहाँ अंत में हेलीपैड भी मिला। यहीं से पैदल निकल पड़ा वरकला स्टेशन की ओर। दिन के मुकाबले रात में मालूम ही नहीं पड़ा कब पहुंच गया स्टेशन।

स्टेशन पर ही टिकट आरक्षित करवा कर प्रतीक्षा करने लगा ट्रेन की। मचान संख्या पांच पर। ट्रेन कुछ ही देर में आ खड़ी हुई। निकल पड़ा थिरुवनंतपुरम की ओर।

इस बार ट्रेन में पर्याप्त जगह है। बैठने को भी मिल रहा है। कोई लेटना चाहे तो उसके लिए भी जगह हो जाएगी।

थिरुवनंतपुरम पहुंचते पहुंचते काफी शाम हो चुकी है। स्टेशन से बस पकड़ कर घर की ओर आ गया। जैसे ही बस से नीचे उतरेगा दरवाजे पर लगी कील में चप्पल फस के टूट गई। देश के अंतिम छोर पर आ कर दम तोड दिया चप्पल ने।

पास के कूडादान में वो चप्पल डाल दी। आसपास कोई दुकान भी नही जहाँ से नई खरीद कर पहन कर चल सकूं। नंगे पैर ही निकलना पड़ रहा है घर की ओर।

शाम की चाय के लिए पास की दुकान में आ गया। लग रहा है अपने कार्यालयों से छूट कर यहीं आ गए हैं सब। चाय की चुस्की के बाद भूख का निवारण करने आगे की ही दुकान में आ गया।

यहाँ डोसा मंगा कर डोसे का स्वाद चखा। खा पी कर भुगतान न अंततः रेलवे क्वार्टर आया। लेकिन यहाँ अखिल जी मौजूद नहीं हैं।

थोड़ी देर में वह आ गए। बताया की पास के ही मैदान में खेलने चले गए थे। पसीने से लथपथ।

कुछ बातें उन्होंने अपने तो कुछ केरल के बारे में बताई। एक और रात थिरुवनंतपुरम में गुजारने की गुजारिश पर अखिल जी राजी हो गए।

थिरुवनंतपुरम से वर्कला तक का कुल सफर 100किमी

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